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Friday, August 26, 2011

samyik teep

क्या संसद में भी हर सांसद को वो ही बोलना चाहिये जो अन्ना जी चाहते हैं? फिर बहस का तो सवाल ही नहीं उठता। अन्ना सीधे सीधे यह क्यों नहीं कह देते कि सभी सांसद चुपचाप मेरे लोकपाल बिल के पक्ष में हाथ उठाकर वोट डालें और पास करा दें नहीं तो अपना घर घिरवायें। राहुल गांधी कुछ बोल नहीं रहें थे तो भी आपत्ति थी और जब संसद में अपने विचार रखे तो कोप का भाजन बनना पड़ा। क्या अन्ना जी यही सच्चा लोकतंत्र हैं?

samyik teep

ऐसा कैसे हो सकता है कि अन्ना अपने लोकपाल को संपूर्ण मानकर उसके समानान्तर भ्रष्टाचार खत्म करने के अन्य लोगों के विचारों को सिरे से नकार रहें है। ताजा उदाहरण है राहुल गांधी के विचारों से असहमत होने पर उन्होंने अपने समर्थकों को उनके घर का घेराव करने भेज दिया।  याने उनके ही लोकपाल को मानो नहीं तो भुगतो।क्या आपको ऐसा नहीं लगता लोकतंत्र के सबसे बड़े हिमायती होने का दावा करने वाले अन्ना लोकतंत्र से ही शक्ति पाकर सबसे ज्यादा लोकतंत्र का दमन कर रहें हैं।   

Thursday, August 25, 2011

samyik teep

प्रजातंत्र में संसद सर्वाैच्च हैं। संसद ने प्रधानमंत्री की पहल पर जन लोकपाल बिल पेश कर उस पर बहस कराने का स्वागत किया हैं। स्पीकर सहित संसद ने अन्ना जी से अनशन समाप्त करने का आग्रह किया हैं। संसद के आग्रह को स्वीकार कर प्रजातंत्र के सजग प्रहरी अन्ना जी को अनशन क्या समाप्त नहीं कर देना चाहिये? उनके स्वास्थ्य की समूचे राष्ट्र को चिंता है। देश और युवा पीढ़ी ने अथाह समर्थन दिया है। संसद के आग्रह को स्वीकार ना करना क्या जनसमर्थन का दुरुपयोग नहीं है

Tuesday, August 23, 2011

plitical dairy of seoni disst. of M.P.

महिला मोर्चे की प्रदेशाध्यक्ष नीता पटेरिया के जिले में भ्रष्टाचार की आरोपी पार्वती जंघेला को पद पर बनाये रखने वाली भाजपा का अन्ना के समर्थन में धरना चर्चित











अन्ना के समर्थन में निकली विशाल रैली में भारी तादाद में युवकों छात्रों के अलावा जिले में अन्ना की कमान संभाहलने वाले राजेन्द्र गुप्ता और नरेन्द्र अग्रवाल के साथ भाजपा नेता नरेन्द्र ठाकुर एवं प्रवीण भारद्वाज सहित कई भाजपा कार्यकर्त्ता भी शामिल थे। प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया के गृह जिले में भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित होने के बाद भी पार्वती जंघेला को पद पर बनाये रखने वाली भाजपा का अन्ना के समर्थन में धरना चर्चा का विषय बना हुआ हैं। विधायक नीता पटेरिया और और कमल मर्सकोले की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुयी है। शिवराज के उपवास स्थगित होने की याद आते ही नरेश ने बमुश्किल हासिल हुयी लाल बत्ती को खतरे में डालने का जाखिम नहीं उठाया और भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाले धरने से परहेज करना ही उचित समझा नहीं तो उनकी उपस्थिति को लेकर भी व्यंग के तीर चलना कोई बड़ी बात नहीं होती। मीडिया प्रभारी श्रीकांत अग्रवाल के स्तीफे के पीछे भाजपा की गुटबाजी थीै या फिर कुछ और? इसे लेकर स्तीफा वापस होने के बाद भी जिज्ञासा बनी हुयी हैं।मीडिया प्रभारी बनने के लिये इच्छुक नेताओं ने अपने अपने आकाओं की गणेश परिक्रमा करना प्रारंभ कर दी हैं। अन्ना के आंदोलन के मूल मूद्दे भ्रंष्टाचार पर ऐसा आंदोलन चलाने की योजना बनायी गयी हैं जिसका राजनैतिक लाभ आगामी लोक सभा चुनाव में भाजपा को मिल सके।









अन्ना के समर्थन में निकली विशाल रैली-पूरे देश में इस वक्त अन्ना हजारे और लोकपाल बिल को लेकर सड़क से लेकर सदन तक तक धूम मची हुयी है। जिले में भी अन्ना की गिरफ्तारी से अभी तक प्रर्दशन और अनशन जारी हैं। अन्ना समर्थकों द्वारा 16 अगस्त को चार बजे शाम को गांधी चौक से विशाल रैली निकाली जिसमें युवकों छात्रों की भागीदारी भारी तादाद में रही। इस रैली में अन्ना समर्थकों की कमान संभाहलने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र गुप्ता और नरेन्द्र अग्रवाल प्रमुख रूप से शामिल थे। इसके अलावा इस रैली में भाजपा नेता प्रवीण भारद्वाज, नरेन्द्र ठाकुर के साथ भाजपा के कार्यकर्त्ता भी मौजूद थे। वकीलों ने मोटर सायकिल रैली के रूप में भागीदारी की थी।









र्पावती की उपस्थिति में अन्ना के समर्थन में भाजपा का धरना चर्चित-इसके बाद जिला भाजपा ने भी अन्ना की गिरफ्तारी के विरोध में एक दिवसीय धरना दिया।यह धरना जिला कलेक्टरेट के प्रतिबंधित क्षेत्र में हुआ जिसे लेकर ही भाजपा आरोपों के कठघरे में आ गयी हैं। इस धरने में जिला भाजपाध्यक्ष सुजीत जैन के साथ ही पूर्व मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,विधायक शशि ठाकुर,अशोक टेकाम सहित भारी संख्या में भाजपा कार्यकर्त्ता मौजूद थे। इनमें सबसे ज्यादा चर्चित उपस्थिति पूर्व पालिका अध्यक्ष और महिला मोर्चे की अध्यक्ष पार्वती जंघेला की रही जिन्हें प्रदेश की भाजपा सरकार ने भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाकर उनसे तीन लाख रुपये की रिकवरी उवं उन्हें पांच साल तक चुनाव लड़ने के लिये अयाग्य घोषित किया था। उल्लेखनीय है कि दुगनी लागत में घटिया सड़कों के मामले की शिकायत इंका नेता आशुतोष वर्मा ने की थी जिसे चार साल तक सरकार ने लटकायें रखा लेकिन पुख्ता प्रमाणों के चलते अंततः कार्यवाही करनी ही पड़ी थी। प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया के गृह जिले में भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित होने के बाद भी पार्वती जंघेला को पद पर बनाये रखने वाली भाजपा का अन्ना के समर्थन में धरना चर्चा का विषय बना हुआ हैं। विधायक नीता पटेरिया और और कमल मर्सकोले की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुयी है।









धरने में उपस्थिति को लेकर नरेश और हरवंश की तुलना हो रही है -भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के समर्थन में जिला भाजपा द्वारा दिये गये धरने में हाल ही में केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त कर लाल बत्तीधारी बने नरेश दिवाकर की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुयी हैं। जबकि विस उपाध्यक्ष के संवैधानिक पद पर राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त करने वाले हरवंश सिंह अपनी पार्टी कांग्रेस के प्रदेश सरकार के विरोध में होने वाले धरना प्रर्दशनों में बेधड़क शामिल होते हैं। हालांकि नियम तो यही कहता हैं कि मंत्री या दर्जा प्राप्त मंत्री किसी भी सरकार विरोधी आंदोलन या धरने में शामिल नहीं हो सकते। लेकिन आजकल इस नियम पर कड़ाई से पालन कोई नहीं करता हैं। यदि संवैधानिक पद पर बैठे हरवंश के आंदोलनों पर जब जिला भाजपा चुप रहती हैं तो भला नरेश के शामिल होने पर जिला इंका कोई आपत्ति कैसे कर सकती हैं। भाजपाइयों के बीच में यह चर्चा भी दबी लुबान चल रही हैं कि शायद नरेश जी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का वह उपवास प्रकरण याद आ गया था जिसमें राजभवन से उपवास स्थल पर पहुंचते ही शिवराज ने मंचासीन किसी भी भाजपा नेता को बताये बिना माइक पर अपने उपवास के समाप्त होने की घोषणा कर दी थी। यहां यह उल्लेखनीय हैं राजभवन में मुख्यमंत्री को साफ साफ बता दिया गया था कि यदि आप उपवास पर बैठेंगें तो आपकी कुर्सी जा सकती हैं। शायद यह याद आते ही नरेश ने बमुश्किल हासिल हुयी लाल बत्ती को खतरे में डालने का जोखिम नहीं उठाया और भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाले धरने से परहेज करना ही उचित समझा नहीं तो उनकी उपस्थिति को लेकर भी व्यंग के तीर चलना कोई बड़ी बात नहीं होती।









श्रीकांत के स्तीफे के कारणों की लेकर शुरू हुयी अटकलें समाप्त-भाजपा के मीडिया प्रभारी श्रीकांत अग्रवाल का त्यागपत्र इन दिनों सियासी हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ हैं। उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र देते हुये एक आम कार्यकर्त्ता के रूप में पार्टी की सेवा करते रहने की बात कही हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि आज से लगभग 11 साल पहले तत्कालीन जिला भाजपा अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने उन्हें मीडिया प्रभारी बनाया था। उसके बाद चक्रेश जैन, प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब, वेदसिंह ठाकुर,सुदर्शन बाझल के समय भी वे अपने पद बने रहे थे। जिला भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष सुजीत जैन ने भी उन्हें इसी पद पर बनाये रखा था। उनके कार्यकाल के एक साल बाद मीडिया प्रभारी के पद से श्रीकांत ने स्तीफा क्यों दिया था? इसे लेकर राजनैतिक क्षेत्रों में तरह तरह की चर्चायें चल रहीं थीं। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि हाल ही में सिवनी के पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को सरकार ने लाल बत्ती देकर महाकौशल विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया हैं। मीडिया प्रभारी के स्तीफे के पीछे भाजपा की गुटबाजी है या फिर कुछ और? कुछ भाजपायी तो यह भी कहते देखे जा रहें हैं कि श्रीकांत अग्रवाल को हटाने की योजना बन चुकी थी इसलिये उन्होंने हटाये जाने के बजाय खुद ही हट जाना बेहतर समझा और इसलिये त्यागपत्र दे दिया था। इसे लेकर अलग अलग लोंगों की अलग अलग मान्यतायें हैं। बताया तो यह भी जा रहा है कि भाजपा नेताओं द्वारा उन्हें मनाने का प्रयास किया जा रहा था। और अंततः उनका स्तीफा वापस हो गया हैं। इसी दौरान मीडिया प्रभारी बनने के लिये इच्छुक नेताओं ने अपने अपने आकाओं की गणेश परिक्रमा करना प्रारंभ कर दी थी जिन्हें अंत में निराशा ही हाथ लगी। लागों में इस स्तीफे के कारणों को लेकर अभी भी जिज्ञासा बनी हुयी हैं।









अन्ना के आंदोलन को हाई जैक करने की भाजपायी कोशिश प्रारंभ?-संघ और भाजपा के चिंतक अन्ना हजारे के आंदोलन को हाई जैक करने की योजना बनाने में जुट गये हैं। इनका यह मानना हैं कि अन्ना के आंदोलन से कांग्रेस को नुकसान तो हो रहा हें लेकिन अन्ना चूंकि चुनावी राजनीति से दूर रहने की बात कह रहें हें इसलिये चुनावी राजनीति में इस नुकसान का लाभ कोई उठाने की स्थिति में नहीं हैं। संघ और भाजपा के रणनीतिकारों ने उज्जैन में तीन दिन के मंथन शिविर में इस ऐलेन्डे पर गुप्त चर्चा की हैं। इस आंदोलन के मूल मूद्दे भ्रंष्टाचार पर ऐसा आंदोलन चलाने की योजना बनायी गयी हैं जिसका राजनैतिक लाभ आगामी लोक सभा चुनाव में भाजपा को मिल सके। परदे के पीछे रहकर अन्ना को समर्थन देने वाली भाजपा और संघ अब खुलकर राजनैतिक लाभ लेने के लिये खुद कमान संभाहलने की योजना बना रहें हैं।







Saturday, August 13, 2011

Artical On Independance Day Of India

भ्रष्टाचार के मामले में कानून के दायरे के बजाए लागू करने के कारगर तरीके की चिता जरूरी है

आज का दिन भारत वर्ष की स्वतंत्रता का दिन हैं। सैकड़ों सालों की गुलामी और हजारों लोगों की शहादत के बाद देश को आजादी मिली थी। गांधी ने आजाद देश की एक कल्पना की थी जिसमें आजादी का लाभ समाज के अंतिम छोर के उस व्यक्ति तक पहुंचना आवश्यक था जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हैं। आज हम आजादी की 64 वीं सालगिरह मना रहें है। हम गांधी जी के सपनों के भारत हिसाब से देश का आकलन करें तो हम पाते हैं कि गांधीं के अंतिम छोर के आदमी की बात तो सभी राजनैतिक दल करने लगें हैं लेकिन वास्तव में आम आदमी की चिंता नेताओं को नहीं हैं। समाज के पिछड़े और दलित आदिवासी वर्ग के हितों की बात करने वाले ये नेता उनके विकास की बात तो छोड़ो उनके मान सम्मान तक को अपने अपने राजनैतिक हित साधने का मुद्दा बनाने में भी संकोच नहीं करते हैं। राजनीति समाज के हर हिस्से में इस कदर हावी हो चुकी है कि सभी समाजसेवी कहलाने वाले भी अपने आप को राजनीति से परे नहीं रख पा रहें हैं। आज हर एक की यह फितरत हो गई है कि आम आदमी जिन चीजों से प्रताडित हो उसे मुद्दा बनाओ और अपनी रोटी सेकों। आज ऐसा ही कुछ देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर हो रहा हैं। लोकपाल बिल के मामले को लेकर तरह तरह के तर्क वितर्क चल रहें हैं। प्रधानमंत्री, न्यायाधीश,संसद में सांसदों का आचरण और समूचे शासकीय अमले को इसके दायरे में लाने की बात की जा रही हैं।़ इसका आशय क्या यह नहीं है कि ऐसी मांग करने वालों का यह मानना हैं कि देश की विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका सभी भ्रष्टाचार के मामले में संदिग्ध हैंर्षोर्षो और यदि सच्चायी यही हैं तो फिर इस देश में किसी दूध से धुले लोकपाल को कहां तलाश किया जाएगार्षोर्षो आज भी देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं। लेकिन इसके बाद भी इस पर कोई कारगर रोक नहीं लग पा रही हैं। देखा जाए तो आज जरूरत इस बात की है कि इन कानूनोेंं को लागू करने वाली ऐजेसिंया पहले तो खुद ईमानदार हों और फिर भ्रष्टाचारी को दंड़ देने के कारगर उपाय करें। भ्रष्टाचार की शिकायत यदि भ्रष्टाचार से ही साबित नहीं हो पाएगी तो कोई भी कानून भला कहां और कैसे भ्रष्टाचार को रोक पाएगार्षोर्षो इसलिए किसी भी कानून के दायरे की चिंता करने के बजाए आज चिंता इस बात की करना जरूरी है कि इन कानूनों को कारगर तरीके से लागू करने के उपाय किए जाए और भ्रष्टाचारियों पर सख्ती से कार्यवाही करने का संकल्प लिया जाए वरना हमेशा ही ऐसे आंदोलन होते रहेगें और मुद्दे जस के तस रह जाएंगें।

Sunday, July 10, 2011

Political Dairy of Seoni Dist- Of M.P.

जैन नेताओं को उपकृत करने की बात पता चलते ही नरेश को रोकने नीता ने भोेपाल में डेरा डालकर क्या पत्ता कटवा दिया?











हाल ही में प्रदेश योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में जब बाबूलाल जैन की नियुक्ति की घोषणा हुयी तब राज खुला कि मैडम वहां क्यों डटीं थींर्षोर्षो बताया जाता हैं कि नीता जी को यह पता चल गया था कि कुछ जैन नेता लाल बत्ती से नवाजे जाने वालें हैं। यह मालूम होते ही उन्होंने भोपाल में डेरा डाल कर पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को रोकने की रणनीति बना डाली। वैसे यह माना जाता हैं कि नौ महीने तके गर्भस्थ रहने वाला शिशु पूरी तरह परिपक्व हो जाता हैं। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि निर्वाचन के पूरे नौ महीने बाद घोषित होने वाले कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी कितने परिपक्व साबित होते हैंर्षोर्षोकांग्रेस की राजनीति में गुमनामी के दौर से गुजरने वाले नेता तो बहुत सारे हैं लेकिन उनमें से एक फोटो एक विज्ञापन में आने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं चल रहीं हैं।सासंद के.डी.देशमुख सिवनी आते हैं और कभी स्कूलों का तो कभी अस्पताल का निरीक्षण करके कलेक्टर और एस.पी. से चर्चा करते हैं तो पूरे जिले में बिक रही अवैध शराब की बिक्री को रोकने की बात कहने से अपने आप को नहीं रोक पा रहें हैं। भाजपायी राजनीति के जानकारों का मानना हैं कि पूर्व मंत्री स्व. महेश शुक्ला के भतीजे सुरेंद्र शुक्ला की इस जीत को नीता पटेरिया भुनाएंगी और राजेश त्रिवेदी के सामने एक ब्राम्हण नेता के रूप में उनका उपयोग करेंगीं।









नरेश को रोकने नीता डटी रहीं भोपाल में -विधायक नीता पटेरिया प्रदेश के दौरे के नाम पर प्रदेश की राजधानी भोपाल में जमीं रहीं। लोगों को अंदाज नहीं हो पाया कि वे ऐसा क्यों कर रहीं हैंर्षोर्षो हाल ही में प्रदेश योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में जब बाबूलाल जैन की नियुक्ति की घोषणा हुयी तब राज खुला कि मैडम वहां क्यों डटीं थींर्षोर्षो बताया जाता हैं कि नीता जी को यह पता चल गया था कि कुछ जैन नेता लाल बत्ती से नवाजे जाने वालें हैं। यह मालूम होते ही उन्होंने भोपाल में डेरा डाल कर पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को रोकने की रणनीति बना डाली। सिवनी के नीता और नरेश दोनों ही लाल बत्ती के प्रबल दावेदार हैं। नीता पूर्व सांसद हैं और एक मात्र वे ही विधायक बने सांसदोंं में बचीं हैं जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया हैं।दूसरी ओर नरेश दिवाकर ऐसेहैं जिनकी टिकिट काट कर नीता को दी गई थी और पार्टी ने नीता को जीतने के बाद से उन्हें उपकृत नहीं किया हैं। लेकिन दोनो ही नेताओं यह होड़ लगी हैं कि पहले लाल बत्ती उन्हें मिले वरना बाद में दूसरे को मिल जाय इसकी कोई गारंटी नहीं हैं। इसलिए मौका आते ही दोनो एक दूसरे के खिलाफ जुट जातें हैं और नतीजा सिफर ही निकलता हैं।योजना आयोग में बाबूलाल जैन की नियुक्ति से अब नरेश की राह और मुश्किल हो जाएगी क्योंकि पहले भी काफी जैन नेताओं को भाजपा लाल बत्ती से नवाज चुकी हैं।









कितने परिपक्व साबित होगें हीरा आसवानी? -निर्वाचन के नौ महीने बाद आखिर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में हीरा आसवानी की ताजपोशी हो ही गई। इस दौरान वर्तमान और भावी अध्यक्ष के बीच जैसी तना तनी चली वह किसी से छिपी नहीं हैं। कार्यक्रमों का कौन इंतजाम करें और कौन अध्यक्ष बन कर बैठा रहें? यही खेल इन नौ महीनों में चलता रहा हैं।जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह के अत्यंत विश्वास पात्रों में गिने जाने वाले इंका नेताओं में हीरा आसवानी के अध्यक्ष बनने से यह माना जा रहा हैं कि भाजपा का नेतृत्व युवा सुजीत जैन के हाथों में सौंपे जाने के बाद युवा को ही कांग्रेस की कमान सौंपने के उद्देश्य से यह नियुक्ति की गई हैं। वैसे तो हीरा आसवानी को संगठन का लंबा अनुभव हैं और वे हरवंश समर्थक नेताओं की तरह अन्य इंका नेताओं में अछूत भी नहीं माने जाते हैं। लेकिन फिर भी यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हरवंश सिंह से उन्हें काम करने में कितनी छूट मिल पाती हैं। यदि जितनी चाबी भरी राम ने की तर्ज पर ही काम चला तो पिछले अध्यक्ष महेश मालू के कार्यकाल से इनका कार्यकाल कुछ अलग नहीं होगा। वैसे यह माना जाता हैं कि नौ महीने तके गर्भस्थ रहने वाला शिशु पूरी तरह परिपक्व हो जाता हैं। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि निर्वाचन के पूरे नौ महीने घोषित होने वाले कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी कितने परिपक्व साबित होते हैंर्षोर्षो और कब अपने महामंत्रियों की घोषणा कर पाते हैं क्यों कि सुरेश पचौरी के कार्यकाल में ही घोषित हो चुके ब्लाक इंका अध्यक्ष अब तक अपने महामंत्रियों की घोषणा नहीं कर पाएं हैं?









विज्ञापन में छपी एक फोटो इंकाइयों में चर्चित- नव नियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी के आभार और बधायी के विज्ञापनों में एक विज्ञापन इंकाइयों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ हैं। कांग्रेस की राजनीति में गुमनामी के दौर से गुजरने वाले नेता तो बहुत सारे हैं लेकिन उनमें से एक फोटो एक विज्ञापन में आने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं चल रहीं हैं। कुछ इंका नेताओं का यह दावा हैं कि एक इंका नेता ने अपनी फोटो का मोह त्याग कर ये कारनामा कर दिखाया हैं। वैसे हमेशा से सुर्खियों रहने वाले इंका नेताओं में ये भी एक माने जाते थे लेकिन लंबे समय से गुमनामी में रहना उनही नियति बन चुकी हैं? या किसी सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हैर्षोर्षो इसे लेकर लोगों का अलग अलग मत हैं। वास्तविकता चाहे जो भी हो लेकिन हीरा आसवानी के अध्यक्ष बनने के विज्ञापनों ने चर्चाओं का एक मुद्दा तो दे ही दिया हैं।









इशारों को अगर समझो राज को राज रहने दो-सासंद के.डी.देशमुख लगभग हर सोमवार को सिवनी आते हैं और कभी स्कूलों का तो कभी अस्पताल का निरीक्षण करके जब भी कलेक्टर और एस.पी. से चर्चा करते हैं तो पूरे जिले में गांव गांव में बिक रही अवैध शराब की बिक्री को रोकने की बात कहने से अपने आप को नहीं रोक पा रहें हैं। निर्माण कार्यों में भी भ्रष्टाचार की बात वे कभी कभी करते हैं लेकिन अवैध शराब के धंधें की चिंता हैं कि उनका पिंड़ ही नहीं छोड़ रही हैं। भाजपायी हल्कों में इस बात को लेकर बहुत सी चर्चाएं जारी हैं।कुछ भाजपा नेता तो यह तक कहते पाए जा रहें हैं कि या तो शराब ठेकेदार और आबकारी विभाग भाऊ का इशारा ही नहीं समझ पा रहा हैं या फिर समझ कर भी जानबूझ कर अनजान बना हुआ हैं? कुछ नेता तो गाने के ये बोल बोल कर मजा ले रहें हैं कि Þइशारों को अगर समझो,राज को राज रहने दोÞ। अब इसमें राज क्या हैं और इशारा क्या है? येभाजपा नेता ही जाने लेकिन ऐसी चर्चाएं किसी भी जनप्रतिनिधि की सेहत के लिए अच्छभ् नहीं होतीं हैं।









सुरेंद्र की जीत से गर्माएगी भाजपायी गुटबंदी-अभिभाषक संघ के चुनाव में सुरेंद्र शुक्ला के अध्यक्ष चुने जाने से भाजपा की स्थानीय गुटबंदी में तेजी आने की संभावना व्यक्त की जा रही हैं। सिवनी के दो जन प्रतिनिधियों के बीच खिंची तलवारें तो जगजाहिर ही हैं। विधायक नीता पटेरिया और नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी कई मौकों पर एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आए हैं। भाजपायी राजनीति के जानकारों का मानना हैं कि पूर्व मंत्री स्व. महेश शुक्ला के भतीजे सुरेंद्र शुक्ला की इस जीत को नीता पटेरिया भुनाएंगी और राजेश त्रिवेदी के सामने एक ब्राम्हण नेता के रूप में उनका उपयोग करेंगीं।यहां यह उल्लेखनीय हैं कि राजेश त्रिवेदी भी आगे विधानसभा की टिकिट के दावेदार के रूप में उभर सकते हैं। यदि नीता पटेरिया दिल्ली की राजनीति में एक बार फिर जाना चाहेंगी तो ऐसी परिस्थिति में नीता विकल्प के रूप में सुरेंद्र शुक्ला का नाम अड़ा सकतीं हैं। यहां महेश शुक्ला का नाम उनके लिए उपयोगी साबित हो सकता हैं। राजेश के अरविंद मैनन से संबंध उनके दावे को पुख्ता कर सकते हैं। ऐसी हालात में जब दो ब्राम्हण नेता आमने सामने होंगें तो इस खींचातानी में विकल्प के रूप में नीता पटेरिया अपने विश्वस्त ब्राम्हण नेता प्रेम तिवारी को सामने कर निर्णायक स्थिति बना सकतीं हैं। यहां यह भी दावा किया जा रहा हैं कि सिवनी विधानसभा क्षेत्र में ब्राम्हणों की निर्णायक संख्या को देखते हुए अगली टिकिट भी ब्राम्हण नेता को ही देना भाजपा की मजबूरी होगी। इसका कारण यह बताया जा रहा हैं कि पूरे जिले के ब्राम्हणों ने नीताको जिता कर यह सोचा था कि भाजपा उन्हें मंत्री बनाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद यदि सिवनी की टिकिट भी ब्राम्हण को देने के बजाय किसी और को दी गई तो जिले भर के ब्राम्हण मतदाताओं की नाराजगी भाजपा को भुगतना पड़ सकता हैं। हालांकि यह सब कुछ बहुत दूर की बातें हैं लेकिन दूर की कौड़ी चलने वाले इन सारे समीकरणों पर पैनी नज़र रखें हुए हैं।







Monday, July 4, 2011

plitical dairy of seoni disst. of M.P.

क्या राहुल और भूरिया की धार बोथली साबित करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत जबेरा में हराया गया कांग्रेस को?

विधायक नीता पटेरिया पर भाजपा के ही अन्य जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा करने के आरोप पार्टी में ही चस्पा हो रहें हैं। बीते दिनों जनपद पंचायत सिवनी की अध्यक्ष किरण अवधिया ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके नीता पटेरिया को कठघरे में खड़ा कर भाजपा से त्यागपत्र दे दिया हैं। उनका आरोप हैं कि नीता की ही शह पर सी.ओ.उन्हें ना केवल नकार रहीं हैं वरन अपमानित भी कर रहीं हैं। जबेरा में इंका की हार के बारे में राजनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना हैं कि अजय सिंह और भूरिया को बोथला साबित करने के लिए तथा इंका महासचिव दिग्विजय सिंह पर वार करने के लिए प्रदेश के क्षत्रपों को हथियार मुहैया कराने के लिए यह सब एक सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हैं।पिछले लंबे समय से इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह स्वयं प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष बनने की जुगाड़ में लगे थे। लेकिन उनके दागदार इतिहास के चलते उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी।केवलारी विस क्षेत्र के भाजपा के प्रभारी बनने के बाद प्रदेश के मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने अपने अंदाज में दौरे चालू कर दिए हैं। अपने कार्यक्रमों में वे ना केवल अधिकारियों को चमका रहें हैं वरन इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के समाने यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि यदि ठीक से काम नहीं करोगे तो तुम्हें कोई बचा भी नहीं पाएगा।

नीता पर उपेक्षा का आरोप लगा भाजपा छोड़ी जनपद अध्यक्ष किरण ने -विधायक नीता पटेरिया पर भाजपा के ही अन्य जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा करने के आरोप पार्टी में ही चस्पा हो रहें हैं। बीते दिनों जनपद पंचायत सिवनी की अध्यक्ष किरण अवधिया ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके नीता पटेरिया को कठघरे में खड़ा कर दिया हैं। उनका आरोप हैं कि नीता की ही शह पर सी.ओ.उन्हें ना केवल नकार रहीं हैं वरन अपमानित भी कर रहीं है और उनके द्वारा शिकायत करने के बाद भी भाजपा की ही सरकार में कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। जनपद अध्यक्ष ने अपने पति वरिष्ठ भाजपा नेता किशोरी लाल अवधिया ने भाजपा की सदस्यता से स्तीफा देने की घोषणा कर दी हैं। यहां यह उल्लेखनीय है केवलारी विस क्षेत्र के गा्रम कान्हीवाड़ा की रहने वाली किरण अवधिया की मारक क्षमता सिवनी विसक्षेत्र में नहीं हें इसलिए ही शायद वे विधायक नीता पटेरिया द्वारा उपेक्षित की जा रहीं थीं। हालांकि अभी उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ली हैं लेकिन ऐसे कयास लगाए जा रहें हैं कि अब शायद वे हरवंश सिंह के प्रयासों से इंका की सदस्यता ले लेंगी।यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जनपद चुनाव के दौरान किरण ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली थी और इंका के कुछ हरवंश विरोधियों ने उन्हें जिता दिया था। वे तत्कालीन प्रदेश इंका अध्यक्ष सुरेश पचौरी के कार्यक्रम में शामिल भी हुयीं थीं लेकिन ना तो उन्हें कांग्रेस में तव्वजो मिली और ना ही उन्होंने भाजपा का दामन छोड़ा था। उनके पति किशोरीलाल अवधिया क्षेत्र के वरिष्ठ भाजपायी नेता माने जाते हैं। उसके बाद भी उनकी पत्नी की उपेक्षा ने उन्हें भी इतना प्रताड़ित किया कि उन्होंने भी भाजपा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया हैं। भाजपा विधायक नीता पटेरिया पर इस आरोप के बाद छपारा क्षेत्र के दो जनप्रतिनिधियों ने भी उपेक्षा का आरोप चस्पा कर दिया हैं। नप अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के समर्थक भी उनके हो रहे विरोध के पीछे विधायक नीता पटेरिया की भूमिका ही बताते हैं। इस सबको देखकर यही कहा जा सकता हैं किम यह कहावत सौ फीसदी सही हैं कि राज के साथ राजरोग आते ही हैं।

जबेरा में इंका की हार क्या सोची समझी रणनीति थी?-इंका विधायक रत्नेश सालोमन के निधन से रिक्त हुयी जबेरा विधानसभा सीट से उनकी बेटी डॉ. तान्या सालोमन की उप चुनाव में भारी हार से इंका की राजनीति में बवाल आ गया हैं। जहां एक ओर प्रदेश स्तर पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और चुनाव संचालक हरवंश को घेरने के प्रयास किए जा रहें हैं तो वहीं दूसरी ओर इस हार को इस रूप में भी देखा जा रहा हैं कुछ अति महत्वाकांक्षी इंका नेताओं ने सोची समझी रणनीति के तहत इंका की नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की धार कमजोर करने के लिए यह षड़यंत्र रच कर सफलता हासिल कर ली हैं। पिछले लंबे समय से इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह स्वयं प्रदेश अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष बनने की जुगाड़ में लगे थे। लेकिन उनके दागदार इतिहास के चलते उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी। भूरिया और अजय सिंह के समय भी ये दौड़ में थे और कुछ पाना तो दूर जो विस उपाध्यक्ष का पद उनके पास हैं वह भी दांव में लग गया था। अजय सिंह की नियुक्ति और प्रियव्रत सिंह के प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए जाने के बाद हरवंश सिंह का पद दांव में लगा हुआ हैं। अपने लाभ के लिए पार्टी से गद्दारी और भाजपा से सांठ गांठ करना उनका शगल बन चुका हैं। अतीत के ऐसे कई उदाहरणों की समय समयपर इंका नेताओं ने आला कमान को शिकायतें भी भेजी थीं लेकिन इनके प्रभाव के चलते वे सब ठंड़े बस्ते में चली जाती हैं। प्रदेश का कोई ना कोई बड़ा इंका नेता उन्हें बचा लेता हैं। हरवंश के इन्हीं कारनामों के चलते उनके गृह जिले सिवनी में लोकसभा दो बार से,सिवनी और बरघाट विस पिछले पांच चुनावों से, लखनादौन दो चुनावों से और सिवनी नगर पालिका अध्यक्ष दो चुनावों स कांग्रेस हारती जा रही हैं। जिले की एक मात्र केवलारी विस क्षेत्र से हरवंश सिंह तो पिछले चार चुनावों से विधायक बनते आ रहें हैं लेकिन उनके क्षेत्र से चंद महीनों बाद कांग्रेस लोकसभा चुनाव में हर बार हार जाती हैं। इंका नेता आशुतोष वर्मा ने इस बारे में प्रमाणों के साथ कई बार आलाकमान के सामने अपना रोना रोया लेकिन हरवंश सिंह कुछ भुगतने बजाय हर बार कुछ ना कुछ पाते ही रहे। जबेरा चुनाव में कांग्रेस की हार से हरवंश सिंह के राजदार कांग्रेसी नेता बहुत खुश दिखायी दे रहे हैं और यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि यदि हरवंश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाता तो कांग्रेस को ये दिन नहीं देखने पड़ते। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना हैं कि अजय सिंह और भूरिया को बोथला साबित करने के लिए तथा इंका महासचिव दिग्विजय सिंह पर वार करने के लिए प्रदेश के क्षत्रपों को हथियार मुहैया कराने के लिए यह सब एक सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा हैं। यहां यह उल्लेखनीय हैं कि अजय सिंह ने साफ शब्दों में भोपाल की स्वागत रैली में मंच से यह तक कह दिया था कि हम प्रदेश में कांग्रेस की सरकार तो बना लेंगें अगर हरवंश सिह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की मदद करना बंद कर दें। कुछ इंकाइयों का तो यह भी मानना हैं कि हरवंश सिंह ने अपना पद बचाने लिए जानबूझ कर कांग्रेस को हार के गर्त में गिराया हैं ताकि अजय सिंह और भूरिया उन पर स्तीफा देने के लिए कुछ कहने के लायक ही ना रह जाए और उनका पद बच जाए। हरवंश सिंह को चुनाव संचालक बनाने के फैसले को कुछ विश्लेषक आत्मघाती निर्णय मान रहें हैं। दिग्गी राजा से हरवंश सिंह की पिछली निकटता को आधार बनाकर प्रदेश के कुछ इंकाई क्षत्रप दिग्गी राजा पर आक्रमण करने की रणनीति बनाने में भी जुट गए हैं। वैसे पिछले दिनों कांग्रेस आला कमान द्वारा बनायी गईं तीन महत्वपूर्ण समितियोंमें हरवंश सिंह को शामिल ना किए जाने को लेकर भी तरह तरह की अटकलें जारी हैं जबकि उनसे कद में बौने कई इंका नेताओं को इनमें शामिल किया गया हैं।

गौरी ने कमाल दिखाना शुरू किया केवलारी में-केवलारी विस क्षेत्र के भाजपा के प्रभारी बनने के बाद प्रदेश के मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने अपने अंदाज में दौरे चालू कर दिए हैं। अपने कार्यक्रमों में वे ना केवल अधिकारियों को चमका रहें हैं वरन इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के समाने यह कहने से भी नहीं चूक रहें हैं कि यदि ठीक से काम नहीं करोगे तो तुम्हें कोई बचा भी नहीं पाएगा। मंच से हरवंश सिंह पर तीखे प्रहार करके भाजपा कार्यकत्ताZओं की तालियां बटोरने में भी कामयाब रहें हैं। हरवंश सिंह और और गौरीशंकर बिसेन की राजनैतिक शैली एक जैसी हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में यह चर्चा व्याप्त हैं कि इन दोनों हरफन मौला नेताओं के बीच हाने वाली पेंतरें बाजी ना केवल रोचक होगी वरन किस अंजाम पर पहुचेंगीर्षोर्षो इस पर कुछ भी कहना संभव नहीं हैं। ये दोनों ही नेता यह मानकर चलते हैं कि राजनीति में ना तो हमेश कोई दुश्मन होता है औ ना ही दोस्त। इसलिए कब कौन किस पर दवाब बना कर अपना उल्लू सीधा कर लेर्षोर्षो यह देखने योग्य दृश्य होगा।