Monday, October 12, 2015

ना जाने क्या हो गया है जिले की फिजा और लोगों के मिजाज को?
एक वक्त था जब सिवनी जिला अविभाजित मध्यप्रदेश में शांति और अमन चैन का टापू माना जाता था। पूरे प्रदेश में जिले के साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल दी जाती थी। मिसाल भी ऐसे ही नहीं दी जाती थी। उसकी भी एक खास वजह थी। एक समय जब 1962 में जबलपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ था, जिसे ऊषा भार्गव कांड़ के नाम से जाना जाता है,तब इसकी चपेट में पूरा प्रदेश आ गया था लेकिन जबलपुर की सीमा से लगा सिवनी जिला इससे अछूता रहा था और यहां आपसी भाई चारा बना रहा था। जबकि सिवनी में भी शांति मार्च निकाला गया था।
जिले में पहली बार नवम्बर 1971 में सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ा था। एक व्यक्ति के पास से मांस पकड़ने की घटना हुयी थी तब उस समय जिला मुख्यालय सिवनी में कर्फ्यू भी पहली बार लगा था। लेकिन इस दौरान भी आगजनी और लूट पाट की घटनायें ही हुयीं थीं और किसी की जान नहीं गयी थी।
इस घटना के बाद जिले में ऐसी कोई सांप्रदायिक घटना नहीं घटी थी जिसके कारण कानून और व्यवस्था भंग हुयी हो। लेकिन 6 दिसम्बर 1992 के अयोध्या में घटी घटना के कारण पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव हो गया था और जगह जगह दंगे हुये थे। अयोध्या में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद लंबे समय से चल रहा था। हिन्दू घर्मावलंबी जिसे राम मंदिर कहते थे उसे ही मुस्लिम घर्मावलंबी बाबरी मस्जिद कहते थे तो सरकार उसे विवादास्पद ढ़ांचा कहती थी। इस दिन अध्येध्या में एकत्रित हुये कारसेवकों ने इसे गिरा दिया था और देश में दंगे भड़क गये थे। इस दौरान सिवनी में 19 दिन कर्फ्यू लगा रहा था जो अब तक का रिकार्ड है। इस दौरान भी आगजनी और लूट पाट की घटनायें तो हुयी लेकिन किसी की भी जान नहीं गयी थी। इस घटना के बाद ही जिले के माथे पर सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील जिला होने का कलंक लग गया और सरकार की नजर में यह संवेदनशील जिला हो गया। लेकिन इसके बावलूद भी सरकार ने ऐसे कोई सुरक्षात्मक उपाय नहीं किये कि जिले के अमन चैन को बनाये रखने के लिये जिला प्रशासन को तत्काल सुविधा हो सके। और तो और जिले में एसएएफ की एक बटालियन तक रखने की व्यवस्था नहीं की गयी जिससे वक्त आने पर फोर्स की कमी महसूस नहीं होती।
इस घटना के बाद 2013 तक जिले में कर्फ्यू लगाने की नौबत नहीं आयी हालांकि जिला मुख्यालय में सांप्रदायिक कारणों से तनाव जरूर रहे। जिला मुख्यालय में पुलिस थाने में पूंछ तांछ के दौरान 4 दिसम्बर 1995 को शरीफ नामक मुस्लिम युवक की मौत हो गयी थी। इससे शहर में सांप्रदायिक तनाव तो जरूर पैदा हो गया था परंतु कर्फ्यूू लगाने की नौबत नहीं आयी थी। बरघाट में 11 जुलाई 2004 में गा्रम खारी के एक मुस्लिम परिवार के सदस्य वारिस की हत्या से भी सांप्रदायिक तनाव हो गया था लेकिन बिना कर्फ्यू लगाये ही स्थिति नियंत्रण में कर ली गयी थी।
इसके बाद बकरीद के मौके पर 11 जुलाई 2006 को शहर में हुये ऊूंट कांड़ को लेकर भी तनाव तो जरूर फैल गया था लेकिन उस समय लोगों को कर्फ्यू का दंश नहीं झेलना पड़ा था।  इसी तरह 17 दिसम्बर 2009 को कान्हीवाड़ा थाने के अंर्तगत ग्राम सुकतरा के एक मंदिर में घटी घटना के कारण भी जिला में मुख्यालय सांप्रदायिक तनाव फैल गया था और लोग सड़कों पर उतर आये थे। लेकिन इस दौरान भी बिना कर्फ्यू लगे स्थिति नियंत्रण में हो गयी थी। 
जिले के छपारा कस्बे में 2 फरवरी 2013 केो एक आदिवासी युवक के साथ घटी घटना के कारण छपारा के साथ साथ सिवनी नगर में भी 6 फरवरी से सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ गया था और फिर तरह तरह की घटनायें घटित होने लगीं थीं। महावीर टाकीज के पास एकत्रित अनियंत्रित हो रही भीड़ के कारण दिनांक 8 फरवरी को जिला प्रशासन ने समय दिये बिना ही तत्काल प्रभाव से कर्फ्यू लगा दिया था जिससे कई निर्दोष नागरिक भी पिट गये थे। शहर को इस कर्फ्यू से 16 फरवरी को निजात मिली थी।
बीते दिनों जिले के बरघाट कस्बे में घटी एक घटना ने सांप्रदायिक सौहार्द को तहस नहस कर के रख दिया। 4 अक्टूबर 2015 को भाजपा के बरघाट मंड़ल के महामंत्री और ग्राम पंचायत लोहारा के पूर्व सरपंच कपूरचंद ठाकरे के साथ एक छोटी सी घटना को लेकर रजा और नासिर ने उसके साथ इतनी गंभीर मारपीट कर दी थी कि वह ना सिर्फ कोमा में आ गया वरन उसी दिन रात को तीन बजे उसने नागपुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस गंभीर और निंदनीय आपराधिक कृत्य के लिये पुलिस ने तत्काल ही उसी दिन दोनों आरोपियों को धारा 307 के तहत हिरासत में लेकर कोर्ट में पेश कर जेल में भेज दिया था। इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी लेकिन इतनी वीभत्स्य हो जायेगी ऐसा सोचा भी नहीं था। 5 अक्टूबर को सुबह से लोगों का जुड़ना चालू हो गया और एक रैली निकाली गयी जिसने आरोपियों के घरों के अलावा कई जगह तोड़ फोड़,लूट पाट और आगजनी की घटना भी कर डाली। इसी दौरान मस्जिद से एक आपत्तिजनक एनाउंसमेंट होने का भी आरोप लगा। पुलिस बल की कमी के कारण प्रशासन भी मजबूर था। पुलिस बल के आते ही बरघाट में 5 अक्टूबर को दोपहर लगभग 3 बजे पहली बार कर्फ्यू लगा दिया गया और स्थिति को नियंत्रित किया गया। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि जब 4 अक्टूबर की रात को तीन बजे ही चोटिल भाजपा नेता की मृत्यु हो गयी तो सुरक्षात्मक उपाय क्यों नहीं किये गये? उसी समय से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाने के प्रयास क्यों नहीं किये गये? यह बात सभी मानते हैं कि पुलिस बल की कमी के कारण ही बरघाट की फिजा बिगड़ गयी थी। प्रशासन ने साक्ष्यों के आधार पर फिजा बिगाड़ने वालों पर कार्यवाही करना प्रारंभ की और 7 अक्टूबर को पांच लोगों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया जिसमें बरघाट नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष भाजपा नेता विजय सूर्यवंशी भी शामिल थे। इसके बाद ही 8 अक्टूबर को सांसद,विधायक और जिला भाजपा अध्यक्ष के नेतृत्व में एक विशाल प्रनिनिधि मंड़ल ने जिला प्रशासन से भेंट कर यह मांग कर डाली कि इस मामले में किसी भी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होना चाहिये। इसके बाद से अभी तक धर पकड़ की कार्यवाही थम गयी है। बरघाट में 12 अक्टूबर से दिन में सोलह घंटे की छूट दी गयी है।
इन घटनाओं को देखते हुये सरकार से यह अपेक्षा है कि जिले में एक एसएएफ की बटालियन रखने की व्यवस्था करे ताकि पुलिस बल की कमी के कारण जिले की फिजा फिर कभी ना बिगड़ पाये। 

दर्पण झूठ ना बोने,सिवनी
13 अक्टूबर 2015 से साभार