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Monday, February 4, 2013


शिवराज की प्रशासनिक पकड़ ना होने से भ्रष्टाचार का चरम पर पहुंचना भाजपा को पड़ सकता है भारी?
भाजपा नेता लोगों को टका सा जवाब 
देते हैं कि अधिकारी सुनते ही नहीं
सिवनी । प्रदेश में भाजपा की सरकार बने 9 साल पूरे हो गये हैं। लेकिन सरकार की प्रशासनिक अमले पर पकड़ ना बन पाने के कारण आम जनता तो दूर भाजपायी तक त्रस्त हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की यह कमी भाजपा को भारी पड़ सकती हैं। 
प्रदेश में स्थापित 10 साल की कांग्रेस की दिग्गी सरकार को भाजपा की तेज तर्रार साध्वी उमा भारती ने उखाड़ फेंका था। उस वक्त भाजपा का यह नारा खूब लोकप्रिय हुआ था कि “सरकार तुम बदलो, व्यवस्था हम बदलेंगें“। प्रदेश के मतदाताओं ने सरकार तो बदल दी लेकिन भाजपा व्यवस्था अभी तक नहीं बदल पायी हैं।
प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उमा भारती तो कुछ समय ही बैठ पायीं। हुबली कांड़ के कारण उन्हें स्तीफा देना पड़ और उनकी जगह बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें भी गद्दी छोड़नी पड़ी और शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने और लगभग सात साल वे मुख्यमंत्री हैं। 
इस दौरान शिवराज द्वारा बनायी गयी लोक लुभावन योजनाओं के कारण उन्हें लोकप्रियता भले ही हासिल हो गयी हो लेकिन प्रशासनिक अमले पर अपनी पकड़ ना बना पाने के कारण आम आदमी त्रस्त हैं। 
आम आदमी त्रस्त होकर जब भाजपा के जनप्रतिनिधियों या नेताओं के पास निराकरण के लिये जाता हैं तो उन्हें एक टका सा जवाब मिल जाता हैं कि क्या करें अधिकारी कुछ सुन ही नहीं रहें हैं। प्रशासनिक अमले की इस निरंकुशता के चलते स्थानीय स्तर पर सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं का कोई नियंत्रण ही नहीं रह गया हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि प्रदेश स्तर पर भाजपा नेताओं द्वारा की गयी शिकायतें भी कारगर साबित नहीं हो पा रहीं हैं। बताया जाता है कि जिले के शीर्ष अधिकरियों के तार सीधे भोपाल से जुड़े होने के कारण वे किसी की परवाह ही नहीं करते हैं।
प्रदेश सरकार की प्रशासन पर पकड़ ना होने से आम आदमी के साथ साथ भाजपा के नेता और कार्यकर्त्ता भी त्रस्त हैं। इससे ना केवल भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है वरन लोक लुभावन योजनाओं का लाभ लेने के लियें भी लोगों को चढ़ोत्री चढ़ाना उनकी मजबूरी बन गयी हैं।
भाजपा के शासन काल के दौरान ही प्रदेश में अधिकारियो के यहां डाले गये लोकायुक्त या आयकर अधिकारियों के छापों में उनके यहां करोड़ों रुपयों की आय से अधिक संपत्ति पायी है। और तो और परिवहन विभाग के बाबू और नगर निगम के चपरासी तक केरोड़ों में खेलते पकड़े गये हैं। यह प्रदेश में निरंकुश भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि ही करती हैं।
इतना ही नहीं वरन प्रदेश के एक दर्जन से अधिक मंत्री लोकायुक्त की जांच के घेरे में हैं। बताया जाता है कि राजनैतिक दवाब के चलते अभी तक ये मामले अभी भी लंबित पड़े पड़े हैं। कई दर्जन अधिकारियों के खिलाफ लोकायुक्त की जांच पूरी हो हो गयी हैं और वे दोषी भी पाये गये हैं लेकिन प्रदेश सरकार की लोकायुक्त को अनुमति ना मिलने कारण मामले कोर्ट तक नहीं पहुंच पाये हैं। 
प्रदेश सरकार और उसके मुखिया शिवराज सिंह चौहान की यह कमजोरी आने वाले समय में भाजपा को भारी भी पड़ सकती हैं।    

कांग्रेसियों द्वारा कांग्रेसियों को हरा कर कांग्रेस को ही निपटा देने संबंधी हरवंश सिंह के बयान की जिले के राजनैतिक हल्कों में चर्चा
साल का वह एक दिन 30 जनवरी का होता था जब समूचा शहर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने श्रृद्धांजली अर्पित कर उन्हें नमन करता था। लेकिन अब 30 जनवरी को ना तो डिस्लरी का भैंपू सुनायी देता है और ना ही डालडा फेक्टरी का सायरन क्योंकि ये दोनों ही फेक्टरियां अब बंद हो चुकीं हैं। यह सच्चायी हमें यह सोचने को मजबूर कर देंती हैं कि हम अपने जिले के विकास के लिये कुछ नया लाना तो दूर पुराना भी सहेज कर नहीं रख पायें हैं। हम मतदाताओं का काम तो जनप्रतिनिधियों को चुनने का रहता हैं। हमारी समस्याओं को प्रदेश और केन्द्र सरकार तक पहुंचाना और उनका निराकरण कराना हमारे जनप्रतिनिधियों का काम होता हैं। जिले में कांग्रेस और भाजपा में कोई और समानता हो या ना हो लेकिन एक समानता जरूर दिखायी दे रही हैं कि दोनों ही पार्टियों में जब भी कोई समिति गठित होती है तो वह जम्बो जेट ही होती हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेस और भाजपा में किसकी जम्बो जेट फौज चुनाव की जंग जीतती हैं। हरवंश सिंह ने कहा है कि कांग्रेसियों द्वारा कांग्रेसियों को निपटाने के कारण आज कांग्रेस ही निपट गयी है। कहा जा रहा है कि उनके इस बयान की पुष्टि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भी यह कह कर दी हैं कि हरवंश सिंह ने क्या गलत कहा है। 
नया लाना तो दूर पुराना भी सहेजकर नहीं रख पाये हम-आज से कई बरस पहले साल में एक दिन सुबह 11 बजने के एक मिनिट पहले,11बजे और 11 बजकर दो मिनिट पर शहर की डिस्लरी का भौंपू सुनायी देता था। फिर इसमें डालडा फेक्टरी का सायरन भी शामिल हो गया था। साल का वह एक दिन 30 जनवरी का होता था जब समूचा शहर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपने श्रृद्धांजली अर्पित कर उन्हें नमन करता था। लेकिन अब 30 जनवरी को ना तो डिस्लरी का भौंपू सुनायी देता है और ना ही डालडा फेक्टरी का सायरन क्योंकि ये दोनों ही फेक्टरियां अब बंद हो चुकीं हैं। यह सच्चायी हमें यह सोचने को मजबूर कर देंती हैं कि हम अपने जिले के विकास के लिये कुछ नया लाना तो दूर पुराना भी सहेज कर नहीं रख पायें हैं। जिले के औद्योगिक विकास के इस पिछड़ेपन के लिये कौन दोषी है? इस पर जरूर विवाद हो सकता हैं। इसका दोष कांग्रेस भाजपा पर और भाजपा कांग्रेस पर मढ़ सकती हैं लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिये इसके ना सिर्फ कांग्रेस और भाजपा वरन हम सभी दोषी हैं। जिले के जनप्रतिनिधि यदि दोषी हैं तो हम सभी मतदाता भी इस बात के लिये बराबरी के दोषी हैं कि हम ऐसे नाकारा जनप्रतिनिधियों को बार बार चुनकर भेज देते हैं। जब बिना कुछ ही चुनाव जीते जा सकते हैं तो भला नेताओं को कुछ करने की जरूरत ही क्यों महसूस होगी? विकास के लिये आवश्यक बड़ी रेल लाइन आज भी विज्ञप्तियों और छोटे मोटे आंदोलनों तक ही सीमित रह गयी हैं तो उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बन रही फोर लेन का विवाद भी अभी तक सुलझा नहीं हैं। मामले चाहे प्रदेश सरकार के कारण लंबित हों या केन्द्र सरकार के इसके लिये क्या जिले के हमारे जनप्रतिनिधि दोषी नहीं हैं? हम मतदाताओं का काम तो जनप्रतिनिधियों को चुनने का रहता हैं। हमारी समस्याओं को प्रदेश और केन्द्र सरकार तक पहुंचाना और उनका निराकरण कराना हमारे जनप्रतिनिधियों का काम होता हैं। जबकि आज हमारे जिले का प्रतिनिधित्व तीन सांसद और चार विधायक कर रहें हैं। सन 2013 और 14 चुनावी साल हैं इसमें हमें हमारे जनप्रतिनिधियों से हिसाब लेना चाहिये नहीं तो चुनाव के समय फिर से एक बार गल्ती दोहरा कर हमें आने वाले पांच सालों तक एक बार फिर पछताने के अलावा कुछ हाथ नहीं आने वाला हैं। 
इंका और भाजपा में से किसकी जम्बो जेट फौज जीतेगी चुनावी जंग?-जिले में कांग्रेस और भाजपा में कोई और समानता हो या ना हो लेकिन एक समानता जरूर दिखायी दे रही हैं कि दोनों ही पार्टियों में जब भी कोई समिति गठित होती है तो वह जम्बो जेट ही होती हैं। इन दिनों जिले में भाजपा की मंड़ल समितियों की घोषणायें हो रही हैं। सभी समितियों में भारी भरकम मात्रा में कार्यकर्त्ताओं को पद देकर संतुष्ट किया जा रहा हैं। इसी तरह कांग्रेस में भी संगठन की मोर्चा समितियों सहित सभी में ढ़ेरों पदाधिकारी बना दिये गये थे। दोनों ही पार्टियों की यह कार्यवाही आने वाले विस और लोस चुनावों को ध्यान में रख कर की जा रही हैं। भाजपा में मंड़ल समितियों में अध्यक्ष के अलावा 6 उपाध्यक्ष,2 महामंत्री,6 मंत्री,1 कोषाध्यक्ष सहित 60 सदस्यों की समिति बन रहीं तो वहीं जिले में अध्यक्ष सहित 91 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति बनना है जिसमें 8 उपाध्यक्ष, 3 महामंत्री,8 मंत्री एवं 1 कोषाध्यक्ष की नियुक्ति होगी। जिले में भाजपा के 24 मंड़ल हैं। इनमें  1 हजार 4 सौ 40 कार्यकर्त्ताओं को पदों से नवाजा गया हैं। जिले में 91 इस तरह कुल 1 हजार 5 सौ 31 नेताओं को पदों पर बिठाया जा रहा हैं। इसी तरह कांग्रेस में भी जिले एवं ब्लाक की भारी भरकम समितियों के अलावा सेवादल,महिला कांग्रेस,युवक कांग्रेस एवं एन.एस.यू.आई में नेताओं को पदों पर बिठाया गया हैं। समितियों में संतुलन के नाम पर अभी भी नियुक्तियों का दौर चालू ही हैं। एक बात यह भी है कि इन दिनों कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही पार्टियों को प्रदेश और केन्द्र सरकार के खिलाफ जिले में आंदोलन करना पड़ता हैं। दोनों ही पार्टियों में आलम एक सा ही हैं। हजारों पदधिकारियों वाली भाजपा और कांग्रेस के आंदोलन के सैकड़ों लोग भी शिरकत नहीं करते हैं। और तो और अपनी अपनी पार्टी के महापुरुषों की जयंती और पुण्य तिथि के अवसर पर पार्टी कार्यालयों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में तो संख्या अगुलियों पर गिनने लायक ही रहती हैं। इस पर अंकुश ना तो जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर लगा पा रहें हैं और ना ही इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी। इससे क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता हैं कि पदाधिकारियों की लंबी फौज को अपने महापुरुषों और नेताओं के प्रति कोई श्रृद्धा नहीं हैं क्योंकि पार्टियों में उन्हें पद उनके आकाओं के रहमोकरम पर मिले हैं और उनकी इस लापरवाही से उनके आका जब नाराज नहीं होते हैं तो भला उनकी राजनैतिक सेहत पर क्या असर पड़ेगा? अब देखना यह है कि कांग्रेस और भाजपा में किसकी जम्बो जेट फौज चुनाव की जंग जीतती हैं।
कांग्रेसी ही कांग्रेस की हार का कारण सबंधी हरवंश का बयान चर्चित-प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह का पिपरिया में दिया गया एक बयान इन दिनों अखबारों की सुर्खियों में है। अपने बयान में हरवंश सिंह ने यह कहा था कि कांग्रेसियों द्वारा कांग्रेसियों को निपटाने के कारण आज कांग्रेस ही निपट गयी है। कहा जा रहा है कि उनके इस बयान की पुष्टि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भी यह कह कर दी हैं कि हरवंश सिंह ने क्या गलत कहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले दस सालों हरवंश सिंह जिले के इकलौते कांग्रेसी विधायक हैं। जिले से कांग्रेस की टिकिट पर चुनाव लड़कर लोकसभा,विधानसभा और नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव हारने वाले नेता भी उनके इस बयान को सही मानते है। फर्क सिर्फ इतना है कि हारने वाले नेताओं की अगुंलिया किसी और कांग्रेसी के बजाय उनकी ओर ही सालों से उठती रहीं हैं। इस जिले में एक विशेष बात यह और रही हैं कि बागी होकर या भीतरघात करके कांग्रेस को हराने वाले नेताओं को पुरुस्कृत भी किया जाता हैं। इस कारण अब जिले में कांग्रेस के यह हाल हो गये हैं कि स्थानीय निकायों में कांग्रेस का बहुमत होने के बाद भी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनने के लिये पार्टी के लोगों को ही पैसा देना पड़ता है जब उसे वोट मिलते हैं। इसीलिये जिले में कांग्रेस तो नेस्त नाबूत हो गयी है लेकिन धनबल और बाहुबल पर राजनीति करने वाले नेता ही सिरमौर हो गये हैं। “मुसाफिर“
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले
05 फरवरी 2013 से साभार

Saturday, January 26, 2013


स्थानीय पुलिस बल की मौजूदगी में केन्द्रीय गृह मंत्री शिंदे का पुतला जलाकर खूब आग तापी भाजपाइयों ने
बीते दिनों हुये सिवनी वृहत्ताकार सहकारी समिति के चुनाव में एक बार इंका और भाजपा के बीच सियासी नूरा कुश्ती सरे आम दिखायी दी। कांग्रेस के एक उप गुट ने भाजपा के एक गुट से तालमेल बिठाकर सदस्यों का चुनाव लड़ा। इसमें यह समझोता किया गया कि सहकारी बैंक का प्रतिनिधि एवं एक उपाध्यक्ष भाजपा काहोगा तथा समिति का अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष इंका का होगा। इंका और भाजपा की लाल बत्तियों से लेकर चिमनियों तक के बीच खेली जा रही नूरा कुश्ती के चलते आज यह कहना संभव नहीं हैं कि जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद पर किस पार्टी के किस गुट का नेता बन जायें। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पूरे देश में चौंकाने वाला साबित हुआ। प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समर्थक नरेश तोमर की ताजपोशी के बाद डॉ. बिसेन को राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में प्रस्तावक बनाया जाना भाजपायी हल्कों में खासा चर्चित हैं। जिला भाजपा ने अध्यक्ष नरेश दिवाकर के नेतृत्व में केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के विवादास्पद बयान को लेर धरना प्रदर्शन किया और यू.पी.ए. तथा शिंदें का पुतला दहन भी किया। उल्लेखनीय है कि शिंदे ने जयपुर में  यह कह दिया था कि संघ और भाजपा में भगवा आतंकवादी तैयार किये जाते हैं। स्थानीय पुलिस बल की भारी उपस्थिति में गांधी चौक में भाजपा के कार्यकर्त्ताओं ने केन्द्रीय गृह मंत्री शिंदे का पुतला जलाया और आराम से पूरा पुतला जलते तक भीषण ठंड़ के मौसम में खूब आग भी तापी।  
सहकारी समितियों के चुनेाव में भी चर्चित रही नूरा कुश्ती-बीते दिनों हुये सिवनी वृहत्ताकार सहकारी समिति के चुनाव में एक बार इंका और भाजपा के बीच सियासी नूरा कुश्ती सरे आम दिखायी दी। कांग्रेस के एक उप गुट ने भाजपा के एक गुट से तालमेल बिठाकर सदस्यों का चुनाव लड़ा। इसमें यह समझोता किया गया कि सहकारी बैंक का प्रतिनिधि एवं एक उपाध्यक्ष भाजपा काहोगा तथा समिति का अध्यक्ष एवं एक उपाध्यक्ष इंका का होगा। नूरा कुश्ती के इस समझोते के तहत लड़े गये चुनाव में इन्हें सफलता मिली और कांग्रस के शिव सनोड़िया अध्यक्ष एवं भाजपा के सहकारी क्षेत्र के एक पुरोधा विजय सिंह बघेल बैंक प्रतिनिधि चुन लिये गये। वैसे तो कांग्रेसी यह दावा कर रहें है कि उन्हें 75 प्रतिशत समितियों में सफलता मिल गयी हैं। यदि इसमें कांग्रेस के बैंक प्रतिनिधि और अध्यक्ष चुने गये हैं तो यह माना जाना चाहिये कि जिलासहकारी बैंक के अधिकांश संचालक कांग्रेस के चुन जायेंगेंऔर बैंक पर कांग्रेस का कब्जा हो जायेगा। लेकिन यदि सिवनी सह. समिति की तर्ज पर चुनाव हुये है तो यह दावा अंत में खोखला भी साबित हो सकता हैं। वैसे वर्तमान में भाजपा के अशोक टेकाम बैंक के अध्यक्ष हैं और वे पूरी ताकत से दोबारा अध्यक्ष बनने की जुगत जमा रहें हैं लेकिन भाजपा के अलग अलग गुट अपने पाले में अध्यक्ष पद लाने की जुगाड़ जमा रहें हैं। इस गुटबाजी के चलते कौन सा गंट कांग्रेस के हाथ मिलाकर संचालक के चुनावों में कौन सा खेल खेल जाये? इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह के कयासे लगाये जा रहे हैं। वैसे सिवनी सहकारी समिति के शपथ ग्रहण समारोह मेें विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ने मंड़ी और इन चुनावों में मिली सफलता के जिला इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी की रणनीति की तारीफ की हैं। दूसरी तरफ मंड़ी चुनावों में मिली हार के कारण जिला भाजपा अध्यक्ष एवं मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर भी यह कोशिश कर रहें हैं कि येन केन प्रकारेण ना केवल भाजपा का वरन उनके अपने गुट का  भाजपा नेता बैंक का अध्यक्ष बन जाये। इंका और भाजपा की लाल बत्तियों से लेकर चिमनियों तक के बीच खेली जा रही नूरा कुश्ती के चलते आज यह कहना संभव नहीं हैं कि जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद पर किस पार्टी के किस गुट का नेता बन जायें। आज आलम यह हैं कि अपने हितों के सामने इस जिले के इंका और भाजपा नेताओं के लिये पार्टी हितों की बलि चढ़ा देना कोई अनहोनी बात नहीं रह गयी हैं। 
राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रस्तावक बनने से कद बढ़ा डॉ. बिसेन का-भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पूरे देश में चौंकाने वाला साबित हुआ। आर.एस.एस. की सहमति से वर्तमान अध्यक्ष नितिन गडकरी का दोबार अध्यक्ष चुना जाना लगभग निश्चित था। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बाद भी संघ ने गडकरी को हरी झंड़ी दे दी थी लेकिन भाजपा की आपसी घमासान और एक दिन पहले गडकरी के ठिकानों पर डले आयकर विभाग के छापों ने सारे पासें एक बार में ही पलट का रख दिये। रातों रात सारा खेल बदल गया और पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह की एक बार फिर से ताजपोशी हो गयी। जितना राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव चर्चित रहा उससे कम जिले में भी यह चर्चित नहीं रहा। इसका प्रमुख कारण यह था कि प्रदेश से अध्यक्ष पद के लिये प्रस्तावकों की सूची में जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को शामिल किया गया था। प्रदेश भाजपा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के समर्थक नरेश तोमर की ताजपोशी के बाद डॉ. बिसेन को राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में प्रस्तावक बनाया जाना भाजपायी हल्कों में खासा चर्चित हैं। ऐसा माना जा रहा है कि डॉ. बिसेन की इस उपलब्धि से जिले की  भाजपा में उनका कद और अधिक बढ़ जायेगा। उल्ललेखनीय है कि डसॅ. बिसेन बरघाट विस से चार बार विधायक रहें हैं इस दौरान वे विधानसभा में भाजपा विधायक दल के सचेतक एवं 2003 से 2008 के बीच प्रदेश के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रह चुके हैं। प्रदेश भाजपा से वे राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी रहें हैं। 
पुलिस बल की मौजूदगी में देश के गृह मंत्री शिंदे का पुतला फूंका भाजपाइनेयों -जिला भाजपा ने अध्यक्ष नरेश दिवाकर के नेतृत्व में केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के विवादास्पद बयान को लेर धरना प्रदर्शन किया और यू.पी.ए. तथा शिंदें का पुतला दहन भी किया। उल्लेखनीय है कि शिंदे ने जयपुर में  यह कह दिया था कि संघ और भाजपा में भगवा आतंकवादी तैयार किये जाते हैं। राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय भाजपा के अध्यक्ष बनने के तत्काल बाद ही इसके विरोध का राष्ट्र व्यापी आव्हान किया था। इसकी के तहत जिला मंख्यालय में यह आयोजन किया था। इस धरने को भाजपा के कई नेताओं ने संबोधित किया और केन्द्र सरकार और सोनिया गांधी पर निशाने साधे। भाजपा नेताओं ने महामहिम राष्ट्रपति महोदय से गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को बर्खास्त करने की भी मांग की हैं। स्थानीय पुलिस बल की भारी उपस्थिति में गांधी चौक में भाजपा के कार्यकर्त्ताओं ने केन्द्रीय गृह मंत्री शिंदे का पुतला जलाया और आराम से पूरा पुतला जलते तक भीषण ठंड़ के मौसम में खूब आग भी तापी। वैसे तो उपस्थिति के हिसाब से यह धरना सिर्फ औपचारिक ही कहा जा सकता है लेकिल भारी ठंड़ और बारिश तथा बदली के बीच संपन्न इस आयोजन  में भाजपा नेताओं के तेवर काफी आग उगलने वाले थे। वैसे तो महात्मा गांधी की हत्या के बाद से ही संघ विवादों के घेरे में रहा हैं तथा उसे अपने आप को हिन्दूवादी संगठन कहने में कभी कोई संकोच भी नहीं रहा हैं। लेकिन केन्द्र सरकार के गृह मंत्री के बयान ने उन्हें और भाजपा को आक्रमक होने का एक मौका दे दिया और मिशन 2013 और मिशन 2014 में जुटी भाजपा ने इसका पूरा पूरा फायदा उठानें में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। सभा स्थल पर मौजूद एक आम आदमी यह टिप्पणी बहुत अधिक सटीक थी कि वैसे तो राजनीति में सारे नेता सब कुछ करते औा कहते हैं लेकिन राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुये ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिये जिससे पड़ोसी देश की सीमाओं पर सेनिकों के साथ हाने वाले अत्याचार और अधिक बढ़ जाये। बात भले ही कुछ अटपटी लगे लेकिन यह आम आदमियों की नेताओं के बारे में बनी सोच को जरूर उजागर करती हैं। “मुसाफिर“
दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
 26 जनवरी 2013 से साभार      

Thursday, January 24, 2013


गण और तंत्र देश हित को सर्वोपरि माने तभी सार्थकता 
15 अगस्त 1947 को देश गुलामी की जंजीरों से आजाद हुआ था। 26 जनवरी 1950 को देश ने अपने संविधान को अंगीकार कर एक विशाल गणतांत्रिक देश के रूप में अपनी पहचान बनायी ।आज हम गणतंत्र दिवस की 63 वीं सालगिरह मना रहें हैं। इन सालों में एक सवाल हमारे सामने जरूर आया है कि आखिर हमारे देश में गण के लिये तंत्र है या तंत्र के लिये गण ? यह सवाल क्यों आज हमारे सामने आया इसके लिये कमोबेश गण और तंत्र दोनों ही अपनी जवाबदारी  से मुकर नहीं सकते हैं। संविधान बनाने वालों की धारणा थी कि गण देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को बखूबी निभाये और तंत्र निष्पक्ष और निर्भीक होकर गण की सेवा करें। संविधान में गण याने आम आदमी को मताधिकार देकर सबसे अहम जवाबदारी डाली थी कि वो अच्छी जन प्रतिनिधियों को चुनकर देश को दे। क्या हम आज यह कह सकते हैं कि गण अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से कर रहें है? क्या चुनावी राजनीति में सदगुणों और बुद्धिबल पर धनबल और बाहुबल हावी नहीं हो गया है?यदि इन आधारों पर जन प्रतिनिधियों का निर्वाचन होगा तो फिर प्रजातांत्रिक मूल्यों में गिरावट तो आयेगी ही जिसके परिणाम अंततः हमें भोगने पड़ेंगें।
गण जब तंत्र चलाने के लिये अच्छे एवं गुणवान जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं देंगें तो भला तंत्र को नियंत्रित करने का अधिकार रखने वाली सरकार अच्छी कैसे बन पायेगी? राजनैतिक दल भी सिद्धान्तों और नीतियों को दर किनार करके महज सत्ता पाने के लक्ष्य को लेकर गठबंधन करते दिखायी दे रहें है। समाज के हर क्षेत्र में राजनीति के हावी हो जाने के कारण प्रशासनिक तंत्र में भी राजनैतिक हस्तक्षेप इतना अधिक बढ़ गया है कि नैतिक अनैतिक के बीच की विभाजन रेखा ही कहीं गुम हो गयी हैं। महज वोट हासिल करने की खातिर सर्व धर्म समभाव की भावना कहीं गुम होते दिखायी दे रही हैं।
गणतंत्र दिवस की 63 वीं वर्षगांठ पर आज इन सवालों के जवाब तलाशना समय की मांग बन गयी हैं। ऐसा भी नहीं है कि आजादी के बाद देश में कुछ विकास हुआ ही नहीं हैं। हां इस बात पर विवाद जरूर हो सकता हैं कि जितना विकास होना था उतना शायद ना हुआ हो। आज यह वक्त का तकाजा हैं कि गण सिर्फ यह ना सोचे कि देश हमें क्या दे रहा है वरन वे ये भी सोचें कि वे देश को क्या दे रहें ? इसके साथ ही चुनाव की प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में जो विकृतियां आ गयी हैं और धनबल और बाहुबल का जो बोलबाला हो गया हैं उसे रोकने के उपाय किये जायें। प्रशासनिक तंत्र को भी अपने मात्र हितों के लिये राजनैतिक हस्तक्षेप को नकार कर निष्पक्ष और निर्भीक बनना समय की मांग हैं। देश में ना सिर्फ गण के लिये तंत्र या तंत्र के लिये गण हो वरन गण और तंत्र आपसी तालमेल से देश हित को सर्वोपरि मान कर देश की पताका पूरी दुनिया में शान के साथ फहरायें, यही गणतंत्र दिवस पर हमारी हार्दिक शुभकामनायें हैं।      

Monday, December 10, 2012


संजय और भोजराज द्वारा श्रेय लेने के प्रयास को वीरेन्द्र ने थोथी वाहवाही बटोरने और प्रेस को गुमराह करने वाली कार्यवाही बताया
फोर लेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था। यह एक गैर राजनैतिक या यू कहें कि सर्वदलीय मंच बनाया गया था। लेकिन इसके कर्त्ता धर्ता बने लोगों ने इस अपनी राजनीति करने का जब मंच बना लिया गया तो धीरे धीरे इससे लोग कटने लगे। इस मंच को कुछ स्वय भू नेताओं कुछ नेताओं की आलोचना करने का मंच बना लिया।फोर लेन के मुद्दे पर मिली सफलता को अपनी निजी सफलता मान लिया और इसके संयोजक संजय तिवारी ने नपा अध्यक्ष का चुनाव लड़कर इसे राजनैतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर डाली। जिसका जनता जनार्दन ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया। जनमंच के बचे खुचे कुछ नेताओं ने एक काम और शुरू कर दिया कहीं कुछ भी हो उस पर मेड बाय जनमंच की सील लगानी चालू कर दिया। जिले में मंड़ी चुनावों का पहला चरण समाप्त हो गया हैं। नाम वापसी के बाद इंका और भाजपा अध्यक्षों ने पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी हैं। मंड़ी चुनावों की शुरुआत से ही सियासी हलकों में यह सुगबुगाहट चल रही थी कि नूरा कुश्ती में पारंगत इंका और भाजपा नेता अपनी अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुरूप आपस में मंड़ियों का बटवारा ना कर लें। केवलारी मंड़ी में हुये इस निर्विरोध निर्वाचन को राजनैतिक विश्लेषक इसी चश्में से देख रहें हैं। शासकीय वाहन में उल्टा तिरंगा झंड़ा लगने के समाचार बीत दिनों अखबारों की सुर्खियों में रहे। वाकया केवलारी विस क्षेत्र के छपारा में आयोजित जन सूचना अभियान मेले का हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विस उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय इंका विधायक ठाकुर हरवंश सिंह थे।  

जनमंची नेता श्रेय बटोरने के आरोप के घेरे में-फोर लेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था। यह एक गैर राजनैतिक या यू कहें कि सर्वदलीय मंच बनाया गया था। लेकिन इसके कर्त्ता धर्ता बने लोगों ने इस अपनी राजनीति करने का जब मंच बना लिया गया तो धीरे धीरे इससे लोग कटने लगे। इस मंच को कुछ स्वय भू नेताओं कुछ नेताओं की आलोचना करने का मंच बना लिया। इस जनमंच को फोर लेन के मुद्दे पर मिली सफलता को अपनी निजी सफलता मान लिया और इसके संयोजक संजय तिवारी ने नपा अध्यक्ष का चुनाव लड़कर इसे राजनैतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर डाली। जिसका जनता जनार्दन ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया। जनमंच के बचे खुचे कुछ नेताओं ने एक काम और शुरू कर दिया कहीं कुछ भी हो उस पर मेड बाय जनमंच की सील लगानी चालू कर दिया। सड़क पर होने वाले प्रर्दशनों में मना बुझा कर सबको बुलाना और फिर कोई श्रेय लेने की बात हो तो सबको दर किनार कर एक पर एक दो लोगों द्वारा उसे बटोरना इन नेताओं की आदत सी बन गयी थी। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों हुआ। सिवनी बाय पास से खवासा तक की फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी के खिलाफ इतने साल बाद हुये 12 करोड़ 94 लाख रु. के जुर्माने के बाद जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने ने हॉटल बाहुबली में एक प्रेस कांफ्रेस लेकर इसे खुद की जीत बताया और अखबारों में सुर्खियां बटोरी थीं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है किसदभाव कंपनी ने सन 2008 से अपना काम चालू किया था और यह अवैध उत्खनन का काम उसी दौरान किया गया था। यहो यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इसी दौरान जनमंच और उसका आंदोलन भी पूरे शवाब में था तब जनमंच की कमान संभाहने वाले इन्हीं नेताओं ने सदभाव कंपनी की इस काली करतूत की अनदेखी क्यों की थी? यह सवाल आज जनता के बीच उठाया जा रहा हैं। जनमंच की इस पत्रकार वार्ता के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेन्द्र सोनकेशरिया ने बाकायदा एक प्रेस नोट जारी करके इस बात का खुलासा किया कि उनने जनवरी 2011 में हाई कोर्ट में सदभाव की इस काली करतूत के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी और माननीय न्यायालय के आदेश पर जिला कलेक्टर ने एक जांच समिति गठित की थी जिसकी अनुशंसा पर खनिज विभाग द्वारा सदभाव कंपनी पर 12 करोड़ 94 लाख रु. का जुर्माना किया गया जिसके लिये वसूली अधिकारी एस.डी.एम. सिवनी को बनाया गया था। लेकिन उन्होंने पूरी गुण दोष के आधार पर पूरी सुनवायी करके जुर्माने को ही शून्य घाषित कर दिया था। इसकी पुनः शिकायत करने की बात का खुलासा करते हुये सोनकेशरिया ने बताया कि इसके बाद एक बार फिर कंपनी पर जुर्माने के आदेश हुये। इस आदेश के बाद जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने द्वारा पत्रकार वार्ता लेकर श्रेय लेने की कार्यवाही को एडवोकेट सोनकेशरिया ने थोथी वाहवाही बटोरने और प्रेस को गुमराह करने वाली कार्यवाही बताया हैं। वीरेन्द्र ने यह भी उल्लेख किया है कि 2009 में सिर्फ फोरलेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था लेकिन अब ऐसा लगता है कि जनमंच अब बाधाओं को दूर करने के बजाय थोथी वाहवाही लूटने की जुगत में लगा रहता हैं। इस तरह के कारनामे देखकर जिले की उस जनता को घोर निराश हाथ लगी है जिसने जनमंच के फोर लेन के आंदोलन में गैर राजनैतिक मंच समझकर उसे अपना समर्थन दिया था वरना जिले के भाजपायी और इंकाई जन प्रतिनिधियों का आपसी सौदेबाजी से तो वो वैसे ही निराश हो चुकी थी।
मंड़ी चुनाव में जोड़ तोड़ शुरू-जिले में मंड़ी चुनावों का पहला चरण समाप्त हो गया हैं। नाम वापसी के बाद इंका और भाजपा अध्यक्षों ने पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी हैं। भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने अपना चुनाव अभियान भी चालू कर दिया हैं। कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई पहल अभी तक दिखी नहीं हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह के निर्वाचन क्षेत्र केवलारी मंड़ी में दो कृषक वार्डों से निर्विरोध निर्वाचन के समाचार अखबारों की सुर्खी भी बने हैं। इनमें एक वार्ड से भाजपा तथा दूसरे वार्ड से इंका के कद्दावर नेता भोयाराम चौधरी निर्वाचित हो गये हैं। अखबारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भोयाराम केवलारी जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष रहें हैं और उपाध्यक्ष रहते हुये ही उन्होंने 1198 में बरघाट विस क्षेत्र से पहले बागी होकर और फिर 2003 में इंका प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। मंड़ी चुनावों की शुरुआत से ही सियासी हलकों में यह सुगबुगाहट चल रही थी कि नूरा कुश्ती में पारंगत इंका और भाजपा नेता अपनी अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुरूप आपस में मंड़ियों का बटवारा ना कर लें। केवलारी मंड़ी में हुये इस निर्विरोध निर्वाचन को राजनैतिक विश्लेषक इसी चश्में से देख रहें हैं।  अब कौतूहल इसबात को लेकर मचा हुआ हैं कि महाराष्ट्र सीमा वाली महत्वपूर्ण सिवनी मंड़ी के मामले में नूरा कुश्ती विशेषज्ञ कैसा बंटवारा करते हैं? यह किसी एक खाते में पूरी पूरी जायेगी या फिर इसका आधा आधा बटवारा हो जायेगा। जिले की शेंष मंड़ियों में देसरा महत्वपूर्ण स्थान राजनैतिक रूप से केवलारी मंड़ी का हैं क्योंकि वह हरवंश सिंह के क्षेत्र में आती हैं। इस पर कांग्रेस का कब्जा होना बति आवयक माना जा रहा हैं। वैसे पहले तो सिवनी और केवलारी दोनों ही प्रमुख मंड़ियों पर कांग्रेस का ही कब्जा था लेकिन अब आने वाले चुनाव परिणामों पर सभी निगाहें इस लिये भी लगी हुयीं है क्योंकि नरेश दिवाकर द्वारा जिला भाजपा अध्यक्ष का दायित्व संभाहलने के बाद जिले में यह पहला चुनाव हैं।
विस उपाध्यक्ष की गाड़ी में उल्टा झंड़ा चर्चित?-शासकीय वाहन में उल्टा तिरंगा झंड़ा लगने के समाचार बीत दिनों अखबारों की सुर्खियों में रहे। वाकया केवलारी विस क्षेत्र के छपारा में आयोजित जन सूचना अभियान मेले का हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विस उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय इंका विधायक ठाकुर हरवंश सिंह थे। वाहन पर सवार होकर हरवंश सिंह समारोह स्थल तक पहुच गये लेकिन तब तक किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया कि गाड़ी में उल्टा राष्ट्र ध्वज फहरा रहा हैं। जब लोगों में इसकी चर्चा हुयी तो तो इसे सीधा किया गया। इस बाबद जब विस उपाध्यक्ष से प्रेस ने पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें सिवनी से प्रशासन ने गाड़ी उपलब्ध करायी थी और शायद ड्रायवर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया होगा। लिा भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने कहा कि राष्ट्र ध्वज का अपमान करने वाले के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये। उन्होंने यह कहने में संकोच बरता कि राष्ट्र ध्वज का अपमान किसने किया। भाजपा ने इस मामले में पुलिस रिपोर्ट कराने से भी परहेज किया। प्रशासन शायद ही अपनी ओर से इस मामले में कोई पहल करें क्योंकि गाड़ी झंड़े सहित उसी के द्वारा उपलब्ध करायी गयी थी। ऐसा लगता है कि जिले में हुये राष्ट्र ध्वज के अपमान का यह गंभीर मामला सिर्फ अखबारों में ही सिमट कर रह जायेगा। “मुसाफिर“  

Monday, December 3, 2012


शहीदों के सम्मान में भी जिला प्रमुखों और राजनेताओं की उपेक्षा एवं राजनीति उचित नहीं कही जा सकती
आजादी के बाद 16 जनवरी 2001 को जिले की वीर आदिवासी बाला बिंदु कुमरे श्रीनगर एयर पोर्ट पर लश्कर-ए-तोएबा की गोली से शहीद हो गयीं थीं। इसके बाद जिले की माटी के ही सपूत धंसौर विकास खंड़ के गा्रम भिलाई  के प्रवीण राजपूत ने श्रीनगर में ही 27 नवम्बर 2012 को आतंकवादी हमले में देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर दी। दोनों अमर शहीदों के पार्थिव शरीर जिले में लाये गये और उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तो किया गया लेकिन जिस तरह से जिला प्रमुखों और राजनेताओं द्वारा व्यवहार किया गया वह उचित तो नहीं ही कहा जा सकता। वैसे तो जिले से होकर गुजरने वाल उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बनने वाल फोर लेन रोड़ को लेकर बहुत से आंदोलन हुये। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ा गया। लेकिन बाद में ऐसे आंदोलन अपने रास्ते से भटकने लगे। अब प्रगतिशील विकासमोर्चे के बैनर पर गैर भाजपायी और गैर इंकाई नेताओं ने इसे लेकर एक बार फिर आंदोलन चालू किया हैं। वैसे प्रदेश की शिवराज सरकार ने अध्यक्ष बाद का सीधे मतदाताओं से होने वाले चुनाव को सदस्यों के माध्यम से कराने का फैसला लेकर किसानों की सीधी पसंद और नापसंद को नकार कर चुनाव मेनेजमेंट में माहिर नेताओं को अपने अपने करतब दिखाने और चुनावी साल में अपने नाम का डंका बजवाने का सुनहरा मौका दे दिया हैं।
शहीदों के सम्मान में जिला प्रमुखों एवं राजनेताओं ने दिखायी लापरवाही-आजादी की लड़ाई में जिले की तीन आदिवासी महिलाओं और एक पुरुष ने टुरिया में अंग्रेजों की गोलियां सीने पर झेल कर देश के लिये अपनी शहादत दी थी। आजादी के बाद 16 जनवरी 2001 को जिले की वीर आदिवासी बाला बिंदु कुमरे श्रीनगर एयर पोर्ट पर लश्कर-ए-तोएबा की गोली से शहीद हो गयीं थीं। इसके बाद जिले की माटी के ही सपूत धंसौर विकास खंड़ के गा्रम भिलाई  के प्रवीण राजपूत ने श्रीनगर में ही 27 नवम्बर 2012 को आतंकवादी हमले में देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर दी। दोनों अमर शहीदों के पार्थिव शरीर जिले में लाये गये और उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तो किया गया लेकिन जिस तरह से राजनेताओं द्वारा व्यवहार किया गया वह उचित तो नहीं ही कहा जा सकता। बिन्दु कुमरे के वक्त तत्कालीन प्रभारी मंत्री डोमन सिंह नगपुरे ने आना जरूरी नहीं समझा तो प्रवीण राजपूत के वक्त प्रभारी मंत्री नाना भाऊ ने आना जरूरी नहीं समझा। बिन्दु कुमरे का पार्थिव शरीर जब सिवनी आ रहा था तब तत्कालीन वन मंत्री हाकी टूर्नामेंट के फायनल में मुख्य अतिथि के रूप से हेलीकाप्टर से सिवनी आये थे और बाजे गाजे और आतिशबाजी के साथ अपना स्वागत करा रहें थे। शहीद प्रवीण के समय भी हरवंश सिंह समय पर सिवनी में नहीं पहुचें और बरघाट नाके में उन्होंने श्रृद्धांजली अर्पित की। दोनों की शहीदों के अंतिम संस्कार में हरवंश सिंह ने शामिल होना उचित नहीं समझा। जिा भाजपा के अध्यक्ष और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने भी जिले की सीमा पर खवासा जाना जरूरी नहीं समझा और परिसीमन के बाद की सिवनी विस की सीमा गोपालगंज में श्रृद्धांजली अर्पित की। जिले के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी कलेक्टर और एस.पी. ने तो सिवनी शहर में ही श्रृद्धांजली अर्पित की और अंतिम संस्कार में भी नहीं गये। हालांकि उनके प्रतिनिधि अंतिम संस्कार में उपस्थित थे। जिस सिवनी जिले का इतिहास आजादी की लड़ाई में शहादत देने का रहा हैं। जिले में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहें हैं। आजादी के दौरान जिस जिले के जेल में देश के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुभाष चंद्र बोस, पीर पगारो,पंड़ित रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे लोग रखे गये हों उसी जिले को आज ना जाने क्या हो गया है कि जिले के प्रशासनिक और राजनैति क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो गये कि देश के लिये अपनी जान न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों के लिये एक दिन का वक्त भी नहीं निकाल पा रहें हैं।
फोर लेन के लिये प्रगतिशील विकास मोर्चे का आंदोलन प्रारंभ-वैसे तो जिले से होकर गुजरने वाल उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बनने वाल फोर लेन रोड़ को लेकर बहुत से आंदोलन हुये। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ा गया। लेकिन बाद में ऐसे आंदोलन अपने रास्ते से भटकने लगे। कभी किसी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के कारण तो कभी सड़क के गड्ढे भरने में उलझा दिया गया तो कभी पुरानी सड़क को ही सुधारने की बात की जाने लगी तो कभी बनाने वालों को टारगेट बनाया जाने लगा। इसी कारण फोर लेन का प्रमुख मुद्दा दर किनार होता गया और गैर राजनैतिक आंदोलन में राजनीति ही राजनीति दिखने लगी इसी कारण धीरे धीरे जनता भी इससे दूर होती गयी।अब प्रगतिशील विकासमोर्चे के बैनर पर गैर भाजपायी और गैर इंकाई नेताओं ने इसे लेकर एक बार फिर आंदोलन चालू किया हैं। 1 दिसम्बर से काला पखवाड़ा मनाने की शुरुआत की गयी हैं।इसके तहत सिवनी शहर और खवासा तक जाने वाले वाहनों में प्रतीकात्मक रूप से काला फीता बांधा जायेगा तथ नुक्कड़ सभाओं के द्वारा कुछ कांग्रेसी और भाजपायी जनप्रतिनिधियों की सांठ गांठ का खुलासा किया जायेगा। मोर्चे के कामरेड हजारी लाल हेडाऊ और याहया कुरैशी ने यह जानकारी भी प्रेस को दी हैं कि आंदोलन आगे भी जारी रहेगा। नेताओं की पोल खोलना तो उनका अधिकार है लेकिन आंदोलन संचालित करने वालों को इस बात के प्रति भी सचेत रहना होगा कि आंदोलन कहीं सिर्फ पोल खोलने तक ही सीमित होकर ना रह जाये। मूल उद्देश्य तो फोर लेन बनवाने का हैं और वर्तमान में यह मामला राज्य वन्य प्राणी बोर्ड की अनुशंसा के साथ राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड में अंतिम स्वीकृति के लिये लंबित पड़ा हैं। इसके लिये या तो किसी सांसद के माध्यम से संसद में या फिर दिल्ली में अपने राष्ट्रीय नेताओं से दवाब बनवाना होगा। इससे मामला जल्दी सुलझ सकता हैं। अन्यथा यह आंदोलन भी अन्य आंदोलनों की भांति ही धीरे धीरे वीर गति को प्राप्त हो जायेगा। 
मंड़ी चुनाव की धूम हुयी शुरु-समूचे जिले में मंड़ी चुनावों की गहमा गहमी तेज हो गयी हैं। नाम वापसी के बाद अब शायद कांग्रेस और भाजपा अपने समर्थित उम्मीदवारों के नामों की सूची भी जारी करें। इसके बाद सभी रणबांकुरे मैदान में अपनी रसद के साथ जुट जायेंगें। वैसे प्रदेश की शिवराज सरकार ने अध्यक्ष बाद का सीधे मतदाताओं से होने वाले चुनाव को सदस्यों के माध्यम से कराने का फैसला लेकर किसानों की सीधी पसंद और नापसंद को नकार कर चुनाव मेनेजमेंट में माहिर नेताओं को अपने अपने करतब दिखाने और चुनावी साल में अपने नाम का डंका बजवाने का सुनहरा मौका दे दिया हैं। ऐसे हालात में अक्सर यह देखा गया है कि दलीय समर्थन की सूची वालों के जीतने या हारने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि चुनाव मेनेजमेंट के फंडें में माहिर नेताओं का यह मानना रहता है कि जो जीता उसे अपना माने और जो हार गया उसे अपना होने के बाद भी भूल जाओ तभी अपनी महारत बनी रह सकती हैं। इसका उदाहरण जिला पंचायत उपाध्यक्ष के चुनाव में देखा भी गया है कि कांग्रेस के समर्थित उम्मीदवार सुधीर जैन को इंका विधायक हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में ही हरा कर जीतने वाले अनिल चौरसिया आज कांग्रेस के बैनर तले ही जीत कर उपाध्यक्ष बन गये हैं। अब देखना यह है कि जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर और इंकार अध्यक्ष हीरा आसवानी अपने समर्थित उम्मीदवारों की सूची बक जारी करते है और उन्हें जिताने के लिये कितने प्रयास करते है? या फिर जो जीता वो ही सिकंदर की तर्ज पर अपनी बिसात बिछाने की रएानीति बनाते हैं। वैसे तो प्रदेश सरकार ने किसानों में व्याप्त असंतोष को देखते हुये लंबे समय तक इन चुनावों को टाला लेकिन अब मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ये चुनाव हो रहें हैं इसका कांग्रेस कितना लाभ ले पाती है और नव नियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर अपना कितना करतब दिखा पाते हैं? इसका खुलासा तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही होगा। “मुसाफिर“     

Monday, November 26, 2012


किंग मेकर बनने की हेट्रिक बनाने की चाहत पड़ी मंहगी नरेश को स्वयं ही बनना पड़ा जिला भाजपा का किंग
 किंगमेकर इज बेटर देन किंग “ लेकिन बार बार यदि यही प्रयोग दोहराने को प्रयास किया जाये तो खेल बिगड़ भी जाता हैं। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों जिला भाजपा के चुनाव के दौरान देखने को मिला। किंग मेकर बनने की हेट्रिक बनाने के चक्कर में किंग मेकर को खुद ही किंग बनना पड़ गया। अब किंग मेकर से किंग बने नरेश दिवाकर, जो कि प्रदेश सरकार द्वारा महाकौशल विकास प्राधिकरण के केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष है, अपनी इस नयी ताजपोशी को किस रूप में लेते हैं? इसका खुलासा तो वक्त आने पर ही होगा। इन दिनों जिले में मंड़ी चुनावों को लेकर राजनैतिक हल चल मची हुयी हैं। इंका और भाजपा दोनों ही पार्टियां अपने अपने तरीके से जीत की बिसात बिछाने में लगी हुयी हैं। पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के कार्यकाल में हुये लखनादौन नपं के चुनाव में भाजपा की हुयी करारी हार का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और पूरी संभावनाओं के बाद भी वे दोबारा अध्यक्ष नहीं पाये। चुनाव नजदीक आने की संभावनाओं को देखते हुये जिले में भी तीसरे मोर्चे के गठन पर प्रयास प्रारंभ हो गये हैं। युवा सपा नेता एवं एडवोकेट याहया कुरैशी की पहल पर मिशन प्रारंभ हुआ हैं। इसमें वाम दलों सहित नागरिक मोर्चे के भी शामिल होने की संभावना हैं। 
हेट्रिक बनाने की कोशिश आखिर पड़ी महंगी-एक कहावत राजनीति के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रचलित हैं।     “ किंगमेकर इज बेटर देन किंग “ लेकिन बार बार यदि यही प्रयोग दोहराने को प्रयास किया जाये तो खेल बिगड़ भी जाता हैं। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों जिला भाजपा के चुनाव के दौरान देखने को मिला। किंग मेकर बनने की हेट्रिक बनाने के चक्कर में किंग मेकर को खुद ही किंग बनना पड़ गया। जी हां हम बात कर रहें हैं नवनियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर की। यह तो सर्वविदित ही है कि पिछले दो बार से नरेश दिवाकर किंग मेकर बने हुये थे। पहले उन्होंने सुदर्शन बाझल को जिला भाजपा का अध्यक्ष बनवाया और फिर सुजीत जैन को। लगातार दोनों ही बार जब उनका यह खेल सफल रहा तो फिर उनके मन में हेट्रिक बनाने की मंशा जाग गयी। इसके लिये उन्होंने बिसात भी बहुत ही सोच समझ कर बिछायी थी। इस हेतु दिवाकर ने जातिगत और क्षेत्रीय आधार पर अपने प्रत्याशी तैयार किये थे। इस पद के लिये भाजपा में 12 उम्मीदवारों के नाम सामने आये थे। इनमें सुजीत जैन,सुदर्शन बाझल, अशोक टेकाम,अजय त्रिवेदी,गोमती ठाकुर,देवी सिंह बघेल,राजेन्द्र सिंह बघेल,वेद सिंह ठाकुर,सुदामा गुप्ता,भुवन अवधिया,संतोष अग्रवाल और ज्ञानचंद सनोड़िया के नाम प्रमुख थे। इनमें से प्रथम सात नेताओं को नरेश समर्थक माना जाता हें। इनमें ब्राम्हण, आदिवासी, पंवार,बागरी और जैन समाज के नाम थे जो कि जिले के अलग अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन इस बार प्रदेश आला कमान का यह स्पष्ट निर्देश था कि चुनावी साल होने के कारण वोटिंग नहीं होना चाहिये। चुनाव के एक दिन पहले से जब आम सहमति बनाने की कवायत चालू हुयी तो यह समझ में आ गया था कि अधिकांश दावेदार नरेश दिवाकर के ही हैं। इसी बीच जिले के एक जनप्रतिनिधि ने, जिसका सीधे प्रदेश संगठन में दखल है, ने प्रदेश नेतृत्व को इस बात से अवगत करा दिया कि अधिकांश दावेदार तो भले ही नरेश दिवाकर के समर्थक हैं लेकिन अब उनके ही बीच में आम सहमति बना पाना नरेश के लिये ही संभव नहीं रह गया हैं इसलिये किसी ऐसे वजनदार नेता को जिले की कमान सौंपी जाये जिसे सभी स्वीकार करने को बाध्य हो जायें। इस खबर के मिलने के बाद प्रदेश नेतृत्व ने यह कर लिया कि नरेश दिवाकर को ही कमान सौंप दी जाये। भाजपा नेताओं का दावा तो यह भी है कि अगला चुनाव लड़ने की इच्छा प्रगट करते हुये शुरू में नरेश ने आना कानी की लेकिन बाद में उन्हें यह स्वीकार करना ही पड़ा। बताया जाता है कि सब कुछ तय हो जाने के बाद विधायक कमल मर्सकोले ने नरेश का नाम प्रस्तावित किया और उनके नाम की घोषणा जिला निर्वाचन अधिकारी ने कर दी। बताया तो यह भी जा रहा हैं कि आम सहमति बनाने जैसी कोई कवायत भी इसके बाद नहीं की गयी। अब किंग मेकर से किंग बने नरेश दिवाकर, जो कि प्रदेश सरकार द्वारा महाकौशल विकास प्राधिकरण के केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष है, अपनी इस नयी ताजपोशी को वे किस रूप में लेते हैं? इसका खुलासा तो वक्त आने पर ही होगा। 
भाजपा और इंका के लिये परीक्षा होगी मंड़ी चुनाव -इन दिनों जिले में मंड़ी चुनावों को लेकर राजनैतिक हल चल मची हुयी हैं। इंका और भाजपा दोनों ही पार्टियां अपने अपने तरीके से जीत की बिसात बिछाने में लगी हुयी हैं। पद भार ग्रहण करते ही नव नियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष के लिये ये एक राजनैतिक चुनौती सामने आ गयी हैं। पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के कार्यकाल में हुये लखनादौन नपं के चुनाव में भाजपा की हुयी करारी हार का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और पूरी संभावनाओं के बाद भी वे दोबारा अध्यक्ष नहीं पाये। वैसे तो जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी के कार्यकाल का भी यही पहला चुनाव था जहां कांग्रेस का अध्यक्ष पद का प्रत्याशी ही नदारत हो गया था लेकिन पार्षदों के चुनावों में मिली सफलता को आधार बनाकर कांग्रेस के किंग मेकर हरवंश सिंह ने किंग को बचा लिया। इस तरह मंड़ी चुनाव ना सिर्फ दोनों पार्टियों के लिये वरन उनके अध्यक्षों के लिये भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गयें हैं। वैसे तो प्रदेश की शिवराज सरकार यह नहीं चाहती थी कि 2013 के विस चुनाव के पहले ग्रामीण क्षेत्र के मतदाताओं का रुझान उजागर हो। इसलिये पिछले दो साल से किसी ना किसी बहाने मंड़ी चुनाव टाले जा रहे थे। लेकिन हाई कोर्ट के आदेश पर जब मंड़ी चुनाव अनिवार्य हो गया तब प्रदेश सरकार ने अध्यक्ष के प्रत्यक्ष निर्वाचन की प्रणाली को ही बदल दिया और सदस्यों के    माध्यम से अध्यक्ष निर्वाचित करने का प्रावधान कर दिया। कांग्रेस के पास यह एक बहुत बड़ा मुद्दा हैं। यदि इसे पूरे जोर शोर से मतदाताओं के बीच उठाया जाता हैं तो इसका लाभ मिल सकता हैं। वैसे भी प्रत्यक्ष निर्वाचन ना होने के कारण अध्यक्ष पद का पूरा दारोमदार जन समर्थन पर कम और “चुनाव     प्रबंधन“ पर अधिक निर्भर करेगा। इसमें हरवंश सिंह और नरेश दिवाकर दोनो ही माहिर हैं। फिर दोनों के बीच समन्वय से राजनीति करने का पिछले 15 सालों से जो खेल चल रहा हैं उसे देखते हुये राजनैतिक क्षेत्रों में यह कयास लगाया जा रहा हैं कि अपने अपने राजनैतिक लाभ के हिसाब से मंड़ी चुनावों में मिले जुले परिणाम सामने आयेंगें। 
जिले में तीसरे मोर्चे के गठन के प्रयास प्रारंभ -चुनाव नजदीक आने की संभावनाओं को देखते हुये जिले में भी तीसरे मोर्चे के गठन पर प्रयास प्रारंभ हो गये हैं। युवा सपा नेता एवं एडवोकेट याहया कुरैशी की पहल पर मिशन प्रारंभ हुआ हैं। इसमें वाम दलों सहित नागरिक मोर्चे के भी शामिल होने की संभावना हैं। बसपा तो इसमें शामिल होने से रही लेकिन यदि गौगपा इसमें शामिल हो जाती हैं तो तो यह चुनावी संभावनाओं पर असर डाल सकता हैं। वैसे तो पूरे प्रदेश सहित जिले में भी राजनैतिक ध्रुवीकरण इंका और भाजपा के बीच में ही है लेकिन ऐसे मोर्चे किसी की हार और किसी की जीत में निर्णायक साबित हो सकते हैं। सियासी हल्कों में यह जरूर माना जा रहा हैं कि जिले में इंका और भाजपा में व्याप्त गुट बाजी का यदि कोई मोहरा बन जायेगा तो उसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी क्योंकि आज कल आम मतदाता इतना जागरूक हो गया हैं कि वो इन सब हथकंड़ों को को बखूबी समझने लगा हैं और यह भी समझ चुका हैं कि चुनावी समीकरण अपने पक्ष में करने के लिये जिले के कौन कौन महारथी ऐसे कारनामें करते रहते हैं। वैसे याहया कुरैशी का नाम एक ऐसा नाम है जिस पर अभी कोई ब्रांड़ चस्पा नहीं हैं। इसलिये उनकी अगुवायी में यदि ऐसा कोई प्रयास होता है तो उन्हें बहुत सावधानी से कदम उठाने पड़ेंगें और अतीत के प्रयोंगों से सबक भी लेना पड़ेगा। वरना नतीजा वही ढाक के तीन पात के समान हो जायेगा। “मुसाफिर“