Sunday, July 10, 2011

Political Dairy of Seoni Dist- Of M.P.

जैन नेताओं को उपकृत करने की बात पता चलते ही नरेश को रोकने नीता ने भोेपाल में डेरा डालकर क्या पत्ता कटवा दिया?











हाल ही में प्रदेश योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में जब बाबूलाल जैन की नियुक्ति की घोषणा हुयी तब राज खुला कि मैडम वहां क्यों डटीं थींर्षोर्षो बताया जाता हैं कि नीता जी को यह पता चल गया था कि कुछ जैन नेता लाल बत्ती से नवाजे जाने वालें हैं। यह मालूम होते ही उन्होंने भोपाल में डेरा डाल कर पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को रोकने की रणनीति बना डाली। वैसे यह माना जाता हैं कि नौ महीने तके गर्भस्थ रहने वाला शिशु पूरी तरह परिपक्व हो जाता हैं। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि निर्वाचन के पूरे नौ महीने बाद घोषित होने वाले कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी कितने परिपक्व साबित होते हैंर्षोर्षोकांग्रेस की राजनीति में गुमनामी के दौर से गुजरने वाले नेता तो बहुत सारे हैं लेकिन उनमें से एक फोटो एक विज्ञापन में आने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं चल रहीं हैं।सासंद के.डी.देशमुख सिवनी आते हैं और कभी स्कूलों का तो कभी अस्पताल का निरीक्षण करके कलेक्टर और एस.पी. से चर्चा करते हैं तो पूरे जिले में बिक रही अवैध शराब की बिक्री को रोकने की बात कहने से अपने आप को नहीं रोक पा रहें हैं। भाजपायी राजनीति के जानकारों का मानना हैं कि पूर्व मंत्री स्व. महेश शुक्ला के भतीजे सुरेंद्र शुक्ला की इस जीत को नीता पटेरिया भुनाएंगी और राजेश त्रिवेदी के सामने एक ब्राम्हण नेता के रूप में उनका उपयोग करेंगीं।









नरेश को रोकने नीता डटी रहीं भोपाल में -विधायक नीता पटेरिया प्रदेश के दौरे के नाम पर प्रदेश की राजधानी भोपाल में जमीं रहीं। लोगों को अंदाज नहीं हो पाया कि वे ऐसा क्यों कर रहीं हैंर्षोर्षो हाल ही में प्रदेश योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में जब बाबूलाल जैन की नियुक्ति की घोषणा हुयी तब राज खुला कि मैडम वहां क्यों डटीं थींर्षोर्षो बताया जाता हैं कि नीता जी को यह पता चल गया था कि कुछ जैन नेता लाल बत्ती से नवाजे जाने वालें हैं। यह मालूम होते ही उन्होंने भोपाल में डेरा डाल कर पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को रोकने की रणनीति बना डाली। सिवनी के नीता और नरेश दोनों ही लाल बत्ती के प्रबल दावेदार हैं। नीता पूर्व सांसद हैं और एक मात्र वे ही विधायक बने सांसदोंं में बचीं हैं जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया हैं।दूसरी ओर नरेश दिवाकर ऐसेहैं जिनकी टिकिट काट कर नीता को दी गई थी और पार्टी ने नीता को जीतने के बाद से उन्हें उपकृत नहीं किया हैं। लेकिन दोनो ही नेताओं यह होड़ लगी हैं कि पहले लाल बत्ती उन्हें मिले वरना बाद में दूसरे को मिल जाय इसकी कोई गारंटी नहीं हैं। इसलिए मौका आते ही दोनो एक दूसरे के खिलाफ जुट जातें हैं और नतीजा सिफर ही निकलता हैं।योजना आयोग में बाबूलाल जैन की नियुक्ति से अब नरेश की राह और मुश्किल हो जाएगी क्योंकि पहले भी काफी जैन नेताओं को भाजपा लाल बत्ती से नवाज चुकी हैं।









कितने परिपक्व साबित होगें हीरा आसवानी? -निर्वाचन के नौ महीने बाद आखिर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में हीरा आसवानी की ताजपोशी हो ही गई। इस दौरान वर्तमान और भावी अध्यक्ष के बीच जैसी तना तनी चली वह किसी से छिपी नहीं हैं। कार्यक्रमों का कौन इंतजाम करें और कौन अध्यक्ष बन कर बैठा रहें? यही खेल इन नौ महीनों में चलता रहा हैं।जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह के अत्यंत विश्वास पात्रों में गिने जाने वाले इंका नेताओं में हीरा आसवानी के अध्यक्ष बनने से यह माना जा रहा हैं कि भाजपा का नेतृत्व युवा सुजीत जैन के हाथों में सौंपे जाने के बाद युवा को ही कांग्रेस की कमान सौंपने के उद्देश्य से यह नियुक्ति की गई हैं। वैसे तो हीरा आसवानी को संगठन का लंबा अनुभव हैं और वे हरवंश समर्थक नेताओं की तरह अन्य इंका नेताओं में अछूत भी नहीं माने जाते हैं। लेकिन फिर भी यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हरवंश सिंह से उन्हें काम करने में कितनी छूट मिल पाती हैं। यदि जितनी चाबी भरी राम ने की तर्ज पर ही काम चला तो पिछले अध्यक्ष महेश मालू के कार्यकाल से इनका कार्यकाल कुछ अलग नहीं होगा। वैसे यह माना जाता हैं कि नौ महीने तके गर्भस्थ रहने वाला शिशु पूरी तरह परिपक्व हो जाता हैं। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि निर्वाचन के पूरे नौ महीने घोषित होने वाले कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी कितने परिपक्व साबित होते हैंर्षोर्षो और कब अपने महामंत्रियों की घोषणा कर पाते हैं क्यों कि सुरेश पचौरी के कार्यकाल में ही घोषित हो चुके ब्लाक इंका अध्यक्ष अब तक अपने महामंत्रियों की घोषणा नहीं कर पाएं हैं?









विज्ञापन में छपी एक फोटो इंकाइयों में चर्चित- नव नियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी के आभार और बधायी के विज्ञापनों में एक विज्ञापन इंकाइयों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ हैं। कांग्रेस की राजनीति में गुमनामी के दौर से गुजरने वाले नेता तो बहुत सारे हैं लेकिन उनमें से एक फोटो एक विज्ञापन में आने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं चल रहीं हैं। कुछ इंका नेताओं का यह दावा हैं कि एक इंका नेता ने अपनी फोटो का मोह त्याग कर ये कारनामा कर दिखाया हैं। वैसे हमेशा से सुर्खियों रहने वाले इंका नेताओं में ये भी एक माने जाते थे लेकिन लंबे समय से गुमनामी में रहना उनही नियति बन चुकी हैं? या किसी सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हैर्षोर्षो इसे लेकर लोगों का अलग अलग मत हैं। वास्तविकता चाहे जो भी हो लेकिन हीरा आसवानी के अध्यक्ष बनने के विज्ञापनों ने चर्चाओं का एक मुद्दा तो दे ही दिया हैं।









इशारों को अगर समझो राज को राज रहने दो-सासंद के.डी.देशमुख लगभग हर सोमवार को सिवनी आते हैं और कभी स्कूलों का तो कभी अस्पताल का निरीक्षण करके जब भी कलेक्टर और एस.पी. से चर्चा करते हैं तो पूरे जिले में गांव गांव में बिक रही अवैध शराब की बिक्री को रोकने की बात कहने से अपने आप को नहीं रोक पा रहें हैं। निर्माण कार्यों में भी भ्रष्टाचार की बात वे कभी कभी करते हैं लेकिन अवैध शराब के धंधें की चिंता हैं कि उनका पिंड़ ही नहीं छोड़ रही हैं। भाजपायी हल्कों में इस बात को लेकर बहुत सी चर्चाएं जारी हैं।कुछ भाजपा नेता तो यह तक कहते पाए जा रहें हैं कि या तो शराब ठेकेदार और आबकारी विभाग भाऊ का इशारा ही नहीं समझ पा रहा हैं या फिर समझ कर भी जानबूझ कर अनजान बना हुआ हैं? कुछ नेता तो गाने के ये बोल बोल कर मजा ले रहें हैं कि Þइशारों को अगर समझो,राज को राज रहने दोÞ। अब इसमें राज क्या हैं और इशारा क्या है? येभाजपा नेता ही जाने लेकिन ऐसी चर्चाएं किसी भी जनप्रतिनिधि की सेहत के लिए अच्छभ् नहीं होतीं हैं।









सुरेंद्र की जीत से गर्माएगी भाजपायी गुटबंदी-अभिभाषक संघ के चुनाव में सुरेंद्र शुक्ला के अध्यक्ष चुने जाने से भाजपा की स्थानीय गुटबंदी में तेजी आने की संभावना व्यक्त की जा रही हैं। सिवनी के दो जन प्रतिनिधियों के बीच खिंची तलवारें तो जगजाहिर ही हैं। विधायक नीता पटेरिया और नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी कई मौकों पर एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आए हैं। भाजपायी राजनीति के जानकारों का मानना हैं कि पूर्व मंत्री स्व. महेश शुक्ला के भतीजे सुरेंद्र शुक्ला की इस जीत को नीता पटेरिया भुनाएंगी और राजेश त्रिवेदी के सामने एक ब्राम्हण नेता के रूप में उनका उपयोग करेंगीं।यहां यह उल्लेखनीय हैं कि राजेश त्रिवेदी भी आगे विधानसभा की टिकिट के दावेदार के रूप में उभर सकते हैं। यदि नीता पटेरिया दिल्ली की राजनीति में एक बार फिर जाना चाहेंगी तो ऐसी परिस्थिति में नीता विकल्प के रूप में सुरेंद्र शुक्ला का नाम अड़ा सकतीं हैं। यहां महेश शुक्ला का नाम उनके लिए उपयोगी साबित हो सकता हैं। राजेश के अरविंद मैनन से संबंध उनके दावे को पुख्ता कर सकते हैं। ऐसी हालात में जब दो ब्राम्हण नेता आमने सामने होंगें तो इस खींचातानी में विकल्प के रूप में नीता पटेरिया अपने विश्वस्त ब्राम्हण नेता प्रेम तिवारी को सामने कर निर्णायक स्थिति बना सकतीं हैं। यहां यह भी दावा किया जा रहा हैं कि सिवनी विधानसभा क्षेत्र में ब्राम्हणों की निर्णायक संख्या को देखते हुए अगली टिकिट भी ब्राम्हण नेता को ही देना भाजपा की मजबूरी होगी। इसका कारण यह बताया जा रहा हैं कि पूरे जिले के ब्राम्हणों ने नीताको जिता कर यह सोचा था कि भाजपा उन्हें मंत्री बनाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद यदि सिवनी की टिकिट भी ब्राम्हण को देने के बजाय किसी और को दी गई तो जिले भर के ब्राम्हण मतदाताओं की नाराजगी भाजपा को भुगतना पड़ सकता हैं। हालांकि यह सब कुछ बहुत दूर की बातें हैं लेकिन दूर की कौड़ी चलने वाले इन सारे समीकरणों पर पैनी नज़र रखें हुए हैं।







Monday, July 4, 2011

plitical dairy of seoni disst. of M.P.

क्या राहुल और भूरिया की धार बोथली साबित करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत जबेरा में हराया गया कांग्रेस को?

विधायक नीता पटेरिया पर भाजपा के ही अन्य जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा करने के आरोप पार्टी में ही चस्पा हो रहें हैं। बीते दिनों जनपद पंचायत सिवनी की अध्यक्ष किरण अवधिया ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके नीता पटेरिया को कठघरे में खड़ा कर भाजपा से त्यागपत्र दे दिया हैं। उनका आरोप हैं कि नीता की ही शह पर सी.ओ.उन्हें ना केवल नकार रहीं हैं वरन अपमानित भी कर रहीं हैं। जबेरा में इंका की हार के बारे में राजनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना हैं कि अजय सिंह और भूरिया को बोथला साबित करने के लिए तथा इंका महासचिव दिग्विजय सिंह पर वार करने के लिए प्रदेश के क्षत्रपों को हथियार मुहैया कराने के लिए यह सब एक सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हैं।पिछले लंबे समय से इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह स्वयं प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष बनने की जुगाड़ में लगे थे। लेकिन उनके दागदार इतिहास के चलते उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी।केवलारी विस क्षेत्र के भाजपा के प्रभारी बनने के बाद प्रदेश के मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने अपने अंदाज में दौरे चालू कर दिए हैं। अपने कार्यक्रमों में वे ना केवल अधिकारियों को चमका रहें हैं वरन इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के समाने यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि यदि ठीक से काम नहीं करोगे तो तुम्हें कोई बचा भी नहीं पाएगा।

नीता पर उपेक्षा का आरोप लगा भाजपा छोड़ी जनपद अध्यक्ष किरण ने -विधायक नीता पटेरिया पर भाजपा के ही अन्य जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा करने के आरोप पार्टी में ही चस्पा हो रहें हैं। बीते दिनों जनपद पंचायत सिवनी की अध्यक्ष किरण अवधिया ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके नीता पटेरिया को कठघरे में खड़ा कर दिया हैं। उनका आरोप हैं कि नीता की ही शह पर सी.ओ.उन्हें ना केवल नकार रहीं हैं वरन अपमानित भी कर रहीं है और उनके द्वारा शिकायत करने के बाद भी भाजपा की ही सरकार में कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। जनपद अध्यक्ष ने अपने पति वरिष्ठ भाजपा नेता किशोरी लाल अवधिया ने भाजपा की सदस्यता से स्तीफा देने की घोषणा कर दी हैं। यहां यह उल्लेखनीय है केवलारी विस क्षेत्र के गा्रम कान्हीवाड़ा की रहने वाली किरण अवधिया की मारक क्षमता सिवनी विसक्षेत्र में नहीं हें इसलिए ही शायद वे विधायक नीता पटेरिया द्वारा उपेक्षित की जा रहीं थीं। हालांकि अभी उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ली हैं लेकिन ऐसे कयास लगाए जा रहें हैं कि अब शायद वे हरवंश सिंह के प्रयासों से इंका की सदस्यता ले लेंगी।यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जनपद चुनाव के दौरान किरण ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी और इंका के कुछ हरवंश विरोधियों ने उन्हें जिता दिया था। वे तत्कालीन प्रदेश इंका अध्यक्ष सुरेश पचौरी के कार्यक्रम में शामिल भी हुयीं थीं लेकिन ना तो उन्हें कांग्रेस में तव्वजो मिली और ना ही उन्होंने भाजपा का दामन छोड़ा था। उनके पति किशोरीलाल अवधिया क्षेत्र के वरिष्ठ भाजपायी नेता माने जाते हैं। उसके बाद भी उनकी पत्नी की उपेक्षा ने उन्हें भी इतना प्रताड़ित किया कि उन्होंने भी भाजपा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया हैं। भाजपा विधायक नीता पटेरिया पर इस आरोप के बाद छपारा क्षेत्र के दो जनप्रतिनिधियों ने भी उपेक्षा का आरोप चस्पा कर दिया हैं। नप अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के समर्थक भी उनके हो रहे विरोध के पीछे विधायक नीता पटेरिया की भूमिका ही बताते हैं। इस सबको देखकर यही कहा जा सकता हैं किम यह कहावत सौ फीसदी सही हैं कि राज के साथ राजरोग आते ही हैं।

जबेरा में इंका की हार क्या सोची समझी रणनीति थी?-इंका विधायक रत्नेश सालोमन के निधन से रिक्त हुयी जबेरा विधानसभा सीट से उनकी बेटी डॉ. तान्या सालोमन की उप चुनाव में भारी हार से इंका की राजनीति में बवाल आ गया हैं। जहां एक ओर प्रदेश स्तर पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और चुनाव संचालक हरवंश को घेरने के प्रयास किए जा रहें हैं तो वहीं दूसरी ओर इस हार को इस रूप में भी देखा जा रहा हैं कुछ अति महत्वाकांक्षी इंका नेताओं ने सोची समझी रणनीति के तहत इंका की नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की धार कमजोर करने के लिए यह षड़यंत्र रच कर सफलता हासिल कर ली हैं। पिछले लंबे समय से इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह स्वयं प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष बनने की जुगाड़ में लगे थे। लेकिन उनके दागदार इतिहास के चलते उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी। भूरिया और अजय सिंह के समय भी ये दौड़ में थे और कुछ पाना तो दूर जो विस उपाध्यक्ष का पद उनके पास हैं वह भी दांव में लग गया था। अजय सिंह की नियुक्ति और प्रियव्रत सिंह के प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए जाने के बाद हरवंश सिंह का पद दांव में लगा हुआ हैं। अपने लाभ के लिए पार्टी से गद्दारी और भाजपा से सांठ गांठ करना उनका शगल बन चुका हैं। अतीत के ऐसे कई उदाहरणों की समय समयपर इंका नेताओं ने आला कमान को शिकायतें भी भेजी थीं लेकिन इनके प्रभाव के चलते वे सब ठंड़े बस्ते में चली जाती हैं। प्रदेश का कोई ना कोई बड़ा इंका नेता उन्हें बचा लेता हैं। हरवंश के इन्हीं कारनामों के चलते उनके गृह जिले सिवनी में लोकसभा दो बार से,सिवनी और बरघाट विस पिछले पांच चुनावों से, लखनादौन दो चुनावों से और सिवनी नगर पालिका अध्यक्ष दो चुनावों स कांग्रेस हारती जा रही हैं। जिले की एक मात्र केवलारी विस क्षेत्र से हरवंश सिंह तो पिछले चार चुनावों से विधायक बनते आ रहें हैं लेकिन उनके क्षेत्र से चंद महीनों बाद कांग्रेस लोकसभा चुनाव में हर बार हार जाती हैं। इंका नेता आशुतोष वर्मा ने इस बारे में प्रमाणों के साथ कई बार आलाकमान के सामने अपना रोना रोया लेकिन हरवंश सिंह कुछ भुगतने बजाय हर बार कुछ ना कुछ पाते ही रहे। जबेरा चुनाव में कांग्रेस की हार से हरवंश सिंह के राजदार कांग्रेसी नेता बहुत खुश दिखायी दे रहे हैं और यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि यदि हरवंश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाता तो कांग्रेस को ये दिन नहीं देखने पड़ते। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना हैं कि अजय सिंह और भूरिया को बोथला साबित करने के लिए तथा इंका महासचिव दिग्विजय सिंह पर वार करने के लिए प्रदेश के क्षत्रपों को हथियार मुहैया कराने के लिए यह सब एक सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हैं। यहां यह उल्लेखनीय हैं कि अजय सिंह ने साफ शब्दों में भोपाल की स्वागत रैली में मंच से यह तक कह दिया था कि हम प्रदेश में कांग्रेस की सरकार तो बना लेंगें अगर हरवंश सिह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की मदद करना बंद कर दें। कुछ इंकाइयों का तो यह भी मानना हैं कि हरवंश सिंह ने अपना पद बचाने लिए जानबूझ कर कांग्रेस को हार के गर्त में गिराया हैं ताकि अजय सिंह और भूरिया उन पर स्तीफा देने के लिए कुछ कहने के लायक ही ना रह जाए और उनका पद बच जाए। हरवंश सिंह को चुनाव संचालक बनाने के फैसले को कुछ विश्लेषक आत्मघाती निर्णय मान रहें हैं। दिग्गी राजा से हरवंश सिंह की पिछली निकटता को आधार बनाकर प्रदेश के कुछ इंकाई क्षत्रप दिग्गी राजा पर आक्रमण करने की रणनीति बनाने में भी जुट गए हैं। वैसे पिछले दिनों कांग्रेस आला कमान द्वारा बनायी गईं तीन महत्वपूर्ण समितियोंमें हरवंश सिंह को शामिल ना किए जाने को लेकर भी तरह तरह की अटकलें जारी हैं जबकि उनसे कद में बौने कई इंका नेताओं को इनमें शामिल किया गया हैं।

गौरी ने कमाल दिखाना शुरू किया केवलारी में-केवलारी विस क्षेत्र के भाजपा के प्रभारी बनने के बाद प्रदेश के मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने अपने अंदाज में दौरे चालू कर दिए हैं। अपने कार्यक्रमों में वे ना केवल अधिकारियों को चमका रहें हैं वरन इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के समाने यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि यदि ठीक से काम नहीं करोगे तो तुम्हें कोई बचा भी नहीं पाएगा। मंच से हरवंश सिंह पर तीखे प्रहार करके भाजपा कार्यकत्ताZओं की तालियां बटोरने में भी कामयाब रहें हैं। हरवंश सिंह और और गौरीशंकर बिसेन की राजनैतिक शैली एक जैसी हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में यह चर्चा व्याप्त हैं कि इन दोनों हरफन मौला नेताओं के बीच हाने वाली पेंतरें बाजी ना केवल रोचक होगी वरन किस अंजाम पर पहुचेंगीर्षोर्षो इस पर कुछ भी कहना संभव नहीं हैं। ये दोनों ही नेता यह मानकर चलते हैं कि राजनीति में ना तो हमेश कोई दुश्मन होता है औ ना ही दोस्त। इसलिए कब कौन किस पर दवाब बना कर अपना उल्लू सीधा कर लेर्षोर्षो यह देखने योग्य दृश्य होगा।