Monday, August 31, 2015

लखनादौन को जिला बनाने की मांग
क्या एक विधानसभा क्षेत्र  की सीमाओं का विस्तार दो जिलों तक हो सकता है या फिर होगा परिसीमन?
तीस तक नहीं हो सकता परिसीमनःप्रस्तावित क्षेत्र में पहले दो ही विस क्षेत्र थेः अब तीन विस क्षेत्र आते हैं प्रस्तावित क्षेत्र मेंः कैसे होगा  इसका हल? 
सिवनी। लखनादौन को जिला बनाने की मांग बहुत पुरानी हैं। आज से लगभग 12-13 साल पहले सोनिया गांधी के लखनादौन प्रवास की तैयारियों की कांग्रेस की बैठक में डॉ. आनंद तिवारी ने यह मांग उठायी थी तब यह कह कर दबा दिया गया था कि जिला क्या संभाग बनाने की मांग कर लो। लेकिन अंदर ही अंदर यह मांग सुलगती रही और अब इसे लेकर विगत पंद्रह दिनों से आंदोलन चल रहा है जिसे भारी जन समर्थन भी मिल रहा है।
जब परिसीमन हुआतो लोकसभा और जिले का एक विस क्षेत्र विलुप्त हो गया तब क्षेत्र कुछ इस तरह से काटे गये कि आज लखनादौन जिले के लिये जो सीमायें प्रस्तावित की जा रहीं हैं उसमें जिले के चार में से तीन विस क्षेत्रों के हिस्से शामिल है। इन क्षेत्रों में लखनादौन के अलावा केवलारी और सिवनी विस क्षेत्र के हिस्ससे भी आ रहें हैं जो कि छपारा विकास खंड़ के इलाके है। 
यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है वर्तमान परिसीमन के पहले जिलें के लो पांच विस क्षेत्र थे एनमें से दो लखनादौन और घंसौर क्षेत्र छपारा,लखनादौन,घंसौर और धनोरा विकास खंड़ में आते थे जो कि वर्तमान में प्रस्तावित लखनादौन जिले की सीमायें है। शेष चार विकासखंड़ों सिवनी,बरघाट,केवलारी और कुरई में सिवनी,केवलारी और बरघाट विस क्षेत्र आते थे जो कि सामान्य क्षेत्र थे। 
पिछले परिसीमन के दौरान केन्द्र की अटल सरकार ने यह प्रतिबंध लगा दिया था कि सन 2030 तक इसके बाद परिसीमन नहीं हो सकेगा। वैसे हर दस साल में जनगणना के बाद देश के लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन होता था। पछिला परिसीमन 2001 की जन गणना के आधार पर हुआ था जबकि अब 2011 की जन गणना भी पूरी हो गयी है लेकिन केन्द्र सरकार के प्रतिबंध के कारण परिसीमन 2030 तक होना संभव नहीं है। 
सामान्य तौर पर एक से अधिक जिलों में लोकसभा क्षेत्र की सीमायें तो विस्तारित होतीं हैं लेकिन विधानसभा क्षेत्रों के मामले में ऐसी कोंई नजीर सामने नहीं आयीं है। ब्लकि परिसीमन आयोग के निर्देश ऐसे रहते है कि विस क्षेत्रों के परिसीमन में जहां तक संभव हो ग्राम पंचायत भी ना तोड़ी जाये तो फिर जिले से ही बाहर जाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता हैं।
इस मांग को लेकर चलाये जा रहे इस आंदोलन को भारी जन समर्थन मिल रहा हैं। जन भावनाओं का प्रजातंत्र में आदर किया जाना चाहिये यह भी सही हैं लेकिन यदि विस क्षेत्रों वाला पेंच फंसा तो फिर इसका क्या और कैसे हल निकलेगा? इस पर भी विचार करना बहुत जरूरी है नहीं तो जन भावनाओं के साथ एक बड़ा खिलवाड़ हो जायेगा।  
दर्पण ढूठ ना बोले सिवनी
01 सितम्बर 2015 से साभार

Monday, August 24, 2015

अतिथि बनाकर बुलाने पर भी गौरी भाऊ से परहेज के चलते क्या सिवनी आने से  कतराते हैं सांसद बोध सिंह?
बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार गिरफ्तारी हुयी।सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है ।  
अतिथि बनने पर भी नहीं आते सांसद बोधसिंह-बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिन मतदाताओं ने उन्हें चुनकर सांसद बनाया है उनके प्रति तो उनके बहुत सारे कर्त्तव्य भी है लेकिन ना जाने क्यों वे सिवनी जिले से ना केवल मंुह चुराते है वरन यहां की समस्याओं के प्रति भी गंभीर नहीं है। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। अब भाजपा के इन दो दिग्गज नेताओं की लड़ाई का खामियाजा जिले को भुगतना पड़ रहा है। अभी हाल ही में बरघाट में नगर पंचायत में लगभग सवा करोड़ रुपयों के कामों का भूमिपूजन प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन के द्वारा किया गया जिसमें सांसद बोधसिंह भगत और फग्गनसिंह कुलस्ते दोनों ही विशिष्ट अतिथि बनाये गये थे। इसी तरह 15 अगस्त को जिले के दलसागर तालाब में दलसागर महोत्सव आयोजित किया गया इसमें भी ओनों ही सांसद विशिष्ट अतिथि थे लेकिन दोनों ही कार्यक्रमों में सांसद कुलस्ते तो आये लेकिन बोधसिंह भगत ने हमेशा की तरह कन्नी काट लिया। जबकि बरघाट और सिवनी दोनों ही विधानसभा क्षेत्र कुलस्ते के संसदीय क्षेत्र में नहीं आते है। कार्यक्रमों से परहेज करें और चाहें तो जिले में बिल्कुज ना आये लेकिन कम से कम जिले की समस्याओं के प्रति तो जागरूक रहें तो वैसा भी नहीं है। फोर लेन के मामले में जरूर उनके एक दो बयान आये लेकिन वे भी सही नहीं निकले। रामटेक गोटेगांव नई रेल लाइन और छिंदवाड़ा नैनपुर के गेज परिवर्तन के संबंध में भी ना जाने क्यों भगत जी ने चुप्पी ही साध रखी है जबकि ये तीनों ही मांगें केन्द्र सरकार से संबंधित हैं और बिना उनके प्रयास किये पूरी भी नहीं होने वाली हैं। जिले के भाजपा के इकलौते विधायक कमल मर्सकोले और दोनों भाजपा सांसदों को इसं संबंध में कारगर पहल करना चाहिये ताकि जिले के लोगों को ये मूलभूत सुविधायें मिल सकें। 
कमलनाथ के नेतृत्व में हुआ जंगी प्रर्दशनःजिले में बजी अपनी अपनी ढपली -विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इस आंदोलन में जिले के कांग्रेस नेताओं ने भी अलग अलग ग्रुप में अपनी भागीदारी की है। केवलारी के इंका विधायक रजनीश सिंह के नेतृत्व में स्व. हरवंश सिंह के समर्थकों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इसमें जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी,राजा बघेल, असलम भाई और मोहन चंदेल सहित कई नेता शामिल थे। जबकि एक अलग ग्रुप के रूप में सिवनी विस के पूर्व प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने भी हिस्सा लिया। उल्लेखनीय है कि व्यापम घोटाले की सी.बी.आई. जांच के बाद प्रदेश में यह पहला विशाल आंदोलन था जिसकी अगुवायी पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने की है। कांग्रेस की आक्रामक नीति के चलते ऐसे और भी आयोजन किया जाना प्रस्तावित है। वेस्े तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने जबलपुर संभाग के अन्य जिलों में इसमें शामिल होने के लिये कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किये थे। ऐसा दावा जिले के कांग्रेस के पदाधिकारियों का था। वैसे भी जिले में कांग्रेस या कांग्रेस के नेताओं के द्वारा कोई ऐसे संगठित प्रयास नहीं किये गये कि जिले के ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें पहुंच सकें। सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। ब्लाक कांग्रेस के लेवल पर भी कोई प्रयास नहीं हुये। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। इसीलिये सभी नेता अपनी अपनी ढपली बजाते देखे गये।
क्या मुख्यमंत्री को अपनी ही जुबान की कद्र नहीं हैं? -कई साल पहले सविनी के मिशन स्कूल की सभा में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। बीच में प्रदेश सरकार ने सदन और प्रेस कॉंफ्रेंस में दावा किया था कि केन्द्र सरकार को छिंदवाड़ा और शिवपुरी नहीं वरन मूल प्रस्ताव के अनुरुप सिवनी और सतना के प्रस्ताव भेजे गये हैं। फिर भाजपा नेताओं ने दावा किया कि यहां पीपीडी मोड का कॉलेज खुलेगा। जेकिन पीपीडी मोड के कालेजों के समय भी सरकार ने सिवनी का प्रस्ताव लंबित रख दिया और ऐसा अखबारों से पता चला है कि केन्द्र सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेजों की सूची में भी पूर्व की ही भांति छिंदवाड़ा और शिवपुरी का प्रस्ताव भेज दिया गया है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है जबकि मेडिकल कालेज के हिसाब से 80 के दशक में ही कु. विमला वर्मा के समय सरकारी अस्पताल खुल चुका था। भाजपा और उसके जनप्रतिनिधि शायद जिले के हितों का इसलिये ध्यान नहीं रखने के आदी हो गये हैं कि बिना कुछ दिये वे चुनाव जीत जाते हैं तो फिर भला कुछ देने से क्या फायदा। रहा सवाल विपक्ष याने कांग्रेस के विधायकों रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह का तो सिवनी मुख्यालय उनके क्षेत्र में नहीं आता है तो वे भी रुचि लेते नहीं दिखते है।वैसे तो एक कहावत है कि झूठ बोले कौव्वा काटे यह चरितार्थ होती है या नहीं और मुख्यमंत्री को कौव्वा काटता है कि नहीं?“मुसाफिर”   
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
24 अगस्त 2015 से साभार
अतिथि बनाकर बुलाने पर भी गौरी भाऊ से परहेज के चलते क्या सिवनी आने से  कतराते हैं सांसद बोध सिंह?
बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार गिरफ्तारी हुयी।सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है ।  
अतिथि बनने पर भी नहीं आते सांसद बोधसिंह-बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिन मतदाताओं ने उन्हें चुनकर सांसद बनाया है उनके प्रति तो उनके बहुत सारे कर्त्तव्य भी है लेकिन ना जाने क्यों वे सिवनी जिले से ना केवल मंुह चुराते है वरन यहां की समस्याओं के प्रति भी गंभीर नहीं है। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। अब भाजपा के इन दो दिग्गज नेताओं की लड़ाई का खामियाजा जिले को भुगतना पड़ रहा है। अभी हाल ही में बरघाट में नगर पंचायत में लगभग सवा करोड़ रुपयों के कामों का भूमिपूजन प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन के द्वारा किया गया जिसमें सांसद बोधसिंह भगत और फग्गनसिंह कुलस्ते दोनों ही विशिष्ट अतिथि बनाये गये थे। इसी तरह 15 अगस्त को जिले के दलसागर तालाब में दलसागर महोत्सव आयोजित किया गया इसमें भी ओनों ही सांसद विशिष्ट अतिथि थे लेकिन दोनों ही कार्यक्रमों में सांसद कुलस्ते तो आये लेकिन बोधसिंह भगत ने हमेशा की तरह कन्नी काट लिया। जबकि बरघाट और सिवनी दोनों ही विधानसभा क्षेत्र कुलस्ते के संसदीय क्षेत्र में नहीं आते है। कार्यक्रमों से परहेज करें और चाहें तो जिले में बिल्कुज ना आये लेकिन कम से कम जिले की समस्याओं के प्रति तो जागरूक रहें तो वैसा भी नहीं है। फोर लेन के मामले में जरूर उनके एक दो बयान आये लेकिन वे भी सही नहीं निकले। रामटेक गोटेगांव नई रेल लाइन और छिंदवाड़ा नैनपुर के गेज परिवर्तन के संबंध में भी ना जाने क्यों भगत जी ने चुप्पी ही साध रखी है जबकि ये तीनों ही मांगें केन्द्र सरकार से संबंधित हैं और बिना उनके प्रयास किये पूरी भी नहीं होने वाली हैं। जिले के भाजपा के इकलौते विधायक कमल मर्सकोले और दोनों भाजपा सांसदों को इसं संबंध में कारगर पहल करना चाहिये ताकि जिले के लोगों को ये मूलभूत सुविधायें मिल सकें। 
कमलनाथ के नेतृत्व में हुआ जंगी प्रर्दशनःजिले में बजी अपनी अपनी ढपली -विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इस आंदोलन में जिले के कांग्रेस नेताओं ने भी अलग अलग ग्रुप में अपनी भागीदारी की है। केवलारी के इंका विधायक रजनीश सिंह के नेतृत्व में स्व. हरवंश सिंह के समर्थकों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इसमें जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी,राजा बघेल, असलम भाई और मोहन चंदेल सहित कई नेता शामिल थे। जबकि एक अलग ग्रुप के रूप में सिवनी विस के पूर्व प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने भी हिस्सा लिया। उल्लेखनीय है कि व्यापम घोटाले की सी.बी.आई. जांच के बाद प्रदेश में यह पहला विशाल आंदोलन था जिसकी अगुवायी पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने की है। कांग्रेस की आक्रामक नीति के चलते ऐसे और भी आयोजन किया जाना प्रस्तावित है। वेस्े तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने जबलपुर संभाग के अन्य जिलों में इसमें शामिल होने के लिये कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किये थे। ऐसा दावा जिले के कांग्रेस के पदाधिकारियों का था। वैसे भी जिले में कांग्रेस या कांग्रेस के नेताओं के द्वारा कोई ऐसे संगठित प्रयास नहीं किये गये कि जिले के ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें पहुंच सकें। सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। ब्लाक कांग्रेस के लेवल पर भी कोई प्रयास नहीं हुये। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। इसीलिये सभी नेता अपनी अपनी ढपली बजाते देखे गये।
क्या मुख्यमंत्री को अपनी ही जुबान की कद्र नहीं हैं? -कई साल पहले सविनी के मिशन स्कूल की सभा में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। बीच में प्रदेश सरकार ने सदन और प्रेस कॉंफ्रेंस में दावा किया था कि केन्द्र सरकार को छिंदवाड़ा और शिवपुरी नहीं वरन मूल प्रस्ताव के अनुरुप सिवनी और सतना के प्रस्ताव भेजे गये हैं। फिर भाजपा नेताओं ने दावा किया कि यहां पीपीडी मोड का कॉलेज खुलेगा। जेकिन पीपीडी मोड के कालेजों के समय भी सरकार ने सिवनी का प्रस्ताव लंबित रख दिया और ऐसा अखबारों से पता चला है कि केन्द्र सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेजों की सूची में भी पूर्व की ही भांति छिंदवाड़ा और शिवपुरी का प्रस्ताव भेज दिया गया है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है जबकि मेडिकल कालेज के हिसाब से 80 के दशक में ही कु. विमला वर्मा के समय सरकारी अस्पताल खुल चुका था। भाजपा और उसके जनप्रतिनिधि शायद जिले के हितों का इसलिये ध्यान नहीं रखने के आदी हो गये हैं कि बिना कुछ दिये वे चुनाव जीत जाते हैं तो फिर भला कुछ देने से क्या फायदा। रहा सवाल विपक्ष याने कांग्रेस के विधायकों रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह का तो सिवनी मुख्यालय उनके क्षेत्र में नहीं आता है तो वे भी रुचि लेते नहीं दिखते है।वैसे तो एक कहावत है कि झूठ बोले कौव्वा काटे यह चरितार्थ होती है या नहीं और मुख्यमंत्री को कौव्वा काटता है कि नहीं?“मुसाफिर”   
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
24 अगस्त 2015 से साभार

Thursday, August 13, 2015

तिरंगे के भगवा और हरे रंग के पक्षधर ये ना भूले कि दोनों के बीच शांति का प्रतीक सफेद रंग भी है जिसके बिना देश की प्रगति की कल्पना संभव नहीं
आज हम 69 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे है। अंग्रेजों की 2 सौ साल की गुलामी के बाद आज के दिन हमें आजादी मिली थी। जिन अंग्रेजों के राज में कभी सूरज नहीं डूबता था उन्हें अहिंसा के हथियार से हमने देश से खदेड़ दिया था। हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने का संकल्प लिया था लेकिन कुछ तबकों में फैली संप्रदायिक ताकतों के चलते  हमें देश को एक और अखंड़ रखने के लिये आजादी के बाद भी तीन तीन गांधियों,महात्मा गांधी,इंदिरा गांधी और राजीव गांधी, की शहादत देनी पड़ी। आज भी देश के कुछ हिस्सों में आतंकवाद का खतरा मंड़रा रहा है। आये दिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान युद्ध विराम और सीमाओं का उल्लंघन करके सीमा पर गोलीबारी करते रहता है। हमारे जवान ना केवल उनका मुंहतोड़ जवाब देते है वरन कई जवान तो शहीद भी हो जाते है। इसके अलावा सांप्रदायिक हिंसा की घटनायें भी हमें शर्मिंदा करती रहतीं हैं। हमें यह समझना और मानना पड़ेगा कि आतंवादियों और अपराधियों का कोई भी धर्म या मजहब नहीं होता। कोई भगवान या खुदा नहीं होता। वो सिर्फ आतंकवादी या अपराधी ही होता है। लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो आतंकवादियों और अपराधियों में रंग के आधार पर परहेज करते है। कभी कोई हरे रंग का पक्षधर दिखायी देता है तो कभी कोई भगवे रंग के पक्ष में लामबंदी करते दिखता है। जबकि होना यह चाहिये कि आतंकवादी हो या अपराधी उससे उसके कर्मों के आधार पर व्यवहार किया जाये ना कि धर्म या जाति के आधार पर। वैसे तो हमने अपने राष्ट्र ध्वज में भी केसरिया (भगवे) और हरे रंग का प्रयोग किया है लेकिन दोनों ही रंगों के बीच में सफेद रंग पर अशोक चक्र भी बनाया है। हालांकि इन रंगो के  प्रतीक कुछ और माने गये थे लेकिन आज के परिपेक्ष्य में देखें तो भगवे और हरे रंग के पक्षधर के रूप में जो लोग भी सामने आये है वे शायद यह भूल गयें हैं कि इन दोनों रंगों के बीच में शांति के प्रतीक सफेद रंग को भी रखा गया है। ताकि सभी वर्गों और धर्मों के बीच अमन चैन और शांति बनी रहे। सिर्फ भगवे और हरे रंग से तिरंगा पूरा नहीं हो सकता जब तक कि उसके बीच में शांति का प्रतीक सफेद रंग नहीं होगा। इसलिये आज यह समय की मांग है कि देश के सभी राजनैतिक दल जात पात,धर्म मजहब, भाषा और क्षेत्रीयता की भावना को वरीयता ना दें और संविधान की मूल भावना के अनुरूप देश को एक मजबूत और विकसित धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बनाने में प्राण प्रण से जुट जायें। तो आइये आज के दिन हम यह संकल्प लें कि आतंकवादियों और अपराधियों में हम मजहब या धर्म के आधार पर हरे या भगवे रंग का पक्षधर बनने के बजाय तिरंगें के तीनों रंगों का सम्मान करते हुये आपसी भाईचारा और अमन चैन कायम करके देश को प्रगति के पथ पर तेजी से अग्रसर करने में जुट जायेंगें।