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Wednesday, October 2, 2013

गांधीगिरी दिखाकर कांग्रेसियों ने शिवराज से पूछे सवाल
सवनी । आज सुबह मु यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जब उर्दू स्कूल में आयोजित आदिवासी सम्मेलन में शामिल होने पहुंच रहे थे उसके पूर्व ही कांग्रेसियों ने अपनी पूर्व घोषणा अनुसार बस स्टेंड में खड़े होकर मुख्यमंत्री को उनके द्वारा की गई अब तक की घोषणाओं का स्मरण पत्र सौंपने का कार्यक्रम निश्चित किया था। कहीं कोई अप्रिय स्थिति न बने इस हेतु कांग्रेस के जमावड़े को देखकर एसडीओपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पुलिस बल यहां आ गया और एसडीओपी द्वारा कांग्रेसियों को यहां से हटने की समझाईश दी गई लेकिन इंका कार्यकर्ता इसके लिये तैयार नहीं हुये। आखिरकार जैसे ही मुख्यमंत्री का काफिला कार्यक्रम स्थल के लिये यहां पहुंचा तो पुलिस बल ने कांग्रेसियों के समक्ष अपनी दीवार खड़ी कर दी।
इस स्थति को देख मुख्यमंत्री स्वयं रूके और उन्होंने वाहन से उतरकर कांग्रेस के प्रमुख प्रतिनिधियों से वह स्मरण पत्र लिया। जिसमें कांग्रेस के द्वारा दस प्रमुख मांगों का उल्लेख किया गया। इनमें पहली मांग जिले को संभाग का दर्जा देना, दूसरा मेडीकल कालेज तीसरा नर्सिंग कॉलेज तथा लखनादौन अस्पताल का उपनयन, दो आकाशवाणी केन्द्र, छपारा और केवलारी को नगर पंचायत का दर्जा, पलारी में उप तहसील, कान्हीवाड़ा में पूर्ण तहसील एवं उसे विकासखंड बनाना, जिले को प्रदेश में नंबर एक बनाना, फोरलेन के रूके कार्य को पूरा कराना, सिवनी को मॉडल नगर बनाना और दल सागर तालाब को रमणीक स्थल बनाना शामिल हैं।
अंत में सौंपे गये स्मरण पत्र में उल्लेख है कि उक्त स्थितियों के चलते जब आपने सिवनी नगर को कोरी घोषणाओं के अलावा कुछ नहीं दिया तो यहां की जनता आपको अपना आर्शीवाद क्यों दे?
स्मरण पत्र सौंपते समय जिला       अध्यक्ष हीरा आसवनी एवं नगर अध्यक्ष इमरान पटेल ने मुख्यमंत्री से कहा कि आपकी कोई भी घोषणा अब तक पूरी नहीं हुई है तो  गुलाब का फूल लेते हुये मुस्कुराकर मुख्यमंत्री ने जवाब दिया कि जनाब आप निश्चिंत रहें सारी घोषणाएं पूरी होंगी। मुख्यमंत्री जब आगे बढऩे लगे तो कांग्रेसियों ने जमकर नारेबाजी की। इस अवसर पर जिला इंका अध्यक्ष हीरा आसवानी, वरिष्ठ नेता आशुतोश वर्मा, नेहा सिंह, पप्पू खुराना, असलम खान, ठा. रजनीश सिंह, जिला पंचायत के अध्यक्ष मोहनसिंह चंदेल,जकी अनवर,फिरोज खॉन, शिव सनोडिया, सुरेन्द्र करोसिया, सोहेल अलवी,,  सुबोध मालू,सुनील संजय बघेल, सोहेल पाशा, आनंद व संतोष पंजवानी, शाहिद खान सहित अन्य इंका के लोग उपस्थित थे।

साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
1 अक्टूबर 2013 से साभार

Wednesday, September 25, 2013

आडवानी का मोदी विरोध महज एक दिखावा या संघ की रणनीति
भारतीय जनता पार्टी के पितृ पुरुष माने जाने वाले लालकृष्ण आडवानी के विरोध को दो बार दर किनार करके नरेन्द्र मोदी को पहले चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और फिर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना क्या उतना ही सहज सरल और पारदर्शी है, जितना दिखायी दे रहा है या फिर पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और है? क्या भाजपा में संघ के आर्शीवाद से उदारवादी अटलबिहारी वाजपेयी और हिन्दूवादी लालकृष्ण आडवानी की जोड़ी को सुनियोजित तरीके से अब उदारवादी लालकृष्ण आडवानी और हिन्दूवादी नरेन्द्र मोदी के रूप में बदला जा रहा है? ये यक्ष प्रश्न आज देश के राजनैतिक क्षितिज में उत्सुकता के साथ चर्चित है।
स्मरणीय है कि सन 1977 में भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ था। जनता पार्टी की पहली गैर कांग्रेसी केन्द्र सरकार में अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी दोनों ही मंत्री बने थे। लेकिन जनता पार्टी की सरकार के मात्र ढ़ाई साल में गिर जाने का कारण भी इसमें शामिल समाजवादी दलों के नेताओं द्वारा जनता पार्टी और आर.एस.एस. की दोहरी सदस्यता का मसला ही था। इसके बाद पूर्व जनसंघ घटक के नेताओं ने एक अलग पार्टी बनायी जिसका नाम भारतीय जनता पार्टी रखा गया। केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी दूसरी गैर कांग्रेसी सरकार भी भाजपा के बाहरी समर्थन से बनी थी। इस दौरान भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी राम रथ पर सवार होकर  सोमनाथ से अयोध्या की यात्रा पर राम मंदिर के मुद्दे को लेकर निकल पड़े थे। यह वाकया भी कम रोचक नहीं है कि जब मीडिया ने इस पर अटल जी से आगे की रणनीति पर टिप्पणी मांगी थी तो अटल जी ने यह कहा था कि ये तो शेर की सवारी है आगे जो भी करेगा वो शेर ही करेगा। बिहार में लालू यादव द्वारा रथ यात्रा को रोककर आडवानी को गिरफ्तार कर लिया तो भाजपा के समर्थन वापस लेने से केन्द्र की दूसरी गैर कांग्रेसी सरकार भी गिर गयी थी।
भाजपा के गठन से ही निरंतर कुछ ऐसे राजनैतिक घटनाक्रम होते गये कि अटल जी एक उदारवादी नेता के रूप में उभरे तो दूसरी ओर आडवानी जी की छवि एक हिन्दूवादी नेता की बनती रही।  अतीत के इस दौर में संघ चट्टान की तरह आडवानी जी के पीछे खड़ा दिखायी देता था। अटल आडवानी की इस जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा ने केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व में सरकार बनायी और आडवानी जी गृह मंत्री बने। इस दौर में उन्हें लोह पुरुष का दर्जा भी भाजपा में दिया गया। जबकि आडवानी के गृह मंत्री रहते हुये ही काश्मीर के कट्टरपंथी आतंकवादियों को विदेश मंत्री जसवंत सिंह कांधांर तक छोड़ कर आये थे। हालांकि इस दौरान अटल आडवानी द्वारा की जाने वाली रोजा अफ्तार की दावतें भी बहुत चर्चित रहती थीं। एन.डी.ए. के ऐजेन्डे में राम मंदिर का मुद्दा ना होने को कारण बता कर भाजपा ने इससे भी किनारा कर लिया था। 
अस्वस्थ हो जाने के कारण देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से दूर हो गये। ऐसे में देश की राजनीति की मांग के अनुरूप भाजपा और संघ को अटल जी के बदले एक उदारवादी चेहरे की आवश्यकता थी। ऐसा माना जा सकता है कि इसकी सुनियोजित शुरुआत उस वक्त हुयी जब पाकिस्तान के दौरे पर गये देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी ने जिन्ना की मजार पर जाकर फूल चढ़ाये। संघ ने इसका भारी विरोध किया जिससे आडवानी की धर्म निरपेक्ष छवि बनना प्रारंभ हुई। दूसरी तरफ गुजरात के गोधरा कांड़ के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कट्टरवादी हिन्दू नेता के रूप में उभर कर सामने आ गये। हालाकि गोधरा कांड़ के बाद अटल जी ने मोदी राजधर्म निभाने की सलाह तो दी लेकिन कोई कठोर कार्यवाही नहीं की थी। गुजरात में तीसरी पारी खेलने के बाद मोदी के व्यक्तित्व को संघ के इशारे पर विशाल रूप में प्रचारित किया गया।
संघ ने मोदी पर दांव लगाने का फैसला किया और उन्हें चुंनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित करने के लिये भाजपा पर दवाब बनाया। लेकिन आडवानी इस वक्त मोदी की घोषणा के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि नवम्बर 2013 में राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद यह घोषणा की जाये। अपने मोदी विरोध के चलते आडवानी गोवा में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुये। लेकिन उनके विरोध को दरकिनार करते हुये संघ के दवाब में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित कर दिया। इससे नाराज आडवानी ने भाजपा में अपने सभी पदों से स्तीफा दे दिया था जिसे चंद दिनों बाद ही वापस भी ले लिया। हाल ही में नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया। आडवानी इस बार भी इस पक्ष में नहीं थे कि यह घोषणा अभी की जाये। अपने विरोध के चलते इस बार भी आडवानी भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में नहीं गये लेकिन संघ के दवाब में भाजपा ने आडवानी के विरोध को एक बार फिर दरकिनार करते हुये मोदी की घोषणा कर डाली। अपनी नाराजगी के बाद भी आडवानी ने दो दिन बाद ही छत्तीसगढ़ केे एक शासकीय समारोह में अपने भाषण में मोदी की जमकर तारीफ कर डाली। आडवानी का रूठना और मानना भी कहीं ऐसा ही तो नहीं है जैसे अटल जी ने मोदी को राज धर्म निभाने की सलाह देकर चुप्पी साध ली थी। शायद इीलिये अब यह धारणा बन गयी है कि संध आडवानी की धर्म निरपेक्ष छवि बनाये रखने के लिये उनका दिखावटी विरोध कर रहा है।
ऐसे हालात में यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि क्या आडवानी जैसा एक अत्यंत अनुभवी और उम्रदराज नेता एक ही गलती बार बार दोहरा सकता है? क्या आडवानी के मोदी विरोध को दरकिनार करने का साहस भाजपा ने इसलिये किया कि वो यह जानती थी कि ये विरोध महज एक दिखावा है? मोदी को लेकर दो बार दर्ज कराये गये अपने विरोध के चलते आडवानी अल्पसंख्यकों में यह संदेश देने में तो सफल हो गये कि वे उनके हित चिंतक है। ऐसा करके उन्होंने उनके उदारवादी नेता की छवि में तो इजाफा कर ही लिया है। इन्हीं सारे तथ्यों को देखते हुये ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि आडवानी का मोदी विरोध संघ की एक सुनियोजित रणनीति का ही हिस्सा था। संघ की यह योजना बहुत हद तक सफल भी रही कि जिस तरह भाजपा में अटलबिहारी वाजपेयी की उक उदारवादी नेता की छवि थी वैसे स्वरूप में अब आडवानी आ गये है और कट्टरवादी हिन्दू नेता के रूप में आडवानी की जगह नरेन्द्र मोदी ने ले ली है। इस तरह संघ अटल आडवानी की जोड़ी को आडवानी मोदी की जोड़ी के रूप में स्थापित करने में सफल हो गया है। अब यह तो आगामी लोकसभा चुनावों के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा कि संघ का यह प्रयोग कितना सफल होता है। 
               लेखक:- आशुतोष वर्मा,16 शास्त्री वार्ड, बारापत्थर सिवनी 480661 मो. 9425174640 



 

Tuesday, September 17, 2013

क्या बिल्डर माफिया तय करायेगा केवलारी की भाजपा टिकिट?
1977 मे राजेन्द्र अग्रवाल,1985 और 2003 में वेदसिंह ठाकुर को स्थानीय प्रत्याशी के रूप में टिकिट दी गयी थी: 62 और 90 में बाहरी गैर कांग्रेसी ही जीते थे चुनावं
सिवनी। जिले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण केवलारी विस क्षेत्र से कांग्रेस और भाजपा से कौन चुनाव लड़ेगा? इसे लेकर उत्सुकता बनी हुयी है। इंका विधायक हरवंश सिंह की मृत्यु के बाद भाजपा में टिकिट के लिये घमासान मचा है। कुछ भाजपायी स्थानीय और बाहरी उम्मीदवार की लड़ाई लड़ रहें तो कुछ दबी जुबान से यह कहने से नहीं चूक रहें हैं कि इस सीट का फैसला प्रदेश के बिल्डर माफिया करायेगें।
इस क्षेत्र से लगातार चार बासर चुनाव जीतने वाले इंका नेता हरवंश सिंह की मृत्यु के बाद ऐसा माना जा रहा है कि उनके पुत्र रजनीश सिंह ही कांग्रेस के उम्मीदवार होंगें। वैसे डॉ. वसंत तिवारी,कु. शक्ति सिंह  और जकी अनवर जैसे नाम भी चर्चित है लेकिन अधिकांश कांग्रेसी यह मान कर चल रहें हैं कि रजनीश सिंह ही प्रत्याशी होंगें।
टिकिट को लेकर इस बार भाजपा में ज्यादा घमासान मचा हुआ है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछला चुनाव भाजपा के पूर्व मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने लड़ा था और स्व. हरवंश सिंह बमुश्किल लगभग 59 सौ वोटों से ही जीत पाये थे। इस बार हरवंश सिंह के ना रहने से बहुत से समीकरणों के बदलने के आसार भी दिखायी दे रहें है।
केवलारी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति शुरू से ऐसी रही है कि पूरे विस क्षेत्र में प्रभाव बना सकने वाले स्थानीय नेता बहुत कम ही रहते है। इसीलिये ज्यादातर चुनाव जिला स्तरीय बाहरी नेता ही इस क्षेत्र से जीतते आये हैं चाहे वे कांग्रेस के हों या गैर कांग्रेस दल के हों। सन 1957 में कांग्रेस के एम.पी.जठार, 62 में राम राज्य परिषद के दादू योगेन्द्रनाथ सिंह,67 से 85 तक कांग्रेस की कु. विमला वर्मा,93 से 2008 तक कांग्रेस के हरवंश सिंह चुनाव जीते थे जो कि सभी केवलारी क्षेत्र के बाहर के निवासी थी। 2008 के चुनाव में नये परिसीमन के बाद छपारा क्षेत्र जुड़ जाने के कारण हरवंश सिंह जरूर स्थानीय उम्मीदवार हो गये थे। 
सन 1977 में जनता पार्टी ने पलारी निवासी राजेन्द्र अग्रवाल को और 1985 तथा 2003 में भाजपा ने वेदसिंह ठाकुर के रूप में स्थानीय उम्मीदवार को टिकिट जरूर दी थी लेकिन वे जीत नहीं पाये थे। जबकि 1977 में जनता पार्टी की तथा 2003 में उमा भारती की लहर चल रही थी।
अब एक बार फिर भाजपा में स्थानीय उम्मीदवार को टिकिट देने की भाजपा में मांग उठ रही है। कई नेताओं का ऐसा मानना है कि हरवंश सिंह के निधन के कारण अब कोई भी चुनाव जीत सकता है।
वहीं दूसरी ओर भाजपा में यह चर्चा भी जोरों से चल रही है कि स्थानीय प्रत्याशी के नाम पर बीसावाड़ी निवासी और लंबे समय से भोपाल में रह रहे डॉ. सुनील राय को टिकिट दिलाने की योजना बनायी गयी। प्रशासनिक अमले द्वारा उन्हें दिये जाने वाले महत्व ने इन हवाओं को और पुख्ता करने का काम किया है। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार डॉ. राय दिलीप बिल्डिकॉन के मालिक दिलीप सूर्यवंशी के रिश्तेदार है। बताया तो यह भी जा रहा है कि डॉ. राय और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी बहुत पुरानी एवं घनिष्ठ सहेलियां हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में यह दावा करने वालों की भी कोई कमी नहीं है कि शिवराज केवलारी में कमजोर प्रत्याशी देकर स्व. हरवंश सिंह का राजनैतिक कर्ज उतारने के लिये ऐसा कर भी सकते हैं। हालाकि यह भी बताया जा रहा है कि रायशुमारी के दौरान डॉ. राय का नाम किसी भी मंड़ल से तीसरे नंबंर पर भी नहीं गया है। प्रदेश में तीसरी पारी खेलने को बेताब भाजपा इस क्षेत्र में किसे चुनाव लड़ायेगी? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं।
सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
17 सितम्बर 2013 

प्रदेश में अरविंद मैनन के पर कतरे जाने से जिले की भाजपा राजनीति में भी चुनाव के समय भारी बदलाव आ सकते है
 सिवनी विस क्षेत्र में भाजपा की घमासान थमने का नाम नहींे ले रही है। नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे जो सिवनी से लगना चालू हुये थे उनकी गूंज भोपाल तक पहुच गयी है। पर्दे के पीछे चल रही चर्चाओं के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा ने इस बार अरविंद मैनन के पर कतर दिये हैं। यदि यह सही है तो जिले की भाजपा की राजनीति में इसका असर होना स्वभाविक है। कांग्रेस में भी टिकिट आवंटन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक भी संपन्न हो गयी है। वर्तमान विधायकों के अलाव पिछला चुनाव एक हजार से कम वोटों से हारने वाले नेताओं के साथ ही स्व. हरवंश सिंह के पुत्र रजनीश सिंह का नाम भी आगे बढ़ा दिया गया है। भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर मचे घमासानकी चर्चाओं के बीच जिले के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हुआ। उन्होंने श्रीवनी में कार्यकर्त्ताओं की एक बैठक भी ली और फिर पत्रकारों से भी रूबरू हुये। भाजपा सूत्रों का यह भी दावा है कि सिवनी की टिकिट तय हाने में अब प्रहलाद पटेल की भूमिका महत्व पूर्ण हो सकती है। छपारा में हुआ तेंदूपत्ता वितरण कार्यक्रम इन दिनों विवादों में छाया हुआ है। इस कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री ठा. रजनीश सिंह मुख्य अतिथि थे। इसे लेकर भाजपा नेताओं में उबाल आया हुआ है।
भाजपा के असंतोष के पीछे कौन?-सिवनी विस क्षेत्र में भाजपा की घमासान थमने का नाम नहींे ले रही है। नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे जो सिवनी से लगना चालू हुये थे उनकी गूंज भोपाल तक पहुच गयी है। बीते दिनों भोपाल में प्रदेश भाजपा नेताओं के सामने भी कार्यकर्त्ताओं ने अपनी नाराजगी व्यक्त की और मांग उनके सामने रखी। पर्दे के पीछे चल रही चर्चाओं के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा ने इस बार अरविंद मैनन के पर कतर दिये हैं। बताया जा रहा है कि जबलपुर के एक सेक्स स्केंडल के कारण यह निर्णय लिया गया है। बताया जा रहा है कि प्रदेश के पूर्व संगठन मंत्री कप्तान सिंह सौलंकी और भगवत शरण माथुर को आगे लाया गया हैै। यदि यह सही है तो जिले की भाजपा की राजनीति में इसका असर होना स्वभाविक है। जिला भाजपा के कई नेताओं से मैनन के प्रगाण संबंध थे। कई नेताओं को मैनन ने ही आश्वस्त किया था कि उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ना है। ऐसे में अब नये समीकरणों में क्या होगा? यह कहना अभी संभव नहीं रह गया है। भाजपा में जो हालात देखे जा रहें और जिस तरीकेे से कार्यकर्त्ताओं का असंतोष उभर कर सामने आ रहा है उससे भाजपा का पार्टी विथ डिफरेंस का दावा तार तार हो गया है। सिवनी विधानसभा में ब्राम्हणों और बनियों के विरोध में जो कार्यकर्त्ता लामबंद हो रहे है उन्हें किसकी शह है? यह तो उजागर नहीं हुआ है लेकिन जिस तरीके से विधायक नीता पटेरिया और पूर्व विधायक तथा जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर के विरोध में सिवनी से लेकर भोपाल तक नारेबाजी हुयी है उसे महज चंद कार्यकर्त्ताओं की ही आवाज ना मान कर इसके पीछे किसी बड़े नेता का हाथ होना माना जा रहा है।तीसरी पारी खेलने को बेताब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे कैसे संभालेंगें? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं।वैसे तो भाजपा नेताओं का यह भी दावा है कि जिन भाजपा विधायकों की टिकिट पर तलवार लटक रही है उनमें नीता पटेरिया भी शामिल हैं। लेकिन उनका ब्राम्हण होने के साथ साथ महिला होना तथा केन्द्रीय भाजपा नेताओं के साथ उनके संपंर्कों को भी नकारा नहीं जा सकता। इसलिये अभी यह दावा करना कि कोई नया प्रत्याशी ही सामने आयेगा?यह कहना अभी संभव नहीं दिख रहा है।
कांग्रेस की प्रदेश चुनाव समिति ने चालू किया काम -कांग्रेस में भी टिकिट आवंटन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक भी संपन्न हो गयी है। इस बैठक में समिति ने प्रदेश के कांग्रेस विधायकों सहित पिछला चुनाव एक हजार से कम वोटों से हारने वाले नेताओं का नाम भी आगे बढ़ा दिया है। इसमें जिले की केवलारी विधानसभा क्षेत्र से स्व. हरवंश सिंह के पुत्र ठा. रजनीश सिंह का नाम भी आगे बढ़ा दिया है। अब इन नामों पर प्रदेश की स्क्रीनिंग कमेटी और फिर केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में विचार होगा जिसके बाद ही टिकिटों का अंतिम फैसला होगा। इसके अलावा अब प्रदेश की चुनाव समिति की अगली बैठक 17 सितम्बर को दिल्ली में होना है। जिसमें बाकी बची टिकटों के बारे में चर्चा होगी। इसमें या अगली बैठक में जिले की शेष तीन सीटों के बारे में विचार होना है। इनमें लखनादौन से हिमाचल की राज्यपाल उर्मिला सिंह के पुत्र योगेन्द्र सिंह, पूर्व विधायक बेनी परते और जनपद अध्यक्ष राजेश्वरी उइके के बीच घमासान है। जिले की दूसरी आदिवासी सीट बरघाट में भी रोचक स्थिति बनी हुयी है जहां एक प्रत्याशी अर्जुनसिंह काकोड़िया के विरुद्ध बाकी 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये है। यहां आदिवासियों में गौड़ और परघान का विवाद मचा हुआ है। जिले में सबसे अधिक घमासान जिला मुख्यालय की सिवनी सीट पर मचा हुआ है। इस बार यह मांग भी जबरदस्त रूप में उठी हुयी है कि जिले में एक सीट अल्प संख्यक वर्ग को दी जाये। यदि केवलारी से रजनीश सिंह का नाम फायनल हो जाता है तो यह दवाब सिवनी सीट पर ही बन जायेगा। पांच बार से हारने वाले इस क्षेत्र से 38 लोगों ने टिकिट मांगी है। इनमें से किसके नाम पर टिकिट आयेगी? यह कहना तो अभी संभव नहीं है। 
प्रहलाद पटेल का दौरा भाजपाइयों में हुआ चर्चित  -भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर मचे घमासानकी चर्चाओं के बीच जिले के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हुआ। उन्होंने श्रीवनी में कार्यकर्त्ताओं की एक बैठक भी ली और फिर पत्रकारों से भी रूबरू हुये। सियासी हल्कों में जारी चर्चाओं के अनुसार वे भाजपा के असंतोष को दूर करने के लिये आये थे। भाजपा के सूत्रों का दावा है कि इस विवाद में चूंकि जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर खुद एक पार्टी बने हुये हैं इसीलिये प्रदेश नेतृत्व ने प्रहलाद पटेल को सुलझाने की जवाबदारी दी है। भाजपा सूत्रों का यह भी दावा है कि सिवनी की टिकिट तय हाने में अब प्रहलाद पटेल की भूमिका महत्व पूर्ण हो सकती है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्रहलाद पटेल के सांसद रहते ही भाजपा ने पहली बार सिवनी सीट 1990 में कांग्रेस के स्व. हरवंश सिंह को हरा कर स्व. पं. महेश शुक्ला ने जीती थी और यह सिलसिला आज तक जारी है। 
बोनस वितरण कार्यक्रम के कांग्रेसीकरण पर बौखलाये भाजपायी-छपारा में हुआ तेंदूपत्ता वितरण कार्यक्रम इन दिनों विवादों में छाया हुआ है। इस कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री ठा. रजनीश सिंह मुख्य अतिथि थे। इसे लेकर भाजपा नेताओं में उबाल आया हुआ है। सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र टांक ने इस मामले में विज्ञप्ति जारी कर विभागीय अधिकारियों में दोषारोपण किया। फिर भाजपा के छपारा मंड़ल के महामंत्री शाहिद पटेल ने भी इसी आशय की विज्ञप्ति जारी कर विरोध जताया। स्थानीय भाजपा नेताओं के इस विरोध ने कई सवाल खड़े कर दिये है। प्रदेश में सरकार भाजपा की है। मुख्यमंत्री से लेकर जिले के तीन विधायक भाजपा के है। उसके बाद भी यदि अधिकारी किसी शासकीय कार्यक्रम में किसी कांग्रेस नेता को मुख्य अतिथि बनाता है तो इसमें गलती किसकी है? यदि अधिकारियों की गलती है तो फिर विज्ञप्ति जारी करने के बजाय उसके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं करते? या फिर स्थानीय भाजपा नेताओं इस बात से भयभीत है कि उनके चाहने के बाद भी वे अपनी सरकार से कार्यवाही नहीं करा सकते है इसलिये सिर्फ विज्ञप्ति जारी कर अपना असंतोष व्यक्त कर रहें है। बीते कई सालों से चल रहा भाजपा का नूरा कुश्ती का दौर अभी भी खत्म होगा या नहीं? इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें होती रहती है। “मुसाफिर”
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
17 सितम्बर 2013 से साभार

Monday, August 26, 2013

जिला मुख्यालय की सीट से टिकिट के लिये इंका और भाजपा में मची भारी घमासान से राजनैतिक हल्कों में  सरगर्मी बढ़ी
 जिला मुख्यालय की राजनैतिक रूप से सर्वाधिक मूहत्वपूर्ण सिवनी विधानसभा सीट के लिये टिकिट की मारामारी कांग्रेस और भाजपा में तेज हो गया हैं। पिछले पांच चुनावों से भाजपा इस सीट से जीत रही है। इसलिये भाजपा नेताओं का मानना है कि सिर्फ टिकिट मिल जाये जीतना तो सुनिश्चित है ही। जिले की कांग्रेसी राजनीति में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का सीधा हस्तक्षेप बढ़ गया है इसीलिये राजनैतिक जानकारों का मानना है कि जिले में कांग्रेस की चुनावी रणनीति में होने ंवाला आमूल चूल परिवर्तन भाजपा की डगर आसान नहीं रहने देगा और जिले चारों विस क्षेत्रों में बिना कठिन परिश्रम किये जीतना संभव नहीं होगा। कांग्रेस भी टिकिट की लड़ायी में उलझी हुयी हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में टिकटार्थियों के लिये बनाये गये मानदंड़ और टिकिट का आवेदन लगाने वालों से मांगी गयी जानकारियों के कारण समीकरण काफी उलझ गये है। वैसे कांग्रेस इस द्वोत्र से 1990 से चुनाव हार रही हैं। लेकिन यह भी राजनैतिक रूप से कम महत्वपूर्ण बात नहीं है कि इस क्षेत्र से टिकिट मांगने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है। इस बार कांग्रेस और भाजपा के आलाकमान ने टिकिट देने की प्रक्रिया निर्धारित की है उससे एक बात तो हुयी है कि चुनाव लड़नें इच्छुक नेता जो मंड़ल या ब्लाक के पदाधिकारियों को अपने आधीन समझते थे उन्हें अपनी ही टिकिट ले लिये उनके दर पर पहुंचना पड़ रहा है। 
आयती जीत की संभावना नहीं फिर भी मची भाजपा में होड़ -जिला मुख्यालय की राजनैतिक रूप से सर्वाधिक मूहत्वपूर्ण सिवनी विधानसभा सीट के लिये टिकिट की मारामारी कांग्रेस और भाजपा में तेज हो गया हैं। पिछले पांच चुनावों से भाजपा इस सीट से जीत रही है। इसलिये भाजपा नेताओं का मानना है कि सिर्फ टिकिट मिल जाये जीतना तो सुनिश्चित है ही।इस क्षेत्र से दो बार स्व. महेश शुक्ला, दो बार नरेश दिवाकर चुने गये और वर्तमान में नीता पटेरिया भाजपा से विधायक है। भाजपा में टिकिट के लिये इस बार नीता और नरेश के अलावा पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी दावेदार के रूप में उभर कर सामने आयें है।लेकिन कार्यकर्त्ताओं एक वर्ग ने ब्राम्हण बनिया विरोधी मोर्चा खोल रखा है। क्षेत्र के कार्यकर्त्ता सम्मेलन में यह मुहिम जोरदार तरीके से चली भी थी। इसके बाद भाजपा में अब यह चर्चित हे गया है कि चौथा कौन? चौथा कौन की चर्चा चालू होते ही पूर्व मंत्री स्व. महेश शुक्ला कि पुत्र अखिलेश शुक्ला एवं पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष द्वय प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब,सुदर्शन बाझल एवं सुजीत जैन के नामों की चर्चा भी चाले हो गयी हैं। लेकिन ये सभी संभावित नाम भी ब्राम्हण एवं बनिया वर्ग से ही हैं। इन वर्गों के विरोध में मुहिम चलाने वाला तबका अपनी ओर से किसी सशक्त दावेदार का नाम आम सहमति से सामने नहीं ला पाया है। वैसे राजेन्द्रसिंह बघेल,नरेन्द्र टांक, घासीराम सनोड़िया, राजेश उपाध्याय,ज्ञानचंद सनोड़िया आदि नेताओं के नाम भी दावेदारों के रूप में सामने आ रहें है। इनमें से कौन बाजी मार लेगा? इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है लेकिन इस बार का चुनाव पिछले चुनावों जैसा नहीं होगा यह बात भाजपा आलाकमान भी जानता है कि सिवनी क्षेत्र में भाजपा को बिना कमर कस कर चुनाव लड़े आयती जीत नहीं मिलने वाली हैं। जिले के कांग्रेस के पुरोधा हरवंश सिंह के आकस्मिक निधन के बाद जिले की कांग्रेसी राजनीति में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का सीधा हस्तक्षेप बढ़ गया है इसीलिये राजनैतिक जानकारों का मानना है कि जिले में कांग्रेस की चुनावी रणनीति में होने ंवाला आमूल चूल परिवर्तन भाजपा की डगर आसान नहीं रहने देगा और जिले चारों विस क्षेत्रों में बिना कठिन परिश्रम किये जीतना संभव नहीं होगा। 
सिवनी क्षेत्र से कांग्रेस में भी मची है घमासान-कांग्रेस भी टिकिट की लड़ायी में उलझी हुयी हैं। एक तरफ तो राहुल गांधी के नाम पर राजा बघेल की टिकिट काफी पहले से सुनिश्चित मानी जा रही थी। लेकिन टिकिट की कवायत चालू होने के बाद बहुत सारा पानी बैनगंगा के पुल के नीचे से बह चुका है। राहुल गांधी के नेतृत्व में टिकटार्थियों के लिये बनाये गये मानदंड़ और टिकिट का आवेदन लगाने वालों से मांगी गयी जानकारियों के कारण समीकरण काफी उलझ गयें हैं। वैसंे तो कांग्रेस में 38 लोगों ने टिकिट मांगी थी लेकिन अनुशासनहीनता के आरोपों के चलते जिले के उपाध्यक्ष खुमान सिंह के निष्कासन के बाद यह संख्या अब 37 रह गयी है। कांग्रेस के प्रमुख दावेदारों में राजकुमार खुराना,नेहा सिंह,दिलीप बघेल,रमेश जैन, मोहन चंदेल, चंद्रभान सिंह बघेल,ठा. धमेन्द्र सिंह के अलावा अल्पसंख्यक नेताओं में जकी अनवर, सुहेल पाशा, असलम भाई,आरिफ पटेल,साबिर अंसारी प्रमुख हैं। वैसे कांग्रेस इस द्वोत्र से 1990 से चुनाव हार रही हैं। लेकिन यह भी राजनैतिक रूप से कम महत्वपूर्ण बात नहीं है कि इस क्षेत्र से टिकिट मांगने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है। हाल ही में प्रदेश कांग्रेस के निर्देश पर इस क्षेत्र में कांग्रेस संदेश यात्रा भी प्रारंभ हो गयी हैं। 24 अगस्त से प्ररंभ यह यात्रा 30 अगस्त चलेगी। इस यात्रा में सभी संबंधित ब्लाक कांग्रेस के पदाधिकारी एवं टिकटार्थी शामिल हो रहें हैं। इस यात्रा के दौरान कांग्रेस नेता एक फोल्डर के माध्यम से कांग्रेस की केन्द्र सरकार की उपलब्धि और भाजपा की प्रदेश सरकार की पोल भी खोल रहें है। कांग्रेस में एक यह मांग भी जबरदस्त तरीके से उठ रही है कि इस बार सिवनी या केवलारी क्षेत्र से मुस्लिम नेता को टिकिट दी जाये। राहुल गांधी की गाइड लाइन,कांग्रेस के पर्यवेक्षकों की कवायत एवं नव नियुक्त प्रदेश प्रभारी मोहनप्रकाश के सख्त निर्देशों के चलते किसे टिकिट मिली है यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना जरूर है कि अच्छे उम्मीदवार को टिकिट और कांग्रेसी यदि एक रहे तो भाजपा के लियें सीट गंवाने का खतरा भी हो सकता है। 
तो कांग्रेस और भाजपा में उत्साह का संचार तो हो ही जायेगा-इस बार कांग्रेस और भाजपा के आलाकमान ने टिकिट देने की प्रक्रिया निर्धारित की है उससे एक बात तो हुयी है कि चुनाव लड़नें इच्छुक नेता जो मंड़ल या ब्लाक के पदाधिकारियों को अपने आधीन समझते थे उन्हें अपनी ही टिकिट ले लिये उनके दर पर पहुंचना पड़ रहा है। राहुल गांधी के भोपाल प्रवास के दौरान अधिकांश पदाधिकारियों ने उन्हें महत्व ना मिलने की बात की थी। राहुल गांधी के निर्देश पर कांग्रेस पर्यवेक्षकों ने इस बार ब्लाक कांग्रेस कमेटी से भी सुझाव मांगे तथा तीन तीन नाम प्रस्तावित करने को कहा। इससे यह हुआ कि अपने आप को बहुत बड़ा नेता मानकर टिकिट मांगने वालों को अपनी मनुहार लेकर उनके दर तक जाना पड़ा। इसी तरह भाजपा में भी रायशुमारी देने का जिन कार्यकर्त्ताओं को अधिकार दिये गये हैं उनके पास अपनी जुगाड़ जमाने के लिये वर्तमान और भावी विधायक पहुंच रहें हैं।दोनों ही पार्टियों द्वारा इस प्रक्रिया को अपनाने से पार्टी के कार्यकर्त्ताओं की प्रतिक्रिया संतोषजनक देखी जा रही हैं। यदि वास्तव में इसी के आधार पर टिकटें बंटतीं हैं तो इससे कार्यकर्त्ताओं में उत्साह का संचार तो हों ही जायेगा। 
“मुसाफिर“ 
सा. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी से साभार
27 अगस्त 2013   

Thursday, August 15, 2013

राजनैतिक हित साधने के लिये  धर्म , जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर नफरत के बीज बोने से परहेज करें वरना देश में विकास के पहिये थम जायेंगें
आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की 66 वीं वर्षगांठ मना रहा हैं। आजादी के बाद देश ने प्रजातंत्र के साथ साथ धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त को भी अंगीकार किया है। इसके तहत सर्व धर्म समभाव की नीति का पालन किया गया। हर धर्म के मानने वाले नागरिकों को अपने अपने  धर्मानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता तो दी गयी है लेकिन किसी दूसरे के धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं दिया गया हैं। लेकिन धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण कर सत्ता के गलियारे तक पहुंचने की ललक ने देश के राजनीतिज्ञों को धर्म की आड में राजनीति करने का रास्ता खोल दिया। धर्म,जाति और क्षेत्रीयता के शार्ट कट से सत्ता पाने का लालच राजनीतिज्ञ छोड़ नहीं पाये और इसी कारण वासुदैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को मानने वाले देश में तरह तरह के विभाजन दिखायी देने लगे हैं। अब धर्मनिरपेक्षता और छद्म धर्मनिरपेक्षता के शब्द राजनैतिक गलियारों में आरोप प्रत्यारोप लगाने में उपयोग होते दिखायी दे रहें हैं। कोई राजनैतिक दल अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहता है तो दूसरा उसे मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगाता हैं। वहीं दूसरी ओर आरोप लगाने वाले खुद ही सत्ता में आने के बाद वही कुछ करते नजर आते हैं जिनके आधार पर वे दूसरे दल पर छद्म धर्मनिरपेक्षता का आरोप लगाते हैं। एक ही राजनैतिक दल के दो मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से अलग अलग आचरण करते दिखायी दे रहें है। एक मुख्यमंत्री सदभावना मंच पर एक मौलवी द्वारा पहनायी जा रही टोपी पहनने से इंकार कर कट्टर हिन्दू होने का संकेत देता है तो दूसरा मुख्यमंत्री ईद मिलन समारोह में इस्लामी टोपी पहनकर खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने का प्रयास करता है। लेकिन मंशा दोनों की ही एक है कि वे अपनी पार्टी को मजबूत करना चाहते है। क्या राजनेताओं का यह आचरण उचित है? लेकिन यह शाश्वत सत्य है कि विभिन्नता में एकता ही भारत की विशेषता है। हमारे देश में अलग अलग धर्म और जाति के लोग आपस में भाई चारे के साथ रहते है। इसीलिये धर्म और जाति को आधार मानकर राजनैतिक बिसात बिछाना देश के लिये हितकारी नहीं हैं। भारत एक विकासशील देश है। विकास की प्रक्रिया सतत जारी रखने के लिये यह आवश्यक है कि देश में अमन चैन कायम रहे। आज यह समय की मांग है कि देश में राजनैतिक नेतृत्व करने वाले राजनेता अपने राजनैतिक हित साधने के लिये  धर्म और जाति के आधार पर नफरत के बीज बोने से परहेज करें वरना देश में विकास के पहिये थम जायेंगें और देश के नौनिहालों का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा और आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।़ इसलिये आइये आज के दिन हम यह संकल्प लें कि हम अपने राजनैतिक हितों के लिये हम धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर समाज को बंटने नहीं देंगें और देश के समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगें।     

Tuesday, August 6, 2013

विस चुनाव के इस दौर में जिले में अभी से टिकिट के बजाय के बजाय मंत्री बनने का ताना बाना बुन रहे हैं भाजपा के शीर्ष नेता
 इन दिनों नगरपालिका की लीज को लेकर समाचार पत्रों में तरह तरह के समाचार प्रकाशित हो रहें हैं। बताया जा रहा है कि गंज क्षेत्र के कुछ व्यापारियों की लीज का नवीनीकरण होना हैं। इसमें अधिकांश व्यापारी संघ एवं भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। पालिका अध्यक्ष एवं भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी का सहयोग ना मिलने पर इन व्यापारियों ने युवा इंका नेता राजा बघेल एवं जिला इंका के महामंत्री चीकू सक्सेना से संपंर्क साधा । कांग्रेस पार्षदों के सहयोग से परिषद में प्रस्ताव भी पारित कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने के लिये मुनपा अधिकारी को अधिकृत कर दिया गया। कांग्रेस में पर्यवेक्षकों के दौरों के बाद टिकिट मांगने वाले नेताओं ने प्रादेशिक नेताओं से मेल मुलाकात का दौर चालू कर दिया है। मोहन समर्थकों में चल रही चर्चा के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष होने के नाते मोहन चंदेल अपने आप को महिमा मंड़ित कर स्वयमेव नेता दिखने के राजनैतिक संदेश देने में सफल रहें हैं। जिला भाजपा में चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के तार विधानसभा चुनाव से जुड़े बताये जा रहें है। दरअसल में इस स्थानीय समीकरण के पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि सरकार बनने पर मंत्री बनने की जुगाड़ हैं। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है?
संघ और भाजपा में सेंध लगायी इंकाइयो ने?-इन दिनों नगरपालिका की लीज को लेकर समाचार पत्रों में तरह तरह के समाचार प्रकाशित हो रहें हैं। बताया जा रहा है कि गंज क्षेत्र के कुछ व्यापारियों की लीज का नवीनीकरण होना हैं। इसमें अधिकांश व्यापारी संघ एवं भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। इन समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि पालिका अध्यक्ष एवं भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी का सहयोग ना मिलने पर इन व्यापारियों ने युवा इंका नेता राजा बघेल एवं जिला इंका के महामंत्री चीकू सक्सेना से संपंर्क साधा और कांग्रेस पार्षदों के सहयोग से परिषद में प्रस्ताव भी पारित कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने के लिये मुनपा अधिकारी को अधिकृत कर दिया गया। प्रकाशित समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारी लेन देन के बाद भी मामला अटकाया जा रहा हैं जिससे व्यापारियों में आक्रोश है। राजनैतिक हल्कों में चर्चा है कि चुनावी समय में इस तरीके से इंकाइयों द्वारा संघ और भाजपा में सेंध लगाने का काम किया गया है जो कि चुनाव में लाभ दायक होगा। भाजपा के पालिका अध्यक्ष होने के बाद भी संघ समर्थक व्यापारी इंका नेताओं के संपंर्क में आये और उनकी मदद से परिषद में प्रस्ताव होने और लीज का नवीनीकरण ना होने से भाजपा के प्रति आक्रोश पैदा हो गया है।बताया जा रहा है कि मुनपा अधिकारी का कहना है कि नियमानुसार परिषद तीन साल से अधिक की लीज नहीं दे सकती जबकि व्यापारियों का कहना है कि भाजपा की पिछली परिषद की तरह इस बार भी 30 साल के लिये नवीनीकरण किया जाय। लेकिन मुनपा अधिकारी अपने अभिमत पर अड़े हुये है कि तीन साल से अधिक की लीज के लिये प्रकरण राज्य शासन को भेजने होंगें। सियासी हल्कों में दूसरी तरफ यह भी चर्चा है कि मामला लेन देन के इर्द गिर्द ही घूम रहा है कि लेन देन कहां हुआ, किसके साथ हुआ और यदि नियम नहीं था तो भाजपा की पिछली परिषद ने तीस साल के लिये लीज कैसे दी? इन सारे सवालों के जवाब तो नगर पालिका परिषद के कर्त्ता धर्त्ता या पालिका के मामलों में विशेष योग्यता हासिल कर चुके नेता ही बता सकते हैं लेकिन इतना तो तय है कि या तो पिछली भाजपा की परिषद ने नियम के विपरीत जाकर तीस साल की लीज दी थी या भाजपा की ही वर्तमान परिषद नियम होने के बाद भी तीस साल की लीज नहीं दे रही है। पालिका परिषद और प्रशासन से इस बात की अपेक्षा करना कोई बेमानी नहीं होगी कि वें इस बात का खुलासा करें कि भाजपा की पिछली परिषद ने नियम विपरीत काम किया है या वर्तमान परिषद नियम विपरीत काम कर रही है? 
प्रदेश के नेताओं के यहां दस्तक दी इंका टिकटार्थियों ने-कांग्रेस में पर्यवेक्षकों के दौरों के बाद टिकिट मांगने वाले नेताओं ने प्रादेशिक नेताओं से मेल मुलाकात का दौर चालू कर दिया है। जिले में पांच बार से हारने वाले सिवनी से 38 और आदिवासी क्षेत्र बरघाट से 19 नेताओं ने टिकिट के लिये आवेदन लगाये है। दोनों ही क्षत्रों क्रमशः 22 और 18 नेता लामबंद हो गये हैं। इन नेताओं ने बीते दिनों छिंदवाड़ा में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ से भेंट कर अपना पक्ष रखा था। पिछले दिनों सिवनी के 22 नेताओं के समूह ने भोपाल जाकर कांग्रेस नेताओं के यहां दस्तक दी है। इन नेताओं ने प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह,प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष से भेंट कर अपना पक्ष रखा और मांग की है कि इस बार प्रत्याशी ग्रामीण क्षेत्र से ही बनाया जाना चाहिये क्योंकि शहरी क्षत्र के नेता पिछले पांच बार से चुनाव हार रहें हैं। भोपाल गये लगभग 16 टिकटार्थियों में जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल और सिवनी के पूर्व विधायक रमेश जैन भी शामिल थे। मोहन समर्थकों में चल रही चर्चा के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष होने के नाते मोहन चंदेल अपने आप को महिमा मंड़ित कर स्वयमेव नेता दिखने के राजनैतिक संदेश देने में सफल रहें हैं।इस प्रतिनिधिमंड़ल द्वारा यह बताये जाने पर कि इस क्षेत्र से 38 नेताओं ने टिकिट के लिये आवेदन लगाया हैं तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आश्चर्य व्यक्त किया कि पांच बार से हारने वाले क्षेत्र से इतने आवेदक? कांग्रेसी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सिवनी और बरघाट से आवेदकों की संख्या बढ़ने का कारण यह बताया जा रहा है कि इस चुनाव में कांग्रेस में बिलोरन होने की संभावना कम है और कांग्रेस जीत भी सकती हैं। हालांकि इस तर्क के आधार अलग अलग लोग अलग ही बता रहें हैं लेकिन इससे इस बात से भी इंकार नहीं सकता कि हो रहे इस बिखराव को रोकना आसान नहीं होगा। 
भाजपा में मंत्री पद को लेकर बुने जा रहें हैं ताने बाने-जिला भाजपा में चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के तार विधानसभा चुनाव से जुड़े बताये जा रहें है। नेरश नीता गुट इस मामले में आमने सामने हैं। नरेश समर्थकों का मानना है कि सिवनी विस से नीता पटेरिया का जीतना संभव नहीं है। इसीलिये भाजपा को प्रत्याशी बदल कर नरेश को टिकिट देना चाहिये। केवलारी के इंका विधायक हरवंश सिंह के निधन के कारण आसान हो चुकी सीट को भाजपा को जीतने के लिये नीता पटेरिया को केवलारी से चुनाव लड़ाना चाहिये।वहीं केवलारी क्षेत्र के प्रबल दावेदार डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को बालाघाट संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाना चाहिये। दरअसल में इस स्थानीय समीकरण के पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि सरकार बनने पर मंत्री बनने की जुगाड़ हैं। यदि नरेश चुनाव जीतते है तो वे तीसरी बार के विधायक होगें,नीता केवलारी से जीततीं है तो वे दूसरी बार की विधायक होंगी जबकि यदि केवलारी से चुनाव लड़कर डॉ. बिसेन चुनाव जीतते है तो वे जिले के पांचवी बार के विधायक होंगें और भाजपा की उमा और गौर सरकार में वे मंत्री भी रह चुके है। इस तरह यदि डॉ. बिसेन को लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिये कहा जाता है तो नरेश और नीता के मंत्री बनने की होड़ में नरेश बाजी मार सकते है। वैसे वर्तग्मान में डॉ. बिसेन और नरेश दोनों ही केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त नेता हैं। मंत्री पद को लेकर बुने जा रहे इस ताने बाने के लिये ही भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही है और नरेश अपने ही किसी समर्थक को जिला भाजपा का अध्यक्ष बनाकर बाजी अपने हाथ में रखना चाह रहें हैं। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है? “ मुसाफिर “    
सा. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
06 अगस्त 2013