Friday, August 26, 2011

samyik teep

क्या संसद में भी हर सांसद को वो ही बोलना चाहिये जो अन्ना जी चाहते हैं? फिर बहस का तो सवाल ही नहीं उठता। अन्ना सीधे सीधे यह क्यों नहीं कह देते कि सभी सांसद चुपचाप मेरे लोकपाल बिल के पक्ष में हाथ उठाकर वोट डालें और पास करा दें नहीं तो अपना घर घिरवायें। राहुल गांधी कुछ बोल नहीं रहें थे तो भी आपत्ति थी और जब संसद में अपने विचार रखे तो कोप का भाजन बनना पड़ा। क्या अन्ना जी यही सच्चा लोकतंत्र हैं?

samyik teep

ऐसा कैसे हो सकता है कि अन्ना अपने लोकपाल को संपूर्ण मानकर उसके समानान्तर भ्रष्टाचार खत्म करने के अन्य लोगों के विचारों को सिरे से नकार रहें है। ताजा उदाहरण है राहुल गांधी के विचारों से असहमत होने पर उन्होंने अपने समर्थकों को उनके घर का घेराव करने भेज दिया।  याने उनके ही लोकपाल को मानो नहीं तो भुगतो।क्या आपको ऐसा नहीं लगता लोकतंत्र के सबसे बड़े हिमायती होने का दावा करने वाले अन्ना लोकतंत्र से ही शक्ति पाकर सबसे ज्यादा लोकतंत्र का दमन कर रहें हैं।   

Thursday, August 25, 2011

samyik teep

प्रजातंत्र में संसद सर्वाैच्च हैं। संसद ने प्रधानमंत्री की पहल पर जन लोकपाल बिल पेश कर उस पर बहस कराने का स्वागत किया हैं। स्पीकर सहित संसद ने अन्ना जी से अनशन समाप्त करने का आग्रह किया हैं। संसद के आग्रह को स्वीकार कर प्रजातंत्र के सजग प्रहरी अन्ना जी को अनशन क्या समाप्त नहीं कर देना चाहिये? उनके स्वास्थ्य की समूचे राष्ट्र को चिंता है। देश और युवा पीढ़ी ने अथाह समर्थन दिया है। संसद के आग्रह को स्वीकार ना करना क्या जनसमर्थन का दुरुपयोग नहीं है

Tuesday, August 23, 2011

plitical dairy of seoni disst. of M.P.

महिला मोर्चे की प्रदेशाध्यक्ष नीता पटेरिया के जिले में भ्रष्टाचार की आरोपी पार्वती जंघेला को पद पर बनाये रखने वाली भाजपा का अन्ना के समर्थन में धरना चर्चित











अन्ना के समर्थन में निकली विशाल रैली में भारी तादाद में युवकों छात्रों के अलावा जिले में अन्ना की कमान संभाहलने वाले राजेन्द्र गुप्ता और नरेन्द्र अग्रवाल के साथ भाजपा नेता नरेन्द्र ठाकुर एवं प्रवीण भारद्वाज सहित कई भाजपा कार्यकर्त्ता भी शामिल थे। प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया के गृह जिले में भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित होने के बाद भी पार्वती जंघेला को पद पर बनाये रखने वाली भाजपा का अन्ना के समर्थन में धरना चर्चा का विषय बना हुआ हैं। विधायक नीता पटेरिया और और कमल मर्सकोले की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुयी है। शिवराज के उपवास स्थगित होने की याद आते ही नरेश ने बमुश्किल हासिल हुयी लाल बत्ती को खतरे में डालने का जाखिम नहीं उठाया और भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाले धरने से परहेज करना ही उचित समझा नहीं तो उनकी उपस्थिति को लेकर भी व्यंग के तीर चलना कोई बड़ी बात नहीं होती। मीडिया प्रभारी श्रीकांत अग्रवाल के स्तीफे के पीछे भाजपा की गुटबाजी थीै या फिर कुछ और? इसे लेकर स्तीफा वापस होने के बाद भी जिज्ञासा बनी हुयी हैं।मीडिया प्रभारी बनने के लिये इच्छुक नेताओं ने अपने अपने आकाओं की गणेश परिक्रमा करना प्रारंभ कर दी हैं। अन्ना के आंदोलन के मूल मूद्दे भ्रंष्टाचार पर ऐसा आंदोलन चलाने की योजना बनायी गयी हैं जिसका राजनैतिक लाभ आगामी लोक सभा चुनाव में भाजपा को मिल सके।









अन्ना के समर्थन में निकली विशाल रैली-पूरे देश में इस वक्त अन्ना हजारे और लोकपाल बिल को लेकर सड़क से लेकर सदन तक तक धूम मची हुयी है। जिले में भी अन्ना की गिरफ्तारी से अभी तक प्रर्दशन और अनशन जारी हैं। अन्ना समर्थकों द्वारा 16 अगस्त को चार बजे शाम को गांधी चौक से विशाल रैली निकाली जिसमें युवकों छात्रों की भागीदारी भारी तादाद में रही। इस रैली में अन्ना समर्थकों की कमान संभाहलने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र गुप्ता और नरेन्द्र अग्रवाल प्रमुख रूप से शामिल थे। इसके अलावा इस रैली में भाजपा नेता प्रवीण भारद्वाज, नरेन्द्र ठाकुर के साथ भाजपा के कार्यकर्त्ता भी मौजूद थे। वकीलों ने मोटर सायकिल रैली के रूप में भागीदारी की थी।









र्पावती की उपस्थिति में अन्ना के समर्थन में भाजपा का धरना चर्चित-इसके बाद जिला भाजपा ने भी अन्ना की गिरफ्तारी के विरोध में एक दिवसीय धरना दिया।यह धरना जिला कलेक्टरेट के प्रतिबंधित क्षेत्र में हुआ जिसे लेकर ही भाजपा आरोपों के कठघरे में आ गयी हैं। इस धरने में जिला भाजपाध्यक्ष सुजीत जैन के साथ ही पूर्व मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,विधायक शशि ठाकुर,अशोक टेकाम सहित भारी संख्या में भाजपा कार्यकर्त्ता मौजूद थे। इनमें सबसे ज्यादा चर्चित उपस्थिति पूर्व पालिका अध्यक्ष और महिला मोर्चे की अध्यक्ष पार्वती जंघेला की रही जिन्हें प्रदेश की भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाकर उनसे तीन लाख रुपये की रिकवरी उवं उन्हें पांच साल तक चुनाव लड़ने के लिये अयाग्य घोषित किया था। उल्लेखनीय है कि दुगनी लागत में घटिया सड़कों के मामले की शिकायत इंका नेता आशुतोष वर्मा ने की थी जिसे चार साल तक सरकार ने लटकायें रखा लेकिन पुख्ता प्रमाणों के चलते अंततः कार्यवाही करनी ही पड़ी थी। प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया के गृह जिले में भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित होने के बाद भी पार्वती जंघेला को पद पर बनाये रखने वाली भाजपा का अन्ना के समर्थन में धरना चर्चा का विषय बना हुआ हैं। विधायक नीता पटेरिया और और कमल मर्सकोले की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुयी है।









धरने में उपस्थिति को लेकर नरेश और हरवंश की तुलना हो रही है -भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के समर्थन में जिला भाजपा द्वारा दिये गये धरने में हाल ही में केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त कर लाल बत्तीधारी बने नरेश दिवाकर की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुयी हैं। जबकि विस उपाध्यक्ष के संवैधानिक पद पर राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त करने वाले हरवंश सिंह अपनी पार्टी कांग्रेस के प्रदेश सरकार के विरोध में होने वाले धरना प्रर्दशनों में बेधड़क शामिल होते हैं। हालांकि नियम तो यही कहता हैं कि मंत्री या दर्जा प्राप्त मंत्री किसी भी सरकार विरोधी आंदोलन या धरने में शामिल नहीं हो सकते। लेकिन आजकल इस नियम पर कड़ाई से पालन कोई नहीं करता हैं। यदि संवैधानिक पद पर बैठे हरवंश के आंदोलनों पर जब जिला भाजपा चुप रहती हैं तो भला नरेश के शामिल होने पर जिला इंका कोई आपत्ति कैसे कर सकती हैं। भाजपाइयों के बीच में यह चर्चा भी दबी लुबान चल रही हैं कि शायद नरेश जी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का वह उपवास प्रकरण याद आ गया था जिसमें राजभवन से उपवास स्थल पर पहुंचते ही शिवराज ने मंचासीन किसी भी भाजपा नेता को बताये बिना माइक पर अपने उपवास के समाप्त होने की घोषणा कर दी थी। यहां यह उल्लेखनीय हैं राजभवन में मुख्यमंत्री को साफ साफ बता दिया गया था कि यदि आप उपवास पर बैठेंगें तो आपकी कुर्सी जा सकती हैं। शायद यह याद आते ही नरेश ने बमुश्किल हासिल हुयी लाल बत्ती को खतरे में डालने का जोखिम नहीं उठाया और भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाले धरने से परहेज करना ही उचित समझा नहीं तो उनकी उपस्थिति को लेकर भी व्यंग के तीर चलना कोई बड़ी बात नहीं होती।









श्रीकांत के स्तीफे के कारणों की लेकर शुरू हुयी अटकलें समाप्त-भाजपा के मीडिया प्रभारी श्रीकांत अग्रवाल का त्यागपत्र इन दिनों सियासी हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ हैं। उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र देते हुये एक आम कार्यकर्त्ता के रूप में पार्टी की सेवा करते रहने की बात कही हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि आज से लगभग 11 साल पहले तत्कालीन जिला भाजपा अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने उन्हें मीडिया प्रभारी बनाया था। उसके बाद चक्रेश जैन, प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब, वेदसिंह ठाकुर,सुदर्शन बाझल के समय भी वे अपने पद बने रहे थे। जिला भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष सुजीत जैन ने भी उन्हें इसी पद पर बनाये रखा था। उनके कार्यकाल के एक साल बाद मीडिया प्रभारी के पद से श्रीकांत ने स्तीफा क्यों दिया था? इसे लेकर राजनैतिक क्षेत्रों में तरह तरह की चर्चायें चल रहीं थीं। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि हाल ही में सिवनी के पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को सरकार ने लाल बत्ती देकर महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया हैं। मीडिया प्रभारी के स्तीफे के पीछे भाजपा की गुटबाजी है या फिर कुछ और? कुछ भाजपायी तो यह भी कहते देखे जा रहें हैं कि श्रीकांत अग्रवाल को हटाने की योजना बन चुकी थी इसलिये उन्होंने हटाये जाने के बजाय खुद ही हट जाना बेहतर समझा और इसलिये त्यागपत्र दे दिया था। इसे लेकर अलग अलग लोंगों की अलग अलग मान्यतायें हैं। बताया तो यह भी जा रहा है कि भाजपा नेताओं द्वारा उन्हें मनाने का प्रयास किया जा रहा था। और अंततः उनका स्तीफा वापस हो गया हैं। इसी दौरान मीडिया प्रभारी बनने के लिये इच्छुक नेताओं ने अपने अपने आकाओं की गणेश परिक्रमा करना प्रारंभ कर दी थी जिन्हें अंत में निराशा ही हाथ लगी। लागों में इस स्तीफे के कारणों को लेकर अभी भी जिज्ञासा बनी हुयी हैं।









अन्ना के आंदोलन को हाई जैक करने की भाजपायी कोशिश प्रारंभ?-संघ और भाजपा के चिंतक अन्ना हजारे के आंदोलन को हाई जैक करने की योजना बनाने में जुट गये हैं। इनका यह मानना हैं कि अन्ना के आंदोलन से कांग्रेस को नुकसान तो हो रहा हें लेकिन अन्ना चूंकि चुनावी राजनीति से दूर रहने की बात कह रहें हें इसलिये चुनावी राजनीति में इस नुकसान का लाभ कोई उठाने की स्थिति में नहीं हैं। संघ और भाजपा के रणनीतिकारों ने उज्जैन में तीन दिन के मंथन शिविर में इस ऐलेन्डे पर गुप्त चर्चा की हैं। इस आंदोलन के मूल मूद्दे भ्रंष्टाचार पर ऐसा आंदोलन चलाने की योजना बनायी गयी हैं जिसका राजनैतिक लाभ आगामी लोक सभा चुनाव में भाजपा को मिल सके। परदे के पीछे रहकर अन्ना को समर्थन देने वाली भाजपा और संघ अब खुलकर राजनैतिक लाभ लेने के लिये खुद कमान संभाहलने की योजना बना रहें हैं।







Saturday, August 13, 2011

Artical On Independance Day Of India

भ्रष्टाचार के मामले में कानून के दायरे के बजाए लागू करने के कारगर तरीके की चिता जरूरी है

आज का दिन भारत वर्ष की स्वतंत्रता का दिन हैं। सैकड़ों सालों की गुलामी और हजारों लोगों की शहादत के बाद देश को आजादी मिली थी। गांधी ने आजाद देश की एक कल्पना की थी जिसमें आजादी का लाभ समाज के अंतिम छोर के उस व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक था जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हैं। आज हम आजादी की 64 वीं सालगिरह मना रहें है। हम गांधी जी के सपनों के भारत हिसाब से देश का आकलन करें तो हम पाते हैं कि गांधीं के अंतिम छोर के आदमी की बात तो सभी राजनैतिक दल करने लगें हैं लेकिन वास्तव में आम आदमी की चिंता नेताओं को नहीं हैं। समाज के पिछड़े और दलित आदिवासी वर्ग के हितों की बात करने वाले ये नेता उनके विकास की बात तो छोड़ो उनके मान सम्मान तक को अपने अपने राजनैतिक हित साधने का मुद्दा बनाने में भी संकोच नहीं करते हैं। राजनीति समाज के हर हिस्से में इस कदर हावी हो चुकी है कि सभी समाजसेवी कहलाने वाले भी अपने आप को राजनीति से परे नहीं रख पा रहें हैं। आज हर एक की यह फितरत हो गई है कि आम आदमी जिन चीजों से प्रताडित हो उसे मुद्दा बनाओ और अपनी रोटी सेकों। आज ऐसा ही कुछ देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर हो रहा हैं। लोकपाल बिल के मामले को लेकर तरह तरह के तर्क वितर्क चल रहें हैं। प्रधानमंत्री, न्यायाधीश,संसद में सांसदों का आचरण और समूचे शासकीय अमले को इसके दायरे में लाने की बात की जा रही हैं।़ इसका आशय क्या यह नहीं है कि ऐसी मांग करने वालों का यह मानना हैं कि देश की विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका सभी भ्रष्टाचार के मामले में संदिग्ध हैंर्षोर्षो और यदि सच्चायी यही हैं तो फिर इस देश में किसी दूध से धुले लोकपाल को कहां तलाश किया जाएगार्षोर्षो आज भी देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं। लेकिन इसके बाद भी इस पर कोई कारगर रोक नहीं लग पा रही हैं। देखा जाए तो आज जरूरत इस बात की है कि इन कानूनोेंं को लागू करने वाली ऐजेसिंया पहले तो खुद ईमानदार हों और फिर भ्रष्टाचारी को दंड़ देने के कारगर उपाय करें। भ्रष्टाचार की शिकायत यदि भ्रष्टाचार से ही साबित नहीं हो पाएगी तो कोई भी कानून भला कहां और कैसे भ्रष्टाचार को रोक पाएगार्षोर्षो इसलिए किसी भी कानून के दायरे की चिंता करने के बजाए आज चिंता इस बात की करना जरूरी है कि इन कानूनों को कारगर तरीके से लागू करने के उपाय किए जाए और भ्रष्टाचारियों पर सख्ती से कार्यवाही करने का संकल्प लिया जाए वरना हमेशा ही ऐसे आंदोलन होते रहेगें और मुद्दे जस के तस रह जाएंगें।