Wednesday, September 25, 2013

आडवानी का मोदी विरोध महज एक दिखावा या संघ की रणनीति
भारतीय जनता पार्टी के पितृ पुरुष माने जाने वाले लालकृष्ण आडवानी के विरोध को दो बार दर किनार करके नरेन्द्र मोदी को पहले चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और फिर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना क्या उतना ही सहज सरल और पारदर्शी है, जितना दिखायी दे रहा है या फिर पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और है? क्या भाजपा में संघ के आर्शीवाद से उदारवादी अटलबिहारी वाजपेयी और हिन्दूवादी लालकृष्ण आडवानी की जोड़ी को सुनियोजित तरीके से अब उदारवादी लालकृष्ण आडवानी और हिन्दूवादी नरेन्द्र मोदी के रूप में बदला जा रहा है? ये यक्ष प्रश्न आज देश के राजनैतिक क्षितिज में उत्सुकता के साथ चर्चित है।
स्मरणीय है कि सन 1977 में भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ था। जनता पार्टी की पहली गैर कांग्रेसी केन्द्र सरकार में अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी दोनों ही मंत्री बने थे। लेकिन जनता पार्टी की सरकार के मात्र ढ़ाई साल में गिर जाने का कारण भी इसमें शामिल समाजवादी दलों के नेताओं द्वारा जनता पार्टी और आर.एस.एस. की दोहरी सदस्यता का मसला ही था। इसके बाद पूर्व जनसंघ घटक के नेताओं ने एक अलग पार्टी बनायी जिसका नाम भारतीय जनता पार्टी रखा गया। केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी दूसरी गैर कांग्रेसी सरकार भी भाजपा के बाहरी समर्थन से बनी थी। इस दौरान भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी राम रथ पर सवार होकर  सोमनाथ से अयोध्या की यात्रा पर राम मंदिर के मुद्दे को लेकर निकल पड़े थे। यह वाकया भी कम रोचक नहीं है कि जब मीडिया ने इस पर अटल जी से आगे की रणनीति पर टिप्पणी मांगी थी तो अटल जी ने यह कहा था कि ये तो शेर की सवारी है आगे जो भी करेगा वो शेर ही करेगा। बिहार में लालू यादव द्वारा रथ यात्रा को रोककर आडवानी को गिरफ्तार कर लिया तो भाजपा के समर्थन वापस लेने से केन्द्र की दूसरी गैर कांग्रेसी सरकार भी गिर गयी थी।
भाजपा के गठन से ही निरंतर कुछ ऐसे राजनैतिक घटनाक्रम होते गये कि अटल जी एक उदारवादी नेता के रूप में उभरे तो दूसरी ओर आडवानी जी की छवि एक हिन्दूवादी नेता की बनती रही।  अतीत के इस दौर में संघ चट्टान की तरह आडवानी जी के पीछे खड़ा दिखायी देता था। अटल आडवानी की इस जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा ने केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व में सरकार बनायी और आडवानी जी गृह मंत्री बने। इस दौर में उन्हें लोह पुरुष का दर्जा भी भाजपा में दिया गया। जबकि आडवानी के गृह मंत्री रहते हुये ही काश्मीर के कट्टरपंथी आतंकवादियों को विदेश मंत्री जसवंत सिंह कांधांर तक छोड़ कर आये थे। हालांकि इस दौरान अटल आडवानी द्वारा की जाने वाली रोजा अफ्तार की दावतें भी बहुत चर्चित रहती थीं। एन.डी.ए. के ऐजेन्डे में राम मंदिर का मुद्दा ना होने को कारण बता कर भाजपा ने इससे भी किनारा कर लिया था। 
अस्वस्थ हो जाने के कारण देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से दूर हो गये। ऐसे में देश की राजनीति की मांग के अनुरूप भाजपा और संघ को अटल जी के बदले एक उदारवादी चेहरे की आवश्यकता थी। ऐसा माना जा सकता है कि इसकी सुनियोजित शुरुआत उस वक्त हुयी जब पाकिस्तान के दौरे पर गये देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी ने जिन्ना की मजार पर जाकर फूल चढ़ाये। संघ ने इसका भारी विरोध किया जिससे आडवानी की धर्म निरपेक्ष छवि बनना प्रारंभ हुई। दूसरी तरफ गुजरात के गोधरा कांड़ के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कट्टरवादी हिन्दू नेता के रूप में उभर कर सामने आ गये। हालाकि गोधरा कांड़ के बाद अटल जी ने मोदी राजधर्म निभाने की सलाह तो दी लेकिन कोई कठोर कार्यवाही नहीं की थी। गुजरात में तीसरी पारी खेलने के बाद मोदी के व्यक्तित्व को संघ के इशारे पर विशाल रूप में प्रचारित किया गया।
संघ ने मोदी पर दांव लगाने का फैसला किया और उन्हें चुंनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित करने के लिये भाजपा पर दवाब बनाया। लेकिन आडवानी इस वक्त मोदी की घोषणा के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि नवम्बर 2013 में राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद यह घोषणा की जाये। अपने मोदी विरोध के चलते आडवानी गोवा में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुये। लेकिन उनके विरोध को दरकिनार करते हुये संघ के दवाब में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित कर दिया। इससे नाराज आडवानी ने भाजपा में अपने सभी पदों से स्तीफा दे दिया था जिसे चंद दिनों बाद ही वापस भी ले लिया। हाल ही में नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया। आडवानी इस बार भी इस पक्ष में नहीं थे कि यह घोषणा अभी की जाये। अपने विरोध के चलते इस बार भी आडवानी भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में नहीं गये लेकिन संघ के दवाब में भाजपा ने आडवानी के विरोध को एक बार फिर दरकिनार करते हुये मोदी की घोषणा कर डाली। अपनी नाराजगी के बाद भी आडवानी ने दो दिन बाद ही छत्तीसगढ़ केे एक शासकीय समारोह में अपने भाषण में मोदी की जमकर तारीफ कर डाली। आडवानी का रूठना और मानना भी कहीं ऐसा ही तो नहीं है जैसे अटल जी ने मोदी को राज धर्म निभाने की सलाह देकर चुप्पी साध ली थी। शायद इीलिये अब यह धारणा बन गयी है कि संध आडवानी की धर्म निरपेक्ष छवि बनाये रखने के लिये उनका दिखावटी विरोध कर रहा है।
ऐसे हालात में यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि क्या आडवानी जैसा एक अत्यंत अनुभवी और उम्रदराज नेता एक ही गलती बार बार दोहरा सकता है? क्या आडवानी के मोदी विरोध को दरकिनार करने का साहस भाजपा ने इसलिये किया कि वो यह जानती थी कि ये विरोध महज एक दिखावा है? मोदी को लेकर दो बार दर्ज कराये गये अपने विरोध के चलते आडवानी अल्पसंख्यकों में यह संदेश देने में तो सफल हो गये कि वे उनके हित चिंतक है। ऐसा करके उन्होंने उनके उदारवादी नेता की छवि में तो इजाफा कर ही लिया है। इन्हीं सारे तथ्यों को देखते हुये ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि आडवानी का मोदी विरोध संघ की एक सुनियोजित रणनीति का ही हिस्सा था। संघ की यह योजना बहुत हद तक सफल भी रही कि जिस तरह भाजपा में अटलबिहारी वाजपेयी की उक उदारवादी नेता की छवि थी वैसे स्वरूप में अब आडवानी आ गये है और कट्टरवादी हिन्दू नेता के रूप में आडवानी की जगह नरेन्द्र मोदी ने ले ली है। इस तरह संघ अटल आडवानी की जोड़ी को आडवानी मोदी की जोड़ी के रूप में स्थापित करने में सफल हो गया है। अब यह तो आगामी लोकसभा चुनावों के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा कि संघ का यह प्रयोग कितना सफल होता है। 
               लेखक:- आशुतोष वर्मा,16 शास्त्री वार्ड, बारापत्थर सिवनी 480661 मो. 9425174640 



 

Tuesday, September 17, 2013

क्या बिल्डर माफिया तय करायेगा केवलारी की भाजपा टिकिट?
1977 मे राजेन्द्र अग्रवाल,1985 और 2003 में वेदसिंह ठाकुर को स्थानीय प्रत्याशी के रूप में टिकिट दी गयी थी: 62 और 90 में बाहरी गैर कांग्रेसी ही जीते थे चुनावं
सिवनी। जिले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण केवलारी विस क्षेत्र से कांग्रेस और भाजपा से कौन चुनाव लड़ेगा? इसे लेकर उत्सुकता बनी हुयी है। इंका विधायक हरवंश सिंह की मृत्यु के बाद भाजपा में टिकिट के लिये घमासान मचा है। कुछ भाजपायी स्थानीय और बाहरी उम्मीदवार की लड़ाई लड़ रहें तो कुछ दबी जुबान से यह कहने से नहीं चूक रहें हैं कि इस सीट का फैसला प्रदेश के बिल्डर माफिया करायेगें।
इस क्षेत्र से लगातार चार बासर चुनाव जीतने वाले इंका नेता हरवंश सिंह की मृत्यु के बाद ऐसा माना जा रहा है कि उनके पुत्र रजनीश सिंह ही कांग्रेस के उम्मीदवार होंगें। वैसे डॉ. वसंत तिवारी,कु. शक्ति सिंह  और जकी अनवर जैसे नाम भी चर्चित है लेकिन अधिकांश कांग्रेसी यह मान कर चल रहें हैं कि रजनीश सिंह ही प्रत्याशी होंगें।
टिकिट को लेकर इस बार भाजपा में ज्यादा घमासान मचा हुआ है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछला चुनाव भाजपा के पूर्व मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने लड़ा था और स्व. हरवंश सिंह बमुश्किल लगभग 59 सौ वोटों से ही जीत पाये थे। इस बार हरवंश सिंह के ना रहने से बहुत से समीकरणों के बदलने के आसार भी दिखायी दे रहें है।
केवलारी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति शुरू से ऐसी रही है कि पूरे विस क्षेत्र में प्रभाव बना सकने वाले स्थानीय नेता बहुत कम ही रहते है। इसीलिये ज्यादातर चुनाव जिला स्तरीय बाहरी नेता ही इस क्षेत्र से जीतते आये हैं चाहे वे कांग्रेस के हों या गैर कांग्रेस दल के हों। सन 1957 में कांग्रेस के एम.पी.जठार, 62 में राम राज्य परिषद के दादू योगेन्द्रनाथ सिंह,67 से 85 तक कांग्रेस की कु. विमला वर्मा,93 से 2008 तक कांग्रेस के हरवंश सिंह चुनाव जीते थे जो कि सभी केवलारी क्षेत्र के बाहर के निवासी थी। 2008 के चुनाव में नये परिसीमन के बाद छपारा क्षेत्र जुड़ जाने के कारण हरवंश सिंह जरूर स्थानीय उम्मीदवार हो गये थे। 
सन 1977 में जनता पार्टी ने पलारी निवासी राजेन्द्र अग्रवाल को और 1985 तथा 2003 में भाजपा ने वेदसिंह ठाकुर के रूप में स्थानीय उम्मीदवार को टिकिट जरूर दी थी लेकिन वे जीत नहीं पाये थे। जबकि 1977 में जनता पार्टी की तथा 2003 में उमा भारती की लहर चल रही थी।
अब एक बार फिर भाजपा में स्थानीय उम्मीदवार को टिकिट देने की भाजपा में मांग उठ रही है। कई नेताओं का ऐसा मानना है कि हरवंश सिंह के निधन के कारण अब कोई भी चुनाव जीत सकता है।
वहीं दूसरी ओर भाजपा में यह चर्चा भी जोरों से चल रही है कि स्थानीय प्रत्याशी के नाम पर बीसावाड़ी निवासी और लंबे समय से भोपाल में रह रहे डॉ. सुनील राय को टिकिट दिलाने की योजना बनायी गयी। प्रशासनिक अमले द्वारा उन्हें दिये जाने वाले महत्व ने इन हवाओं को और पुख्ता करने का काम किया है। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार डॉ. राय दिलीप बिल्डिकॉन के मालिक दिलीप सूर्यवंशी के रिश्तेदार है। बताया तो यह भी जा रहा है कि डॉ. राय और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी बहुत पुरानी एवं घनिष्ठ सहेलियां हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में यह दावा करने वालों की भी कोई कमी नहीं है कि शिवराज केवलारी में कमजोर प्रत्याशी देकर स्व. हरवंश सिंह का राजनैतिक कर्ज उतारने के लिये ऐसा कर भी सकते हैं। हालाकि यह भी बताया जा रहा है कि रायशुमारी के दौरान डॉ. राय का नाम किसी भी मंड़ल से तीसरे नंबंर पर भी नहीं गया है। प्रदेश में तीसरी पारी खेलने को बेताब भाजपा इस क्षेत्र में किसे चुनाव लड़ायेगी? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं।
सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
17 सितम्बर 2013 

प्रदेश में अरविंद मैनन के पर कतरे जाने से जिले की भाजपा राजनीति में भी चुनाव के समय भारी बदलाव आ सकते है
 सिवनी विस क्षेत्र में भाजपा की घमासान थमने का नाम नहींे ले रही है। नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे जो सिवनी से लगना चालू हुये थे उनकी गूंज भोपाल तक पहुच गयी है। पर्दे के पीछे चल रही चर्चाओं के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा ने इस बार अरविंद मैनन के पर कतर दिये हैं। यदि यह सही है तो जिले की भाजपा की राजनीति में इसका असर होना स्वभाविक है। कांग्रेस में भी टिकिट आवंटन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक भी संपन्न हो गयी है। वर्तमान विधायकों के अलाव पिछला चुनाव एक हजार से कम वोटों से हारने वाले नेताओं के साथ ही स्व. हरवंश सिंह के पुत्र रजनीश सिंह का नाम भी आगे बढ़ा दिया गया है। भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर मचे घमासानकी चर्चाओं के बीच जिले के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हुआ। उन्होंने श्रीवनी में कार्यकर्त्ताओं की एक बैठक भी ली और फिर पत्रकारों से भी रूबरू हुये। भाजपा सूत्रों का यह भी दावा है कि सिवनी की टिकिट तय हाने में अब प्रहलाद पटेल की भूमिका महत्व पूर्ण हो सकती है। छपारा में हुआ तेंदूपत्ता वितरण कार्यक्रम इन दिनों विवादों में छाया हुआ है। इस कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री ठा. रजनीश सिंह मुख्य अतिथि थे। इसे लेकर भाजपा नेताओं में उबाल आया हुआ है।
भाजपा के असंतोष के पीछे कौन?-सिवनी विस क्षेत्र में भाजपा की घमासान थमने का नाम नहींे ले रही है। नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे जो सिवनी से लगना चालू हुये थे उनकी गूंज भोपाल तक पहुच गयी है। बीते दिनों भोपाल में प्रदेश भाजपा नेताओं के सामने भी कार्यकर्त्ताओं ने अपनी नाराजगी व्यक्त की और मांग उनके सामने रखी। पर्दे के पीछे चल रही चर्चाओं के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा ने इस बार अरविंद मैनन के पर कतर दिये हैं। बताया जा रहा है कि जबलपुर के एक सेक्स स्केंडल के कारण यह निर्णय लिया गया है। बताया जा रहा है कि प्रदेश के पूर्व संगठन मंत्री कप्तान सिंह सौलंकी और भगवत शरण माथुर को आगे लाया गया हैै। यदि यह सही है तो जिले की भाजपा की राजनीति में इसका असर होना स्वभाविक है। जिला भाजपा के कई नेताओं से मैनन के प्रगाण संबंध थे। कई नेताओं को मैनन ने ही आश्वस्त किया था कि उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ना है। ऐसे में अब नये समीकरणों में क्या होगा? यह कहना अभी संभव नहीं रह गया है। भाजपा में जो हालात देखे जा रहें और जिस तरीकेे से कार्यकर्त्ताओं का असंतोष उभर कर सामने आ रहा है उससे भाजपा का पार्टी विथ डिफरेंस का दावा तार तार हो गया है। सिवनी विधानसभा में ब्राम्हणों और बनियों के विरोध में जो कार्यकर्त्ता लामबंद हो रहे है उन्हें किसकी शह है? यह तो उजागर नहीं हुआ है लेकिन जिस तरीके से विधायक नीता पटेरिया और पूर्व विधायक तथा जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर के विरोध में सिवनी से लेकर भोपाल तक नारेबाजी हुयी है उसे महज चंद कार्यकर्त्ताओं की ही आवाज ना मान कर इसके पीछे किसी बड़े नेता का हाथ होना माना जा रहा है।तीसरी पारी खेलने को बेताब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे कैसे संभालेंगें? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं।वैसे तो भाजपा नेताओं का यह भी दावा है कि जिन भाजपा विधायकों की टिकिट पर तलवार लटक रही है उनमें नीता पटेरिया भी शामिल हैं। लेकिन उनका ब्राम्हण होने के साथ साथ महिला होना तथा केन्द्रीय भाजपा नेताओं के साथ उनके संपंर्कों को भी नकारा नहीं जा सकता। इसलिये अभी यह दावा करना कि कोई नया प्रत्याशी ही सामने आयेगा?यह कहना अभी संभव नहीं दिख रहा है।
कांग्रेस की प्रदेश चुनाव समिति ने चालू किया काम -कांग्रेस में भी टिकिट आवंटन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक भी संपन्न हो गयी है। इस बैठक में समिति ने प्रदेश के कांग्रेस विधायकों सहित पिछला चुनाव एक हजार से कम वोटों से हारने वाले नेताओं का नाम भी आगे बढ़ा दिया है। इसमें जिले की केवलारी विधानसभा क्षेत्र से स्व. हरवंश सिंह के पुत्र ठा. रजनीश सिंह का नाम भी आगे बढ़ा दिया है। अब इन नामों पर प्रदेश की स्क्रीनिंग कमेटी और फिर केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में विचार होगा जिसके बाद ही टिकिटों का अंतिम फैसला होगा। इसके अलावा अब प्रदेश की चुनाव समिति की अगली बैठक 17 सितम्बर को दिल्ली में होना है। जिसमें बाकी बची टिकटों के बारे में चर्चा होगी। इसमें या अगली बैठक में जिले की शेष तीन सीटों के बारे में विचार होना है। इनमें लखनादौन से हिमाचल की राज्यपाल उर्मिला सिंह के पुत्र योगेन्द्र सिंह, पूर्व विधायक बेनी परते और जनपद अध्यक्ष राजेश्वरी उइके के बीच घमासान है। जिले की दूसरी आदिवासी सीट बरघाट में भी रोचक स्थिति बनी हुयी है जहां एक प्रत्याशी अर्जुनसिंह काकोड़िया के विरुद्ध बाकी 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये है। यहां आदिवासियों में गौड़ और परघान का विवाद मचा हुआ है। जिले में सबसे अधिक घमासान जिला मुख्यालय की सिवनी सीट पर मचा हुआ है। इस बार यह मांग भी जबरदस्त रूप में उठी हुयी है कि जिले में एक सीट अल्प संख्यक वर्ग को दी जाये। यदि केवलारी से रजनीश सिंह का नाम फायनल हो जाता है तो यह दवाब सिवनी सीट पर ही बन जायेगा। पांच बार से हारने वाले इस क्षेत्र से 38 लोगों ने टिकिट मांगी है। इनमें से किसके नाम पर टिकिट आयेगी? यह कहना तो अभी संभव नहीं है। 
प्रहलाद पटेल का दौरा भाजपाइयों में हुआ चर्चित  -भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर मचे घमासानकी चर्चाओं के बीच जिले के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हुआ। उन्होंने श्रीवनी में कार्यकर्त्ताओं की एक बैठक भी ली और फिर पत्रकारों से भी रूबरू हुये। सियासी हल्कों में जारी चर्चाओं के अनुसार वे भाजपा के असंतोष को दूर करने के लिये आये थे। भाजपा के सूत्रों का दावा है कि इस विवाद में चूंकि जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर खुद एक पार्टी बने हुये हैं इसीलिये प्रदेश नेतृत्व ने प्रहलाद पटेल को सुलझाने की जवाबदारी दी है। भाजपा सूत्रों का यह भी दावा है कि सिवनी की टिकिट तय हाने में अब प्रहलाद पटेल की भूमिका महत्व पूर्ण हो सकती है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्रहलाद पटेल के सांसद रहते ही भाजपा ने पहली बार सिवनी सीट 1990 में कांग्रेस के स्व. हरवंश सिंह को हरा कर स्व. पं. महेश शुक्ला ने जीती थी और यह सिलसिला आज तक जारी है। 
बोनस वितरण कार्यक्रम के कांग्रेसीकरण पर बौखलाये भाजपायी-छपारा में हुआ तेंदूपत्ता वितरण कार्यक्रम इन दिनों विवादों में छाया हुआ है। इस कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री ठा. रजनीश सिंह मुख्य अतिथि थे। इसे लेकर भाजपा नेताओं में उबाल आया हुआ है। सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र टांक ने इस मामले में विज्ञप्ति जारी कर विभागीय अधिकारियों में दोषारोपण किया। फिर भाजपा के छपारा मंड़ल के महामंत्री शाहिद पटेल ने भी इसी आशय की विज्ञप्ति जारी कर विरोध जताया। स्थानीय भाजपा नेताओं के इस विरोध ने कई सवाल खड़े कर दिये है। प्रदेश में सरकार भाजपा की है। मुख्यमंत्री से लेकर जिले के तीन विधायक भाजपा के है। उसके बाद भी यदि अधिकारी किसी शासकीय कार्यक्रम में किसी कांग्रेस नेता को मुख्य अतिथि बनाता है तो इसमें गलती किसकी है? यदि अधिकारियों की गलती है तो फिर विज्ञप्ति जारी करने के बजाय उसके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं करते? या फिर स्थानीय भाजपा नेताओं इस बात से भयभीत है कि उनके चाहने के बाद भी वे अपनी सरकार से कार्यवाही नहीं करा सकते है इसलिये सिर्फ विज्ञप्ति जारी कर अपना असंतोष व्यक्त कर रहें है। बीते कई सालों से चल रहा भाजपा का नूरा कुश्ती का दौर अभी भी खत्म होगा या नहीं? इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें होती रहती है। “मुसाफिर”
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
17 सितम्बर 2013 से साभार