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Sunday, September 2, 2012


खुद के हित पर जनहित को कुर्बान कर देने वाले जन  प्रतिनिधियों को क्या जनता कभी सबक सिखायेगी?
सिवनी। बीते दस पंद्रह सालों से कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नुरा कुश्ती के कारण जन          प्रतिनिधि अपने हित के लिये जन हित को कुर्बान करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहें हैं। इसका खामियाजा इस पिछड़े हुये जिले को भुगतना पड़ रहा हैं और पड़ोसी जिलो की तुलना में सिवनी और पिछड़ता जा रहा हैं। क्या जनता कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को सबक सिखायेगी? यह सवाल सियासी हल्कों में चर्चित हैं।
बात चाहे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव द्वारा घोषित रामटेक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन की हो या मुख्यमंत्री शिवराजसिंह द्वारा घोषित इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज और नगर को माडल शहर बनाने की घोषणा हो उन्हें पूरा कराने की दिशा में जनप्रतिनिधियों की अनदेखी किसी से भी छिपी नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनो के ही जन प्रतिनिधियों ने इस हेतु ना तो सदन में और ना ही सड़क पर कभी कोई दवाब बनाया।
कांग्रेस और भाजपा के जन    प्रतिनिधियों की नूरा कुश्ती के चलते भी जिले ने बहुत कुछ खो दिया हैं। इसी नूरा कुश्ती के चलते सिवनी लोकसभा और घंसौर विधानसभा परिसीमन में समाप्त हो गयी। जिले के किसी भी नेता के प्रयासों के बिना जो फोर लेन सड़क जिले को मिल रही थी उसमें भी नूरा कुश्ती के चलते जो ग्रहण लगा हैं तो वह आज तक नहीं हट पाया हैं। पहली बार जब यह प्रस्ताव राज्य नेशनल लाइफ बोर्ड के पास गया था तो प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसे अस्वीकार कर केन्द्र को भेज दिया था। जब  दूसरा प्रस्ताव राज्य से भेजा गया तब तक नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुका था। उसके बाद मामला जो उलझा तो आज तक सुलझ नहीं पाया हैं। शिवराज की गर्जना और दिल्ली ले जाकर जनमंच के प्रतिनिधि मंड़ल को मिलवाने की घोषणा भी दोनों तरफ की ढील के चलते नाकामयाब ही रही। 
कृषि महाविद्यालय की मांग भी लंबे समय से लंबित हैं। महिला महाविद्यालय का हास्टल सहित भवन,बीज निगम और कृषि विज्ञान केन्द्र की सुविधा के बावजूद भी यह मांग आज तक पूरी नहीं हो पायी हैं। भीमगढ़ जलावर्धन योजना का बिजली का बिल उसकी लागत से अधिक हो गया हैं लेकिन ना तो कांग्रेस के राज में और ना ही भाजपा के राज में इसका कोई निदान निकाला गया।
कहने को इस जिले में ती सांसद भाजपा के के.डी.देशमुख और राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह,बकीना मंत्री का दर्जा प्राप्त डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,नरेश दिवाकर,प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर,कमल मर्साकेले, जिला पंचायत के युवा जुझारू अध्यक्ष मोहन चंदेल एवं नपा के एुवा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी हैं लेकिन इतने नाथ होने के बाद भी जिला अनाथों की भांति भुगत रहा हैं। इसमें इंका भाजपा की नूरा कुश्ती और दोनों ही पार्टियशें की गुटबाजी भी कम जवाबदार नहीं हैं।    
  
सदभाव से अब दुर्भाव क्यों?
सिवनी। जिले में आजकल फोरलेन में रुचि लेने वालों के बीच में चटखारे लेकर यह चर्चा होती देखी जा रही हैं कि सिवनी से खवासा तक फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी से कुछ उसके पुरानें अंध भक्त अब दुर्भाव क्यों रखने लगे हैं? सन 2007 से फोर लेन का काम करने वाली सदभाव कंपनी ने इस दौरान जो भी अनियमिततायें की उन्हें नजर अंदाज कर उनके प्रवक्ता क्ी भूमिका अदा करने वाले ही आज जनहित की बात करते हुये सदभाव से दुर्भाव रखते हुये उनकी कब्र्र खोदते देखे जा रहें हैं?यदि अनिमिततायें करके सदभाव ने चोरी की है तो उन्हें सजा मिलनी चाहिये लेकिन अचानक ही हुये इस हृदय के कारणों को लेकर तरह तरह की बात करते देखे जा रहे हैं।  

Tuesday, August 14, 2012


आजादी के बाद पैसठ साल के सियासी सफर में जिले ने भी तरह तरह के कई मुकाम देखे और कई रिकार्ड भी बना लिये है
आज देश में स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं साल गिरह मनायी जा रही हैं। आजादी के बाद इन 65 सालों में देश की राजनीति ने बहुत बदलाव देखे। लेकिन देश में हर बड़ा परिवर्तन बैलेट के माध्यम से ही हुआ। भारतवर्ष में प्रजातंत्र की जड़े मजबूत हुयीं हैं। लेकिन जनता के बीच राष्ट्रीय पार्टियों की पकड़ कम होने तथा क्षेत्रीय दलों के उभरने से राष्ट्रीय स्तर पर प्रजातांत्रिक प्राथमिकताओं में फर्क आया है। पिछले पंद्रह बीस सालों से गठबंधन की सरकारे देश चला रहीं हैं। इन पैंसठ सालों के सियासी सफर में जिले ने भी बहुत से मुकाम देखे हैं। वैसे तो सियासी रूप से यह जिला आजादी के समय से ही अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं। केन्द्र और प्रदेश सरकार में जिले के जनप्रतिनिधियों ने भागीदारी की हैं। आजादी के पहले बनी अंतरिम सरकार से लेकर अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ था कि सत्ता दल का विधायक जिले से चुना गया हो और मंत्री ना बना हो। पहले गैर कांग्रेसी मंत्री का रिकार्ड स्व. पं. महेश प्रसाद शुक्ला के नाम दर्ज है जो कि राज्य मंत्री बने थे। 2003 की उमा सरकार में पहले गैर कांग्रेसी केबिनेट मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन बने थे। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में शिव की नगरी सिवनी के मंत्री विहीन रहने का रिकार्ड बन गया हैं।
देश में हर परिवर्तन बैलेट से हुआ बुलैट से नहीं -आज देश में स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं साल गिरह मनायी जा रही हैं। आजादी के बाद इन 65 सालों में देश की राजनीति ने बहुत बदलाव देखे। लेकिन देश में हर बड़ा परिवर्तन बैलेट के माध्यम से ही हुआ। चाहे वह जयप्रकाश जी की सम्पूर्ण का्रंति के बाद जनता सरकार के रूप में हुआ हो, या फिर ढ़ाई साल बाद ही इंदिरा गांधी की वापसी हो या फिर 415 सांसदों के ऐतिहासिक बहुमत वाली कांग्रेस की राजीव गांधी की सरकार को नकारा गया हो या फिर कांग्रेस के नरसिंहा राव की सरकार के बाद अटल जी सरकार का बनना हो या फिर दो बार से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यू.पी.ए. सरकार का आना हो सभी कुछ जनता ने अपने वोटों से ही किया जबकि भारत के साथ ही आजाद होने वाले पाकिस्तान में ना केवल अधिकांश परिवर्तन बुलैट से हुये और सालों में वह विभाजित भी हुआ और बांगलादेश का उदय हुआ। भारतवर्ष में प्रजातंत्र की जड़े मजबूत हुयीं हैं। पंचायत से लेकर लोकसभा के सभी बदलाव प्रजातंत्र के जरिये ही सफलता पूर्वक हुये हैं। लेकिन जनता के बीच राष्ट्रीय पार्टियों की पकड़ कम होने तथा क्षेत्रीय दलों के उभरने से राष्ट्रीय स्तर पर प्रजातांत्रिक प्राथमिकताओं में फर्क आया है और पिछले पंद्रह बीस सालों से गठबंधन की सरकारे देश चला रहीं हैं। इस कारण कई बार राष्ट्रीय हितों पर क्षेत्रीय हित हावी हो रहें हैं जो कि भारत जैसे एक प्रगतिशील देश के लिये चिता का विषय हैं। इसका निदान होना जरूरी हैं। इसके लिये आवयक है कि या तो राष्ट्रीय पार्टियां अपना जनाधार बढ़ायें या फिर क्षेत्रीय पार्टियां अपना नजरिया बदलें और राष्ट्रीय हितो पर क्षेत्रीय हितों को हॉवी ना होनें दे या फिर संविधान में संशोधन कर कुछ ऐसी व्यवस्था की जाये कि देश में राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल ही लोकसभा का चुनाव लड़ने की पात्रता रखें। जाति,भाषा और क्षेत्रीयता पर आधारित राजनैतिक दलों का राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ता प्रभाव देश के व्यापक हितों के लिये एक चिंता का विषय बनता जा रहा हैं। वैसे इस बात से कई लोगों के विचार अलग हो सकते हैं और हमारा भी कहने का यह आशय नहीं हैं कि क्षेत्रीय दलों राष्ट्रीय हितो की चिंता नही रहती लेकिन यह जरूर रहता हैं अपने प्रभाव क्षेत्र के हितो को प्राथमिकता देना उनकी राजनैतिक मजबूरी रहती हैं। अंर्तराज्यीय मुद्दों के मामलों में भी जो सोचएक राष्ट्रीय पार्टी की होती हैं वह एक क्षेत्रीय दल की नहीं होती। क्योंकि यदि मुद्दा क्षेत्रीय दल के अपने प्रदेश का होता हैं तो वह संबंधित दूसरे प्रदेश के हितो को स्वीेकार ना करना उसकी राजनैतिक मजबूरी होती हैं।इसलिये वर्तमान व्यवस्था में कुछ सुधार होना आज समय की मांग बन गयी है। जिससे राष्ट्रीय हितों पर क्षेत्रीय हित हावी ना हो सकें और देश तेजी से प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सके।     
भरपूर प्रतिनिधित्व मिला जिले है को-इन पैंसठ सालों के सियासी सफर में जिले ने भी बहुत से मुकाम देखे हैं। वैसे तो सियासी रूप से यह जिला आजादी के समय से ही अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं। आजादी की लड़ाई के कई महान सेनानी सिवनी की जेल में रहे हैं। महान क्रांतिकारी पीर पगारो, नेताजी सुभाष चंद बोस,रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र सहित कई नेता इसी जेल में रहे हैं। देश आजाद होने के पहले बनी अंतरिम सरकार में जिले के डी.के.मेहता मंत्री मंड़ल में शामिल किये गये थे। आजादी के बाद से तो देश में वैसे भी कांग्रेस का वर्चस्व रहा था उसी तरह जिले में भी कांग्रेस का बोल बाला था। जिले के राजनैतिक परिदृश्य में पहला परिवर्तन 1962 के विधानसभा चुनाव में आया जब राम राज्य परिषद ने जिले के तीनों सामान्य विधानसभा क्षेत्रों सिवनी,केवलारी और बरघाट में कांग्रेस केा हरा दिया था। लेकिन उसके बाद हुये 1967 के अगले विधानसभा चुनाव में ही कांग्रेस ने फिर पांचों सीटों को जीत लिया था और यह सिलसिला लगातार 1990 तक चला।  और तो और  1977 के पहले गैर कांग्रेसी दौर में जनता पार्टी की आंधीं  में भी जिले में पांचों विधानसभा सीटें जीत कर कांग्रेस ने संपूर्ण उत्तर भारत में एक कीर्तिमान कायम किया था। 1990 की रामलहर में 1962 की तरह तीनों सामान्य सीटें तो कांग्रेस हार गयी लेकिन दोनों आदिवासी सीटों पर उसका कब्जा बरकरार रहा। 1993 और 1998 के विस चुनाव में बरघाट और सिवनी से भाजपा और शेष तीन सीटों से कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। लेकिन 2003 की उमा भारती की लहर में कांग्रेस के सिर्फ हरवंश सिंह ही जिले में अकेले जीते थे और पहली आर दोनो आदिवासी सीटों पर कांग्रेस को हारना पड़ा था। पिछले 2008 के चुनाव में भी केवलारी में कांग्रेस के हरवंश सिंह के अलावा शेष तीनों सीटों पर भाजपा ने जीत ली थीं। जिले के सांसद रहे पं. गार्गीशंकर मिश्रा और कु. विमला वर्मा ने केन्द्रीय मंत्री मंड़ल में प्रतिनिधित्व किया था। प्रदेश सरकार में तो जिले के एक से अधिक विधायक ही अधिकांश समय मंत्री मंड़ल में रहे हैं। पहले डी.के.मेहता और वसंतराव उइके,फिर वसंतराव उइके और कु. विमला वर्मा, फिर उर्मिला सिंेह और हरवंश सिंह मंत्री रहें हैं। सन 1993 से 1998 के दिग्गी सरकार के दौरान तो दो मंत्रियों के अलावा आदिवासी वर्ग के शोभाराम भलावी और गीता सिंह,अनुचूचित जाति के इंद्रेश गजभिये,पिछड़ा वर्ग के पुसऊलाल राहंगडाले और नेहा सिंह भी विभिन्न निगमों और आयोगों में मंत्री का दर्जा प्राप्त लाल बत्तीधारी नेता रहें हैं। आज भी जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक विधानसभा में उपाध्यक्ष हैं।
लोस और नपा में भी जीत रही है भाजपा-लोकसभा चुनावों में जिले के विधानसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा और जबलपुर संसदीय क्षेत्र में शामिल थे। आजादी के बाद से 1975 तक कांग्रेस के ही सांसद रहें। पहले गैर कांग्रेसी सांसद के रूप में उप चुनाव में शरद यादव जीते थे जब जबलपुर क्षेत्र में जिले का लखनादौन विस क्षेत्र शामिल था। सन 1977 में सिवनी संसदीय क्षेत्र अस्तित्व में आया जिसके पहले सांसद स्व. निर्मलचंद्र जैन बने। फिर 80 से 90 तक स्व. गार्गीशंकर मिश्र रहे जिन्हें कमल चुनाव चिन्ह धारी भाजपा के बागी प्रहलाद पटेल ने हराया। फिर 91 और 98 में विमला वर्मा जीतीं। 1999 से लगातार भाजपा के रामनरेश त्रिपाठी और नीता पटेरिया चुनाव जीते। नये परिसीमन में जिले के सिवनी और बरघाट क्षेत्र बालाघाट में जहां से भाजपा के के.डी.देशमुख और केवलारी और लखनादौनक्षेत्र मंड़ला में शामिल हो गये जहां से कांग्रेस के बसोरीसिंह मसराम चुनाव जीते हैं। इसी तरह 1994 से लेकर आज तक कांग्रेस नगरपालिका सिवनी का चुनाव भी नहीं जीत पायी हैं और लगातार तीन चुनाव हार चुकी हैं। पिछले दो बार से भाजपा चुनाव जीत रही हैं। 
जिले को मंत्रीविहीन रखने का रिकार्ड शिवराज के नाम-आजादी के पहले बनी अंतरिम सरकार से लेकर अभी तक कभी ऐसा नहीं हुआ था कि सत्ता दल का विधायक जिले से चुना गया हो और मंत्री ना बना हो। 1977 में पहली बार जिला मंत्री विहीन रहा था क्योंकि जनता पार्टी का कोई भी विधायक जिले से नहीं जता पाया था। 1990 में बनने वाली भाजपा सरकार के पटवा मंत्री मंड़ल में पहले गैर कांग्रेसी मंत्री का रिकार्ड स्व. पं. महेश प्रसाद शुक्ला के नाम दर्ज है जो कि राज्य मंत्री बने थे। 2003 की उमा सरकार में पहले गैर कांग्रेसी केबिनेट मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन बने थे जो कि बाबूलाल गौर के मंत्रीमंड़ल मेंभी शामिल थे। लेकिन जब पहली बार शिवराज सिंह चौहान मुख्य मंत्री बने तो भाजपा के तीन विधायकों डॉ. बिसेन, नरेश दिवाकर और शशि ठाकुर में से कोई भी मंत्री नहीं बन पाया। चौहान की दूसरी पारी में भी शिव की नगरी सिवनी मंत्री विहीन ही रह गयी जबकि नीता पटेरिया,शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले भाजपा के विधायक हैं। और तो और भाजपा ने चार सांसदों को विधान सभा का चुनाव लड़ाया था जिसमें नीता पटेरिया को छोड़ कर शेष सभी तीनों सांसद रहें नेता कबीना मंत्री हैं। आजादी के बाद के 65 सालों के सियासी सफर का एक सियाह मुकाम यह भी है। हालांकि शिवराज ने नरेश दिवाकर और डॉ. बिसेन को लाल बत्ती देकर कबीना मंत्री का दर्जा जरूर दिया हैं।
और अंत में-जिले के सियासी हालात आज ऐसे हैं कि कांग्रेस और भाजपा आलाकमान में जिले के किसी भी नेता की सीधी कोई एप्रोच नहीं हैं। इसका खामियाजा जिला भुगत रहा हैं। लोकसभा चली गयी, एक विधानसभा चली,बड़ी रेल लाइन आयी नहीं,पेंच परियोजना बनी नहीं  और फोरलेन का मामला भी अटका पड़ा हैं। ना जाने यह भुगतमान जिले को और कब तक भुगतना पड़ेगा? “मुसाफिर“    


परिवर्तनों के लिये राजनैतिक विकल्प मिलने वाले देश की संसद को सड़क से संचालित करने की नाकाम कोशश हुयी 
आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं वर्षगांठ मना रहा हैं। एक प्रजातांत्रिक देश होने के नाते इन 65 सालों की राजनैतिक यात्रा के दौरान कई परिवर्तन और पड़ाव देखें हैं। देश में पहला राजनैतिक परिवर्तन जयप्रकाश जी की संपूर्ण क्रांति के बाद हुआ और जनता पार्टी की दो तिहायी बहुमत वाली सरकार ने देश की सत्ता संभाली लेकिन इंदिरा हटाओ के मुद्दे पर एक हुये विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनैतिक दल ढ़ाई साल में ही तितर बितर हो गये और इंदिरा गांधी की वापसी हो गयी। फिर वी.पी.सिंह के द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये गये  आंदोलन और राम मंदिर के मुद्दे पर देश में दूसरी बार राजनैतिक पविर्तन हुआ और कांग्रेस के 415  सांसदों के ऐतिहासिक बहुमत वाली राजीव गांधी की सरकार धराशायी हो गयी। वी.पी.सिंह के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में विचारधारा में एक दूसरे के धुर विरोधी वाम दल और भाजपा सरकार में शामिल थे। लेकिन इसका भी वही हश्र हुआ और 1991 में राजीव गांधी की चुनाव के दौरान हुयी हत्या के बाद केन्द्र में कांग्रेस के स्व. पी.वी.नरसिंहा राव के नेतृत्व में सरकार बनी। 1996 और 1998 के खंड़ित जनादेश के कारण अस्थिरता का वातावरण रहा और 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग गठबंधन की अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी और देश में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत हुयी। सन 2004 और 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व में यू.पी.ए. की सरकार डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवायी मे चल रही हैं। यू.पी.ए. के दूसरे कार्यकाल में देश में उजागर हुये लगातार घोटालों और केन्द्रीय मंत्री सहित बड़े बड़े नेताओं और अधिकारियों की जेल यात्राओं के बाद देश में एक बार फिर भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा कालेधन को लेकर आंदोलन जारी है। समाजसेवी अन्ना हजारे और योग गुरू बाबा रामदेव के नेतृत्व में हो रहे इन आंदोलनों में निर्वाचित सदन के भ्रष्ट और आपाधिक स्वरूप को भी मुद्दा बनाया गया हैं। लेकन यहां एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि यदि ऐसा है तो क्या इसके लिये सिर्फ सदन में बैठे सदस्य ही जवाबदार हैं? मेरे विचार से नहीं। पहले तो वे राजनैतिक दल दोषी हैं जो ऐसे नेताओं को प्रत्याशी बनाते हैं और अंततः हम मतदाता जो कि ऐसे उम्मीदवारों को अपना वोट देकर उन्हें सदन का सदस्य चुन लेते हैं। अपराधियों के खौफ और धन की चकाचौंध हमें प्रभावित करती रहेगी तो बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। यदि ऐसे नेताओं को नकारा नहीं गया तो वही सब कुछ चलता रहेगा जो चल रहा हैं। सिर्फ चलाने वाले बदल सकतें है। इन आंदोलनों में बिना राजनैतिक विकल्प दिये निर्वाचित सदन को सड़क से संचालित करने की नाकाम कोशिश भी गयी। टीम अन्ना ने तो पार्टी बनाने की घोषणा के साथ अपना अनशन खत्म कर दिया है और बाबा रामदेव के मंच पर राजग नेताओं की उपस्थिति में राजनीति का दौर भी खूब चला। आने वाले साल में सरकार,विपक्ष और आंदोलन चलाने वाले अन्ना और बाबा भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के सपने को साकार करने की दिशा में कारगर कदम उठायें, यही स्वतंत्रता दिवस पर हमारी शुभकामनायें हैं।  

Monday, July 30, 2012


भाजपा के सदस्यता अभियान के लिये केवलारी में नरेश दिवाकर और सिवनी में वेदसिंह को प्रभारी बनाना चर्चित
भाजपा का यह सदस्यता अभियान इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि अभी जो सदस्य बनेंगें वे ही लोकसभा और विधानसभा के चुनावों की रणभूमि में रणबांकुरे रहेंगें। संभागीय संगठन मंत्री की उपस्थिति में हुयी एक बैठक में जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन ने जिले के चारों विस क्षेत्रों  के लिये प्रभारी नियुक्त किये हैं। जिनमें लखनादौन में सुदामा गुप्ता,बरघाट में गोमती ठाकुर,सिवनी में वेद सिंह और केवलारी क्षेत्र में नरेश दिवाकर को प्रभारी बनाया गया हैं। केवलारी और सिवनी विस क्षेत्र के प्रभारियों की नुयुक्ति कुछ अलग ही राजनैतिक संकेत दे री हैं।हरवंश नरेश बिसेन त्रिकोण के तीनों कोणों को राजनीति का क ख ग जानने वाला भी बखूबी जानता हैं। पिछले एक दशक से नूरा कुश्ती के किस्से भाजपा और कांग्रेस में चलते रहें हैं जो आज भी जारी हैं। पूर्व घंसौर विस क्षेत्र के पूर्व कांग्रेस विधायक टक्कनसिंह मरकाम का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया। लेकिन सहकारिता और राजनैतिक क्षेत्रों में जिस गुमनामी में उनका अंतिम संस्कार हो गया उसके चर्चे अवश्य हो रहें है। सिवनी और बालाघाट के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की बालाघाट संसदीय क्षेत्र में बढ़ रहींे राजनैतिक गतिविधियां सियासी हल्कों में चर्चित हैं। लंबे समय से केवलारी के भाजपायी आपने पालनहार गौरी भाऊ के दर्शन के लिये भी तरस गये हैं। भाजपायी क्षेत्रों यह चर्चा जोरों पर हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो केवलारी के भाजपा के पालनहार ना केवल कहीं गुम हो गयें हैं वरन उनके कोई बयान भी इन दिनों सुर्खियों में नहीं हैं। 
भाजपा के सदस्यता प्रभारियों की नियुक्ति हुयी चर्चित-भाजपा का सदस्यता अभियान प्रारंभ हो चुका हैं। आलाकमान के निर्देशानुसार इस बार बीस प्रतिशत नये सदस्य बनाने का लक्ष्य दिया गया हैं।यह सदस्यता अभियान इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि अभी जो सदस्य बनेंगें वे ही लोकसभा और विधानसभा के चुनावों की रणभूमि में रणबांकुरे रहेंगें। संभागीय संगठन मंत्री की उपस्थिति में हुयी एक बैठक में जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन ने जिले के चारों विस क्षेत्रों  के लिये प्रभारी नियुक्त किये हैं। जिनमें लखनादौन में सुदामा गुप्ता,बरघाट में गोमती ठाकुर,सिवनी में वेद सिंह और केवलारी क्षेत्र में नरेश दिवाकर को प्रभारी बनाया गया हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में विशेषकर भाजपा में ही इस बात लेकर चर्चाओं के दौर प्रारंभ हो गये हैं कि ये नियुक्तियां क्या किसी नये चुनावी समीकरण की शुरुआत तो नहीं हैं।   एक तरफ जहां बरघाट और लखनादौन, जो कि दोनों आदिवासी क्षेत्र है, में स्थानीय नेताओं को ही प्रभारी बनाया गया हैं लेकिन केवलारी और सिवनी विस क्षेत्र के प्रभारियों की नुयुक्ति कुछ अलग ही राजनैतिक संकेत दे री हैं। सिवनी क्षेत्र से दो बार विधायक रहे नरेश दिवाकर की पिछले चुनाव में टिकिट कट गयी थी लेकिन वे आज मविप्रा के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष हैं। उन्हें सिवनी के बजाय केवलारी का प्रभारी बनाया गया हैं जबकि केवलारी से 2003 का विस चुनाव लड़ चुके भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर को सिवनी का प्रभार दिया गया हैं। वैसे तो सिवनी से भाजपा की नीता पटेरिया विधायक हैं लेकिन भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर कुछ इस तरह से मारामारी चल रही हैं मानो वहां से कांग्रेस का विधायक हो। केवलारी विस क्षेत्र से कांग्रेस के हरवंश सिंह विधायक हैं जहां का सदस्यता प्रभारी नरेश जी को बनाया गया हैं। यहां यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि पिछला विधानसभा चुनाव केवलारी से डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने लड़ा था जो कि आज प्रदेश के वित्त आयोग के लालबत्तीधारी अध्यक्ष हैं।  हरवंश नरेश बिसेन त्रिकोण के तीनों कोणों को राजनीति का क ख ग जानने वाला भी बखूबी जानता हैं। पिछले एक दशक से नूरा कुश्ती के किस्से भाजपा और कांग्रेस में चलते रहें हैं जो आज भी जारी हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष द्वारा सदस्यता अभियान का केवलारी और सिवनी का प्रभार वरिष्ठों को सम्मान देने वाला हैं या फिर इसके पीछे कुछ राजनैतिक मंसूबे फल फूल रहें हैं?इसका इसके बारे में अभी से सियासी हल्कों में पोस्टमार्टम शुरू हो गया हैं। क्योंकि आदिवासी विधायकों शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले के क्षेत्रों को प्रभार ऐसे किसी वरिष्ठ भाजपा नेता को नहीं सौंपा गया हैं।
मरकाम के निधन पर सहाकारिता एवं राजनैतिक क्षेत्र में की गयी उपेक्षा चर्चित-पूर्व घंसौर विस क्षेत्र के पूर्व कांग्रेस विधायक टक्कनसिंह मरकाम का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया। लेकिन सहकारिता और राजनैतिक क्षेत्रों में जिस गुमनामी में उनका अंतिम संस्कार हो गया उसके चर्चे अवश्य हो रहें है। स्व. मरकाम जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष सहित सहकारी बैंक के अध्यक्ष और अपेक्स बैंक के उपाध्यक्ष भी रहे है। बाद में वे भाजपा में शामिल हो गये थे। लेकिन उनके दुखद निधन पर ना तो जिला भाजपा ने,ना जिला कांग्रेस ने और ना ही सहकारी बैंक ने उन्हें श्रृद्धांजली देना जरूरी समझा। हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह और म.प्र.वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन की विज्ञप्तियां जरूर प्रकाशित हुयीं हैं। एक कद्दावर आकिदवासी नेता के निधन पर की गयी ये उपेक्षा बहुत से सवाल छोड़ जाती हैं। 
बालाघाट लोस क्षेत्र में प्रहलाद की सक्रियता बनी चर्चा का केन्द्र-सिवनी और बालाघाट के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की बालाघाट संसदीय क्षेत्र में बढ़ रहींे राजनैतिक गतिविधियां सियासी हल्कों में चर्चित हैं। उल्लेखनीय है कि परिसीमन में सिवनी संसदीय क्षेत्र समाप्त हो जाने के बाद सिवनी लोस क्षेत्र के सिवनी एवं बरघाट विस क्षेत्र बालाघाट लास में शामिल कर दिये गयेहैं। इसके अलावा 6 विस क्षेत्र बालाघाट जिले के हैं। हाल ही में हुये लखनादौन नगर पंचायत के चुनाव  में भी प्रहलाद पटेल आये थे और हाल ही में उन्होंने बालाघाट जिले में कार्यक्रम आयोजित किया था जिसे मीडिया ने उनके शक्ति प्रर्दशन के रूप में देखा हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय हैं कि इस क्षेत्र के सांसद के.डी. देशमुख विस चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं और नगरपालिका चुनाव के दौरान वारासिवनी आये भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने भी कांग्रेस के गढ़ वारासिवनी को ढहाने के लिये के.डी. भाऊ को हरी झंड़ी सी दिखा दी हैं। ऐऐ हालात में भाजपा का एक वर्ग विशेष कर पटेल समर्थकों का मानना हैं बालाघाट लोस से प्रहलाद पटेल भी एक सशक्त दावेदार हो सकते हैं।
बालाघाट लोस क्षेत्र में प्रहलाद की सक्रियता बनी चर्चा का केन्द्र-बड़ी उम्मीदों के साथ प्रदेश भाजपा ने केवलारी विस क्षेत्र का प्रभारी सरकार के वरिष्ठ मंत्री गौरीशंकर बिसेन को बनाया था। इसके पहले राज्य सरकार के मंत्री जयसिंह मरावी प्रभारी थे। लेकिन कांग्रेस के दिग्गजों को हराने की मुख्यमंत्री की सार्वजनिक रूप से घोषित रणनीति के तहत प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने बिसेन को प्रभारी बनाया था। अपने बयानों और कार्यशैली के लिये हमेशा चर्चाओं में रहने वाले गौरी भाऊ ने अपनी धमाकेदार आमद भी केवलारी में दी थी। इसी बीच रानजैतिक समीकरणों में बदलाव हुआ और केवलारी क्षेत्र से भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़ चुके डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को कबीना मंत्री के दर्जेे के साथ प्रदेश के वित्त आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। अब लंबे समय से केवलारी के भाजपायी आपने पालनहार गौरी भाऊ के दर्शन के लिये भी तरस गये हैं। भाजपायी क्षेत्रों यह चर्चा जोरों पर हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो केवलारी के भाजपा के पालनहार ना केवल कहीं गुम हो गयें हैं वरन उनके कोई बयान भी इन दिनों सुर्खियों में नहीं हैं। वैसे तो जब गौरी भाऊ प्रभारी बनाये गये थे तभी से यह चर्चा थी कि नाटकीय शैली में राजनीति करने वाले क्षेत्रीय इंका विधायक हरवंश सिंह और गौरी शंकर बिसेन में से आखिर कौन किसको मात देगा? या कब नूरा कुश्ती चाले हो जावेगी? अब गौरी भाऊ केवलारी क्यों नहीं आ रहे हैं? इसका खुलासा तो वो ही कर सकतें हैं। “मुसाफिर“  
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले से साभार

जनभावनाओं पर हमेशा भारी पड़े षड़यंत्रकारी
षड़यंत्रों में बराबरी की भागीदारी रही हैं इंका भाजपा नेताओं की
बीते कई सालों से जिले की जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वाले षड़यंत्रकारी ही भारी साबित होते रहें हैं। फिर चाहे वो लोकसभा का परिसीमन में विलोपन का मामला हो, या जिले की बड़ी रेल लाइन का मामला हो या फिर फोर लेन का या संभाग बनाने का। इन षड़यंत्रकारियों में कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की बराबरी की भागीदारी और नूरा कुश्ती भी जिम्मेदार रही हैं। जिससे जिले में विकास के पहिये थम से गये है।   
जिले के पिछड़ेपन का रोना तो हर नेता और राजनैतिक दल रोता है और उसे दूर करने का दावा भी करता हैं। लेकिन जब किसी भी नेता तो व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ आड़े आता हैं तो जिले का हित तो छोड़ो अपनी पार्टी के हितों की भी बलि चढ़ाने संकोच नहीं करता हैं।
पिछले कई सालों में जिले को कुछ मिला तो नहीं हैं लेकिन छिन जरूर गया हैं।सन 1977 से अस्तित्व में आने वाली सिवनी लोकसभा क्षेत्र परिसीमन में समाप्त कर दी गयी। यह एक शाश्वत सत्य है कि कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेताओं के राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये एक नूरा कु श्ती खेली गयी और क्षेत्र समाप्त हो जाने के बाद दोनों ही दलों के नेताओं ने उक दूसरे को दोषी बताया और मामला खत्म हो गया।
ठीक इसी तरह जिले को बड़ी रेल लाइन से जोड़ने के लिये जब जब भी जन भावनायें सामने आयीं हैं तब जिले के राजनैतिक शिखर बैठे हुये नेताओं ने कहीं आपसी गुटबंदी तो कभी राजनैतिक प्रतिद्वंदता के चलते सहयोग करना तो दूर अड़गें तक डालने से कोई परहेज नहीं किया। यह कारनामा केन्द्र में राजग और संप्रग दोनो ही सरकारों के कार्यकाल में हुआ और परिणाम आज सामने हैं।
इसी तरह जिले को भौगोलिक स्थिति के कारण उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत फोर लेन सड़क की सौगात मिली। यह सौगात जिले को किसी के राजनैतिक प्रयासों से नहीं मिली थी। लेकिन अपने अपने आकाओं को खुश करने के लिये जिले के कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने ऐसे पेंच डाल कि मामला आज भी खटायी में पड़ा हुआ हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी उसके निर्देशानुसार प्रस्ताव बनाने का काम अभी तक राज्य और केन्द्र सरकार पूरा नहीं कर पायीं हैं। 
इसी तरह भौगोलि रूप से छिंदवाड़ा,सिवनी और बालाघाट जिले को मिलाकर बनाये जाने वाले नये संभाग का मुख्यालय सिवनी में होना चाहिये था लेकिन वह भी जिले को नसीब नहीं हुआ। चुनावी समीकरणों को देखते हुये प्रदेश के मुख्यमंत्री मामले का निपटारा करने के बजाय उसे लंबित रखना बेहतर समझा और मामला आज तक लंबित हैं। 
इन सभी मुद्दों पर जिले की जनता ने अपनी भावनाओं को अपने तरीक से व्यक्त  भी किया। समय समय पर विभिन्न आंदोलनों के जरिये जिले के हक की मांग भी गयी। विशेषकर परिसीमन और फोर लेन के मामले में ऐतिहासिक जनांदोलन भी हुये जनता ने खुलकर सड़क पर आकर अपनी भावनायें भी प्रगट की थीं। लेकिन अपने आप को जनता का प्रतिनिधि बताने वाले और भाजपा और कांग्रेस के षड़यंत्रकारी नेता हमेशा ही जनभावनाओं पर भारी पड़े। इसीलिये आज जिले में विकास के पहिये थम गये हैं। 

Monday, July 23, 2012


आमानाला कांड़ में हरवंश के खिलाफ हत्या का प्रयास करने का मामला दर्ज कराने वाली नीता पटेरिया अब चुप क्यों है ?
पेश नहीं हुआ चालान
हरवंश पहुंचे हाई कोर्ट 
सिवनी। आमानाला कांड़ में इंका विधायक हरवंश सिंह के खिलाफ धारा 307 का प्रकरण दर्ज करवाने वाली भाजपा विधायक नीता पटेरिया की लंबी चुप्पी सियासी हल्कों में चर्चित हैं। प्रकरण का चालान अभी तक पुलिस ने कोर्ट में पेश नहीं किया हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह भी हाई कोर्ट गयें हैं कि उनके खिलाफ धारा 307 का मामला नहीं बनता हैं। 
उल्लेखनीय हैं कि लगभग छः साल पहले आमानाला लघु सिंचायी परियोजना के लोकार्पण के मामले में तत्कालीन भाजपा सांद नीता पटेरिया और तत्कालीन क्षेत्रीय इंका विधायक हरवंश सिंह आमने सामने हो गये थे। कुछ हल्के फल्के वाद विवाद के बाद भाजपा सांसद नीता पटेरिया की ना केवल गाड़ी क्षति ग्रस्त हो गयी थी वरन उसी गाड़ी में उनका पुत्र भी बैठा हुआ था। सांसद पटेरिया ने आरोप लगाया था कि इंका विधायक हरवंश सिंह और उनके समर्थकों ने जान से मारने का प्रयास किया हैं। थाने में मामला दर्ज कराने के लिये जिले के तमाम भाजपा नेताओं ने थाने में धरना भी दिया था। उसके बाद जिले के बंड़ोल थाने में  इंका विधायक हरवंश सिंह सहित अन्य लोगों के खिलाफ धारा 307 सहित अन्य गंभीर धाराओं में प्रकरण भी पंजीबद्ध हो गया था। 
इंका विधायक हरवंश सिंह ने अपने खिलाफ पंजीबद्ध किये गये मामले को राजनैतिक बताते हुये एक न्याय रैली का आयोजन किया था। इस न्याय रैली में जिले सहित जबलपुर संभाग के हजारों कार्यकर्त्ताओं ने भाग लिया था। जिले की एंतिहासिक रैलियों में इस न्याय रैली को भी गिना जाता हैं।
मामला दर्ज होने के बाद हरवंश सिह सहित सभी आरोपियों को चालान पेश होते तक के लिये अग्रिम जमानत भी मिल गयी थी। लंबे समय तक चालान पेश ना होने के कारण इंका विधायक हरवंश सिंह उच्च न्यायालय की शरण में चले गये तथा यह गुहार लगायी कि उनके खिलाफ धारा 307 का मामला नहीं बनता हैं अतः उन्हें आरोप मुक्त किया जाये। यह मामला भी अभी हाई कोर्ट में लंबित हैं।
आज नीता पटेरिया सिवनी विस क्षेत्र की भाजपा विधायक हैं तथा प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष हैं। जबकि इंका विधायक हरवंश सिंह प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष है। परिसीमन के बाद इस कांड का घटना स्थल अब केवलारी के बजाय सिवनी विस क्षेत्र का हिस्सा बन गया हैं।
प्रदेश में भाजपा की सरकार हैं और पुलिस लगभग छः साल बाद भी कोर्ट में इस प्रकरण का चालान नहीं पेश कर पायी हैं। ऐसे में यह सवाल सियासी हल्कों में खासा चर्चित हैं कि भाजपा विधायक नीता पटेरिया इस मामले अब तक चुप्पी क्यों साधे हुयीं हैं? क्या उनके द्वारा उस समय बनवाया गया प्रकरण फर्जी था? या अब किन्हीं राजनैतिक समीकरणों के चलते मामला लटका हुआ है? या मुख्यमंत्री के डंपर कांड़ से इस मामले के तार जुड़े हुये? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जो कि राजनैतिक क्षेत्रों में तैर रहें हैं।         

वर्षाकालीन सत्र में घटित घटनाओं की गूंज प्रदेश सहित जिले में भी कई दिनों तक गूंजती रहेगी
बीते दिनों रानी दुर्गावती वार्ड क्ी भाजपा पार्षद माया मरकाम ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। इसकी घोषणा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष हीरा आसवानी की उपस्थिति में एक पत्रकार वार्ता में की गयी।इसमें युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल की विशेष भूमिका बतायी जा रही हैं। दक्षिण सिवनी के वार्डों में भीतरघात की मार अधिक थी। दक्षिण सिवनी क्षेत्र में ही रानी दुर्गावती वार्ड स्थित हैं जो कि शुरू से ही आदिवासी वर्ग के लिये आरक्षित और यहां से हमेशा कांग्रेस ही जीतती रही हैं। भाजपा पार्षद का कांग्रेस प्रवेश राजनैतिक हल्कों में चर्चित हैं। विधानसभा के वर्षाकालीन सत्र में जो कुछ भी हुआ उसे लेकर भारी राजनैतिक उथल पुथल मची हुयी हैं।  विपक्ष द्वारा जब अध्यक्ष को निकलने नहीं दिया तो बजाय उपाध्यक्ष के सभापति पैनल के सदस्य का आसंदी पर बैठना भी चर्चित हैं। वर्षाकालीन सत्र में घटित अशोभनीय घटनाओं ने इतिहास को कलंकित कर दिया हैं। विधानसभा  में घटित घटनाओं का जिले में भी असर हुआ हैं। भाजपा और कांग्रेस ने प्रदर्शन कर विरोध किया और लोकतंत्र को कलंकित करने का एक दूसरे पर आरोप लगाया। लेकिन इन शर्मनाक घटनाओं ने कुछ ऐसे सवाल अनुत्तरित छोड़ दिये हैं जो प्रदेश के सियासी हल्कों में कई दिनों तक गूंजते रहेंगें। 
भाजपा पार्षद का इंका प्रवेश चर्चित-बीते दिनों रानी दुर्गावती वार्ड क्ी भाजपा पार्षद माया मरकाम ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। इसकी घोषणा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष हीरा आसवानी की उपस्थिति में एक पत्रकार वार्ता में की गयी।इसमें युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल की विशेष भूमिका बतायी जा रही हैं। उल्लेखनीय हैं कि सन 2008 के विस चुनाव में इंका प्रत्याशी इंजी. प्रसन्न मालू के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश मुनमुन राय का खुलकर काम करने वाले हरवंश सिंह समर्थक नेताओं के हौसले कोई कार्यवाही ना होने से काफी बुलंद हो गये थे। इसके अलावा कई नेताओं को कांग्रेस की जमानत जप्त कराने के लिये बतौर इनाम पदों से भी नवाजा दिया गया था। इसीलिये 2009 के नगरपालिका चुनाव में भी सिवनी के   अध्यक्ष पद के प्रत्याशी संजय भारद्वाज और अधिकांश पार्षद पद के उम्मीदवारों को भारी भीतरघात का सामना करना पड़ा था। हालांकि संजय भारद्वाज ना सिर्फ हरवंश सिंह के स्वजातीय थे वरन दूर के उनके रिश्तेदार भी थे। फिर भी वे नहीं चाहते थे कि संजय चुनाव जीते। इसीलिये उनके समर्थक खुले आम विरोध में काम कर रहें थे। खासकर दक्षिण सिवनी के वार्डों में इसकी मार अधिक थी। दक्षिण सिवनी क्षेत्र में ही रानी दुर्गावती वार्ड स्थित हैं जो कि शुरू से ही आदिवासी वर्ग के लिये आरक्षित और यहां से हमेशा कांग्रेस ही जीतती रही हैं। लेकिन भीतरघात के चलते इस चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार विमला पंद्रे को जहां 446 वोट मिले थे वहीं भाजपा की माया मरकाम ने 811 वोट लेकर इस आदिवासी वार्ड में पहली बार 346 वोटों से जीतकर भाजपा का परचम फहराया था। इसी वार्ड में अध्यक्ष पद के इंका प्रत्याशी संजय भारद्वाज को 480 वोट मिले थे जबकि भाजपा के राजेश त्रिवेदी ने भी 799 वोट लेकर 319 वोटों की भारी बढ़त हासिल की थी। अब जबकि 2013 में विस चुनाव होना हैं तब भाजपा की पार्षद माया मरकाम का कांग्रेस में शामिल होना राजनैतिक हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ हैं। कुछ नेता तो यह कहते हुये देखे जा रहें हैं कि जिनने भाजपा पार्षद को चुनाव जितवाया था अब वेे ही उसे कांग्रेस में लाकर वाहवाही लूट रहें हैं।
विधानसभा का इतिहास हुआ कलंकित-विधानसभा के वर्षाकालीन सत्र में जो कुछ भी हुआ उसे लेकर भारी राजनैतिक उथल पुथल मची हुयी हैं। कांग्रेस के विधायक और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह यह चाहते थे कि आयकर विभाग द्वारा डाले गये छापे और जिनके यहां छापे डाले गये थे उनके तार मुख्यमंत्री सहित भाजपा से जुड़ने के प्रमाणों पर सदन में चर्चा हो लेकिन भापा और सरकार का यह कहना था कि एक केन्द्रीय ऐजेन्सी ने यह कार्यवाही की हैं इसलिये इस पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। इसे लेकर विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस विधायकों ने विस अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी और मुख्यमंत्री के चेम्बर के बाहर धरना दे दिया और उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया। समाान्यतः ऐसा माना जाता हैं कि सदन में जब भी कोई गंभीर संकट आता हैं तो विस अध्यक्ष,उपाध्यक्ष,सदन के नेता और नेता प्रतिपक्ष मिलकर उसे निपटाते हैं। विपक्ष द्वारा जब अध्यक्ष को निकलने नहीं दिया तो बजाय उपाध्यक्ष के सभापति पैनल के सदस्य का आसंदी पर बैठना भी चर्चित हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हैं कि विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह क्या उस दौरान सदन में उपस्थित नहीं थे या पार्टी के इस अभियान में शामिल थे ? या फिर  किसी राजनैतिक कारणों से सोची समझी साझा रणनीति के तहत उपाध्यक्ष के बजाय सभापति पैनल के आदिवासी सदस्य ज्ञानसिंह को आसंदी पर आसीन कराया गया था?यहां यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विधायक दल के उपनेता राकेश चौधरी और कल्पना पेरुलेकर को ज्ञानसिंह के साथ अपमानजनक व्यवहार करने के कारण ही अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा हैं। पहले कांग्रेस विधायकों द्वारा विस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के चेम्बरों का घेराव और उसके बाद आसंदी पर बैठे ज्ञान सिंह के साथ आरोपित अभद्र व्यवहार और फिर विस अध्यक्ष की उपस्थिति में संसदीय कार्य मंत्री द्वारा दोनों इंका विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का प्रस्ताव लाना और हल्ले गुल्ले के बीच बिना सफाई का अवसर दिये उसे ध्वनिमत से पारित कर देने की घटना ने प्रदेश की विधानसभा के इतिहास को कलंकित कर दिया हैं। 
भाजपाऔर इंका ने भी जिले में किया विरोध प्रर्दशन -विधानसभा  में घटित घटनाओं का जिले में भी असर हुआ हैं। पहले भाजपा ने धरना देकर कांग्रेस पर विधानसभा की गरिमा को कलंकित करने का आरोप लगाते हुये  राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। भाजपा ने यह आरोप भी लगाया कि विधानसभा में आसंदी पर बैठे सभापति पैनल के आदिवासी सदस्य ज्ञानसिंह का अपमान कर यह साबित कर दिया हैं कि कांग्रेस का लोकतांत्रिक परंपराओं में कोई विश्वास नही हैं। इस धरने में जिला भाजपा के तमाम नेता तो मौजूद थे लेकिन इस धरने में जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही। उनके निकटस्थ सहयोगियों का कहना हैं कि कुछ प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहने के कारण वे भोपाल से वापस नहीं आ पाये हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के कुछ कार्यकर्त्ताओं ने भी जिला इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी के नेतृत्व में विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी का पुतला दहन शुक्रवारी में किया। कांग्रेसजन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का पुतला नहीं जला पाये। कांग्रेसियों ने भी राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर भाजपा पर आरोप लगाया कि उसने सदन में बहुमत का दुरुपयोग करते हुये कांग्रेस के विधायकों की सदस्यता समाप्त कर लोकतंत्र की हत्या की हैं। आनन फानन में कांग्रेस के द्वारा आयोजित इस पुतला दहन कार्यक्रम की सूचना अधिकांश कांग्रेसियो को कार्यक्रम संपन्न होने के अखबारों में प्रकाशित समाचार से ही प्राप्त हुयी। विधानसभा में जो कुछ भी घटित हुआ उस बारे में एक दूसरे पर आरोप लगाकर भाजपा और कांग्रेस ने तो अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली लेकिन जो कुछ भी शर्मनाक घटनाक्रम हुआ उसने कई सवाल अनुत्तरित ही छोड़ दिये हैं। कांग्रेस यदि भ्रष्टाचार के मामले पर स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा करना चाहती थी तो आखिर भाजपा को इसमें क्या आपत्ति थी? लेकिन कांग्रेस के सदस्यों ने आसंदी पर बैठे सभापति के साथ जो र्दुव्यवहार किया क्या वह उचित था? कांग्रेस सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने वाला प्रस्ताव अध्यक्ष की उपस्थिति में हल्ले गुल्ले में ध्वनिमत से पास करना क्या उचित था? ये तमाम सवाल प्रदेश के सियासी हल्कों में कई दिनों तक गूंजते रहेंगें। “मुसाफिर“ 
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले से साभार

Monday, July 16, 2012


स्थानीय जमीनी कांग्रेसियों की मेहनत पर पानी फेरा हरवंश-मुनमुन नूरा कुश्ती ने?
ठीकरा फोड़ने की जुगत में जुटे भाजपायी 
सिवनी। नगर पंचायत लखनादौन के चुनाव में 8 पार्षद जीतने तथा 15 वार्डों में 3226 वोट पाने वाली कांग्रेस का अध्यक्ष पद से मैदान से बाहर होना राजनैतिक हल्कों में एक बार चर्चित हो गया हैं। जबकि पूरी ताकत झोंकने के बाद भी भाजपा 3 पार्षद जीतने एवं अध्यक्ष पद के लिये 1880 और 15 वार्डों में मात्र 2375 वोट ही ले सकी हैं। सभी भाजपा नेता एक दूसरे के सिर पर इस हार का ठीकरा फोड़ने के प्रयास में जुटे हुये हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह और मुनमुन की सांठ गांठ के कारण स्थानीय कांग्रेस नेताओं की मेहनत पर पानी फिर गया हैं। 
कांग्रेस ने किया शानदार प्रदर्शन-लखनादौन विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा हैं। आजादी के बाद से इस क्षेत्र से कांग्रेस ही जीतती रही हैं। लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों से कांग्रेस इस क्षेत्र से हार रही हैं। यहां से भाजपा की शशि ठाकुर विधायक हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस विधानसभा क्षेत्र से लगभग 23 हजार वोटों की बढ़त ली थी जो कि इंका सांसद बसोरीसिंह मसराम की जीत का एक प्रमुख कारण बनी थी। जबकि जिले के इकलौते इंका विधायक एवं विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के केवलारी विस क्षेत्र से लोस चुनाव में कांग्रेस करीब 3 हजार वोटों से हार गयी थी। पिछले लोस चुनाव की तरह ही लखनादौन क्षेत्र में हुये इस चुनाव में भी कांग्रेस ने शानदार प्रर्दशन तो किया लेकिन यहां से अध्यक्ष पद का कांग्रेस का कोई उम्मीदवार ही मैदान में नहीं था। इसके बावजूद भी कांग्रेस ने पंचायत के 15 वार्डों में से अपने 8 पार्षद जितवा कर बहुमत बनानेे में सफलता प्राप्त की हैं। इतना ही नहीं वरन कांग्रेस के पंजे को 15 वार्डों में कुल 3226 वोट मिले हैं। जबकि निर्दलीय उम्मीदवार श्रीमती सुधा राय को 6628 वोट लेकर भाजपा प्रत्याशी को 4548 वोट से भाजपा उम्मीदवार से चुनाव जीत गयी थीं।  इन राजनैतिक परिस्थितियों में कांग्रेस यदि अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ती तो परिणाम कुछ और भी आ सकते थे। राजनैतिक विश्लेषकों का ऐसा भी मानना हैं कि चुनावी वातावरण को भांप कर ही विकास के नाम पर चुनाव जीतने का दावा करने वाले मुनमुन राय अंतिम समय में फिल्मी कलाकारों के रोड़ शो करवा कर माहौल अपने पक्ष में करने का प्रयास किया था। 
दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ने की जुगत में जुटे भाजपायी - भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, संगठन मंत्री अरविंद मैनन,राज्यसभा सदस्य एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते,पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल,मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर,जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन,विधायकगण शशि ठाकुर,नीता पटेरिया एवं कमल मर्सकोले सहित तमाम भाजपायी दिग्गजों की फौज भी इस चुनाव में पंद्रह में मात्र तीन पार्षद ही जिता पायी। अध्यक्ष पद के लिये भी भाजपा को मात्र 1880 वोट ही मिल सके। नगर के पंद्रह वार्डों में पार्षद पर के भाजपा प्रत्याशियों को मात्र 2475 वोट ही मिल पाये जो कि अध्यक्ष को मिले वोटों से लगभग 500 अधिक हैं। मीडिया में कभी यह समाचार छपता कि नरेश दिवाकर को विशेष चुनाव संचालक बनाया गया हैं तो कभी यह प्रकाशित होता था कि चुनाव की कमान जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन थामे हुये हैं। जीत का सेहरा अपने सिर पर बंधाने के लिये जितने भी भाजपा नेता उतावले थे वे सभी अब खुद को बचाते हुये दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ने की जुगत जमाते देखे जा सकते हैं।
जिले में कांग्रेस के इतिहास का सर्वाधिक कलंकित अध्याय-लखनादौन के कांग्रेस के स्थानीय जमीनी कार्यकर्त्ताओं की मेहनत और तमन्नाओं पर एक राजनैतिक फिक्सिंग ने पानी फेर दिया हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि लोस चुनाव में केवलारी से कांग्रेस के हारने और क्षेत्र निर्णायक कलार समाज के वोटों पर मुनमुन राय की पकड़ से चिंतित इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह 2013 के चुनाव के लिये कोई भी खतरा मोल लेना नहीं चाहते थे। इसीलिये हरवंश सिंह ने मुनमुन रा से सांठगांठ करके यह सारा राजनैतिक खेल खेला था। वैसे भी पार्टियां सामान्य तौर पर एक डमी उम्मीदवार का भी फार्म भरातीं हैं ताकि यदि घोषित उम्मीदवार का नामांकन किन्हीं कारणों से चुनाव मैदान से बाहर हो जाये तो डमी उम्मीदवार को चुनाव लड़ाया जा सके। जिले के कद्दावर इंका नेता हरवंश सिंह इस बात से अनभिज्ञ होंगें? इसे कोई भी नहीं मानेगा। इसके बाद भी अध्यक्ष चुनाव से कांग्रेस का प्रत्याशी ना रहना बड़े ही आश्चर्य की बात हैं। वैसे अपने हित के लिये कांग्रेस की बली देना हरवंश सिंह के लिये कोई नयी बात नहीं और यही इस चुनाव में भी हुआ जिसने जिले में कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया हैं।
पूरे प्रदेश में बने इस रिकार्ड एवं जिले में कांग्रेस के इतिहास को सर्वाधिक कलंकित करने वाली इस घटना पर कांग्रेस आलाकमान की कार्यवाही पर राजनैतिक विश्लेषकों की नजरें टिकी हुयी हैं।          
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोने से साभार