Monday, December 10, 2012


संजय और भोजराज द्वारा श्रेय लेने के प्रयास को वीरेन्द्र ने थोथी वाहवाही बटोरने और प्रेस को गुमराह करने वाली कार्यवाही बताया
फोर लेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था। यह एक गैर राजनैतिक या यू कहें कि सर्वदलीय मंच बनाया गया था। लेकिन इसके कर्त्ता धर्ता बने लोगों ने इस अपनी राजनीति करने का जब मंच बना लिया गया तो धीरे धीरे इससे लोग कटने लगे। इस मंच को कुछ स्वय भू नेताओं कुछ नेताओं की आलोचना करने का मंच बना लिया।फोर लेन के मुद्दे पर मिली सफलता को अपनी निजी सफलता मान लिया और इसके संयोजक संजय तिवारी ने नपा अध्यक्ष का चुनाव लड़कर इसे राजनैतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर डाली। जिसका जनता जनार्दन ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया। जनमंच के बचे खुचे कुछ नेताओं ने एक काम और शुरू कर दिया कहीं कुछ भी हो उस पर मेड बाय जनमंच की सील लगानी चालू कर दिया। जिले में मंड़ी चुनावों का पहला चरण समाप्त हो गया हैं। नाम वापसी के बाद इंका और भाजपा अध्यक्षों ने पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी हैं। मंड़ी चुनावों की शुरुआत से ही सियासी हलकों में यह सुगबुगाहट चल रही थी कि नूरा कुश्ती में पारंगत इंका और भाजपा नेता अपनी अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुरूप आपस में मंड़ियों का बटवारा ना कर लें। केवलारी मंड़ी में हुये इस निर्विरोध निर्वाचन को राजनैतिक विश्लेषक इसी चश्में से देख रहें हैं। शासकीय वाहन में उल्टा तिरंगा झंड़ा लगने के समाचार बीत दिनों अखबारों की सुर्खियों में रहे। वाकया केवलारी विस क्षेत्र के छपारा में आयोजित जन सूचना अभियान मेले का हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विस उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय इंका विधायक ठाकुर हरवंश सिंह थे।  

जनमंची नेता श्रेय बटोरने के आरोप के घेरे में-फोर लेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था। यह एक गैर राजनैतिक या यू कहें कि सर्वदलीय मंच बनाया गया था। लेकिन इसके कर्त्ता धर्ता बने लोगों ने इस अपनी राजनीति करने का जब मंच बना लिया गया तो धीरे धीरे इससे लोग कटने लगे। इस मंच को कुछ स्वय भू नेताओं कुछ नेताओं की आलोचना करने का मंच बना लिया। इस जनमंच को फोर लेन के मुद्दे पर मिली सफलता को अपनी निजी सफलता मान लिया और इसके संयोजक संजय तिवारी ने नपा अध्यक्ष का चुनाव लड़कर इसे राजनैतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर डाली। जिसका जनता जनार्दन ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया। जनमंच के बचे खुचे कुछ नेताओं ने एक काम और शुरू कर दिया कहीं कुछ भी हो उस पर मेड बाय जनमंच की सील लगानी चालू कर दिया। सड़क पर होने वाले प्रर्दशनों में मना बुझा कर सबको बुलाना और फिर कोई श्रेय लेने की बात हो तो सबको दर किनार कर एक पर एक दो लोगों द्वारा उसे बटोरना इन नेताओं की आदत सी बन गयी थी। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों हुआ। सिवनी बाय पास से खवासा तक की फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी के खिलाफ इतने साल बाद हुये 12 करोड़ 94 लाख रु. के जुर्माने के बाद जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने ने हॉटल बाहुबली में एक प्रेस कांफ्रेस लेकर इसे खुद की जीत बताया और अखबारों में सुर्खियां बटोरी थीं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है किसदभाव कंपनी ने सन 2008 से अपना काम चालू किया था और यह अवैध उत्खनन का काम उसी दौरान किया गया था। यहो यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इसी दौरान जनमंच और उसका आंदोलन भी पूरे शवाब में था तब जनमंच की कमान संभाहने वाले इन्हीं नेताओं ने सदभाव कंपनी की इस काली करतूत की अनदेखी क्यों की थी? यह सवाल आज जनता के बीच उठाया जा रहा हैं। जनमंच की इस पत्रकार वार्ता के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेन्द्र सोनकेशरिया ने बाकायदा एक प्रेस नोट जारी करके इस बात का खुलासा किया कि उनने जनवरी 2011 में हाई कोर्ट में सदभाव की इस काली करतूत के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी और माननीय न्यायालय के आदेश पर जिला कलेक्टर ने एक जांच समिति गठित की थी जिसकी अनुशंसा पर खनिज विभाग द्वारा सदभाव कंपनी पर 12 करोड़ 94 लाख रु. का जुर्माना किया गया जिसके लिये वसूली अधिकारी एस.डी.एम. सिवनी को बनाया गया था। लेकिन उन्होंने पूरी गुण दोष के आधार पर पूरी सुनवायी करके जुर्माने को ही शून्य घाषित कर दिया था। इसकी पुनः शिकायत करने की बात का खुलासा करते हुये सोनकेशरिया ने बताया कि इसके बाद एक बार फिर कंपनी पर जुर्माने के आदेश हुये। इस आदेश के बाद जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने द्वारा पत्रकार वार्ता लेकर श्रेय लेने की कार्यवाही को एडवोकेट सोनकेशरिया ने थोथी वाहवाही बटोरने और प्रेस को गुमराह करने वाली कार्यवाही बताया हैं। वीरेन्द्र ने यह भी उल्लेख किया है कि 2009 में सिर्फ फोरलेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था लेकिन अब ऐसा लगता है कि जनमंच अब बाधाओं को दूर करने के बजाय थोथी वाहवाही लूटने की जुगत में लगा रहता हैं। इस तरह के कारनामे देखकर जिले की उस जनता को घोर निराश हाथ लगी है जिसने जनमंच के फोर लेन के आंदोलन में गैर राजनैतिक मंच समझकर उसे अपना समर्थन दिया था वरना जिले के भाजपायी और इंकाई जन प्रतिनिधियों का आपसी सौदेबाजी से तो वो वैसे ही निराश हो चुकी थी।
मंड़ी चुनाव में जोड़ तोड़ शुरू-जिले में मंड़ी चुनावों का पहला चरण समाप्त हो गया हैं। नाम वापसी के बाद इंका और भाजपा अध्यक्षों ने पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी हैं। भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने अपना चुनाव अभियान भी चालू कर दिया हैं। कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई पहल अभी तक दिखी नहीं हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह के निर्वाचन क्षेत्र केवलारी मंड़ी में दो कृषक वार्डों से निर्विरोध निर्वाचन के समाचार अखबारों की सुर्खी भी बने हैं। इनमें एक वार्ड से भाजपा तथा दूसरे वार्ड से इंका के कद्दावर नेता भोयाराम चौधरी निर्वाचित हो गये हैं। अखबारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भोयाराम केवलारी जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष रहें हैं और उपाध्यक्ष रहते हुये ही उन्होंने 1198 में बरघाट विस क्षेत्र से पहले बागी होकर और फिर 2003 में इंका प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। मंड़ी चुनावों की शुरुआत से ही सियासी हलकों में यह सुगबुगाहट चल रही थी कि नूरा कुश्ती में पारंगत इंका और भाजपा नेता अपनी अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुरूप आपस में मंड़ियों का बटवारा ना कर लें। केवलारी मंड़ी में हुये इस निर्विरोध निर्वाचन को राजनैतिक विश्लेषक इसी चश्में से देख रहें हैं।  अब कौतूहल इसबात को लेकर मचा हुआ हैं कि महाराष्ट्र सीमा वाली महत्वपूर्ण सिवनी मंड़ी के मामले में नूरा कुश्ती विशेषज्ञ कैसा बंटवारा करते हैं? यह किसी एक खाते में पूरी पूरी जायेगी या फिर इसका आधा आधा बटवारा हो जायेगा। जिले की शेंष मंड़ियों में देसरा महत्वपूर्ण स्थान राजनैतिक रूप से केवलारी मंड़ी का हैं क्योंकि वह हरवंश सिंह के क्षेत्र में आती हैं। इस पर कांग्रेस का कब्जा होना बति आवयक माना जा रहा हैं। वैसे पहले तो सिवनी और केवलारी दोनों ही प्रमुख मंड़ियों पर कांग्रेस का ही कब्जा था लेकिन अब आने वाले चुनाव परिणामों पर सभी निगाहें इस लिये भी लगी हुयीं है क्योंकि नरेश दिवाकर द्वारा जिला भाजपा अध्यक्ष का दायित्व संभाहलने के बाद जिले में यह पहला चुनाव हैं।
विस उपाध्यक्ष की गाड़ी में उल्टा झंड़ा चर्चित?-शासकीय वाहन में उल्टा तिरंगा झंड़ा लगने के समाचार बीत दिनों अखबारों की सुर्खियों में रहे। वाकया केवलारी विस क्षेत्र के छपारा में आयोजित जन सूचना अभियान मेले का हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विस उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय इंका विधायक ठाकुर हरवंश सिंह थे। वाहन पर सवार होकर हरवंश सिंह समारोह स्थल तक पहुच गये लेकिन तब तक किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया कि गाड़ी में उल्टा राष्ट्र ध्वज फहरा रहा हैं। जब लोगों में इसकी चर्चा हुयी तो तो इसे सीधा किया गया। इस बाबद जब विस उपाध्यक्ष से प्रेस ने पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें सिवनी से प्रशासन ने गाड़ी उपलब्ध करायी थी और शायद ड्रायवर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया होगा। लिा भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने कहा कि राष्ट्र ध्वज का अपमान करने वाले के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये। उन्होंने यह कहने में संकोच बरता कि राष्ट्र ध्वज का अपमान किसने किया। भाजपा ने इस मामले में पुलिस रिपोर्ट कराने से भी परहेज किया। प्रशासन शायद ही अपनी ओर से इस मामले में कोई पहल करें क्योंकि गाड़ी झंड़े सहित उसी के द्वारा उपलब्ध करायी गयी थी। ऐसा लगता है कि जिले में हुये राष्ट्र ध्वज के अपमान का यह गंभीर मामला सिर्फ अखबारों में ही सिमट कर रह जायेगा। “मुसाफिर“  

Monday, December 3, 2012


शहीदों के सम्मान में भी जिला प्रमुखों और राजनेताओं की उपेक्षा एवं राजनीति उचित नहीं कही जा सकती
आजादी के बाद 16 जनवरी 2001 को जिले की वीर आदिवासी बाला बिंदु कुमरे श्रीनगर एयर पोर्ट पर लश्कर-ए-तोएबा की गोली से शहीद हो गयीं थीं। इसके बाद जिले की माटी के ही सपूत धंसौर विकास खंड़ के गा्रम भिलाई  के प्रवीण राजपूत ने श्रीनगर में ही 27 नवम्बर 2012 को आतंकवादी हमले में देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर दी। दोनों अमर शहीदों के पार्थिव शरीर जिले में लाये गये और उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तो किया गया लेकिन जिस तरह से जिला प्रमुखों और राजनेताओं द्वारा व्यवहार किया गया वह उचित तो नहीं ही कहा जा सकता। वैसे तो जिले से होकर गुजरने वाल उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बनने वाल फोर लेन रोड़ को लेकर बहुत से आंदोलन हुये। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ा गया। लेकिन बाद में ऐसे आंदोलन अपने रास्ते से भटकने लगे। अब प्रगतिशील विकासमोर्चे के बैनर पर गैर भाजपायी और गैर इंकाई नेताओं ने इसे लेकर एक बार फिर आंदोलन चालू किया हैं। वैसे प्रदेश की शिवराज सरकार ने अध्यक्ष बाद का सीधे मतदाताओं से होने वाले चुनाव को सदस्यों के माध्यम से कराने का फैसला लेकर किसानों की सीधी पसंद और नापसंद को नकार कर चुनाव मेनेजमेंट में माहिर नेताओं को अपने अपने करतब दिखाने और चुनावी साल में अपने नाम का डंका बजवाने का सुनहरा मौका दे दिया हैं।
शहीदों के सम्मान में जिला प्रमुखों एवं राजनेताओं ने दिखायी लापरवाही-आजादी की लड़ाई में जिले की तीन आदिवासी महिलाओं और एक पुरुष ने टुरिया में अंग्रेजों की गोलियां सीने पर झेल कर देश के लिये अपनी शहादत दी थी। आजादी के बाद 16 जनवरी 2001 को जिले की वीर आदिवासी बाला बिंदु कुमरे श्रीनगर एयर पोर्ट पर लश्कर-ए-तोएबा की गोली से शहीद हो गयीं थीं। इसके बाद जिले की माटी के ही सपूत धंसौर विकास खंड़ के गा्रम भिलाई  के प्रवीण राजपूत ने श्रीनगर में ही 27 नवम्बर 2012 को आतंकवादी हमले में देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर दी। दोनों अमर शहीदों के पार्थिव शरीर जिले में लाये गये और उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तो किया गया लेकिन जिस तरह से राजनेताओं द्वारा व्यवहार किया गया वह उचित तो नहीं ही कहा जा सकता। बिन्दु कुमरे के वक्त तत्कालीन प्रभारी मंत्री डोमन सिंह नगपुरे ने आना जरूरी नहीं समझा तो प्रवीण राजपूत के वक्त प्रभारी मंत्री नाना भाऊ ने आना जरूरी नहीं समझा। बिन्दु कुमरे का पार्थिव शरीर जब सिवनी आ रहा था तब तत्कालीन वन मंत्री हाकी टूर्नामेंट के फायनल में मुख्य अतिथि के रूप से हेलीकाप्टर से सिवनी आये थे और बाजे गाजे और आतिशबाजी के साथ अपना स्वागत करा रहें थे। शहीद प्रवीण के समय भी हरवंश सिंह समय पर सिवनी में नहीं पहुचें और बरघाट नाके में उन्होंने श्रृद्धांजली अर्पित की। दोनों की शहीदों के अंतिम संस्कार में हरवंश सिंह ने शामिल होना उचित नहीं समझा। जिा भाजपा के अध्यक्ष और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने भी जिले की सीमा पर खवासा जाना जरूरी नहीं समझा और परिसीमन के बाद की सिवनी विस की सीमा गोपालगंज में श्रृद्धांजली अर्पित की। जिले के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी कलेक्टर और एस.पी. ने तो सिवनी शहर में ही श्रृद्धांजली अर्पित की और अंतिम संस्कार में भी नहीं गये। हालांकि उनके प्रतिनिधि अंतिम संस्कार में उपस्थित थे। जिस सिवनी जिले का इतिहास आजादी की लड़ाई में शहादत देने का रहा हैं। जिले में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहें हैं। आजादी के दौरान जिस जिले के जेल में देश के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुभाष चंद्र बोस, पीर पगारो,पंड़ित रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे लोग रखे गये हों उसी जिले को आज ना जाने क्या हो गया है कि जिले के प्रशासनिक और राजनैति क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो गये कि देश के लिये अपनी जान न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों के लिये एक दिन का वक्त भी नहीं निकाल पा रहें हैं।
फोर लेन के लिये प्रगतिशील विकास मोर्चे का आंदोलन प्रारंभ-वैसे तो जिले से होकर गुजरने वाल उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बनने वाल फोर लेन रोड़ को लेकर बहुत से आंदोलन हुये। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ा गया। लेकिन बाद में ऐसे आंदोलन अपने रास्ते से भटकने लगे। कभी किसी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के कारण तो कभी सड़क के गड्ढे भरने में उलझा दिया गया तो कभी पुरानी सड़क को ही सुधारने की बात की जाने लगी तो कभी बनाने वालों को टारगेट बनाया जाने लगा। इसी कारण फोर लेन का प्रमुख मुद्दा दर किनार होता गया और गैर राजनैतिक आंदोलन में राजनीति ही राजनीति दिखने लगी इसी कारण धीरे धीरे जनता भी इससे दूर होती गयी।अब प्रगतिशील विकासमोर्चे के बैनर पर गैर भाजपायी और गैर इंकाई नेताओं ने इसे लेकर एक बार फिर आंदोलन चालू किया हैं। 1 दिसम्बर से काला पखवाड़ा मनाने की शुरुआत की गयी हैं।इसके तहत सिवनी शहर और खवासा तक जाने वाले वाहनों में प्रतीकात्मक रूप से काला फीता बांधा जायेगा तथ नुक्कड़ सभाओं के द्वारा कुछ कांग्रेसी और भाजपायी जनप्रतिनिधियों की सांठ गांठ का खुलासा किया जायेगा। मोर्चे के कामरेड हजारी लाल हेडाऊ और याहया कुरैशी ने यह जानकारी भी प्रेस को दी हैं कि आंदोलन आगे भी जारी रहेगा। नेताओं की पोल खोलना तो उनका अधिकार है लेकिन आंदोलन संचालित करने वालों को इस बात के प्रति भी सचेत रहना होगा कि आंदोलन कहीं सिर्फ पोल खोलने तक ही सीमित होकर ना रह जाये। मूल उद्देश्य तो फोर लेन बनवाने का हैं और वर्तमान में यह मामला राज्य वन्य प्राणी बोर्ड की अनुशंसा के साथ राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड में अंतिम स्वीकृति के लिये लंबित पड़ा हैं। इसके लिये या तो किसी सांसद के माध्यम से संसद में या फिर दिल्ली में अपने राष्ट्रीय नेताओं से दवाब बनवाना होगा। इससे मामला जल्दी सुलझ सकता हैं। अन्यथा यह आंदोलन भी अन्य आंदोलनों की भांति ही धीरे धीरे वीर गति को प्राप्त हो जायेगा। 
मंड़ी चुनाव की धूम हुयी शुरु-समूचे जिले में मंड़ी चुनावों की गहमा गहमी तेज हो गयी हैं। नाम वापसी के बाद अब शायद कांग्रेस और भाजपा अपने समर्थित उम्मीदवारों के नामों की सूची भी जारी करें। इसके बाद सभी रणबांकुरे मैदान में अपनी रसद के साथ जुट जायेंगें। वैसे प्रदेश की शिवराज सरकार ने अध्यक्ष बाद का सीधे मतदाताओं से होने वाले चुनाव को सदस्यों के माध्यम से कराने का फैसला लेकर किसानों की सीधी पसंद और नापसंद को नकार कर चुनाव मेनेजमेंट में माहिर नेताओं को अपने अपने करतब दिखाने और चुनावी साल में अपने नाम का डंका बजवाने का सुनहरा मौका दे दिया हैं। ऐसे हालात में अक्सर यह देखा गया है कि दलीय समर्थन की सूची वालों के जीतने या हारने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि चुनाव मेनेजमेंट के फंडें में माहिर नेताओं का यह मानना रहता है कि जो जीता उसे अपना माने और जो हार गया उसे अपना होने के बाद भी भूल जाओ तभी अपनी महारत बनी रह सकती हैं। इसका उदाहरण जिला पंचायत उपाध्यक्ष के चुनाव में देखा भी गया है कि कांग्रेस के समर्थित उम्मीदवार सुधीर जैन को इंका विधायक हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में ही हरा कर जीतने वाले अनिल चौरसिया आज कांग्रेस के बैनर तले ही जीत कर उपाध्यक्ष बन गये हैं। अब देखना यह है कि जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर और इंकार अध्यक्ष हीरा आसवानी अपने समर्थित उम्मीदवारों की सूची बक जारी करते है और उन्हें जिताने के लिये कितने प्रयास करते है? या फिर जो जीता वो ही सिकंदर की तर्ज पर अपनी बिसात बिछाने की रएानीति बनाते हैं। वैसे तो प्रदेश सरकार ने किसानों में व्याप्त असंतोष को देखते हुये लंबे समय तक इन चुनावों को टाला लेकिन अब मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ये चुनाव हो रहें हैं इसका कांग्रेस कितना लाभ ले पाती है और नव नियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर अपना कितना करतब दिखा पाते हैं? इसका खुलासा तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही होगा। “मुसाफिर“     

Monday, November 26, 2012


किंग मेकर बनने की हेट्रिक बनाने की चाहत पड़ी मंहगी नरेश को स्वयं ही बनना पड़ा जिला भाजपा का किंग
 किंगमेकर इज बेटर देन किंग “ लेकिन बार बार यदि यही प्रयोग दोहराने को प्रयास किया जाये तो खेल बिगड़ भी जाता हैं। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों जिला भाजपा के चुनाव के दौरान देखने को मिला। किंग मेकर बनने की हेट्रिक बनाने के चक्कर में किंग मेकर को खुद ही किंग बनना पड़ गया। अब किंग मेकर से किंग बने नरेश दिवाकर, जो कि प्रदेश सरकार द्वारा महाकौशल विकास प्राधिकरण के केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष है, अपनी इस नयी ताजपोशी को किस रूप में लेते हैं? इसका खुलासा तो वक्त आने पर ही होगा। इन दिनों जिले में मंड़ी चुनावों को लेकर राजनैतिक हल चल मची हुयी हैं। इंका और भाजपा दोनों ही पार्टियां अपने अपने तरीके से जीत की बिसात बिछाने में लगी हुयी हैं। पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के कार्यकाल में हुये लखनादौन नपं के चुनाव में भाजपा की हुयी करारी हार का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और पूरी संभावनाओं के बाद भी वे दोबारा अध्यक्ष नहीं पाये। चुनाव नजदीक आने की संभावनाओं को देखते हुये जिले में भी तीसरे मोर्चे के गठन पर प्रयास प्रारंभ हो गये हैं। युवा सपा नेता एवं एडवोकेट याहया कुरैशी की पहल पर मिशन प्रारंभ हुआ हैं। इसमें वाम दलों सहित नागरिक मोर्चे के भी शामिल होने की संभावना हैं। 
हेट्रिक बनाने की कोशिश आखिर पड़ी महंगी-एक कहावत राजनीति के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रचलित हैं।     “ किंगमेकर इज बेटर देन किंग “ लेकिन बार बार यदि यही प्रयोग दोहराने को प्रयास किया जाये तो खेल बिगड़ भी जाता हैं। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों जिला भाजपा के चुनाव के दौरान देखने को मिला। किंग मेकर बनने की हेट्रिक बनाने के चक्कर में किंग मेकर को खुद ही किंग बनना पड़ गया। जी हां हम बात कर रहें हैं नवनियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर की। यह तो सर्वविदित ही है कि पिछले दो बार से नरेश दिवाकर किंग मेकर बने हुये थे। पहले उन्होंने सुदर्शन बाझल को जिला भाजपा का अध्यक्ष बनवाया और फिर सुजीत जैन को। लगातार दोनों ही बार जब उनका यह खेल सफल रहा तो फिर उनके मन में हेट्रिक बनाने की मंशा जाग गयी। इसके लिये उन्होंने बिसात भी बहुत ही सोच समझ कर बिछायी थी। इस हेतु दिवाकर ने जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर अपने प्रत्याशी तैयार किये थे। इस पद के लिये भाजपा में 12 उम्मीदवारों के नाम सामने आये थे। इनमें सुजीत जैन,सुदर्शन बाझल, अशोक टेकाम,अजय त्रिवेदी,गोमती ठाकुर,देवी सिंह बघेल,राजेन्द्र सिंह बघेल,वेद सिंह ठाकुर,सुदामा गुप्ता,भुवन अवधिया,संतोष अग्रवाल और ज्ञानचंद सनोड़िया के नाम प्रमुख थे। इनमें से प्रथम सात नेताओं को नरेश समर्थक माना जाता हें। इनमें ब्राम्हण, आदिवासी, पंवार,बागरी और जैन समाज के नाम थे जो कि जिले के अलग अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन इस बार प्रदेश आला कमान का यह स्पष्ट निर्देश था कि चुनावी साल होने के कारण वोटिंग नहीं होना चाहिये। चुनाव के एक दिन पहले से जब आम सहमति बनाने की कवायत चालू हुयी तो यह समझ में आ गया था कि अधिकांश दावेदार नरेश दिवाकर के ही हैं। इसी बीच जिले के एक जनप्रतिनिधि ने, जिसका सीधे प्रदेश संगठन में दखल है, ने प्रदेश नेतृत्व को इस बात से अवगत करा दिया कि अधिकांश दावेदार तो भले ही नरेश दिवाकर के समर्थक हैं लेकिन अब उनके ही बीच में आम सहमति बना पाना नरेश के लिये ही संभव नहीं रह गया हैं इसलिये किसी ऐसे वजनदार नेता को जिले की कमान सौंपी जाये जिसे सभी स्वीकार करने को बाध्य हो जायें। इस खबर के मिलने के बाद प्रदेश नेतृत्व ने यह कर लिया कि नरेश दिवाकर को ही कमान सौंप दी जाये। भाजपा नेताओं का दावा तो यह भी है कि अगला चुनाव लड़ने की इच्छा प्रगट करते हुये शुरू में नरेश ने आना कानी की लेकिन बाद में उन्हें यह स्वीकार करना ही पड़ा। बताया जाता है कि सब कुछ तय हो जाने के बाद विधायक कमल मर्सकोले ने नरेश का नाम प्रस्तावित किया और उनके नाम की घोषणा जिला निर्वाचन अधिकारी ने कर दी। बताया तो यह भी जा रहा हैं कि आम सहमति बनाने जैसी कोई कवायत भी इसके बाद नहीं की गयी। अब किंग मेकर से किंग बने नरेश दिवाकर, जो कि प्रदेश सरकार द्वारा महाकौशल विकास प्राधिकरण के केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष है, अपनी इस नयी ताजपोशी को वे किस रूप में लेते हैं? इसका खुलासा तो वक्त आने पर ही होगा। 
भाजपा और इंका के लिये परीक्षा होगी मंड़ी चुनाव -इन दिनों जिले में मंड़ी चुनावों को लेकर राजनैतिक हल चल मची हुयी हैं। इंका और भाजपा दोनों ही पार्टियां अपने अपने तरीके से जीत की बिसात बिछाने में लगी हुयी हैं। पद भार ग्रहण करते ही नव नियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष के लिये ये एक राजनैतिक चुनौती सामने आ गयी हैं। पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के कार्यकाल में हुये लखनादौन नपं के चुनाव में भाजपा की हुयी करारी हार का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और पूरी संभावनाओं के बाद भी वे दोबारा अध्यक्ष नहीं पाये। वैसे तो जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी के कार्यकाल का भी यही पहला चुनाव था जहां कांग्रेस का अध्यक्ष पद का प्रत्याशी ही नदारत हो गया था लेकिन पार्षदों के चुनावों में मिली सफलता को आधार बनाकर कांग्रेस के किंग मेकर हरवंश सिंह ने किंग को बचा लिया। इस तरह मंड़ी चुनाव ना सिर्फ दोनों पार्टियों के लिये वरन उनके अध्यक्षों के लिये भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गयें हैं। वैसे तो प्रदेश की शिवराज सरकार यह नहीं चाहती थी कि 2013 के विस चुनाव के पहले ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं का रुझान उजागर हो। इसलिये पिछले दो साल से किसी ना किसी बहाने मंड़ी चुनाव टाले जा रहे थे। लेकिन हाई कोर्ट के आदेश पर जब मंड़ी चुनाव अनिवार्य हो गया तब प्रदेश सरकार ने अध्यक्ष के प्रत्यक्ष निर्वाचन की प्रणाली को ही बदल दिया और सदस्यों के    माध्यम से अध्यक्ष निर्वाचित करने का प्रावधान कर दिया। कांग्रेस के पास यह एक बहुत बड़ा मुद्दा हैं। यदि इसे पूरे जोर शोर से मतदाताओं के बीच उठाया जाता हैं तो इसका लाभ मिल सकता हैं। वैसे भी प्रत्यक्ष निर्वाचन ना होने के कारण अध्यक्ष पद का पूरा दारोमदार जन समर्थन पर कम और “चुनाव     प्रबंधन“ पर अधिक निर्भर करेगा। इसमें हरवंश सिंह और नरेश दिवाकर दोनो ही माहिर हैं। फिर दोनों के बीच समन्वय से राजनीति करने का पिछले 15 सालों से जो खेल चल रहा हैं उसे देखते हुये राजनैतिक क्षेत्रों में यह कयास लगाया जा रहा हैं कि अपने अपने राजनैतिक लाभ के हिसाब से मंड़ी चुनावों में मिले जुले परिणाम सामने आयेंगें। 
जिले में तीसरे मोर्चे के गठन के प्रयास प्रारंभ -चुनाव नजदीक आने की संभावनाओं को देखते हुये जिले में भी तीसरे मोर्चे के गठन पर प्रयास प्रारंभ हो गये हैं। युवा सपा नेता एवं एडवोकेट याहया कुरैशी की पहल पर मिशन प्रारंभ हुआ हैं। इसमें वाम दलों सहित नागरिक मोर्चे के भी शामिल होने की संभावना हैं। बसपा तो इसमें शामिल होने से रही लेकिन यदि गौगपा इसमें शामिल हो जाती हैं तो तो यह चुनावी संभावनाओं पर असर डाल सकता हैं। वैसे तो पूरे प्रदेश सहित जिले में भी राजनैतिक ध्रुवीकरण इंका और भाजपा के बीच में ही है लेकिन ऐसे मोर्चे किसी की हार और किसी की जीत में निर्णायक साबित हो सकते हैं। सियासी हल्कों में यह जरूर माना जा रहा हैं कि जिले में इंका और भाजपा में व्याप्त गुट बाजी का यदि कोई मोहरा बन जायेगा तो उसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी क्योंकि आज कल आम मतदाता इतना जागरूक हो गया हैं कि वो इन सब हथकंड़ों को को बखूबी समझने लगा हैं और यह भी समझ चुका हैं कि चुनावी समीकरण अपने पक्ष में करने के लिये जिले के कौन कौन महारथी ऐसे कारनामें करते रहते हैं। वैसे याहया कुरैशी का नाम एक ऐसा नाम है जिस पर अभी कोई ब्रांड़ चस्पा नहीं हैं। इसलिये उनकी अगुवायी में यदि ऐसा कोई प्रयास होता है तो उन्हें बहुत सावधानी से कदम उठाने पड़ेंगें और अतीत के प्रयोंगों से सबक भी लेना पड़ेगा। वरना नतीजा वही ढाक के तीन पात के समान हो जायेगा। “मुसाफिर“ 

Sunday, November 11, 2012


प्रजातंत्र में प्रविष्ट आसुरी शक्तियों को समूल नष्ट करने हर नारगरिक को बनना होगा राम
बुराइयों पर अच्छाइयों की, अधर्म पर धर्म की और आसुरी शक्तियों पर दैवीय शक्तियों की जीत का प्रतीक है दीपावली का त्यौहार। आततायी रावण का वध करके जब भगवान राम अयोध्या वापस आये थे तो अयोध्यावासियों ने घी के दिये जला कर भगवान राम का स्वागत किये थे। इसे ही दिवाली के रूप में मनाते हैं। हम हर साल रावण को जलाते तो जरूर है लेकिन देश में आसुरी शक्तियां नये नये रूप में पनपने लगतीं हैं। जब देश खुशहाल रहेगा तभी तो हम खुशहाल रहेंगें। आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी देश में भाषावाद,राष्ट्रवाद पर हावी होते क्षेत्रीयतावाद,गठबंधन की राजनीति के दुष्परिणाम, जातिवाद, भ्रष्टाचार जैसी आसुरी शक्तियां पैर पसारे हुये हैं। आज के युग में इन आसुरी शक्तियों को नष्ट करने भगवान श्री राम तो आने से रहे। पूरा देश जिन भगवान राम को मर्यादा पुरषोत्तम और अपना आदर्श मानते हैं आज तो उन्हीं पर तथा कथित राम भक्त ही अगुलियां उठाने से परहेज नहीं कर रहें हैं। इन आसुरी शक्तियों का विनाश हुये बिना राम राज्य की कल्पना करना बेमानी होगा।  इनके समूल नष्ट करने की अपेक्षा किसी सरकार या किसी राजनैतिक दल से करना भी निराश ही करेगा।प्रजातंत्र में आयी  इन आसुरी शक्तियों को नष्ट करने के लिये आज आवश्यक्ता है कि इस पर चिंतन मनन किया जाये। मेरे विचार से आज इस बात की जरूरत हैं कि देश का हर नागरिक जहां जो भी कर रहा हैं वह भगवान राम के आर्दश के अनुरूप करे।”स्वहित” के अलावा परिवार,समाज,प्रदेश और देश के हित का भी ख्याल रखे। पुराने सामाजिक मूल्यों को स्थापित करें। आधुनिकता और आर्थिक चकाचौंध से बाहर आयें। याने देश का हर नागरिक राम बने। और राम के आदर्शाें को आत्मससात करें। तभी विकराल रूप धारण कर चुकी इन आसुरी शक्तियों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। भगवान राम देश और देश के हर नागरिक को ऐसी शक्ति प्रदान करें और प्रजातंत्र में आयी इन आसुरी शक्तियों का नाश हो, यही दीपावली के पावन पर्व पर हमारी शुभकामनायें हैं।  
आशुतोष वर्मा
मो. 9425174640

Tuesday, November 6, 2012



बंदूकों के साये में शुरू हुआ पेंच परियोजना का काम
मेघा पाटकर की गयी नजरबंदःतीन साल से ठेकेदार काम नहीं कर पा रहा थाःएस.ए.एफ. की आठ कंपनी लगायी गयीं  
सिवनी । छिंदवाड़ा और सिवनी जिले की अति महत्वाकांक्षी पेंच सिचायी परियोजना के बांध का लंबे समय से लंबित काम अंततः चालू हो गया हैं। वैसे तो पेंच परियोजना बीसों साल से राजनैतिक पेंचों में उलझ कर रह गयी थी। लेकिन आडवानी जी के छिंदवाड़ा प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक मंच से यह घोषणा की थी कि कोई माई का लाल पेंच परियोजना के काम को नहीं रोक पायेगा। मुख्यमंत्री की इस घोषणा के बाद भी प्रशासनिक सहयोग ना मिलने के कारण मात्र चंद किसानों के विरोध के चलते ठेकेदार काम ही नहीं कर पा रहा था और आइडियल चार्ज के रूप में एक लंबी राशि वह सरकार से लेने का हकदार बन गया था।
पूरे लाव लश्कर के साथ बांध स्थल पर ठेकेदार के आ जाने के बाद भी वह लगभग तीन साल से काम चालू नहीं कर पा रहा था। बताया जा रहा हैं कि ठेकेदार ने इस मामले में कोर्ट जाने की जब बात की तो प्रदेश के मुख्य सचिव के हस्तक्षेप से यह व्यवस्था की गयी हैं भारी पुलिस बल की उपस्थिति में काम चालू कराया जाये। इसी के चलते स्थानीय पुलिस बल के अलावा आठ एस.ए.एफ. की कंपनियां भी तैनात की गयीं हैं।
काम चालू होने की भनक लगते हैं विरोध करने वाले स्थानीय नेताओं के अलावा मेघा पाटकर भी छिंदवाड़ा पहुंच गयीं हैं। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार प्रशासन ने उन्हें नजर बंद कर लिया हैं।
यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि दोनो जिलो के 242 गांवों की 63777 हेक्टेयर भूमि इस योजना से सिंचित होगी। इसके साथ ही 500 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी होगा। इससे दोनों जिलों के हजारों किसान लाभान्वित होगें।
उल्लेखनीय हैं इससे प्रभावित होने वाले किसानो का 2006 एवं 2009 में मुआवजा दे दिया गया हें तथा किसानों की मांग पर 2011.2012 की नई गाइड लाइन के अनुसार भी मुआवजा तय कर दिया गया हैं जिसे मात्र बाम्हनवाड़ा गांव के किसानों को छोड़कर सबने ले भी लिया हैं।
मात्र एक गांव के चंद किसानो के कारण सैकड़ों गांवों के हजारों किसानो के हितो की अनदेखी करने वाले आंदोलनकारी भला कैसे किसान हितेषी हो सकते हें। लाभान्वित होने वाले किसानों और पेंच की मांग करने नेताओं और जन प्रतिनिधियों को भी अपनी आवाज बुलंद करना चाहिये ताकि चालू हुआ काम फिर ना रुक सके।      


गरीब जान के मुझको ना तुम भुला देना,
                             तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना
प्रदेश के स्थापना दिवस के समारोह मेंविस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ने ध्वजारोहण कर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संदेश का वाचन किया। जहां एक ओर स्थानीय भाजपा विधायक नीता पटेरिया आंत्रण पत्र में अतिथि के रूप में नाम छपने के बाद भी कार्यक्रम में अनुपस्थित रहीं वहीं दूसरी ओर आमंत्रण पत्र में नाम ना रहने के बाद भी महाकौशल विकास प्राधिकरण के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष नरेश दिवाकर की कार्यक्रम में उपस्थिति राजनैतिक हल्कों में  चर्चित रही। भाजपा के 23 मंड़लों में से अधिकांश के चुनाव निर्विरोध संपन्न हो गये हैं। वैसे तो बताया यह जा रहा है कि ये सारे चुनाव आम सहमति से हुये हैं लेकिन आम सहमति कैसे बनी? या कैसे बनायी गयी? इसके किस्से भी कम रोचक नहीं हैं। गरीब जान के मुझको ना तुम भुला देना, तम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना”की तर्ज पर भी पूरा खेल हुआ जिला पंचायत के युवा,जुझारू और लोकप्रिय अध्यक्ष मोहन चंदेल के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव का। वैसे तो यह रामगोपाल जैसवाल और कांग्रेस की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रैनवती मानेश्वर की अगुवायी में लाया गया था लेकिन सियासी हल्कों में यह चर्चा भी थी कि इसके पीछे जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह का ही आर्शीवाद था।
नीता गायब,हरवंश नरेश रहे साथ-प्रदेश के स्थापना दिवस के समारोह में जिले के इंका विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ने ध्वजारोहण कर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संदेश का वाचन किया। इस शासकीय समारोह में जहां एक ओर स्थानीय भाजपा विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष नीता पटेरिया आंत्रण पत्र में अतिथि के रूप में नाम छपने के बाद भी कार्यक्रम में अनुपस्थित रहीं वहीं दूसरी ओर आमंत्रण पत्र में नाम ना रहने के बाद भी महाकौशल विकास प्राधिकरण के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष एवं सिवनी के पूर्व भाजपा विधायक नरेश दिवाकर की कार्यक्रम में उपस्थिति राजनैतिक हल्कों में ना केवल चर्चित रही वरन स्थानीय अखबारों ने इस पर अपनी अपनी टिप्पणियां भी की हैं। जहां तक विधायक नीता पटेरिया का सवाल है तो यह पहला अवसर नहीं हैं जबकि किसी ऐसे शासकीय कार्यक्रम में वे शामिल ना हुयीं हों जिसमें हरवंश सिंह मुख्य अतिथि रहते हैं। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका हैं। रहा सवाल हरवंश सिंह के साथ नरेश दिवाकर के शामिल होने का तो इससे लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनो ही पार्टियों में किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि दोनों ही पार्टियों में इन दोनों नेताओं की राजनैतिक निकटता एक अब एक ओपन सीक्रेट की तरह हो गयी हैं। चुनावी सल में इंका और भाजपा के इन नेताओं के बीच बनने बिगड़ने वाले राजनैतिक समीकरणक्या गुल ख्लिायेंगें? इसे लेकर कयास लगाये जा रहें हैं। इस समारोह में एक और बात विशेष रूप से उल्लेखनीय रही कि जिस दिन प्रदेश का स्थापना दिवस मनाया जाता हैं वही दिन जिले का भी स्थापना दिवस हैं लेकिन पिछले सालों में हमेशा ऐसा होता रहा हैं कि प्रदेश का स्थापना दिवास तो समारोह पूर्वक मना लिया जाता हैं लेकिन जिले की याद ना तो प्रशासनिक अधिकारियों को रहती हैं और ना उन नेताओं को जिनको इस जिले ने  ही उस मुकाम तक पहुंचाया हैं जहां आज वे हैं। अब इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाये कि जिले की माटीका कर्ज ही आज नेताओं को जब याद नहीं रहता तो भला उनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? 
भाजपा में बलात आम सहमति बनी निर्विरोध निर्वाचन-इन दिनों जिले में भाजपा के संगठनात्मक चुनाव हो रहें हैं। जिले के 23 मंड़लों में से अधिकांश के चुनाव निर्विरोध संपन्न हो गये हैं। वैसे तो बताया यह जा रहा है कि ये सारे चुनाव आम सहमति से हुये हैं लेकिन आम सहमति कैसे बनी? या कैसे बनायी गयी? इसके किस्से भी कम रोचक नहीं हैं। अधिकांश मंड़लों में हालात यह थे कि एक से अधिक कई कार्यकर्त्ता अध्यक्ष बनने की तैयारी में काफी दिनों से लगे हुये थे। लेकिन बताया जा रहा है कि मिशन 2013 और 2014 को ध्यान में रखते हुये भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने यह यत कर लिया था कि किसी भी हालत में वोटिंग ना करायी जाये। आमतौर पर यह भी तय कर लिया गया था कि क्षेत्रीय विधायकों और जिले के वरिष्ठ नेताओं की पंसद के अनुसार ही चुनाव करायें जायें। इस लिहाज से जिले में तीनों भाजपा विधायक नीता पटेरिया,कमल मर्सकोले और शशि ठाकुर के अलावा जिला भापा अध्यक्ष सुजीत जैन,मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर और वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन की पसंद नापसंद ही निर्णायक रही हैं। चुनाव अधिकारियों द्वारा आम सहमति बनाने की कोशिश की जाती थी और उसके बाद भी यदि कोई अड़ जाता था तो उसे बता दिया जाता था कि फला व्यक्ति के लिये ऊपर से निर्देश हैं। इस तरह सीधे नहीं तो बलात आम सहमति बना कर जिसे बनाना रहता था उसे बना दिया गया और इसे निर्विरोध निर्वाचन का जामा पहना दिया गया हैं। इस तरह चुनाव भले ही शांतिपूर्ण तरीके से निपट गयें हों लेकिन अंदर ही अंदर पार्टी के निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्त्ताओं के अंदर असंतोष व्याप्त हैं। कॉर बेस कही जाने वाली भाजपा में ऐसे चुनाव इस बात का प्रमाण माने जा रहें हैं कि भाजपा भी अब उसी राजरोग से ग्रस्त हों गयी हैं जिसकी आलोचना करके वो सबसे अलग दिखने का दावा किया करती थी।
अविश्वास प्रस्ताव के नाटकीय अंत का राज क्या?-”गरीब जान के मुझको ना तुम भुला देना, तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना”की तर्ज पर भी पूरा खेल हुआ जिला पंचायत के युवा,जुझारू और लोकप्रिय अध्यक्ष मोहन चंदेल के खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्ताव का। पिछले एक पखवाड़े से जिले के राजनैतिक हल्कों में इसे लेंकर खासी गहमा गहमी थी। वैसे तो यह प्रस्ताव अध्यक्ष पद का चुनाव भाजपा के बैनर तले लड़ने वाले रामगोपाल जैसवाल और कांग्रेस की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रैनवती मानेश्वर की अगुवायी में लाया गया था लेकिन सियासी हल्कों में यह चर्चा भी थी कि इसके पीछे जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह का ही आर्शीवाद था। अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले और उससे बचने वाले मोहन चंदेल दोनों ही पक्षों के सदस्य लगातार हरवंश सिंह के संपर्क में बने हुये थे। इंकाई हल्कों में यह भी चर्चा है मोहन चंदेल ने केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ से अपनी निकटता बढ़ा ली थी और इसी के चलते अंत में कमलनाथ के कहने पर अनिच्छा से सही लेकिन संचालन के सारे सूत्र हरवंश सिंह कोे अपने हाथ में लेना पड़ा। लेकिन अविश्वास का वातावरण इतना गहरा चुका था कि कोई किसी पर विश्वास करने को ही राजी नहीं था। इसीलिये यह रणनीति बनायी गयी कि कोई भी सदस्य बैठक में जाये ही नहीं। यह निर्णय लेने के पीछे भी कुछ कारण थे। पहला तो यह कि मोहन पर लगाये गये गंभीर आरोपों पर कोई बहस नहीं हो पायेगी और शेष कार्यकाल वे अपने ऊपर लगे आरोपों के साये में ही पूरा करेंगें। दूसरा यह कि प्रस्ताव भले ही निरस्त हो जाये लेकिन यह संदेश भी जायेगा कि अध्यक्ष के पास बचने के लिये आवश्यक पांच वोट भी थे तभी तो बैठक का बहिष्कार किया गया। प्रस्ताव को गिर गया लेकिन सियासी हल्कों में यह भी चर्चा हैं प्रदेश में पंचायती राज्य के जनक के रूप में दिग्गी राजा के साथ साथ तत्कालीन पंचायत मंत्री हरवंश सिंह भी अपने आप को मानते हैं और एक अच्छा पंचायत राज्य अधिनियम बनाने का श्रेय भी लेते हैं। लेकिन उन्होंने अपने ही गृह जिले में उसी अधिनियम के प्रावधानों का ऐसा घिनौना मजाक उड़ाया है कि उसकी कोई मिसाल ही नहीं हैं। ”मुसाफिर”     

Monday, October 29, 2012


शिवराज ने नरेश को मविप्रा का अध्यक्ष महाकौशल के विकास के लिये बनाया था या उनके राजनैतिक व्यक्तित्व के विकास के लिये?
राजनेता कोई संत या सन्यासी नहीं होता जिससे कि त्याग और बलिदान की उम्मीद की जाये। कोई ऐसा राजनीतिज्ञ जिसका सब कुछ छीन कर किसी दूसरे की झोली में डाल दिया गया हो वो तो और अधिक प्रतिशोध की आग में झुलसा हुआ रहता हैं। और ऐसे में उसे फिर से कोई अवसर देने वाला अवसर दे दे तो फिर कहना ही क्या है? ऐसा ही कुछ प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को मविप्रा का लालबत्तीधारी अध्यक्ष बनाकर किया है। सियासी हल्कों में यह चर्चा है कि आखिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष महाकौशल के विकास के लिये बनाया था या उनके राजनैतिक व्यक्तित्व के विकास के लिये? बीस साल से जिस केवलारी विस क्षेत्र का वे प्रतिनिधित्व कर रहें हैं वहां खुद कितना विकास हुआ है? इसका खुलासा हाल ही में हुआ हैं। वैसे तो हर साल हर विस द्वोत्र में हाई रूकूल और हायर सेकेन्डरी स्कूल खुलते हैं। लेकिन इस साल केवलारी विस द्वोत्र में उगली के पास रुमाल गांव में खुले हायर सेकेन्डरी स्कूल ने राजनैतिक भूचाल ला दिया है। इस घोषणा के बाद से ही उगली में क्षेत्रीय विधायक और विस उपध्यक्ष हरवंश सिंह का विरोध चालू हो गया।इन दिनों जिले में भाजपा के चुनावों को लेकर राजनैतिक हलचल जारी हैं। हालांकि आलकमान के निर्देशानुसार भाजपा में चुनाव की जगह आम सहमति से चयन होने की संभावना व्यक्त की जा रही हैं। मंड़लों के चुनावों में तो कोई खास उलट फेर होने की संभावना नहीं हैं।
विकास किसका महाकौशल का या खुद का? -राजनेता कोई संत या सन्यासी नहीं होता जिससे कि त्याग और बलिदान की उम्मीद की जाये। कोई ऐसा राजनीतिज्ञ जिसका सब कुछ छीन कर किसी दूसरे की झोली में डाल दिया गया हो वो तो और अधिक प्रतिशोध की आग में झुलसा हुआ रहता हैं। और ऐसे में उसे फिर से कोई अवसर देने वाला अवसर दे दे तो फिर कहना ही क्या है? ऐसा ही कुछ प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को मविप्रा का लालबत्तीधारी अध्यक्ष बनाकर किया है। उल्लेखनीय है कि दो बार के विधायक रहते हुये भी भाजपा ने नरेश दिवाकर की कई आरोपों के चलते टिकिट काट कर तत्कालीन सांसद नीता पटेरिया को दे दी थी। वे भारी मतों से चुनाव जीत भी गयीं थीं। प्रदेश में चार सांसदों को चुनाव लड़ाया गया था जिनमें से तीन को दो चरणों में कबीना मंत्री बना दिया गया। लेकिन ना जाने क्यों शिवराज सिंह ने नीता पटेरिया को मंत्री नहीं बनाया हालांकि उन्हें प्रदेश महिला मोर्चे का अध्यक्ष जरूर बना दिया गया। इसके बाद जब लाल बत्तियां बंटनी शुरू हुयी तो शिवराज ने पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बना दिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि विकास के लिहाज से प्रदेश के पिछड़े हुये क्षेत्रों के विकास को गति प्रदान करने के लिये प्राधिकरण बनाये गये हैं। इस लिहाज से देखा जाये तो नरेश जी के अध्यक्ष बनने के बाद से महाकौशल के विकास को गति पकड़ना चाहिये था लेकिन ऐसा कुछ तो दिखायी नहीं दिया वरन उनके राजनैतिक व्यक्तित्व में विकास जरूर दिखायी दे रहा हैं। जिले को भी कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुयी हैं। हां कहने को उन दो सड़कों के लिये राशि मंजूर करने की जरूर घोषणा हुयी है। ये सड़के है सर्किट हाउस से एस.पी. बंगले तक तथा सिंघानिया के मकान से मठ स्कूल जिसे जुलूस मार्ग कहा जाता है। ये दोनों सड़कें ही उनके विधायक रहते हुये दुगनी लागत में उनके समर्थक भाजपा ठेकेदारों ने घटिया बनायीं थी। इनमें से एक पहली सड़क तो बन गयी है लेकिन जुलूस मार्ग अभी भी नहीं बनी है जबकि दशहरा का जुलूस तो इस साल का भी निकल गया है। सियासी हल्कों में यह चर्चा है कि आखिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष महाकौशल के विकास के लिये बनाया था या उनके राजनैतिक व्यक्तित्व के विकास के लिये?
विकास की गंगा कहां गुम हो गयी उगली में?-जिले में विकास की गंगा बहाने वाले भागीरथ,इंका महाबली,प्रदेश के कद्दावर नेता,दादा ठाकुर और विकास पुरुष जैसे ना जाने कितने नामों से जिले के इकलौते इंका विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह को पुकारा जाता हैं। लेकिन बीस साल से जिस केवलारी विस क्षेत्र का वे प्रतिनिधित्व कर रहें हैं वहां खुद कितना विकास हुआ है? इसका खुलासा हाल ही में हुआ हैं। वैसे तो हर साल हर विस द्वोत्र में हाई रूकूल और हायर सेकेन्डरी स्कूल खुलते हैं। लेकिन इस साल केवलारी विस द्वोत्र में उगली के पास रुमाल गांव में खुले हायर सेकेन्डरी स्कूल ने राजनैतिक भूचाल ला दिया है। इस घोषणा के बाद से ही उगली में द्वोत्रीय विधायक और विस उपध्यक्ष हरवंश सिंह का विरोध चालू हो गया। वहां गांव के लोगों और इंका नेताओं का भी यह कहना है कि हरवंश सिंह के पहले चुनाव जीतने के बाद से ही उगली में हायर सेकेन्डरी स्कूल खोलने की मांग की जा रही थी। यह मांग अभी तक पूरी नहीं हो पायी है जबकि उससे छोटे गांव रुमाल में हायर सेकेन्डरी स्कूल खुल गया। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सितम्बर माह में ही शिक्षक दिवस के मौके पर क्षेत्रीय विधायक हरवंश सिंह ने रुमाल गांव में ही शिक्षकों के सम्मान का आयोजन किया था। इस घोषणा से उगली गांव में आक्रोश पैदा हो गया और विधायक के आगमन पर पुतला जलाने की घोषणा कर दी गयी। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि हरवंश सिंह कांग्रेस के दिग्विजय मंत्री मंड़ल में दस साल तक एक ताकतवर मंत्री के रूप में रहें हैं। वर्तमान में भाजपा के राज में भी वे लाल बत्तीधारी विस उपाध्यक्ष के पद पर विराजमान हैं। इन सब कारणों से जो विरोध उपजा उसे येन केन प्रकारेण हरवंश सिंह ने फिलहाल तो शांत कर लिया और उनका पुतला बनने के बाद भी जल नहीं पाया। यहां यह भी उल्लेखनीय हैं कि पिछले चुनाव में उनका मुकाबला करने वाले भाजपा प्रत्याशी डॉ. ढ़ासिंह बिसेन भी इन दिनों प्रदेश वित्त आयोग के अध्यक्ष बन कर लाल बत्ती पर सवार कबीना मंत्री के दर्जे के साथ केवलारी क्षेत्र में ही घूम रहें हैं। लेकिन 2013 में होने वाले विस चुनाव के पहले उपजे इस विरोध ने इंका विधायक हरवंश सिंह को चौकन्ना कर दिया हैं और अब वे डेमेज कंट्रोल करने के उपाय तलाशने में जुट गयें हैं। बताया तो यह भी जा रहा है कि इस विरोध की खबर सुनकर हरवंश ने अपने दो सिपहसालारों को भी खूब खरी खोटी सुनायी है जबकि इसमें उनका कोई दोष भी नही था। अब चुनाव तक वे इस विरोध को कैसे और कितना शांत कर पायेंगें? यह तो अभी भविष्य की गर्त में ही हैं। 
जिला भाजपा अध्यक्ष को लेकर अटकलें हुयी तेज-इन दिनों जिले में भाजपा के चुनावों को लेकर राजनैतिक हलचल जारी हैं। हालांकि आलकमान के निर्देशानुसार भाजपा में चुनाव की जगह आम सहमति से चयन होने की संभावना व्यक्त की जा रही हैं। मंड़लों के चुनावों में तो कोई खास उलट फेर होने की संभावना नहीं हैं। अधिकांश मंड़लों में अध्यक्ष पद पर पुराने चेहरों के बने रहने की ही संभावना हैं। जिला अध्यक्ष पद को लेकर सर्वाधिक चर्चे हो रहे हैं। जिले में भाजपा के तीन नेताओं के इर्द गिर्द ही यह चयन प्रक्रिया घूम रही हैं। इनमें डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,नीता पटेरिया और नरेश दिवाकर शामिल हैं। वैसे तो अध्यक्ष पद के लिये आधा दर्जन से ज्यादा नाम शामिल हैं जिनमें वर्तमान अध्यक्ष सुजीत जैन के अलाव पूर्व अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर एवं सुदर्शन बाझल,सुदामा गुप्ता, भुवनलाल अवधिया,प्रेम तिवारी,अशोक टेकाम आदि शामिल हैं। नरेश दिवाकर के मामले में कहा जा रहा है कि वे अपनी तरफ से सुजीत को अध्यक्ष बनाने की कोशिश तो नहीं करेंगें लेकिन यदि आम सहमति बनती दिखी तो वे विरोध भी शायद ना करें। वैसे उनकी ओर से सुदर्शन बाझल का नाम आगे किया जा सकता हैं। यदि आदिवासी अध्यक्ष बनाने की बात हुयी तो वे अशोक टेकाम के नाम को आगे कर सकते हैं। डॉ. बिसेन खुले तौर पर कुछ बोल नहीं रहें हैं लेकिन सुजीत से उन्हें भी कोई  तकलीफ नहीं हैं। प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष एवं विधायक नीता पटेरिया ने अपने पत्ते अभी तक नहीं खोले हैं। जिले के दोनों आदिवासी विधायक शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले की विशेष रुचि अपने क्षेत्रों के मंड़ल अध्यक्षों तक ज्यादा केन्द्रित हैं। इस सबके बावजूद भी यह माना जा रहा हैं प्रदेश स्तर पर जिसके नाम पर आम सहमति बन जायेगी उसके सर पर ही ताज पहनाया जायेगा।”मुसाफिर”  

Monday, October 22, 2012



अजय सिंह को विस उपाध्यक्ष और हरवंश सिंह को प्रदेश चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाने के असंतुष्टों के प्रस्ताव से सियसी हल्के हुये भौंचक
 बीते दिनों दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर असंतुष्ट विधायकों की केन्द्रीय नेताओं से हुयी मुलाकात अखबारों की सुर्खी बनी हुयी हैं। इन नेताओं ने मिशन 2013 में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिये केन्द्रीय नेताओं एक पांच सूत्रीय र्फामूला सुझाया हैं। अखबारों में दावा किया जा रहा हैं कि यह मुहिम प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेश जोशी के नेतृत्व में चलायी जा रही हैं जिसमें सिंधिया समर्थक गुट शामिल हैं। इस अभियान से यह चर्चा जोर पकड़ गयी हैं कि अभी से मुख्यमंत्री बनने की बिसात बिछना चालू हो गयी हैं। इंकाई राजनीति को जानने वालों का दावा है कि महेश जोशी की हरवंश सिंह के बीच  सालों से तना तनी चल रही हैं। राजनैतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि हरवंश-शिवराज सांठ गांठ के आरोपों के चलते यह मुहिम फेल भी हो सकती हैं। हाल ही में संविधान में हुये संशोधन ाके लेकर जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन खासे उत्साहित हें कि गड़करी की भांति उन्हें भी लगातार दूसरी पारी खेलने को मिल सकती हैं। सिवनी के पूर्व और वर्तमान भाजपा विधायकों नरेश दिवाकर और नीता पटेरिया को अन्य जिलों का चुनाव प्रभारी बनाने को लेकर भी तरह तरह की चर्चायें जारी हैं। पिछले विस चुनाव में गौगपा उम्मीदवार के रूप में 39 हजार वोट लेने वाली इंका नेत्री एवं जनपद अध्यक्ष राजेश्वरी उइके ने आगामी चुनाव में कांग्रेस से उम्मीदवार बनने के लिये अपनी दावेदारी ठोंक दी हैं।
जिले मे चर्चा है प्रदेश इंका असंतोष की-प्रदेश कांग्रेस में चल रहे उठा पटक के दौर की जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चा जारी हैं। बीते दिनों दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर असंतुष्ट विधायकों की केन्द्रीय नेताओं से हुयी मुलाकात अखबारों की सुर्खी बनी हुयी हैं। इन नेताओं ने मिशन 2013 में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिये केन्द्रीय नेताओं एक र्फामूला सुझाया हैं। इस र्फामूले तहत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया को केन्द्रीय मंत्री बनाने, केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को विधानसभा उपाध्यक्ष बनाने, वरिष्ठ आदिवासी विधायक बिसाहूलाल सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाने और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह को प्रदेश चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया गया हैं। अखबारों में दावा किया जा रहा हैं कि यह मुहिम प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेश जोशी के नेतृत्व में चलायी जा रही हैं जिसमें सिंधिया समर्थक गुट शामिल हैं। इस अभियान से यह चर्चा जोर पकड़ गयी हैं कि अभी से मुख्यमंत्री बनने की बिसात बिछना चालू हो गयी हैं जबकि आज इस बात कीे कोई गारंटी नहीं हैं कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन ही जायेगी। गुटबाजी के लिये मशहूर मध्यप्रदेश में जब तक कांग्रेस के सभी गुटों को आला कमान पूरी सख्ती के साथ एक जुट होकर कांग्रेस को जिताने के लिये लाम बंद नहीं करेगा तब तक कांग्रेंस की संभावनायें प्रबल नहीं बन सकती हैं। और ऐसा हो पायेगा? यह कहना भी अभी संभव नहीं दिख पा रहा हैं। चूंकि इस अभियान में दिये गयेसुझावों में से एक हरवंश सिंह को प्रदेश चुनाव समिति के अध्यक्ष बनाने का भी है इसलिये जिले के राजनैतिक हल्कों में बन रहे इस नये राजनैतिक समीकरण का विश्लेषण भी किया जा रहा हैं। इंकाई राजनीति को जानने वालों का दावा है कि महेश जोशी की हरवंश सिंह के बीच  सालों से तना तनी चल रही हैं। ऐसे में उनके नेतृत्व में चलाये जा रहे अभियान में प्रदेश चुनाव समिति के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद के लिये उनका नाम कैसे शामिल हो गया। जानकार सूत्रों का दावा हैं कि विधायकों के माफीनामे के कांड़ के बाद दिग्गी खेमा हरवंशसिंह से खासा नाराज हैं। इसका खुलासा भी बीते दिनों जिले के कई इंका नेताओं ने देखा भी हैं। इसको भांपते हुये हरवंश सिंह ने एक सोची समझी रणनीति के तहत कमलनाथ और दिग्गी खेमे से परे हट कर सिधिंया खेमे की ओर अपने कदम बढ़ा लिय हैं। परिसीमन समिति में इंका सांसदों में सिधिया और विधायक हरवंश सिंह सदस्य थे। इस दौरान बने संबंधों के चलते ही उन्होंने निकटता बढ़ायी और चार साल तक विपक्ष की सरकार में भी लाल बत्ती का सुख भोगने के बाद अब चुनाव समिति का अध्यक्ष बन कर मिशन 2013 में तुरुप के पत्ते बनने का प्रयास चालू कर दिया हैं। इस र्फामूले की एक विशेषता और यह हैं कि मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अजय सिंह करे विस उपाध्यक्ष के संवैधानिक पद बिठाने और दूसरंे प्रबल दावेदार भूरिया को केन्द्र में भेजने की जो योजना हैं वह  भी  एक सोची समझी कूटनीतिक चाल कही जा रही  हैं। हरवंश सिंह यह बात भी भली भांति जानते है कि विस उपाध्यक्ष रहते हुये प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में भी वे सिर्फ विस अध्यक्ष ही बन सकते हैं। इस रास्ते से मुख्यमंत्री बनना संभव नहीं हैं। इसीलिये प्रदेश की राजनैतिक शतरंज में यह बिसात बिछायी गयी हैं। इंकाई हल्कों में यह भी चर्चा है कि कमलनाथ और दिग्गी राजा लंबे समय से हरवंश सिंह की राजनैतिक फितरतों को भली भांति जानते हैं जबकि सिंधिंया इससे उतने वाकिफ नहीं हैं। फिलहाल तो आला कमान ने डांट डपट कर असंतुष्टों को खाली हाथ लौटा दिया हैं लेकिन बताया जा रहा हैं कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात के विस चुनावों के बाद यह मुहिम एक बार फिर नये सिरे से चालू करने की योजना बनायी जा रही हैं। लेकिन राजनैतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि हरवंश-शिवराज सांठ गांठ के आरोपों के चलते यह मुहिम फेल भी हो सकती हैं।
भाजपा में क्या दूसरी पारी खेल पायेंगें सुजीत?-प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के संगठनात्मक चुनावों को लेकर इन दिनों खासी उत्सुकता बनी हुयी हैं। हाल ही में संविधान में हुये संशोधन ाके लेकर जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन खासे उत्साहित हें कि गड़करी की भांति उन्हें भी लगातार दूसरी पारी खेलने को मिल सकती हैं। सिवनी के पूर्व और वर्तमान भाजपा विधायकों नरेश दिवाकर और नीता पटेरिया को अन्य जिलों का चुनाव प्रभारी बनाने को लेकर भी तरह तरह की चर्चायें जारी हैं। संगठनात्मक चुनाव, सहकारिता के चुनाव और अगली विधानसभा टिकिट लो लेकर कुछ भाजपा नेताओं की डिनर डिप्लोमेसी की भी भाजपायी खेमे में खासी चर्चा हें।  जिले में कई गुटों में बंटी भाजपा में प्रदेश नेतृत्व कैसे तालमेल बिठायेगा और किसकी झोली मे क्या आयेगा? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं। वर्तमान जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के कार्यकाल में हुये एक मात्र लखदौन नगर पंचायत के चुनाव में भाजपा की हुयी करारी हार को उनके विरोधी नेता हथियार बनाने की फिराक में हैं। इसमें वे कहां तक कामयाब होते हैं? इसका खुलासा तो चुनावों के बाद ही हो पायेगा। 
इंका में लखनादौन विस से राजेश्वरी ने किया दावा -कभी कांग्रेस का मजबूत किला रही लखनादौन विस क्षेत्र में मिशन 2013 को लेकर अभी से हलचल चालू हो गयी हैं। पिछला चुनाव गौगपा से लड़कर 30 हजार 8 सौ 57 वोट लेने वाली राजेश्वरी उइके अब कांग्रेस में आकर वर्तमान में लखनादौन जनपद पंचायत की अध्यक्ष हैं। पिछले चुनाव में इंका प्रत्याशी पूर्व विधायक बेनी परते को 41211 तथा चुनाव जीतने वाली भाजपा की शशि ठाकुर को 46209 वोट मिले थे। आजादी के बाद से इस क्षेत्र में कभी ना हारने वाली कांग्रेस को 2003 के चुनाव में शशि ठाकुर ने ही पहली हराया था और भाजपा का परचम फहराया था। हाल ही में यह समाचार सियासी हलकों में चर्चित रहा कि लखनादौन क्षेत्र के 25 हजार आदिवासियों ने हस्ताक्षर करके राजेश्वरी उइके को कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने की गुहार आलाकमान से की हैं। इस पत्र में यह लिखा गया हैं कि राजेश्वनी उइके ही भाजपा से इस क्षेत्र को वापस कांग्रेस को दिला सकतीं हैं। अब इसे क्या कहा जाये कि इंका नेता हरवंश की राजनैतिक चालों एवं उनके समर्थकों द्वारा की गयी हरकतों के चलते ही कांग्रेस का यह किला धूल धूसरित हो गया और हरवंश के समर्थक ही इस किले पर फिर से कांग्रेस का परचम फहराने का दावा कर रहें हैं। इतने पहले चालू हुयी राजनैतिक गतिविधियों को लेकर सियासी हल्कों में आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा हैं। उल्लेखनीय हैं कि हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह के परिसीमन के बाद समाप्त हो गयें घंसौर विस क्षेत्र का काफी बड़ा हिस्सा भी अब लखनादौन क्षेत्र में शामिल हो गया हैं।“मुसाफिर” 

Monday, October 1, 2012


शिवनगरी का आखिर किस मंुह से जनदर्शन करते या जनता को दर्शन देते शिवराज 
एक भी घोषणा नहीं हुयी थी पूरीः अन्य जिलों की तरह पूरे पेज के विज्ञापन में क्या छपता?
सिवनी। पूरे प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लगभग तीन सप्ताह तक जनदर्शन का कार्यक्रम रखा था। इसके तहत हर जिले में जब वो जाते  थे तो जन संपर्क विभाग द्वारा स्थानीय एवं क्षेंत्रीय अखबारों में पूरे पूरे पेज के विज्ञापन प्रकाशित कराये जाते थे जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा जिले में की गयी घोषणाओं और उनके पूरे होने का जिक्र होता था। बताया जाता हैं कि इसके लिये जिला प्रशासन से घोषणाओं के बारे में पूरी जानकारी संकलित की जाती थी। 
शिवराज सिंह चौहाने ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जिले में सात बार यात्रायें की हैं। इस दौरान उन्होंने छोटी बड़ी  कई घोषणाये करके  ना केवल जनता की वरन मंच पर बैठे जनप्रतिनिधियों की भी खूब तालियां बटोरी थी। इनमें प्रमुख मेडिकल कालेज, इंजीनियरिंग एवं कृषि महाविद्यालय,फोर लेन,पेंच का पानी सिवनी लाने,सिवनी को प्रदेश का सबसे सुंदर शहर बनाने,दलसागर को ऐसा सजायेंगें कि मेहमान गर्व कर सकें,नरसिंग कॉलेज खोेलने,केवलारी और छपारा को नगर पंचायत का दर्जा देने,पलारी को उप तहसील बनाने, कान्हीवाड़ा को पूर्ण तहसील एवं विकास खंड़ बनाने और कांचना मंड़ी जलाशय के लिये 2008 में 36 करोड़ रु. स्वीकृत करने सहित अन्य कई छोटी घोषणाये भी शामिल हैं। 
उक्त घोषणाओं में सिर्फ दलसागर तालाब के मामले में जरूर कुछ काम हुआ हैं वह भी केन्द्र सरकार की बी.आर.जी.एफ. योजना के तहत हुआ हैं। शेष सभी घोषणायें सिर्फ घोषणायें ही बन कर रह गयीं हैं।
लेकिन इसके लिये सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं वरन जिले के वे जन प्रतिनिधि भी दोषी हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र के लिये होने वाली घोषणाओं पर ताली तो खूब बजायी लेकिन मुख्यमंत्री के पीछे नहीं पड़े कि उन्हें पूरा किया जायें। ऐसे हालात में शिवराज शिव की नगरी सिवनी में जनदर्शन करने या जनता को दर्शन देने के लिये भला कैसे और किस मुंह से आ सकते थे?


जिसके खिलाफ आंदोलन उससे ही 
मदद की मांग? वाह क्या बात है .......
सिवनी। कभी आपने यह सुना है कि जिसके खिलाफ आंदोलन किया जाये उससे ही आंदोलन के खर्च की मांग की जाये? और कहीं कभी भी यह हुआ हो या नहीं लेकिन सिवनी में ऐसा एक वाकया होने की इन दिनो शहर में चर्चा गर्म हैं। बताया जा रहा है कि नगर के वी.आई.पी. जोन बारापत्थर में स्थित केन्द्र सरकार के एक कार्यालय प्रमुख से बुद्धिबल के नाम पर जनहित की आड़ में राजनीति करने वाले एक नेता ने कुछ ऐसी ही मांग कर डाली थी। उनका तर्क यह था कि जब वे आंदोलन करते हैं तभी तो केन्द्र सरकार आपके लिये पैसा स्वीकृत्त करता हैं। लेकिन जब कार्यालय प्रमुख ने यह मांग पूरी करने से मना कर दिया तो उससे बहुत हुज्जत भी की गयी। बताया तो यहां तक जा रहा हैं कि जब यह मांग पूरी नहीं हुयी तो कार्यालय प्रमुख के उच्चाधिकारियों से उसकी शिकायत भी कर दी गयी हैं। जनहित की आड़ में स्वहित की राजनीति करने वाले ये नेता ऐसा भी कारनामा कर दिखायेंगें इसकी लोगों को उम्मीद नहीं थी। लोग तो यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि ऐसा नायाब नुस्खा  तो कोई बुद्धिमान ही ढ़ूंढ़कर ला सकता हैं।

पुराने पाप धोने की भी मांग की जाये और फिर आभार भी व्यक्त करें तो भला नरेश को क्यों ना पसंद आयेगा? 
पाप धोने में भी आभार लेने की तकनीक जिले की राजनीति में ईजाद कर ली गयी हैं।भाजपा की तत्कालीन नपा अध्यक्ष पार्वती जंघेला के कार्यकाल में दुगनी कीमत पर तीन घटिया सड़कें तत्कालीन भाजपा विधायक नरेश दिवाकर के कार्यकाल में बनायीं गयीं थीं। इसकी शिकायत इंका नेता आशुतोष वर्मा ने राज्य सरकार से की थी। प्रदेश की भाजपा सराकर ने पार्वती जंघेला सहित दो सी.एम.ओ. पर 9 लाख से अधिक की रिकवरी निकाली गयी थी जो कि आज तक वसूल नहीं की जा सकी हैं। इन सड़कों को फिर से बनवाने में पुराने पाप धोने में भी आभार प्राप्त करने की उपरोक्त कला का बखूबी प्रर्दशन किया गया। जनता जनार्दन यदि किसी नेता या कुछ नेताओं को शूरवीर मान लें और वाकयी में वे वीर भी ना हों तो भला उन नेताओं का क्या दोष है? दोषी तो जनता जर्नादन ही कहलायेगी जो ऐसे नेताओं को अपना प्रतिनिधि बनाते रहती हैं। मुस्लिम समाज मे हज यात्रा सबसे पाक यात्रा मानी जाती हैं। आज से दो साल पहले अचानक ही सिवनी,छिंदवाड़ा,बालाघाट और मंड़ला जिले के हज यात्रियों को नागपुर के बजाय भोपाल से उड़ान भरने का आदेश जारी हो गया। सन 2010 में चारों जिलों की हज कमेटियों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। अब जब फिर नागपुर से ही जाने का निर्णय हुआ तो श्रेय लेने का सियासी खेल भी खूब चला और कांग्रेस और भाजपा ने भी इसमें पूरी कवायत की हैं। इसेस तमाम सवाल पैदा हो गयें हैं जिनका जवाब यदि हम खुद तलाश करें तो सारे खेल का खुलास हो जायेगा।  
पुराने पाप धोने में भी मिलने लगा आभार-पाप      धोने में भी आभार लेने की तकनीक जिले की राजनीति में ईजाद कर ली गयी हैं। इसके लिये पहले पाप धोने की जनप्रतिनिधयों से बाकायदा अखबारों के माध्यम से मांग करानी पड़ती हैं। फिर इसकी स्वीकृति देकर अपना पुराना पाप धोया जाता हैं और फिर मांग करने वालों से अखबार में ही आभार व्यक्त कराया जाता हैं और अपना नाम विनाश पुरूष से अलग कर विकास पुरूष के रूप मे दर्ज करा लिया जाता हैं। चौंकिये नही यह वाकया कहीं और का नहीं वरन अपने सिवनी शहर का ही हैं। पाठकों को याद होगा कि भाजपा की तत्कालीन नपा अध्यक्ष पार्वती जंघेला के कार्यकाल में दुगनी कीमत पर तीन घटिया सड़कें तत्कालीन भाजपा विधायक नरेश दिवाकर के कार्यकाल में बनायीं गयीं थीं। इसकी शिकायत इंका नेता आशुतोष वर्मा ने राज्य सरकार से की थी। तीन साल चली इस लड़ाई के बाद प्रदेश की भाजपा सराकर ने पार्वती जंघेला सहित दो सी.एम.ओ. पर 9 लाख से अधिक की रिकवरी निकाली गयी थी जो कि आज तक वसूल नहीं की जा सकी हैं। यह भी आरोप था कि ये घटिया सड़के तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर के ही विश्वस्त भाजपा ठेकेदारों ने बनायीं थी। जैसे ही नरेश दिवाकर को सरकार ने महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाकर लाल बत्तीधारी बनाया वैसे ही वे अपने पुराने पाप धोने में लग गये। पहले सर्किट हाउस से एस.पी. बंगले तक की घटिया सड़क को बनवाया गया और अब दूसरी सड़क अनिल सिंघानिया के मकान से मठ मंदिर चौराहे तक की सड़क की स्वीकृति दी गयी हैं। इसमें पुराने पाप धोने में भी आभार प्राप्त करने की उपरोक्त कला का बखूबी प्रर्दशन किया गया। यहां एक बात और विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि इन दोनों ही सड़कों को बनाने के लिये स्वीकृत की गयी राशि भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी वाली पालिका को ना देकर लोक निर्माण विभाग को देकर यह संदेश देने की कोशिश भी गयी हैं कि घटिया सड़क  बनाने में पालिका ही जवाबदार थी और इसमें किसी और का कोई रोल नहीं था। जबकि मांग और आभार दोनों ही पालिका के पदाधिकारी और पार्षदों ने ही की थी और नरेश दिवाकर को विकास पुरूष बनने का मौका दिलाया था। इसे ही तो राजनीति में कूटनीति कहा जाता हैं।
हज यात्रा जैसे पाक काम में भी खूब हुआ सियासी खेल-जनता जनार्दन यदि किसी नेता या कुछ नेताओं को शूरवीर मान लें और वाकयी में वे वीर भी ना हों तो भला उसमें उन नेताओं का क्या दोष है? दोषी तो जनता जर्नादन ही कहलायेगी जो ऐसे नेताओं को अपना प्रतिनिधि बनाते रहती हैं। मुस्लिम समाज मे हज यात्रा सबसे पाक यात्रा मानी जाती हैं। आज से दो साल पहले अचानक ही सिवनी,छिंदवाड़ा,बालाघाट और मंड़ला जिले के हज यात्रियों को नागपुर के बजाय भोपाल से उड़ान भरने का आदेश जारी हो गया। सन 2010 में चारों जिलों की हज कमेटियों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। इस संबंध में जानकार लोगों का कहना हैं कि प्रदेश हज कमेटी और प्रदेश सरकार की अनुशंसा पर सेन्ट्रल हज कमेटी और केन्द्र सरकार हज यात्रियों की उड़ान भरने के लिये एरोड्रम का निर्धारण करती हैं। पिछले साल भी इसका विरोध हुआ और इस साल भी जारी था। पहले तो यह खबर आयी कि चारों जिले के हज यात्रियों अब पहले की तरह नागपुर से हज यात्रा पर जायेंगें। इसके लिये आभार भी व्यक्त कर दिया गया। लेकिन जब आदेश आये तो केवल छिंदवाड़ा जिले के हज यात्रियों के लिये ही नागपुर   किया गया लेकिन बाकी तीनों जिलों को छोड़ दिया गया। यह हल्ला होते ही इन तीन जिलो में खलबली मच गयी। जब चारों जिलो का एक साथ नागपुर से भोपाल परिवर्तन किया गया था तो फिर केवल छिंदवाड़ा को ही यह       सुविधा फिर से क्यों दी गयी और बाकी तीन जिलों को क्यों छोड़ दिया गया? मुस्लिम समाज के नेताओं के अलावा और कांग्रेस तथा भाजपा ने भी परंपरानुसार एक दूसरे पर आरोप लगाते हुये इस मामले में पहल करना शुरू कर दिया। इसी बीच मुस्लिम सामाजिक संस्था अलफलाह तंजीम के दो नौजवानों तनवीर अहमद और रिजवान खॉन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी। याचिका दायर होने के चंद दिनों बाद ही इन तीनों जिलों के हज यात्रियों को भी नागपुर से हज यात्रा प्रारंभ करने के आदेश जारी हो गये। इसकी खबर लगते ही हज जस्ी पाक यात्रा में सियासत का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस की ओर से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह का आभार व्यक्त किया गया तो जिला भाजपा अल्प सयंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष शफीक खॉन ने विज्ञप्ति जारी कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, छिंदवाड़ा जिले के विधायक प्रेम नारायण ठाकुर, विधायक नीता पटेरिया,मविप्रा के अध्यक्ष रनेश दिवाकर एवं जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन का आभार व्यक्त कर डाला। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समाज की ओंर से याचिका दर्ज करने वालों की प्रशंसा कर डाली। इन सब भारी भरकम लोगों का आभार व्यक्त करने से एक सवाल यह पैदा हो गया हैं कि क्या ये सब वास्तव में भारी भरकम हैं? यदि हैं तो इन सबको यह काम कराने में दो साल का समय क्यों लग गया? जिन कांग्रेस भाजपा नेताओं की नूरा कुश्ती के समाचार सियासी हल्कों में जब देखो तब तैरते दिखायी देते हैं उन्हें भी यह करने में क्यों इतना समय लग गया? इन सब भारी भरकम नेताओं के रहते हुये भी इन चार जिलों के हज यात्रियों को क्या दो साल तक बिना वजह परेशानी का भार नहीं छेलना पड़ा? और यदि भार झेलना पड़ा तो भला अब आभार किस बात का?क्या चार जिलों में से तीन जिलों को पहले छोड़ देना उचित था? प्रदेश  के इन वार जिलो को नागपुर के बदलेे भोपाल से भेजने का पहले लिया गया निर्णय अब गलत साबित नहीं हो गया है? यदि हां तो इस निर्णय को किसने और क्यों लिया था? क्या यह सब भोपाल में हज यात्रियों की खिदमत के लिये हज हाउस बनाने के लिये किया गया था? क्या यह सारी सियासी कवायत अगले साल होने वाले चुनावों को ध्यान में रख कर की गयी है? इन सारे ावालों का जवाब यदि बिना किसी सियासी भेदभाव के हम खुद तलाश करें तो सारा खेल का खुद ब खुद खुलासा हो जायेगा। अब यह तो हमें खुद ही सोचना पड़ेगा कि जिन्हें हम शूर वाीर मान कर अपना प्रतिनिधि चुनते आ रहें हैं वे कितने शूरवीर हैं?”मुसाफिर”          

Thursday, September 27, 2012


राष्ट्रवाद पर हावी होते क्षेत्रीयतावाद के खतरे से बचने के उपाय तलाशना जरूरी
भारतीय राजनीति का इन दिनो संक्रमण काल चल रहा हैं। सन 1996 से प्रारंभ हुये गठबंधन की राजनीति का दौर जारी हैं। केन्द्र में सरकार  इन गठबंधनों की ही बन रही हैं। इन सोलह सालों में देश हित में हुआ तो बहुत कुछ है लेकिन गठबंधन की मजबूरियों के कारण बहुत कुछ ऐसा भी है जो नहीं हो पाया हैं।
देश में 7 राष्ट्रीय एवं 45 क्षेत्रीय मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल हैं। राष्ट्रीय पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी, सी.पी.आई.,सी.पी.एम.,राष्ट्रवादी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी शामिल हैं। 
कांग्रेस हमेशा से मास बेस पार्टी रही हैं लेकिन पिछले कुछ समय से क्षेत्रीय दलों द्वारा उसके वोट बैंक में सेध लगाने के कारण जनाधार कमजोर हुआ हैं। परंतु राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस आज भी सबसे बड़ा राजनैतिक दल हैं। भाजपा केडर बेस पार्टी हैं लेकिन उसका प्रभाव अभी भी दक्षिण भारत में नहीं जम पाया हैं। दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में भाजपा ने सरकार तो बनायी लेकिन जिस तरह से सरकार चल रही है उससे सबसे अलग दिखने का भाजपा का दावा कमजोर ही हुआ हैं। वाम दलों सहित राकपा,सपा और बसपा कहने को तो राष्ट्रीय दल हैं लेकिन वास्तविकता यह हैं कि इनका राजनैतिक अस्तित्व भी क्षेत्रीय दलो से कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता है। इस प्रकार यह कहने में कोई संकोच नही हैं कि इन दिनों राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के प्रभामंड़ल में जो कमी आयी हैं वही गठबंधन की राजनीति प्रारंभ होने का मूल कारण हैं। 
मान्यता प्राप्त 45 क्षेत्रीय दलों में डी.एम.के.,ए.आई.ए.डी.एम.के.,तृणमूल कांग्रेस,बीजू जनता दल,जनता दल यू.,आर.जे.डी.,तेलगू देशम पार्टी,शिव सेना और टी.आर.एस. जैसे कई राजनैतिक दल हैं जो कि गठबंधन की सरकारों के गठन और पतन में महत्वपूर्ण राजनैतिक भूमिका निभाते रहें हैं। इसका दंश देश ने देखा और भोगा है फिर चाहे वो भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार हो या कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार हो।
अंर्तराष्ट्रीय और अंर्तराज्यीय मुद्दों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की सोच में फर्क रहता है। जहां एक ओर राष्ट्रीय पार्टियों की सोच राष्ट्रीय स्तर की होती हैं। वहीं क्षेत्रीय पार्टियों की प्राथमिकता उनके प्रभाव क्षेत्र तक सीमित होकर रह जातीं हैं। सोच का यही अंतर सरकार के कामकाज पर निर्णायक असर डालता हैं। गठबंधन की सरकारों के 16 सालों के काम काज को देखते हुये अब यह समय की मांग हैं कि इनसे बचने के लिये उपायों पर विचार किया जाये। 
मेरे विचार से संविधान में कुछ ऐसा प्रावधान किया जाना क्या न्याय संगत नहीं होगा कि चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को पंचायत से लेकर विधानसभा चुनाव लडने की पात्रता दी जाये और यदि किसी गठबंधन के साथ ऐसे क्षेत्रीय दल लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो गठबंधन का नेतृत्व करने वाली राष्ट्रीय पार्टी के चुनाव चिन्ह पर ही उन्हें चुनाव लड़ने की पात्रता दी जाये? ऐसा करने से कम से कम दल बदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत सरकार की स्थिरता पर तो कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। मेरे इस विचार का हो सकता है कि इस आधार पर विरोध भी हो कि यह सुझाव प्रजातंत्र के मूल सिद्धान्तों के खिलाफ है। लेकिन बीते दिनों क्षेत्रीय दलों और उनके नेताओं की भूमिेका और सौदे बाजी ने आज यह सोचने को तो जरूर मजबूर कर दिया हैं कि ऐसे उपाय किये जाना जरूरी हैं जो कि बढ़ते हुये क्षेत्रीयतावाद  और कमजोर पड़ते राष्ट्रवाद के बीच समन्वय बना सके। अन्यथा देश की अखंड़ता और एकता पर बढ़ते हुये क्षेत्रीयतावाद के खतरे से इंकार नहीं किया जा सकता हैं।
समय समय पर देश में इस बात पर भी बहस होती रही हैं कि राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू होना चाहिये या नहीं ? क्या देश एक बार फिर ऐसे दौर से नहीं गुजर रहा हैं कि जिसमें राष्ट्रपति शासन प्रणाली देश हित में हैं या नही? इस पर विचार होना चाहिये। मेरे विचार से क्षेत्रीयतावाद के बढ़ते हुये प्रभाव को देखते हुये और उसे रोकने के लिये यह भी एक कारगर उपाय हो सकता हैं जिसमें देश का हर मतदाता सीधे राष्ट्रपति का चुनाव कर पांच साल के लिये एक स्थायी सरकार तो चुन सकता है। 
देश की एकता और अखंड़ता पर मंड़राते क्षेत्रीयतावाद के खतरे से बचने के और भी उपाय हो सकते हैं लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं हैं कि अब यह समय की मांग है कि इनसे बचने के कारगर उपाय तलाश कराना देश हित में अत्यंत आवश्यक हैं।
आशुतोष वर्मा
अंबिका सदन,बारा पत्थर  सिवनी (म.प्र.) 480661
मो. 91 9425174640  ं    

Monday, September 24, 2012


नगर पंचायत लखनादौन चुनाव के मामले में भी  आला कमान ने यदि कार्यवाही नहीं की गर्त में चली जायेगी कांग्रेस
 बीते कई सालों से जिले में कांग्रेस को कांग्रेसियों से ही हरवाने का चलन चल रहा हैं। इसी कारण कभी 1977 की जनता लहर में भी जिलंे की पांचों विधानसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब सिमट कर एक सीट पर रह गयी हैं और यह जिला भाजपा का गढ़ माने जाने लगा हैं। समय समय पर आलाकमान को शिकायतें भी हुयी हैं लेकिन रह बार किसी ना किसी बढ़े नेता ने अपने खिदमतगार हरवंश सिंह को बचा ही लिया। इन सबका असर यह हुआ कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के दोनों प्रत्याशियों ने नगर पंचयात लखनादौन के अध्यक्ष पद के चुनाव  में आपने नामांकन पत्र ही उठा लिये और क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव से बाहर हो गयी। कांग्रेसी हल्कों में यह चर्चा जोरों से है कि यदि हमेशा की तरह इस बार भी कुछ नहीं हुआ तो कांग्रेस के मिशन 2013 और 14 में विपरीत असर पड़ सकता हैं। नरेश और राजेश के विचार बिल्कुल नहीं मिलते लेकिन वे एकसाथ मिलकर विहार जरूर कर लेते हैं। ऐसा ही एक वाकया दलसागर में नौका विहार के दौरान देखने को मिला। वैसे तो जिला सहकारी बैक के शताब्दी समारोह की तैयारियां जोर शोर से चल रहीं हैं। अध्यक्ष अशोक टेकाम की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेश  दिवाकर और विधायक नीता पटेरिया ने भी हिस्सा लिया था।यहां यह उल्लेखनीय है कि अब कुछ हीदिनों बाद बैंक के चुनाव होना हैं। इसलिये अभी से पैतरेबाजी भी प्रारंभ हो गयी हें। 
जिले में कांग्रेस को हराने वाले दंड़ित होने के बजाय पुरुस्कृत होते रहे-बीते कई सालों से जिले में कांग्रेस को कांग्रेसियों से ही हरवाने का चलन चल रहा हैं। इसी कारण कभी 1977 की जनता लहर में भी जिलंे की पांचों विधानसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब सिमट कर एक सीट पर रह गयी हैं और यह जिला भाजपा का गढ़ माने जाने लगा हैं। तारीफ की बात तो यह हैं कि कांग्रेस को हराने वाले कांग्रेसियों को सजा मिलने के बजाय पुरुस्कृत किया जाता रहा हैं। और तो और बागी होकर विस चुनाव लड़ने और कांग्रेस को हराने वाले कांग्रेसियों को उप चुनाव या अगले चुनाव में ही पार्टी की टिकिट तक मिली हें। और यह सब आज के जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह की सरपरस्ती में हो रहा हैं। समय समय पर आलाकमान को शिकायतें भी हुयी हैं लेकिन रह बार किसी ना किसी बढ़े नेता ने अपने खिदमतगार हरवंश सिंह को बचा ही लिया। इन सबका असर यह हुआ कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के दोनों प्रत्याशियों ने नगर पंचयात लखनादौन के अध्यक्ष पद के चुनाव  में आपने नामांकनपत्र ही उठा लिये और क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव से बाहर हो गयी जिस क्षेत्र से आजादी के बाद से 2003 तक कांग्रेस का कब्जा रहा हैं। और यह सब कुछ हुआ हरवंश सिंह और दिनेश राय मुनमुन की नूरा कुश्ती के चले हुये। इंका नेता आशुतोष वर्मा ने मेल के द्वारा चुनाव के दौरान ही इसकी शिकायत कांग्र्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, महासचिव राहुल गांधी और प्रभारी महासचिव बी.के.हरप्रिसाद से की थी।  यहां यह विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं कांग्रेस ने इस चुनाव में शानदा प्रर्दशन किया और उसके 15 में से ना सिर्फ आठ पार्षद जीते वरन सभी वार्डों में कांग्रेस ने 3226 वोट लिये जबकि भाजपा के अध्यक्ष पद के प्रत्याश्ी को कुल 1880 वोट मिले और निर्दलीय प्रत्याशी मुनमुन राय की माताजी सुधा राय को 6628 वोट मिले थे। यह भी तय है कि कांग्रेस के वोट भाजपा को तो गये नहीं होंगें इसीलिये यदि सुधा राय के वोटों में से कांग्रेस के वोट घटा दिये जायें तो उन्हें 3402 वोट ही मिलते। ऐसये हालात में कहा जा सकता हैं कि यदि कांग्रेस का अध्यक्ष पद का प्रत्याशी मैदान में होता तो ना केवल बराबरी की टक्कर होती वरन कांग्रेस चुनाव जीत भी सकती थी। इन्हीं सब कारणों के चलते बताया जा रहा है कि हाल ही में भोपाल में हुयी प्रदेश कांग्रेस की तीन दिन की बैठकों में भी यह मामला प्रभारी बी.के.हरप्रिसाद और दिग्विजय सिंह के सामने भी  जोरदारी से उठाया गया हैं। बताते हैं कि कांग्रेस आला कमान ने भी इसे काफी गंभीरता से लिया हैं। लेकिन कांग्रेसी हल्कों में यह चर्चा जोरों से है कि यदि हमेशा की तरह इस बार भी हरवंश सिंह को बरी कर दिया जाता हैं तो जिले में कांग्रेस के मिशन 2013 और 2014 पर विपरीत असर पड़ सकता हैं।
विचार मिले या ना मिलें साथ में विहार तो कर ही लेते हैं नरेश और राजेश -गुटबाजी के राज रोग से भाजपा भी अछूती नहीं हैं।जिले में भाजपा के कई गुट है जो कि आपस में गलाकाट प्रतियोगिता भी करते रहतें हैं। भाजपायी हलके में हमेशा से यह चर्चित रहा है के मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी दो अलग अलग धु्रवो पर रहते हैं। इनके विचार बिल्कुल नहीं मिलते और आपस में एक दूसरे को फूटीं आंख भी नहीं सुहाते हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि विचार आपसमें मिले या ना मिले वे एकसाथ मिलकर विहार जरूर कर लेते हैं। ऐसा ही एक समाचार बीते दिनों अखबारों में फोटो के साथ सुर्खियों में रहा जिनमें ये दोनो युवा नेता दलसागर तालाब में एक साथ नौका विहार करते दिख रहे थे जिसेें लोगों ने चटखारे लेकर पढ़ा। भाजपाइयों में तो यहां तक चर्चा है कि इसी दलसागर तालाब में चेकर्स टाइल्स लगानें में की गयी गड़बड़ियों को लेकर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजिक अकील ने जो शिकायत की थी और उस पर जिला प्रशासन ने जो फुर्ती दिखायी थी उसके पीछे नरेश दिवाकर का ही हाथ था।  अब यह कहां तक सही हैं? यह तो नरेश जी ही जानते होंगें लेकिन फिर  भी दोनों भाजपा नेताओं का यह विहार चर्चित जरूर हो गया हैं। 
शताब्दी समारोह के संग चल रही है नरेश की कूटनीति? -वैसे तो जिला सहकारी बैक के शताब्दी समारोह की तैयारियां जोर शोर से चल रहीं हैं। इसके लिये बैक में अध्यक्ष अशोक टेकाम की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेश  दिवाकर और विधायक नीता पटेरिया ने भी हिस्सा लिया था। वैसे तो इस बैंक ने इन सौ सालों में कई बार उतार चढ़ाव देखें हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस बैंक के संचालक मंड़ल के चुनावों में ज्यादातर कांग्रेस का ही कब्जा रहा हैं। या फिर जिला कलेक्टर इसके अध्यक्ष रहें हैं। लेकिन पहली बार भाजपा ने इन चुनावों में बाजी मार कर संचालक मंड़ल में अपना कब्जा किया और युवा आदिवासी नेता अशोक टेकाम इस बैं के अध्यक्ष बनें। वैसे तो चुनाव के दौरान तत्कालीन जिला भाजपा अध्यक्ष वेद सिंह ठाकुर को अध्यक्ष ना बनने देने की रणनीति के तहत तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर ने टेकाम से हाथ मिलाकर अपने समर्थक सुनील अग्रवाल को उपाध्यक्ष बनवा लिया था। उनकी योजना यह थी कि अग्रवाल के माध्यम से बैंक पर पूरा नियंत्रण रख्रेंगें। लेकिन तेज तर्रार अशोक टेकाम के चलते जब यह संभव नहीं हुआ तो फिर दोनों के बीच तकरार हो गयी। लेकिन बीते दिनों फोर लेन के मामले में कुरई के अनशन के दौरान बरघाट के विधायक कमल सर्मकोले से नरेश की तकरार हो जाने के बाद नरेश अशोक के बीच फिर एका होने की चर्चायें भाजपायी हल्कों में सुनायी देने लगीं हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि अब कुछ हीदिनों बाद बैंक के चुनाव होना हैं। इसलिये अभी से पैतरेबाजी भी प्रारंभ हो गयी हें। बैंक की राजनीति से नाता रखने वालों का दावा है कि इस बार बैंक पर अपना कब्जा करने के लिये नरेश दिवाकर ने अभी से ताना बाना बुनना शुरू करा दिया हैं। वे सोसायटियों के पुराने धुरंधरों से संपर्क में हैं और यह कोशिश कर रहें हैं कि संचालक मंड़ल में उनके अधिक सदस्य आ सकें तथ बैंक पर अशोक टेकाम के बजाय उनका कब्जा हो जाये। ऐसे हालात में उन्हें बरघाट से विधानसभा की टिकिट दिलाने का प्रलोभन भी दिया जा सकता हैं।इस खेल में कौन कितना सफल होगा? यह तो भविष्य में ही पता चल पायेगा। “मुसाफिर“   




सप्ताह मुसाफिर आपसे मुखातिब नहीं हो पाया था। इसलिये इस हफ्ते पुराने और नये राजनैतिक घटनाक्रमों पर हम चर्चा करेंगें। बीते दिनो सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम छिंदवाड़ा जिले में हुआ। जहां केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र में रेल मंत्री मुकुल राय ने परासिया माडल रेल्वे स्टेशन की आधारशिला रखी,अब प्रतिदिन चलने वाली छिंदवाड़ा दिल्ली ट्रेन को हरी झंड़ी दिखाया और अभी पूरी ना होने वाली छिंदवाड़ा नागपुर बा्रडगेज के विद्युतीकरण की भी आधार शिला रखी जो कि आमला नागपुर के नाम से स्वीकृत हुयी हैं। इसी कार्यक्रम के दौरान एक पत्रकार वार्ता के दौरान कमलनाथ ने  छिंदवाड़ा के विकास की चर्चा करते हुये यह कह दिया कि इतना विकास तो पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा और सिवनी का भी नहीं हुआ हैं और चाहो तो ये हरवंश सिंह बैठे हैं इनसे पूछ लो।इस पर हरवंश सिंह ने जवाब दे दिया कि मैं भी तो छिंदवाड़ा का हूं। जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले हरवंश सिंह का यह जवाब स्थानीय समाचार पत्रों में सुर्खियां भी बना। वैसे भी कांग्रेसियों में नाथों के नाथ कमलनाथ कहलाते हैंऔर वे गोद लेने के भी आदी रहें हैं। चुनाव प्रचार के दौरान वे जिले की अधिकांश विधानसभा सीटों को भी गोद ले चुके हैं। अब तो कांग्रेसियों के बीच चटखारे लेकर ख्ह चर्चा भी होने लगी हैं कि अच्छा हो कि कमलनाथ हरवंश सिंह का ही गोद लेकर अपने जिले से ही, जो कि हरवंश सिंह की मातृ भूमि भी है, से चुनाव लड़वा दें तो कम से कम जिला नाथ रहते हुये भी ऐसा अनाथ तो नहीं रहेगा जैसा कि पिछले दिनों देखा गया हैं और जिले को भी एक मौका मिल जायेगा कि वो अपना नया नाथ तलाश कर सके। वैसे हरवंश सिंह के इस कथन से उन पर पहले लगे ये आरोप सही लगने लगे है कि उन्होंने छिदवाड़ा के हितों के लिये सिवनी के हितों को कुर्बान किया है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि परिसीमन में सिवनी लोकसभा के विलोपन,फोर लेन में आये अड़ंगें,संभाग मुख्यालय सिवनी ना बनने,बड़ी रेल के ना बनने आदि में हरवंश सिंह पर आरोप लगते रहें हैं कि उन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिये सिवनी के हितों पर कुठाराघात किया हैं। मातृ भूमि के लिये प्यार होना चाहिये यह तो ठीक है लेकिन उस कर्म भूमि के कर्जे को भी नहीं भूलना चाहिये जिसने उन्हें मातृ भूमि में मंच पर बैठाल कर सम्मान दिलाया। यह तो कम से कम नहीं ही भूलना चाहिये कि किस बुरे स्थिति और अपमानजनक हालात में मातृ भूमि को छोड़ना पड़ा था। वैसे हरवंश समर्थकों का कहना हैं कि इससे साहब को कोई नुकसान नहीं होगा ब्लकि ऐसा कहकर कमलनाथ ने अपने आप को महाकौशल के बजाय सिर्फ छिंदवाड़ा जिले का नेता ही मान लिया हैं।
चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश ने मंत्री से की चर्चा-जंगल मे मोर नाचा किसने देखा की कहावत बहुत पुरानी हैं। लेकिन इन दिनों यह कहावत एक बार फिर चर्चा में आ गयी हैं। छिंदवाड़ा में रेल मंत्री मुकुल राय के कार्यक्रम के दो दिन के बाद जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश की तरफ से बाकायदा एक प्रेस नोट जारी कर यह बताया गयी कि रेल्वे के सैलून में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ की उपस्थिति में उन्होंने छिंदवाड़ा से नैनपुर रेल लाइन के गेज परिवर्तन और रामटेक से गोटेगांव नयी रेल लाइन के बारे में चर्चा की और डिब्बे में मौजूद रेल्वे बोर्ड के सदस्य मिश्रा ने उन्हें जानकारी दी है कि नैनपुर बड़ी रेल लाइन के मिट्टी के काम का टेंड़र लगने वाला हैं और दो साल में छिंदवाड़ा से सिवनी तक बड़ी रेल लाइन का काम पूरा हो जायेगा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छिंदवाड़ा से नागपुर के 125 कि.मी. गेज कनर्वशन का काम कमलनाथ के रहते हुये भी पांच साल में पूरा नहीं हो पाया हैं  तो भला सिवनी से छिंदवाड़ा का 70 कि.मी. का गेज कनर्वशन का काम दो साल में हरवंश कैसे पूरा करा लेंगें?यह एक विचारणीय प्रश्न हैं। रहा सवाल रामटेंक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन का तो इसके लिये इंका नेता आशुतोष वर्मा सन 2007 से अभियान चलाये हुये हैं। इसमें दो बार पत्र लिखो अभियान चलाया गया जिसमें जिले के सैकड़ों जन प्रतिनिधियों सहित हजारों नागरिकों ने भाग लिया लेकिन हरवंश सिंह ने चिट्ठी लिखना भी पसंद नहीं किया। अब यह एक सोचने वाली बात है कि चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश सैलून में मंत्री से चर्चा भला क्या और कैसी की होगी?सैलून में हरवंश की चर्चा को लेकर स्थानीय अखबारों में भी सुर्खियां बनी हैं और इस चर्चा को उनकी कार्यप्रणाली के विपरीत निरूपित किया हैं। लेकिन इस सबसे और कुछ हुआ हो या नहीं हुआ हो लेकिन जिले में लोग चटखारे लेकर यह कहते हुये जरूर देखे जा रहें हैं कि सैलून में सिंह नाचा किसने देखा?
प्रधानमंत्री का पुतला तो जल जाता है पर मुख्यमंत्री का नहीं-वैसे तो यह आम बात है कि प्रदेश सरकार के विरोध में कांग्रेस और केन्द्र सरकार के विरोध भाजपा आंदोलन,प्रदर्शन कर पुतले जलाती रहती हैं। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सत्तारूढ़ दल हैं और जनता के लिये जो भी समस्यायें होती हैं उनके लिये कमोबेश दोनों ही जवाबदार होती हैं लेकिन अपने को बचाते हुये दूसरे पर राजनैतिक हमलें करने की संस्कृति इन दिनों खूब फल फूल रही हैं। राजनैतिक विश्लेषकों ने एक बात और विशेषकर नोट की हैं कि जब प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभाहने वाली भाजपा कोई आंदोनल करती है और प्रधानमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती हैं तो वो पुतला जल लेती हैं लेकिन जब कांग्रेस प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती है तो पुलिस येन केन प्रकारेण पुतला नहीं जलने देती चाहे इसके लिये आंदोलनकारियों से ही सांठगांठ क्यों ना करनी पड़े। ऐसा क्यों होता हैं? यह समझ से परे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों ही पद संवैधानिक पद है और दोनों ही जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों के मुखिया होते हैं। बीते दिनों भाजपायुमो ने जिला अध्यक्ष नवनीत सिंह ठाकुर के नेतृत्व में डीजल और रसोई गैस की कीमतों की गयी वृद्धि के खिलाफ प्रर्दशन किया और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बाकायदा पुतला भी जलाया। यह बात सही है कि इससे आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा लेकिन इसके लिये प्रदेश सरकार द्वारा डीजल और रसोई गैस पर लिया जाने वाला वेट टेक्स भी कम जवाबदार नहीं हैं। उसमें कुछ कमी करके राज्य सरकार भी जनता को राहत पहुंचा सकती थी जैसी कि केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर प्रति लिटर पांच रुपये से अधिक एक्साइज डयूटी कम करके उसकी कीमत को बढ़ने से रोक कर किया है। कुछ राज्यों ने भी अपने टेक्स में कमी करके जनता को राहत पहुंचायी हैं। लेकिन राजनीति के लिये राजनीति करना आजकल नेताओं का शगल बन गया हैं। “मुसाफिर”    

Monday, September 17, 2012



शिवराज का जनदर्शन अधर में?
सिवनी।मुख्य मंत्री शिवराज सिंह के प्रदेश स्तरीय जन दर्शन कार्यक्रम में सिवनी का कार्यक्रम अधर में लटक गया हैं। पिछले प्रवासों में की गयी घोषणायें पूरी ना होने के कारण यह निरस्त तो नहीं हो गया है?यह सवाल सियासी हल्कों में चर्चित हैं।
बीते दिनों यह चर्चा थी कि शिव की नगरी सिवनी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जनदर्शन कार्यक्रम 14 सितम्बर को होने वाला हैं। फिर 17 की तारीख सुनने को मिली लेकिन दो दिन पहले पालेटेक्निक ग्राउंड़ में कार्यक्रम के लिये लगयो गये खंबे भी उखाड़ लिये गये हैं। इससे इस चर्चा को बल मिला है कि शिवराज का नजदर्शन कार्यक्रम अधर में लटक गया हैं।
सियासी हल्कों में इस बात को लेकर यह चर्चा चल रही है कि मुख्यमंत्री ने जिले के अपने पूर्व के दौरों में जो भी घोषणायें की थीं वे सिर्फ घोषणा ही रह गयी हैं। फिर चाहे वो मेडिकल,कृषि या इंजीनियरिंग कालेज की हो या फोर लेन की हो या फिर शहर को माडल शहर बनाने की हो। इमनें से सिर्फ एक घोषणा पर अमल हुआ है वो दलसागर तालाब का जिसका काम केन्द्र की बी.आर.जी.एफ. योजना के तहत किया गया हैं। यह काम भी कैसा हुआ है? यह जगजाहिर हैं। लेकिन प्रशासन इस तालाब को सुन्दर दिखने लायक बनाने का इन दिनो ताबड़तोड़ प्रयास कर रहा हैं।सौन्दर्यीकरण के नाम पर इसमें कैसी पैसों की होली खेली गयी है? यह किसी से छिपा नहीं हैं।
इन सब कारणों से अब ऐसा माना जा रहा हैं कि शिवराज का जनदर्शन तो घोषणाओं की तरह ही अधर में लटक गया हैं लेकिन हो सकता है कि वे तेदूं पत्ता बोनस वितरण कार्यक्रम में भाग लेने शायद जल्दी ही सिवनी आ जायें।  


नाथ यदि हरवंश को गोद लें ले तो नाथ रहते हुये भी अनाथ रहने वाले जिले को नया नाथ चुनने का मौका  मिल जायेगा
बीते दिनो सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम छिंदवाड़ा जिले में हुआ। एक पत्रकार वार्ता के दौरान कमलनाथ ने  छिंदवाड़ा के विकास की चर्चा करते हुये यह कह दिया कि इतना विकास तो पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा और सिवनी का भी नहीं हुआ हैं और चाहो तो ये हरवंश सिंह बैठे हैं इनसे पूछ लो।इस पर हरवंश सिंह ने जवाब दे दिया कि मैं भी तो छिंदवाड़ा का हूं। हरवंश सिंह के इस कथन से उन पर पहले लगे ये आरोप सही लगने लगे है कि उन्होंने छिदवाड़ा के हितों के लिये सिवनी के हितों को कुर्बान किया है। जंगल मे मोर नाचा किसने देखा की कहावत बहुत पुरानी हैं। लेकिन इन दिनों यह कहावत एक बार फिर चर्चा में आ गयी हैं।विज्ञप्ति जारी कर हरवंश सिंह ने बताया है कि छिंदवाड़ा से नैनपुर रेल लाइन के गेज परिवर्तन और रामटेक से गोटेगांव नयी रेल लाइन के बारे में चर्चा की और बोर्ड के सदस्य मिश्रा ने उन्हें जानकारी दी है कि छिंदवाड़ा सिवनी बड़ी रेल लाइन दो साल में पूरा हो जायेगी। इस सबसे और कुछ हुआ हो या नहीं हुआ हो लेकिन जिले में लोग चटखारे लेकर यह कहते हुये जरूर देखे जा रहें हैं कि सैलून में सिंह नाचा किसने देखा? जनता के लिये जो भी समस्यायें होती हैं उनके लिये कमोबेश इंका और भाजपा दोनों  ही जवाबदार होती हैं लेकिन अपने को बचाते हुये दूसरे पर राजनैतिक हमलें करने की संस्कृति इन दिनों खूब फल फूल रही हैं। प्रधानमत्री का पुतला तो जला दिया जाता है लेकिन पुलिस मुख्यमंत्री का पुतला नहीं जलने देती हैं। 
हरवंश को ही गोद लें ले नाथ-बीते सप्ताह मुसाफिर आपसे मुखातिब नहीं हो पाया था। इसलिये इस हफ्ते पुराने और नये राजनैतिक घटनाक्रमों पर हम चर्चा करेंगें। बीते दिनो सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम छिंदवाड़ा जिले में हुआ। जहां केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र में रेल मंत्री मुकुल राय ने परासिया माडल रेल्वे स्टेशन की आधारशिला रखी,अब प्रतिदिन चलने वाली छिंदवाड़ा दिल्ली ट्रेन को हरी झंड़ी दिखाया और अभी पूरी ना होने वाली छिंदवाड़ा नागपुर बा्रडगेज के विद्युतीकरण की भी आधार शिला रखी जो कि आमला नागपुर के नाम से स्वीकृत हुयी हैं। इसी कार्यक्रम के दौरान एक पत्रकार वार्ता के दौरान कमलनाथ ने  छिंदवाड़ा के विकास की चर्चा करते हुये यह कह दिया कि इतना विकास तो पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा और सिवनी का भी नहीं हुआ हैं और चाहो तो ये हरवंश सिंह बैठे हैं इनसे पूछ लो।इस पर हरवंश सिंह ने जवाब दे दिया कि मैं भी तो छिंदवाड़ा का हूं। जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले हरवंश सिंह का यह जवाब स्थानीय समाचार पत्रों में सुर्खियां भी बना। वैसे भी कांग्रेसियों में नाथों के नाथ कमलनाथ कहलाते हैंऔर वे गोद लेने के भी आदी रहें हैं। चुनाव प्रचार के दौरान वे जिले की अधिकांश विधानसभा सीटों को भी गोद ले चुके हैं। अब तो कांग्रेसियों के बीच चटखारे लेकर ख्ह चर्चा भी होने लगी हैं कि अच्छा हो कि कमलनाथ हरवंश सिंह का ही गोद लेकर अपने जिले से ही, जो कि हरवंश सिंह की मातृ भूमि भी है, से चुनाव लड़वा दें तो कम से कम जिला नाथ रहते हुये भी ऐसा अनाथ तो नहीं रहेगा जैसा कि पिछले दिनों देखा गया हैं और जिले को भी एक मौका मिल जायेगा कि वो अपना नया नाथ तलाश कर सके। वैसे हरवंश सिंह के इस कथन से उन पर पहले लगे ये आरोप सही लगने लगे है कि उन्होंने छिदवाड़ा के हितों के लिये सिवनी के हितों को कुर्बान किया है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि परिसीमन में सिवनी लोकसभा के विलोपन,फोर लेन में आये अड़ंगें,संभाग मुख्यालय सिवनी ना बनने,बड़ी रेल के ना बनने आदि में हरवंश सिंह पर आरोप लगते रहें हैं कि उन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिये सिवनी के हितों पर कुठाराघात किया हैं। मातृ भूमि के लिये प्यार होना चाहिये यह तो ठीक है लेकिन उस कर्म भूमि के कर्जे को भी नहीं भूलना चाहिये जिसने उन्हें मातृ भूमि में मंच पर बैठाल कर सम्मान दिलाया। यह तो कम से कम नहीं ही भूलना चाहिये कि किस बुरे स्थिति और अपमानजनक हालात में मातृ भूमि को छोड़ना पड़ा था। वैसे हरवंश समर्थकों का कहना हैं कि इससे साहब को कोई नुकसान नहीं होगा ब्लकि ऐसा कहकर कमलनाथ ने अपने आप को महाकौशल के बजाय सिर्फ छिंदवाड़ा जिले का नेता ही मान लिया हैं।
चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश ने मंत्री से की चर्चा-जंगल मे मोर नाचा किसने देखा की कहावत बहुत पुरानी हैं। लेकिन इन दिनों यह कहावत एक बार फिर चर्चा में आ गयी हैं। छिंदवाड़ा में रेल मंत्री मुकुल राय के कार्यक्रम के दो दिन के बाद जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश की तरफ से बाकायदा एक प्रेस नोट जारी कर यह बताया गयी कि रेल्वे के सैलून में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ की उपस्थिति में उन्होंने छिंदवाड़ा से नैनपुर रेल लाइन के गेज परिवर्तन और रामटेक से गोटेगांव नयी रेल लाइन के बारे में चर्चा की और डिब्बे में मौजूद रेल्वे बोर्ड के सदस्य मिश्रा ने उन्हें जानकारी दी है कि नैनपुर बड़ी रेल लाइन के मिट्टी के काम का टेंड़र लगने वाला हैं और दो साल में छिंदवाड़ा से सिवनी तक बड़ी रेल लाइन का काम पूरा हो जायेगा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छिंदवाड़ा से नागपुर के 125 कि.मी. गेज कनर्वशन का काम कमलनाथ के रहते हुये भी पांच साल में पूरा नहीं हो पाया हैं  तो भला सिवनी से छिंदवाड़ा का 70 कि.मी. का गेज कनर्वशन का काम दो साल में हरवंश कैसे पूरा करा लेंगें?यह एक विचारणीय प्रश्न हैं। रहा सवाल रामटेंक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन का तो इसके लिये इंका नेता आशुतोष वर्मा सन 2007 से अभियान चलाये हुये हैं। इसमें दो बार पत्र लिखो अभियान चलाया गया जिसमें जिले के सैकड़ों जन प्रतिनिधियों सहित हजारों नागरिकों ने भाग लिया लेकिन हरवंश सिंह ने चिट्ठी लिखना भी पसंद नहीं किया। अब यह एक सोचने वाली बात है कि चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश सैलून में मंत्री से चर्चा भला क्या और कैसी की होगी?सैलून में हरवंश की चर्चा को लेकर स्थानीय अखबारों में भी सुर्खियां बनी हैं और इस चर्चा को उनकी कार्यप्रणाली के विपरीत निरूपित किया हैं। लेकिन इस सबसे और कुछ हुआ हो या नहीं हुआ हो लेकिन जिले में लोग चटखारे लेकर यह कहते हुये जरूर देखे जा रहें हैं कि सैलून में सिंह नाचा किसने देखा?
प्रधानमंत्री का पुतला तो जल जाता है पर मुख्यमंत्री का नहीं-वैसे तो यह आम बात है कि प्रदेश सरकार के विरोध में कांग्रेस और केन्द्र सरकार के विरोध भाजपा आंदोलन,प्रदर्शन कर पुतले जलाती रहती हैं। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सत्तारूढ़ दल हैं और जनता के लिये जो भी समस्यायें होती हैं उनके लिये कमोबेश दोनों ही जवाबदार होती हैं लेकिन अपने को बचाते हुये दूसरे पर राजनैतिक हमलें करने की संस्कृति इन दिनों खूब फल फूल रही हैं। राजनैतिक विश्लेषकों ने एक बात और विशेषकर नोट की हैं कि जब प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभाहने वाली भाजपा कोई आंदोनल करती है और प्रधानमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती हैं तो वो पुतला जल लेती हैं लेकिन जब कांग्रेस प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती है तो पुलिस येन केन प्रकारेण पुतला नहीं जलने देती चाहे इसके लिये आंदोलनकारियों से ही सांठगांठ क्यों ना करनी पड़े। ऐसा क्यों होता हैं? यह समझ से परे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों ही पद संवैधानिक पद है और दोनों ही जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों के मुखिया होते हैं। बीते दिनों भाजपायुमो ने जिला अध्यक्ष नवनीत सिंह ठाकुर के नेतृत्व में डीजल और रसोई गैस की कीमतों की गयी वृद्धि के खिलाफ प्रर्दशन किया और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बाकायदा पुतला भी जलाया। यह बात सही है कि इससे आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा लेकिन इसके लिये प्रदेश सरकार द्वारा डीजल और रसोई गैस पर लिया जाने वाला वेट टेक्स भी कम जवाबदार नहीं हैं। उसमें कुछ कमी करके राज्य सरकार भी जनता को राहत पहुंचा सकती थी जैसी कि केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर प्रति लिटर पांच रुपये से अधिक एक्साइज डयूटी कम करके उसकी कीमत को बढ़ने से रोक कर किया है। कुछ राज्यों ने भी अपने टेक्स में कमी करके जनता को राहत पहुंचायी हैं। लेकिन राजनीति के लिये राजनीति करना आजकल नेताओं का शगल बन गया हैं।    

Sunday, September 2, 2012


राघव जी ने साबित कर दिया कि नये सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय सिवनी में होना  ही कम खर्चीला होगा
हाल ही में विक्रयकर विभाग द्वारा भामाशाह पुरुस्कार वितरण का समारोह सिवनी जिले में आयोजित किया गया। इस समारोह में बालाघाट,छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के लोगों को पुरुसक्ृत् किया जाना था। बड़ी होशियारी से वित्त मंत्री राधव जी ने एक हाथ से खजाने से निकाल कर दूसरे हाथ से इनाम की अधिकांश खजाने में ही जमा कर लेने का कमाल कर दिखाया। होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययतिा बरतने के लिये े इन तीन जिलों का कार्यक्रम बीच में स्थित सिवनी जिले में आयोजित कर राघव जी ने लोगों पर एक बहुत बड़ा उपकार भी किया है। वित्त मंत्री के निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सिवनी का दावा उचित हैं इसीलिये अब जिले के तमाम जन प्रतिनिधियाों का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस आधार पर जिले को जायज हक  दिलायें। मिशन 2013 और 2014 की कांग्रेा की जिले में कोई तैयारी नहीं दिख रही हैं। ना तो कमेटियों में प्रभारी महामंत्री नियुक्त हो पाये हैं और ना ही ध्वजवाहिनी समिति की कोई हलचल ही दिख रही हैं। पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर भाजयुमो द्वारा विवेकानंद संदेश यात्रा के नाम पर मोटर सायकिल रैली आयोजित की गयी हैं। युवा मोर्चे के नाम पर निकाली जाने वाली रैली का भार अपने वजनदार नेताओं के कंधों पर डाल दिया हैं। भाजपायियों में चल रही चर्चा के अनुसार भाजपा ने विधायक पद के जीते हारे प्रत्याशियों के साथ ही संभावित प्रत्याशियों को भी अभी से बोझ लाद दिया हैं।
संभाग की मांग को जायज ठहरा गये राघव जी-वित्त मंत्री मितव्ययिता ध्यान नहीं रखेगा तो भला कौन रखेगा? और ऐसा ही किया वित्तमंत्री राघव जी ने। हाल ही में विक्रयकर विभाग द्वारा भामाशाह पुरुस्कार वितरण का समारोह सिवनी जिले में आयोजित किया गया। इस समारोह में बालाघाट,छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के लोगों को पुरुसक्ृत् किया जाना था। जिसके मुख्य अतिथि वित्तमंत्री राघव जी और अध्यक्षता विस उपाध्यक्ष एवं इंका विधायक हरवंश सिंह ने की थी। इसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रभारी मंत्री नाना भाऊ,सांसद द्वय के.डी. देशमुख एवं बसोरी सिंह,विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर एवं कमलमर्सकोले, केबिनेट मंत्री के दर्जा प्राप्त वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर थे। इस समारोह में ना जाने क्यों राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते को आतंत्रित नहीं किया गया।इसमें हर जिले में सर्वाधिक टेक्स देने वालों को पुरुस्कृत किया जिसमें प्रथम इनाम एक लाख रु. द्वितीय इनाम 50 हजार रु. एवं तृतीय इनाम 25 हजार रु. का दिया गया। तीनों जिलों में प्रथम एवं द्वितीय पुरुस्कार तो शासकीय विभागों को ही मिले। इसमें बड़ी होशियारी से वित्त मंत्री राधव जी ने एक हाथ से खजाने से निकाल कर दूसरे हाथ से इनाम की अधिकांश खजाने में ही जमा कर लेने का कमाल कर दिखाया। होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययतिा बरतने के लिये े इन तीन जिलों का कार्यक्रम बीच में स्थित सिवनी जिले में आयोजित कर राघव जी ने लोगों पर एक बहुत बड़ा उपकार भी किया है। प्रस्तावित नये सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय सिवनी को बनायश जाने की मांग लंबे समय से चल रही हैं। इसका प्रमुख कारण भी यही बताया गया था कि छिंदवाड़ा और बालाघाट जिले के बीच में सिवनी स्थित है इसलिये प्रशासनिक एवं आर्थिक रूप से इसे ही मुख्यालय बनाया जाना चाहिये। लेकिन छिंदवाड़ा को मुूख्यालय बनाने की अपनी घोषणा के कारण मुख्यमंत्री जिले की इस जायज मांग को नहीं मान रहें हैं और मामले को लंबित रखे हुये हैं।वित्त मंत्री के निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सिवनी का दावा उचित हैं इसीलिये अब जिले के तमाम जन प्रतिनिधियाों का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस आधार पर जिले को जायज हक विस औा लोस चुनाव के पहले दिलायें वरना मामला फिर लटक जायेगा।
जिले में ना प्रभारी महामंत्री और ना ध्वज दिख रहा है  ना ही वाहिनी -राजनैतिक हल्कों में चर्चित है कि मिशन 2013 एवं 2014 का कांग्रेस का कार्यक्रम काफी शिथिल चल रहा हैं। राजनैतिक सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक जिला एवं ब्लाक कांग्रेस कमेटियों में प्रभारी महामंत्री की नियुक्ति तक नहीं हो पारयी हैं। कांग्रेसजनों में व्याप्त चर्चा के अनुसार कांग्रेस के जिले के पट्टेदार एवं इकलौते विधायक हरवंश सिंह ने अपने ही गुट के उप गुटों में तालमेल बिठाने चक्कर में इन पदों के लिये कई कई नेताओं को आश्वासन दे दिया था। लेकिन बनना तो एक ही को था इसलिये अब वे यह तय नहीं कर पा रहें हैं कि चुनाव के समय नेताओं की नाराजगी मोल ली जाये या फिर बिना प्रभारी महामंत्री के ही काम चलने दिया जाये। जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी की भी मजबूरी यह है कि बिना हरवंश सिंह की अनुमति के वे कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं। प्रदेश कांग्रेस ने मिशन 2013 एवं 2014 के लिये केन्द्र की ध्वजवाहिनी योजनाओं की निगरानी एवं प्रचार प्रसार के लिये ध्वज वाहिनी समितियों का जिला स्तर पर गठन किया हैं। लेकिन जिले में यह पद भी अपने ही उप गुटों में संतुलन बिठाने की भेंट चढ़ गया है। इस पद पर मां. असलम खॉन की नियुक्ति की गयी हैं। वे जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार थे लेकिन इस पद पर हीरा आसवानी बैठ गये है। इसके बाद जिला इंका में उन्हें कोई पर ना दिया जाय ऐसा दवाब हरवंश समर्थक 14 नेताओं ने बनाया था। इसमें कुछ नेता ऐसे भी थे जिनका हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में प्रभाव था। वैसे असलम भाई को जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल का खुला समर्थ था लेकिन उसके बावजूद भी असलम भाई को जिला कांग्रेस में कोई सम्मानजनक पद नहीं मिल पाया था। इसीलिये मौका हाथ लगते ही हरवंश सिंह ने उन्हें ध्वज वाहिनी योजनाओं की समिति का जिले का अध्यक्ष बना दिया। लेकिन उनके द्वारा काम नहीं करने की बात जब केई बार हुयी तो उनके समर्थक यह तक कहते देखे गये कि असलम भाई ने तो स्तीफा दे दिया हैं। इसमें सच्चायी क्या है? यह तो असलम भाई या हरवंश सिंह ही बता सकते हैं लेकिन यह जरूर है कि जिलें ना तो ध्वज दिख रहा है और ना ही वाहिनी,ऐसे में कांग्रेस चुनावी मिशन में कैसे कामयाब होगी? यह चर्चा का विषय बना हुआ हैं। 
हर्रा लगे ना फिटकरी,रंग चोखा के चोखा-पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर भाजयुमो द्वारा विवेकानंद संदेश यात्रा के नाम पर मोटर सायकिल रैली आयोजित की गयी हैं। इंदौर और उज्जैन संभाग की रैली फेल हो जाने कारण जबलपुर संभाग की रैली पर भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने विशेष ध्यान दिया और युवा मोर्चे के नाम पर निकाली जाने वाली रैली का भार अपने वजनदार नेताओं के कंधों पर डाल दिया हैं। भाजपायियों में चल रही चर्चा के अनुसार भाजपा ने विधायक पद के जीते हारे प्रत्याशियों के साथ ही संभावित प्रत्याशियों को भी अभी से बोझ लाद दिया हैं। जिले के भाजयुमो अध्यक्ष ठा. नवनीत सिंह और जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के नेतृत्व में भारी संख्या में जिले से कार्यकर्त्ता रैली में भाग लेने जबलपुर गये। इस आयोजन में कुछ ऐसा ही हुआ कि हर्रा लगे ना फिटकरी रंग चोखा के चोखा। भाजपा के किस बड़े नेता पर कितना आर्थिक बोझ पड़ा और कैसे और किससे इसकी व्यवस्था की गयी?इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिले के 17 मंड़लों में हर मंड़ल से पचास पचास मोटर साइकिल भेजने का लक्ष्य रखा गया था। नाम तो इा आयोजन का विवेकानंद संदेश यात्रा रखा गया था लेकिन वास्तव में शिवराज विवेकानंद जी पर भारी पड़े और हर जगह उनका ही गुणगान किया जाता रहा।“मुसाफिर“       



खुद के हित पर जनहित को कुर्बान कर देने वाले जन  प्रतिनिधियों को क्या जनता कभी सबक सिखायेगी?
सिवनी। बीते दस पंद्रह सालों से कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नुरा कुश्ती के कारण जन          प्रतिनिधि अपने हित के लिये जन हित को कुर्बान करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहें हैं। इसका खामियाजा इस पिछड़े हुये जिले को भुगतना पड़ रहा हैं और पड़ोसी जिलो की तुलना में सिवनी और पिछड़ता जा रहा हैं। क्या जनता कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को सबक सिखायेगी? यह सवाल सियासी हल्कों में चर्चित हैं।
बात चाहे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव द्वारा घोषित रामटेक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन की हो या मुख्यमंत्री शिवराजसिंह द्वारा घोषित इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज और नगर को माडल शहर बनाने की घोषणा हो उन्हें पूरा कराने की दिशा में जनप्रतिनिधियों की अनदेखी किसी से भी छिपी नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनो के ही जन प्रतिनिधियों ने इस हेतु ना तो सदन में और ना ही सड़क पर कभी कोई दवाब बनाया।
कांग्रेस और भाजपा के जन    प्रतिनिधियों की नूरा कुश्ती के चलते भी जिले ने बहुत कुछ खो दिया हैं। इसी नूरा कुश्ती के चलते सिवनी लोकसभा और घंसौर विधानसभा परिसीमन में समाप्त हो गयी। जिले के किसी भी नेता के प्रयासों के बिना जो फोर लेन सड़क जिले को मिल रही थी उसमें भी नूरा कुश्ती के चलते जो ग्रहण लगा हैं तो वह आज तक नहीं हट पाया हैं। पहली बार जब यह प्रस्ताव राज्य नेशनल लाइफ बोर्ड के पास गया था तो प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसे अस्वीकार कर केन्द्र को भेज दिया था। जब  दूसरा प्रस्ताव राज्य से भेजा गया तब तक नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुका था। उसके बाद मामला जो उलझा तो आज तक सुलझ नहीं पाया हैं। शिवराज की गर्जना और दिल्ली ले जाकर जनमंच के प्रतिनिधि मंड़ल को मिलवाने की घोषणा भी दोनों तरफ की ढील के चलते नाकामयाब ही रही। 
कृषि महाविद्यालय की मांग भी लंबे समय से लंबित हैं। महिला महाविद्यालय का हास्टल सहित भवन,बीज निगम और कृषि विज्ञान केन्द्र की सुविधा के बावजूद भी यह मांग आज तक पूरी नहीं हो पायी हैं। भीमगढ़ जलावर्धन योजना का बिजली का बिल उसकी लागत से अधिक हो गया हैं लेकिन ना तो कांग्रेस के राज में और ना ही भाजपा के राज में इसका कोई निदान निकाला गया।
कहने को इस जिले में ती सांसद भाजपा के के.डी.देशमुख और राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह,बकीना मंत्री का दर्जा प्राप्त डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,नरेश दिवाकर,प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर,कमल मर्साकेले, जिला पंचायत के युवा जुझारू अध्यक्ष मोहन चंदेल एवं नपा के एुवा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी हैं लेकिन इतने नाथ होने के बाद भी जिला अनाथों की भांति भुगत रहा हैं। इसमें इंका भाजपा की नूरा कुश्ती और दोनों ही पार्टियशें की गुटबाजी भी कम जवाबदार नहीं हैं।    
  
सदभाव से अब दुर्भाव क्यों?
सिवनी। जिले में आजकल फोरलेन में रुचि लेने वालों के बीच में चटखारे लेकर यह चर्चा होती देखी जा रही हैं कि सिवनी से खवासा तक फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी से कुछ उसके पुरानें अंध भक्त अब दुर्भाव क्यों रखने लगे हैं? सन 2007 से फोर लेन का काम करने वाली सदभाव कंपनी ने इस दौरान जो भी अनियमिततायें की उन्हें नजर अंदाज कर उनके प्रवक्ता क्ी भूमिका अदा करने वाले ही आज जनहित की बात करते हुये सदभाव से दुर्भाव रखते हुये उनकी कब्र्र खोदते देखे जा रहें हैं?यदि अनिमिततायें करके सदभाव ने चोरी की है तो उन्हें सजा मिलनी चाहिये लेकिन अचानक ही हुये इस हृदय के कारणों को लेकर तरह तरह की बात करते देखे जा रहे हैं।