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Monday, March 30, 2015

जिला पंचायत चुनाव में डाले गये वोटों में एक ही खाने में पायी गयी एक से अधिक सीलों से गोपनीयता भंग नहीं हुयी?
भाजपा के रणनीतिकारों के अनुसार उन्होंने जो व्यवस्था जमायी थी उससे एक वोट कम मिला तो कैसे? भाजपा के रणनीतिकारों को कांग्रेस के सदस्यों के साथ साथ अपनी खुद की पार्टी के सदस्यों को भी “मैनेज“ करना पडा। भाजपायी सूत्रों का दावा है कि जो एक वोट निरस्त हुआ है वो भाजपा के किसी जयचंद का ही है। प्रदेश कांग्रेस के सचिव राजा बघेल ने बहुत स्पष्ट शब्दों में यह कहा था कि हर चुनाव के बाद समीक्षा बैठक होना चाहिये और उसके अनुसार कार्यवाही होना चाहिये ना कि कभी भी किसी चुनाव को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगते रहें। इंका के वरिष्ठ नेता आशुतोष वर्मा ने अपने संबोधन में कहा था कि कांग्रेस के जिन उम्मीदवारों को जनादेश मिला हैं उन्हें सब नेता अपना मानें। अपनों में ज्यादा अपना तलाशने के प्रयास नुकसानदायक हो जाते हैं। लेकिन इतिहास में पहली बार कांग्रेस ने बहुमत होने के बाद भी जिला पंचायत पर अपना कब्जा बरकरार नहीं रख पायी जो कि पिछले चार चुनावों से बना हुआ था। इसे लेकर राजनैतिक हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हैं। बीते दिनों संपन्न इस चुनाव में तीन या चार मतपत्रों में एक ही प्रत्याशी के सामने वाले खाने में एक से अधिक सील लगी पायी गयीं। इन मतपत्रों में दो से लेकर चार और पांच सीले लगी पायीं गयीं। एक बात और आश्चर्य के साथ यह पायी कि सभी सीलें स्पष्ट रूप से दिखायी दे रहीं थी। क्या मात्र 19 वोटों में ऐसा करना गोपनीयता को भंग करने वाला कृत्य नहीं हैं? क्या इन वोटों को निरस्त नहीं किया जाना चाहिये था ? 
जिपं चुनाव में भाजपायी जयचंद की भी चर्चा-जिला पंचायत के चुनावों के बाद जयचंदों की चर्चा थमने का नाम ही ले रहीं है। भाजपा के रणनीतिकारों के अनुसार उन्होंने जो व्यवस्था जमायी थी उससे एक वोट कम मिला तो कैसे? भाजपा को 6 तथा उसकी बागी गोमती ठाकुर सहित कुल 7 मेम्बर थे। भाजपा के रणनीतिकारों का दावा है कि उन्होंने कांग्रेस के तीन मेम्बरों को मैनेज किया था। एक कांग्रेसी वोट उन्हें चंद्रशेखर चर्तुवेदी का विधायक मुनमुन राय के माध्यम से मिलना था।इस तरह भाजपा को अध्यक्ष के लिये 11 वोट मिलना थे लेकिन भाजपा को दस वोट ही मिले। और एक वोट निरस्त हो गया। भाजपायी सूत्रों का दावा है कि जो एक वोट निरस्त हुआ है वो भाजपा के किसी जयचंद का ही है। चूंकि भाजपा अल्पतम में होने के बाद भी चुनाव जीत गयी है इसीलिये वहां जयचंद की तलाश करने के बजाय जीत श्रेय लेने का सिलसिला जारी  है। अखबारों में विज्ञापनों की होड़ लगी हुयी हैं। भाजपा के बड़े नेताओं ्रके साथ जिले के इकलौते भाजपा विधायक कमल मर्सकोले और निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय की फोटो े प्रकाशित हो रही हैं और उन्हें इन चुनावों का कुशल रणनीतिकार माना जा रहा है।संगठन को सत्ता से प्रमुख मानने वाली भाजपा के हाल भी कंछ अलग थे। इन चुनावों में भाजपा के जिलाध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर की भूमिका भी सत्तासीनों के बगलगीर होने से ज्यादा और कुछ नहीं थी। इसके अलावा एक बात और सामने आयी है कि भाजपा के रणनीतिकारों को कांग्रेस के सदस्यों के साथ साथ अपनी खुद की पार्टी के सदस्यों को भी “मैनेज“ करना पडा।  
प्रदेश सचिव के कहने के बाद भी नहीं हो पायी कांग्रेस की समीक्षा बैठक-नव निर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों के अभिनंदन के लिये आयोजित बैठक में ही प्रदेश कांग्रेस के सचिव राजा बघेल ने बहुत स्पष्ट शब्दों में यह कहा था कि हर चुनाव के बाद समीक्षा बैठक होना चाहिये और उसके अनुसार कार्यवाही होना चाहिये ना कि कभी भी किसी चुनाव को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगते रहें। इसके पूर्व इंका के वरिष्ठ नेता आशुतोष वर्मा ने अपने संबोधन में कहा था कि कांग्रेस के जिन उम्मीदवारों को जनादेश मिला हैं उन्हें सब नेता अपना मानें। अपनों में ज्यादा अपना तलाशने के प्रयास नुकसानदायक हो जाते हैं। इन्हीें कांग्रेसी मेम्बरों में से जिन्हें ज्यादा मेम्बर पसंद करें उसे अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष बनाना चाहिये। लकिन जब जिला पंचायत के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव हुये तो दोनो ही पदों पर कांग्रेस का हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इस चुनाव के पहले इंका विधायक रजनीश सिंह के निावास स्थान बर्रा में जिले के कांग्रेस नेताओं की प्रदेश के पर्यवेक्षकों सुरेश राय और पाली भाटिया की उपस्थिति और जिला इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी की अध्यक्षता में एक बैठक रखी गयी जिसमें विधायक योगेन्द्र सिंह बाबा सहित सभी नेता शामिल हुये। इस बैठक में कांग्रेस समर्थित चंद्रशेख चर्तुवेदी के अलावा सभी सदस्य शामिल हुये जो कि बाद में भाजपा की ओर से उपाध्यक्ष बने। बैइक के उदबोधनों के बाद रात में अधिकांश नेता चले गये लेकिन पर्यवेक्षक सहित सभी सदस्य रात को वहीं रहें। सदस्यों की रायशुमारी के अलावा प्रत्याशी चयन के लिये और क्या प्रक्रिया अपनायी गयी इसकी जानकारी अधिकांश नेताओं को नहीं दी गयी और दूसरे दिन सुबह लगभग सवा दस बजे मेम्बरों की उपस्थिति में सुरेश राय ने अध्यक्ष पद के लिये ऊषा पटले के नाम के साथ ही उपाध्यक्ष पद के लिये अशोक सिरसाम के नाम की घोषणा कर दी थी और तत्काल ही वाहनों में सवार होंकर काफिला सिवनी रवाना कर दिया गया था। किसी भी मेम्बर की किसी भी नेता से बात ही नहीं हुयी कि मेम्बर इस फैसले से संतुष्ट हैं कि नहीं? यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि श्रीमती पटेल केवलारी क्षेत्र से निर्वाचित हुयीं है तो अशोक सिरसाम के निर्वाचन क्षेत्र में केवलारी विस के एक प्रमुख राजनैतिक केन्द्र भोमा सहित कुछ गांव आते हैं। उम्मीद की जा रही थी कि प्रदेश कांग्रेस सचिव राजा बघेल के निर्देश के अनुसार इस बार समीक्षा बैठक होगी जिसमें खुल कर सभी बातों की चर्चा होगी और जयचंदों को तलाश कर उन्हें दंड़ित किया जायेगा लेकिन ऐसा कुछ भी तक नहीं हो पाया है। चुनाव के बाद कुछ मेम्बरों ने कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह जरूर बताया कि अधिकांश मेम्बरों की राय अध्यक्ष पद के लिये चित्रलेखा नेताम और उपाध्यक्ष पद के लिये जयकेश ठाकुर के लिये थी लेकिन उन पर यह फैसला थोप दिया गया। यदि ऐसा भी हाता तो क्याा होता? यह कहना आसान नहीं हैं लेकिन इतिहास में पहली बार कांग्रेस ने बहुमत होने के बाद भी जिला पंचायत पर अपना कब्जा बरकरार नहीं रख पायी जो कि पिछले चार चुनावों से बना हुआ था। इसे लेकर राजनैतिक हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हैं। 
मतपत्र में एक से अधिक सील से क्या गोपनीयता भंग नहीं होती?-सिवनी जिला पंचायत में मात्र 19 सदस्य मतपत्र के माध्यम से वेट डालकर अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। बीते दिनों संपन्न इस चुनाव में तीन या चार मतपत्रों में एक ही प्रत्याशी के सामने वाले खाने में एक से अधिक सील लगी पायी गयीं। इन मतपत्रों में दो से लेकर चार और पांच सीले लगी पायीं गयीं। एक बात और आश्चर्य के साथ यह पायी कि सभी सीलें स्पष्ट रूप से दिखायी दे रहीं थी। क्या मात्र 19 वोटों में ऐसा करना गोपनीयता को भंग करने वाला कृत्य नहीं हैं? क्या इन वोटों को निरस्त नहीं किया जाना चाहिये था?ये ऐसे सवाल है जो कि इस चुनाव के बाद से सियासी हल्कों में चर्चित हैं। यह बात भी साफ है कि जनादेश के अनुसार तो यह चुनाव कांग्रेस को जीतना था। लेकिन भाजपा की जीत से यह स्पष्ट है कि कुछ मैनेज किया गया। जब मैनेजमेंट किया जाता है तो यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि यह पता चल जाये कि जिसये मैनेज किया है उसने वोट दिया है कि नहीं? क्या एक से अधिक लगायी गयी सीलें इसी योजना का हिस्सा थी? यदि ऐसे वोट निकले थे तो फिर निरस्त करने की मांग क्यों नहीं की गयी? प्रशासनिक अधिकारी तो यह कह सकते हैं कि ऐसी कोई आपत्ति नहीं लगायी गयी। तब यह सवाल  ाी उठता है कि क्या जो एक वोट निरस्त हुआ है उसके लिये आपत्ति लगायी गयी थी?क्या मतदान की गोपनीयता बनाये रखना निर्वाचन में लगे प्रशासनिक अमले की जवाबदारी नहीं हैं? ये तमाम ऐसे सवाल है जो इसलिये चर्चित हो रहें हैं क्योंकि प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा ने बहुमत ना होने के बाद भी अपना अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष बनवा लिया है। “मुसाफिर“
सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
31 मार्च 2015 से साभार

Monday, March 23, 2015

बहुमत के बाद भी जिला पंचायत अध्यक्ष ,उपाध्यक्ष का चुनाव हारने वाली कांग्रेस जयचंदों को दंड़ित कर पायेगी?
 जिला पंचायत के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत होने के बाद भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। जिले के ग्रामीण मतदाताओं ने जिला पंचायत में कांग्रेस का जनादेश दिया था लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद पर भाजपा की मीना बिसेन और चंद्रशेखर चर्तुवेदी चुनाव जीत गयें हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने सिवनी में भाजपा का अध्यक्ष बिठाने के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और ऐसे विचार उन्होंने जिले के कुछ विधायकों से भी व्यक्त कर सहयोग का अनुरोध किया था। जब प्रदेश का मुखिया ही जनादेश के विपरीत ऐसा प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ले तो कुछ भी हो सकना संभव था। जब हर तरह के प्रयास के बाद भी बात नहीं बनी तो गोमती ठाकुर  बात मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से करायी गयी। विश्वसनीय सूत्र तो यहां तक दावा कर रहें हैं कि उन्हें महिला आयोग का सदस्य बना कर लाल बत्ती से नवाजने के लिये आश्वस्त कर दिया गया है। इस चुनाव में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत हाने के बाद भी कांग्रेस चुनाव हार गयी और भाजपा ने पहली बार बीस साल बाद जिला पंचायत में कब्जा कर लिया और उसकी मीना बिसेन अध्यक्ष बनीं। जबकि घंसौर से कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी घोषित किये गये चंद्रशेखर चर्तुवेदी भाजपा से उपाध्यक्ष चुने गये।कांग्रेस में हार का विश्लेषण किया जा रहा है और जयचंदों को तलाश कर उन्हें दंड़ित करने की बात की जा रही हैं। लेकिन क्या कांग्रेस जयचंदों को दंड़ित कर पायेगी?
जिपं में कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत हुयी चर्चित-जिला पंचायत के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत होने के बाद भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। जिले के ग्रामीण मतदाताओं ने जिला पंचायत में कांग्रेस का जनादेश दिया था लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद पर भाजपा की मीना बिसेन और चंद्रशेखर चर्तुवेदी चुनाव जीत गयें हैं। हालांकि इस चुनाव में जिले के कांग्रेस के दोनों विधायक रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह बाबा तथा भाजपा की ओर से कमल मर्सकोले और दिनेश मुनमुन राय सक्रिय थे। इस 19 सदस्यीय जिला पंचायत में कांग्रेस के 11 और भाजपा के 6 तथा दोनों ही पार्टियों के एक एक बागी चुनाव जीते थे। पंचायती राज लागू होने के बाद से लगातार चार बार कांग्रेस ने अपना कब्जा बनाये रखा था जो कि बीस साल बाद स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी समाप्त हो गया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के रणनीतिकार अपने क्षेत्र से निर्वाचित सदस्य को अध्यक्ष बनाने के मोह से परे नहीं रह पाये। इस कारण योग्यता की तुलना में क्षेत्रीयता हावी हो गयी और परिणाम विपरीत आ गये। यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने सिवनी में भाजपा का अध्यक्ष बिठाने के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और ऐसे विचार उन्होंने जिले के कुछ विधायकों से भी व्यक्त कर सहयोग का अनुरोध किया था। जब प्रदेश का मुखिया ही जनादेश के विपरीत ऐसा प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ले तो कुछ भी हो सकना संभव था। जिले के प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन और सांसदद्वय फग्गनसिंह कुलस्ते तथा बोधसिंह भगत भी इस प्रयास में जुट गये थे। अंततः भाजपा की मीना बिसेन को 10,कांग्रेस की केवलारी क्षेत्र से चुनी गयीं ऊषा दयाल पटेल को 8 तथा 1 वोट निरस्त हुआ जबकि उपाध्यक्ष पद में भाजपा के चंद्रशेखर चर्तुवेदी और कांग्रेस के अशोक सिरसाम को 9 9 वोट मिले और एक वोट इसमें भी निरस्त हुआ। इस तरह कांग्रेस के खेमे के अध्यक्ष पद में दो तथा उपाध्यक्ष पद में एक वोट बाहर गया और कहा जाता है कि प्रत्याशी चयन से नाराज एक सदस्य ने दोनों ही समय अपना वोट एक ही तरीके से निरस्त करवा दिया। कांग्रेसी खेमें में एक तरफ तो इस बात को लेकर खोज जारी है कि आखिर अपनें में ही जयचंद कौन हैं? तो दूसरी तरफ कुछ नेताओं का यह भी मानना है कि कांग्रेसी सदस्य जयचंद क्यों बने? इसके कारणों को भी तलाशना चाहिये। चुनाव के बाद कुछ कांग्रेसी सदस्यों ने प्रत्याशी चयन के तरीके से भी नाराजगी जतायी हैं तो कुछ सदस्यों का यह भी कहना है कि सदस्यों की राय कुछ और थी और उन पर यह निर्णय थोपा गया था। इसीलिये कांग्रेस को हार का सामना पड़ा। कुछ राजनैतिक प्रेक्षक तो यह मान रहें कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था तो फिर कहीं भी कुछ भी हो जाना असंभव नहीं हैं?
शिवराज से बात करने के बाद मानीं गोमती?-जिले के भाजपा नेताओं ने जिला पंचायत की चार बार लगातार चुनाव जीतने वाली गोमती ठाकुर को इस बार टिकिट नहीं दी थी। लेकिन वो बागी होकर चुनाव लड़ीं थीं और एक ही क्षेत्र से लगातार पांच बार चुनाव जीतने का एक रिकार्ड बनाया था। वे भाजपा के स्थानीय नेतृत्व से बुरी तरह नाराज थीं। वे किसी भी कीमत पर भाजपा को अध्यक्ष उपाध्यक्ष पद के चुनाव में उस वक्त तक वोट देने को तैयार नहीं थीं जबकि उन्हें अध्यक्ष पद का उम्मीदवार ना बना दिया जाय। भाजपायी सूत्रों का कहना है कि जब हर तरह के प्रयास के बाद भी बात नहीं बनी तो उनकी बात मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से करायी गयी। विश्वसनीय सूत्र तो यहां तक दावा कर रहें हैं कि उन्हें महिला आयोग का सदस्य बना कर लाल बत्ती से नवाजने के लिये आश्वस्त कर दिया गया है। यदि ऐसा होता है तो जिले एक मात्र बरघाट क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा अब इसी क्षेत्र में मीना बिसेन के बाद दूसरी लाल बत्ती देने की तैयारी कर रही है। 
क्या जयचंदों को दंड़ित करेगी कांग्रेस?-अभी तक के जिला पंचायत अध्यक्ष उपाध्यक्ष चुनाव के बारे में देखा जाये तो पहली आदिवासी महिला अध्यक्ष गीता उइके सिवनी विस से थीं तो उपाध्यक्ष झुम्मकलाल बिसेन केवलारी से थे। दूसरी अनुसूचित जाति की महिला अध्यक्ष रैनवती मानेश्वर लखनादौन विस से थीं तो उपाध्यक्ष आलोक वाजपेयी घंसौर विस के थे। तीसरी पिछड़े वर्ग की किरार जाति की महिला अध्यक्ष प्रीता ठाकुर केवलारी क्षेत्र से थीं तो उपाध्यक्ष शक्तिसिंह घंसौर विस के थे। चौथे पिछड़े वर्ग के कुर्मी जाति के अध्यक्ष मोहन चंदेल नये परिसीमन के अनुसार बरघाट क्षेत्र के थे तो उपाध्यक्ष अनिल चौरसिया केवलारी विस के थे। इस तरह यदि देखा जाये तो कांग्रेस ने घंसौर विस को छोड़कर सभी क्षेत्रों से अध्यक्ष दिये थे तो घंसौर क्षेत्र को दो बार उपाध्यक्ष पद दिया गया था। केवलारी क्षेत्र कोे दो बार उपाध्यक्ष तो एक बार अध्यक्ष पद दिया गया था। घंसौर क्षेत्र परिसीमन में समाप्त कर दिया गया था। इस बार पुराने घंसौर क्षेत्र की दावेदार चित्रलेखा नेताम, जो कि पहले जिपं चुनाव में अध्यक्ष पद की दावेदार थीं, प्रबल दावेदार थीं लेकिन कांग्रेस ने केवलारी क्षेत्र की किरार समाज की ऊषा दयाल पटले को अध्यक्ष पद के लिये उम्मीदवार बनाया और सिवनी विकास खंड़ के अशोक सिरसाम को उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया था जिनक क्षेत्र में केवलारी विस का भोमा सहित कुछ हिस्सा आता हैं।लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत हाने के बाद भी कांग्रेस चुनाव हार गयी और भाजपा ने पहली बार बीस साल बाद जिला पंचायत में कब्जा कर लिया और उसकी मीना बिसेन अध्यक्ष बनीं। जबकि घंसौर से कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी घोषित किये गये चंद्रशेखर चर्तुवेदी उपाध्यक्ष चुने गये। इनके पिता जयंतकुमार चर्तुवेदी घंसौर क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता है और लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति कर रहें है। कांग्रेस में हार का विश्लेषण किया जा रहा है और जयचंदों को तलाश कर उन्हें दंड़ित करने की बात की जा रही हैं लेकिन पिछले बीस सालों से जयचंदों को पुरुस्कृत करने का कांग्रेस में जो सिलसिला चला है उसे देखते हुये यह नहीं लगता कि जयचंदों के खिलाफ कोई कार्यवाही हो पायेगी। “मुसाफिर”     

Tuesday, January 6, 2015

मेडिकल कालेज को लेकर प्रदेश सरकार के जिम्मेदार लोगों के अलग अलग बयानों से राजनीति गर्मायी
 सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने एक प्रश्न पूछा था। इस तारांकित प्रश्न क्र. 515 का सदन में जवाब 12 दिसम्बर 2014 को प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दिया था। अपना पूरक प्रश्न पूछने के पहले मुनमुन राय ने कहा कि,“ माननीय अध्यक्ष महोदय आपकी मार्फत मैं माननीय मंत्री जी से इस प्रश्न का जवाब मांगने से पूर्व  माननीय मुख्यमंत्री जी और माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी को बधाई दूंगा कि हमारे जिले में पहली बार एक बड़ा काम मेडिकल कालेज का आपके माध्यम से सरकार के माध्यम से होने जा रहा है।”छिंदवाड़ा जिले के विधायक सोहनलाल बाल्मीक ने कहा कि छंदवाड़ा जिले में मेडिकल कालेज पहले स्वीकृत हुआ था और सरकार की गलत नीतियों के कारण मेडिकल कालेज सिवनी में परिवर्तित किया जा रहा है।”जब 2013 में छिंदवाड़ा और शिवपुरी में केन्द्र द्वारा पोषित मेडिकल कालेज खुलने खोले जाने की घोषणा हुयी थी तब प्रदेश सरकार ने इस बात का खुलासा क्यों नहीं किया था कि प्रदेश सरकार ने प्रस्ताव में सिवनी और सतना प्रस्तावित किया था जिसे तत्कालीन केन्द्र सरकार ने बदल कर छिंदवाड़ा और शिवपुरी कर दिया जहां से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद थे। जिले में हुये पहले जिला पंचायत चुनाव में भाजपा की गोमती ठाकुर वार्ड क्रं 8 से चुनाव जीती थी। तब से लेकर पिछले चुनाव तक वे लगातार इसी वार्ड से निर्वाचित होते आयीं है। एक बार पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़वाया था लेकिन वे हार गयीं थीं। 
केन्द्र सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेज से कब छटेगी धुंध?ः-शीतकालीन सत्र में विधानसभा में जिला चिकित्सालय की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने एक प्रश्न पूछा था। इस तारांकित प्रश्न क्र. 515 का सदन में जवाब 12 दिसम्बर 2014 को प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दिया था। अपना पूरक प्रश्न पूछने के पहले मुनमुन राय ने कहा कि,“ माननीय अध्यक्ष महोदय आपकी मार्फत मैं माननीय मंत्री जी से इस प्रश्न का जवाब मांगने से पूर्व  माननीय मुख्यमंत्री जी और माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी को बधाई दूंगा कि हमारे जिले में पहली बार एक बड़ा काम मेडिकल कालेज का आपके माध्यम से सरकार के माध्यम से होने जा रहा है।” मुनमुन राय के इतना कहते ही छिंदवाड़ा जिले के विधायक सोहनलाल बाल्मीक ने कहा कि,“अध्यक्ष महोदय यह विषय के बाहर की बात है। मुझे बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है जो बात हमको कहनी चाहिये। मेडीकल कालेज की बात मैंने उठाई हैं। छिंदवाड़ा जिले में मेडिकल कालेज पहले स्वीकृत हुआ था और सरकार की गलत नीतियों के कारण मेडिकल कालेज सिवनी में परिवर्तित किया जा रहा है।” इस पर व्यवधान हुआ। अध्यक्ष महोदय ने कहा कि,“ आप प्रश्न कर दें। यह उनका प्रश्न है। यह आपका प्रश्न नहीं था। आपका प्रश्न था क्या?” इस पर सोहन लाल बाल्मीक ने कहा कि,“ उनकी बधायी का हम विरोध करेंगें। मुनमुन भाई यह छिंदवाड़ा में सेंक्शन था माननीय कमलनाथ के मार्फत ” इस पर फिर व्यवधान हुआ। और चर्चा फिर मूल प्रश्न पर चालू हो गयी। विधानसभा की इस कार्यवाही विवरण में यह स्पष्ट हो गया है कि विधायक मुनमुन राय ने सदन में मेडिकल कालेज के लिये सिर्फ मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को बधायी भर दी थी। उनकी इस बधायी से ही सदन में विवाद हुआ और छिंदवाड़ा और सिवनी को लेकर एक सवाल खड़ा हो गया। लेकिन एक बात यह भी स्पष्ट हो गयी कि सदन में मौजूद मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ने इस मामले में चुप्पी साधे रहे । जबकि छिंदवाड़ा की सभा में मुख्यमंत्री ने यह दहाड़ लगायी कि मेडिकल कालेज छिंदवाड़ा में ही खुलेगा और उनके रहते कोई भी माई का लाल छिंदवाड़ा से उसका हक नहीं छीन सकता।  उन्होंने यह तक कह डाला कि यह अफवाह ना जाने कौन फैला रहा है । जबकि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करते समय प्रेस को यह बताया था कि प्रदेश सरकार का मूल प्रस्ताव सिवनी और सतना में केन्द्रीय सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेज खोले जायेंगें जिसे तत्कालीन यू.पी.ए. सरकार ने बदल कर छिंदवाड़ा और शिवपुरी कर दिया था। लेकिन ये कालेज सतना और सिवनी में ही खुलेंगें। छिंदवाड़ा के कलेक्टर ने मुख्यमंत्री के छिंदवाड़ा प्रवास के पूर्व प्रेस कांफ्रेंस लेकर यह कहा कि मेडिकल कालेज छिंदवाड़ा में ही खुलेगा। इसमें कोई भ्रम नहीं हैं। प्रदेश सरकार के जिम्मेदार लोगों के द्वारा दिये गये अलग अलग बयानों से छिंदवाड़ा और सिवनी के राजनैतिक क्षेत्रों में हडकंप मच गया और आंदोलन तथा बयानबाजी होने लगी। इन सब बातों से एक सवाल यह सामने आता है कि जब 2013 में छिंदवाड़ा और शिवपुरी में केन्द्र द्वारा पोषित मेडिकल कालेज खुलने खोले जाने की घोषणा हुयी थी तब प्रदेश सरकार ने इस बात का खुलासा क्यों नहीं किया था कि प्रदेश सरकार ने प्रस्ताव में सिवनी और सतना प्रस्तावित किया था जिसे तत्कालीन केन्द्र सरकार ने बदल कर छिंदवाड़ा और शिवपुरी कर दिया जहां से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद थे। ऐसे में यह उठना स्वभाविक है कि क्या इस स्थान परिवर्तन में प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके मुखिया की भी सहमति थी? विधानसभा में सिवनी के लिये बधायी स्वीकार करने वाले शिवराज सिंह की छिंदवाड़ा की सभा में लगायी गयी दहाड़ क्या नगर निगम के होने वाले चुनाव के संबंध में थी? इन तमाम बातों से ऐसा लगता है कि हमेशा सिवनी के साथ छल करने वाली प्रदेश सरकार और उसके मुखिया शिवराज सिंह जिले की भोली भाली जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। ऐसी ही थोथी घोषणाओं के चलते विस चुनाव में भाजपा का मात्र एक विधायक ही जीत पाया जबकि पिछली विस में भाजपा के तीन विधायक थे। यदि ऐसा ही चलते रहा तो जिले में भाजपा का सूपड़ा साफ होने से कोई नहीं रोक पायेगा। 
गामती ठाकुर की उपेक्षा सियासी हल्कों हुयी चर्चित:-मध्यप्रदेश में 1994 से तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पंचायती राज लागू किया था। देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा संविधान में संशोधन के बाद प्रदेश में पंचायती राज लागू करने वाला पहला प्रदेश मध्यप्रदेश था। जिले में हुये पहले जिला पंचायत चुनाव में भाजपा की गोमती ठाकुर वार्ड क्रं 8 से चुनाव जीती थी। तब से लेकर पिछले चुनाव तक वे लगातार इसी वार्ड से निर्वाचित होते आयीं है। एक बार पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़वाया था लेकिन वे हार गयीं थीं। इस बार भाजपा ने उनके वार्ड से उन्हें उम्मीदवार ना बना कर माया ठाकरे को अपना समर्थित उम्मीदवार बनाया है। लेकिन गोमती ठाकुर भी फिर से पांचवी बार इसी वार्ड से चुनाव लड़ रहीं है। इससे नाराज होकर भाजपा नेतृत्व ने उनसे जिला महिला मोर्चे के अध्यक्ष पद से स्तीफा ले लिया और आनन फानन में उसे मंजूर भी कर लिया। भाजपा की अंदरूनी राजनीति जानने वालों का कहना है कि चूंकि इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष का पद महिला अनारक्षित हुआ है इसलिये सालों से अध्यक्ष बनने की लालसा रखने वाली गोमती ठाकुर को दौड़ से बाहर करने के लिये स्थानीय भाजपायी गुटबंदी के चलते गोमती ठाकुर को भाजपा ने अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। यदि वे प्रत्याशी बन कर जीत कर आतीं तो ना केवल जिले में यह रिकार्ड बनता ब्लकि भाजपा में भी सबसे अनुभवी सदस्य वही होतीं और उनके दावे को दरकिनार करना आसान नहीं होता। इसी के चलतें ये सब सियासी चाले चलीं गयी है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि श्रीमती गोमती ठाकुर भाजपा की ना केवल वरिष्ठ सक्रिय महिला नेत्री रहीं हैं वरन जिला भाजपा की महामंत्री सहित कई महत्वपूर्ण पदों की जवाबदारी भी निभा चुकीं हैं। ऐसे में उनकी उपेक्षा किया जाना सियासी हल्कों में चर्चित हैं। “मुसाफिर” 
दर्पण झूठ ना बोले, सिवन
6 जनवरी 2015 से साभार  





Monday, October 13, 2014

धार्मिक उत्सवों से समाप्त होती धर्मिकता ना केवल चिंता का विषय है वरन इसे पुर्नजीवित करने के प्रयास करना जरूरी है
आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी। महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। लेकिन कांग्रेस से टीम राहुल की हिना कांवरे ही गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है। दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। 
धार्मिक उत्सवों में समाप्त होती धार्मिकता चिंता का विषय:-आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। पिछले कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि जब पूरे देश में दशहरा मनाया जाता है तो उसके दूसरे दिन सिवनी में दशहरा मनाने का निर्णय ले लिया जाता है। इस साल भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस कारण होता यह है कि गांव के लोग दशहरे के दिन आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं। उन्हें इस बात का पता ही नहीं रहता कि शहर में आज नहीं ब्लकि कल मनाया जाने वाला हैं। ऐसे आयोजनों में यदि भटकाव आता है तो धर्म गुरु राह दिखाते हैं। कई साल पहले शहर में मां दुर्गा के मंड़पों में नौ दिनों तक ना केवल बेतुके फिल्मी गाने बजते थे ब्लकि कई स्थानों पर फूहड़ नृत्य भी हुआ करते थे। तब जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने यह कहा कि मां जगदम्बा के पंड़ालों में फिल्मी गीत नहीं बजना चाहिये औ फूहड़ नृत्य नहीं होना चाहिये ब्लकि जस और भजन बजना चाहिये ताकि धार्मिक वातावरण बने और दर्शक पूरे श्रृद्धा भाव से मां के दर्शन कर धर्म लाभ ले सकें। इसका यह असर हुआ कि आज शहर में ना तो कोई फूहड़ नृत्य होते है और ना ही फिल्मी गाने बजते है ब्लकि मां अम्बे के जस की गूंज पूरे शहर में भक्ति भाव का संचार करते हैं। इस साल भी पं. रविशंकर शास्त्री जी ने यह कहा था कि धर्मानुसार सभी पूजन पाठ मुहुर्त के हिसाब से होना चाहिये। लेकिन दशहरा एक दिन बाद मनाने का निर्णय ले लिया गया था। जानकार लोगों का दावा है कि ऐसा इसलिये होता है क्योंकि दुर्गा चौक के माता राज राजेश्वरी मंदिर के जवारे नवमी के दिन विसर्जन के लिये निकलते हैं। कई बार जब तिथियों के घटने के कारण दशहरा भी नवमी के दिन पड़ता है तो समस्या आती है। वैसे यदि देखा जाये तो सिर्फ सिंघानिया जी के मकान से स्व.महेश मालू के घर के सामने तक की कुछ मीटर की सड़क ही ऐसी कामन है जो दशहरे के जुलूस मार्ग और जवारे के मार्ग में शामिल रहती हैं। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी।
कांग्रेस में सिवनी का कम होता महत्व:-महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। जिले के भाजपा के के तीन पूर्व विधायकों डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और नरेश दिवाकर को महाराष्ट्र तथा नीता पटेरिया को हरियाणा में प्रभार दिया गया है। इसके अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और पूर्व जिला भाजप अध्यक्ष सुजीत जैन भी महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार करने गये हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश में विस के उप चुनावों में भाजपा को करारा झटका लगने के बाद ये चुनाव भाजपा के लिये प्रतिष्ठा  का प्रश्न बन गयें हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि इन दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जरूरत से ज्यादा प्रचार को महत्व दे रहें हैं। जिसके कारण उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी है। ऐसे महत्वपूर्ण मिशन में जिले के भाजपा नेताओं को भी प्रभार मिलना काफी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिये भी ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व ने जिले के किसी भी नेता को इन राज्यों में चुनाव में कोई जवाबदारी नहीं दी है।  और तो और टीम राहुल से भी सिर्फ बालाघाट लोस क्षेत्र की कांग्रेस उम्मीदवार रहीं विधायक हिना कांवरे कांग्रेस के प्रचार में महाराष्ट्र गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है।
दिवाली के बाद लग सकती है नपा चुनाव के लिये आचार संहिताः-दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। वैसे तो वार्डों के आरक्षण के बाद से ही मोहल्लों में चुनावी रणवीरों ने अपने दांव पेंच दिखाने लगे है। हालांकि अभी किसी भी पार्टी ने अपने उम्मीदवार तय नहीं किये हैं लेकिन अपने अपने आकाओं के आश्वासन पर पार्षद बनने की उम्मीद रखने वाले नेताओं ने अपनी अपनी बिसात बिछाना चालू कर दी है। तब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव में क्या रणनीति अपनाते है और किन मुद्दों को उठाया जाता है। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि सिवनी के निर्दलीय विधायक मुनमुन राय इस चुनाव में सीधे मैदान में उतरते हैं या फिर कोई और रणनीति बना कर किसी को लाभ पहुचाने और किसी को नुकसान करने करने की बिसात बिछाते है? राजनैतिक विश्लेषकों की इन्हीं सब पर पैनी नजर है जो चुनावों के परिणामों को प्रभावित करन वाली साबित होंगीं।“मुसाफिर” 
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
14 अक्टूबर 2014

Monday, September 29, 2014

पल्लू कांड़ को  राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये लेकिन सामाजिक रूप से उचित ठहराना संभव दिखायी नहीं देता 
विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया।  भाजपा ने इस घटना की निंदा करके चुप्पी साध ली जबकि कांग्रेस ने निंदा करने के साथ ही कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरना का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे 
मोदी के जन्म दिन पर सार्वजनिक मंच पर हुआ भाजपा नेत्री का अपमान:-विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। इसी कार्यक्रम को कवर करने के लिये लगे वीडियो कैमरों में मंच की एक अशोभनीय घटना भी कैद हो गयी। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया। चुपके से ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पलट कर बाजू में देखा तो उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान सी दिख रही थी और उन्होंने चेहरे पर एक ऐसी हरकत करके सिर हिलाया जिसे समाज में अच्छा नहीं माना जाता है। सोशल मीडिया पर इस घटना के दो वीडियो ने चंद घंटों में ही हड़कंप मचा दिया। इसे सार्वजनिक शासकीय मंच पर एक महिला के साथ हुये अपमान से जोड़कर देखा गया और निंदा तथा आलोचना का दौर शुरू हो गया। नीता पटेरिया ने कहा कि उन्हें वाडियो देखने के बाद घटना का पता चला तो दूसरी तरफ मुनमुन राय ने कहा कि वे नीता पटेरिया को मां,बहन और भाभी मानते हैं और मंच पर हुआ वो हास्य विनोद के क्षण थे। फिर भी यदि बुरा लगा हो तो वे माफी मांगते है। दूसरे दिन नपा के सामने मुनमुन राय का भाजपा कार्यकर्त्ताओं ने पुतला जलाया और पुलिस में घटना की कंपलेंट की लेकिन नीता पटेरिया ने रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी। इस घटना के समाचार राष्ट्रीय और प्रादेशिक चैनलों के साथ ही अखबारों की भी सुर्खी बनी और राजनैतिक हल्कों में एक भूचाल सा आ गया। 
कांग्रेस ने सौंपा ज्ञापन तो भाजपा ने की निंदा:- इस घटना को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने विज्ञप्ति जारी कर घटना की निंदा की और इसे महिला अपमान के साथ के साथ जनादेश का अपमान भी निरूपित किया। लेकिन इसके बाद भाजपा ने चुप्पी साघ ली। कहा जाता है दूसरे वीडियों में जिला भाजपा अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर भी विवाद में आ गये थे। कांग्रेस नेताओं ने बाद में कलेंक्टर से मुलाकत कर ज्ञापन भी सौंपा और प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी कटघरें में खड़ा किया कि एक वरिष्ठ महिला नेत्री के साथ हुये अपमान पर सरकार और प्रशासन चुप्पी साधे हुये है। इसके अलावा भ कई संगठनों और दलों ने भी घटना की निंदा की और इसे महिला का अपमान निरूपित किया।
ब्राम्हण समाज ने दिश धरनाः- इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरने का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। इसमें पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेत्री नेहा सिंह और विस प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना सहिीत कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने हिस्सा लेकर धटना की निंदा कर कार्यवाही की मांग भी की। धरने के बाद नीता पटेरिया ने एस.पी. से भेंट करके एक ज्ञापन भी सौंपा और इस बात पर अपनी नाराजगी भी जताई कि मेरे बयान होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी। हालांकि यहां यह उल्लेखनीय है कि पुलिस थाने में स्वयं नीता पटेरिश ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी है। उन्होंने राज्य महिला आयोग में जरूर अपनी शिकायत दी है। 
मुनमुन ने भी किया शक्ति प्रदर्शन:- जिस दिन ब्राम्हण समाज के बैनर पर महिला अपमान के विरोध में धरना प्रदर्शन हो रहा था तो वहीं दूसरी तरफ चंद कदमों दूर विधायक मुनमुन राय अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। जिले भर से आयी सैकड़ों गाड़िया ओर में लाये गये हजारों लोगों का उत्साह देखने लायक था। राजनैतिक विश्लेषकों की आंखों के सामने वह दिन आ गया जब तत्कालीन भाजपा सांसद नीता पटेरिया की रिपोर्ट पर तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला धारा 307 के तहत कायम हुआ था तो उन्होंने न्याय रैली आयोजित की थी जिसमें ऐसी ही भीड़ जुटायी गयी थी। स्व. हरवंश सिंह ने न्याय रैली की थी तो अभी मुनमुन जनता से न्याय मांग रहे थे। अभी यदि रिपोर्ट पर पुलिस मामला कायम करती है तो वो भी धारा 354 का होता। जनता के सामने मुनमुन ने अपनी पुरानी मां,बहन और भाभी वाली सफायी देते हुये कांग्रेस और भाजपा नेताओं पर आरोप भी लगा डाला कि वे उनकी जीत  और लोकप्रियता से जलते है इसलिये धज्जी का सांप बना रहें हैं। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे और इस मामले में घिर जाने पर ही उन्हें यहां गाड़ियां भेज कर बुलाया गया था। कुछ लोग इस बात को लेकर भी लेकर आश्चर्यचकित है कि एक ही दिन लगभग एक ही जगह एक ही मुद्दे पर आयोजित होने वाले दो विपरीत आंदोलनों के लिये अनुमति कैसे दे दी गयी? यह भी बताया गया कि शक्ति प्रदर्शन के दूसरे ही दिन वे विदेश यात्रा पर चले गये हैं। बहरहाल उस दिन मंच पर घटित पल्लू कांड़ को कितने ही राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये?लेकिन सामाजिक रूप से इसे उचित ठहराना तो संभव दिखायी नहीं देता है। “मुसाफिर”
 sABHAR Darpan Jhoot Na Bole
Seoni 
30 Sep 2014




















   



Monday, September 15, 2014

मान ना मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर समन्वयक बने मुनमुन की बैठक में पार्षदों का ना आना सियासी हल्कों में हुआ चर्चित 
इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पार्षद आये ही नहीं। घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है। शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा।
मुनमुन की बैठक में नहीं आये पार्षदंः-इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। यहां यह विशेष् रूप से उल्लेखनीय है कि तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। इस संबंध में मुख्यनगरपालिका अधिकारी द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि केन्द्रसरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय के द्वारा दिये जाने वाले अंशदान से कुलराशि 47 करोड़ 36 लाख रु. की राशि इस हेतु स्वीकृत की गयी है। साथ ही यह भी बताया गया है कि राज्य तकनीकी समिति द्वारा 62 करोड़ 55 लाख रु. की निविदा लागत स्वीकृत की गयी है। इसमें वर्तमान तथा नवीन जलावर्धन योजना के पांच साल के रख रखाव और संचालित करने का व्यय भी ठेकेदार द्वारा किया जाना प्रसतवित है। इस योजना हेतु स्वीकृत राशि और निविदा की राशि को लेकर ही विवाद प्रारंभ हुआ है। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि आखिर 15 करोड़ 19 लाख रु. की अतिरिक्त राशि निविदा में कैसे आयी और अंतर की यह राशि पालिका को मिलगी कहां से? आम तौर पर यह माना जा रहा है कि ये अंतर की राशि की बंदर बांट करनंे के लिये ही बढ़ायी गयी है। इसे लेकर पालिका के कांग्रेसी पार्षद लामबंद हो गयें हैं वहीं पालिका के भाजपा पार्षदों का भी अपने अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी को समर्थन नहीं है। बीते कई दिनों से दोनों पक्षों का यह विवाद सुर्खियों में बना हुआ है। यह भी सही है कि जब किन्हीं दो पक्षों के बीच विवाद हो जाता है तो उसे सुलझाने के लिये दोनों ही पक्ष अपने किसी विश्वास प्राप्त व्यक्ति को पंच बनाकर उसे सुलझाने का काम करते है। लेकिन पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान  ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के अलावा भाजपा पार्षद श्याम शोले के अलावा कोई भी पार्षद उसमें नहीं आया। कुछ अखबारों में यह भी छपा कि कांग्रेस पार्षद दल के नेता शफीक पार्षद भी उसमें उपस्थित थे। इसके बावजूद भी विधायक मुनमुन राय ने अपनी निधि से नगर विकास के लिये 25 लाख रु. की राशि देने की घोषणा की जो कि शायद इस बैठक का मुख्य उद्देश्य था। हालांकि यह कहना भी गलत होगा कि मुनमुन को नपा के मामलो से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह उनके विस क्षेत्र के मुख्यालय की पालिका है लेकिन नपा चुनाव के दो तीन महीने पहले ही नगर की सुध लेना कुछ और ही कहानी कहती नजर आ रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि नपा में चुनावों में भाजपा की जीत हार में मुनमुन की भूमिका ही निर्णायक रहने वाली है। इसमें उन्हें अपने चुनाव में नगर में मिली भारी बढ़त और मुस्लिम वार्डों में मिले वोटों को कारण बताया जा रहा है। इसमें उनकी क्या रणनीति होगी? यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा।
भाजपा राज में वेदसिंह और इंका राज में आशुतोष भी नही करा पाये थे जांचः- घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है।शहर के लिये सफेद हाथी साबित हो चुकी इस योजना की जांच के लिये कांग्रेस शासनकाल में सिवनी विस के इंका प्रत्याशी रहे आशुतोष वर्मा ने इस मुद्दे पर जांच की मांग तो कांग्रेस शासनकाल में जरूर उठायी लेकिन कोई कारगर जांच नहीं हो पायी। इसके बाद जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो उमा भारती के शासनकाल में जिला भाजपा अध्यक्ष रहे वेदसिंह ठाकुर ने फिर एक बार इस मामले में शिकायत की लेकिन इस परियोजना की फिर भी जांच नहीं हो पायी। इसमें घपले करने वाले हाथ काफी ताकतवर थे। इस योजना के क्रियान्वयन के दौरान सिवनी में पदस्थ पी.एच.ई. के कार्यपालन यंत्री जोशी जबलपुर संभाग के संघ के प्रमुख स्तंभ रहे स्व. बाबूराव जी परांजपे के निकट रिश्तेदार थे और उस विभाग के मंत्री उस दौरान स्व. हरवंश सिंह थे। उस वक्त इस योजना के घटिया काम को लेकर एक दुर्गा मंड़प में झांकी भी लगायी गयी थी। तकनीकी लोगों का यह मानना है कि इस योजना में निर्धारिम मानदंड़ों के पाइप नहीं लगे है। जितनी रफ्तार और मात्रा में पानी फेंकने के लिये मोटर पंप लगाये लगाये हैं उसकी लगभग आधी क्षमता के पाइप का उपयोग किया गया है। इसीलिये टेस्टिंग के समय जब पूरी रफ्तार से पानी छोड़ा गया था तो छोटे मिशन स्कूल के पास एक जमीन से उखड़कर लगभग खड़ा हो गया था और एक बड़ी दुर्घटना होने से बच गयी थी क्योंकि कुछ समय पहले ही स्कूल की छुट्ठी हो चुकी थी। उसके बाद से मोटर पंपों से लगभग आधी मात्रा ममें नियंत्रित करके पानी छोड़ा जाता है जिसके कारण पंप अपनी क्षमता से दुगने समय तक चलने के बाद भी शहर की स्ीाी टंकियशें को दिन में एक बार भी पूरा नहीं भर पाते थे जबकि तकनीकी स्वीकृति के अनुसार दिन में दो बार में 12 एमएलडी पानी टंकियों में भरा जाना चाहिये था। दुगने समय तक पंपों को चलाने कारण प्राकल्लन में किया गया विद्युत खपत का आकलन फेल हो गया और लगभग दुगनी बिजली की खपत होने लगी जिसका बोझ नगरपालिका आज भी नहीं झेल पा रही है। हाल ही में जो प्रस्ताव जलावर्धन योजना को लेकर सामने आयें हैं उसके अनुसार शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा। ये कैसे संभव होगा? इसे लेकर नगर के सभी कर्णधार फिलहाल तो मौन ही है। “मुसाफिर”
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
16 सितम्बर 2014 से साभार 

Wednesday, September 3, 2014

विधान सभा में मुनमुन ने बागरी जाति का मामला तो उठाया लेकिन उससे बागरी समाज के हित पूरे होते नहीं दिख रहें है
हाल ही में हुये विस सत्र में जिले के बागरी समाज के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना बंद हो जाने का मामला सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने उठाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जवाब देकर मामले को समाप्त कर दिया कि केन्द्र सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रमाण प. देना बंद किये गये हैं। बागरी समाज का यह विवाद  1998 के विस चुनाव के पहले से चल रहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रमाण पत्र जारी नही होंगें इसकी भनक जैसे ही समाज के लोगों को लगी वैसे ही पूरी समाज में हड़कंप मच गया। बागरी समाज के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हिम्मत सिंह बघेल के नेतृत्व में जिला मुख्यालय में एक विशाल जुलूस निकाला गया था। किसी पार्टी में की गयी कोई शिकायत पर भी नौ महीन बाद कार्यवाही होेती है यह पहली बार ही देखने सुनने को मिला है। जी हां प्रदेश भाजपा कार्यालय ने नवम्बर 2013 में की गयी किसी शिकायत पर सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेकाम और सिवनी के पूर्व पार्षद अजय डागोरिया सहित चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। लोग तो यह कहते भी देखे जा रहें है कि कांग्रेस में बहोरीबंद का बंद खुलता ही नजर नहीं आ रहा है कि जीत कैसे हुयी।
सवाल तो विस में उठा लेकिन बागरी समाज को मिला कुछ नहींः-हाल ही में हुये विस सत्र में जिले के बागरी समाज के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना बंद हो जाने का मामला सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने उठाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जवाब देकर मामले को समाप्त कर दिया कि केन्द्र सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रमाण प. देना बंद किये गये हैं। बागरी समाज का यह विवाद  1998 के विस चुनाव के पहले से चल रहा है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 1978 में केन्द्र की जनता पार्टी सरकार ने जिले की बागरी समाज को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया था। उसके बाद इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना चालू हो गये थे जो कि बिना किसी बाधा के 1997 तक जारी रहे। इस दौन शिकायत होने पर प्रदेश सरकार द्वारा इस जाति की जांच के लिये वैष्ठव समिति का गठन किया था कि इस जाति के लोग अनुसूचित जाति के हैं या नहीं? जिला कलेक्टर मो. सुलेमान के कार्यकाल में वैष्ठव समिति ने  जांच हेतु बागरी बाहुल्य क्षेत्रों का भ्रमण किया था। इस कमेटी ने आपनी रिपोर्ट में इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति में शामिल करने योग्य नहीं माना था तथा इस आशय की रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रमाण पत्र जारी नही होंगें इसकी भनक जैसे ही समाज के लोगों को लगी वैसे ही पूरी समाज में हड़कंप मच गया। बागरी समाज के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हिम्मत सिंह बघेल के नेतृत्व में जिला मुख्यालय में एक विशाल जुलूस निकाला गया तथा समाज का पूरा आक्रोश केवलारी क्षेत्र के तत्कालीन विधायक एवं राज्य सरकार के ताकतवर मंत्री स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ फूट पड़ा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि केवलारी विस क्षेकत्र में सिवनी और केवलारी ब्लाक का बहुत बड़ा ऐसा इलाका शामिल था जिसमें बागरी समाज का बाहुल्य था। ऐन चुनाव के समय बागरी समाज के इस आक्रोश का थामना स्व. हरवंश सिंह के लिये राजनैतिक रूप से बहुत जरूरी था। वे प्रदेश सरकार की राजनैतिक मामलों की समिति के भी सदस्य थे। उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुये इस रिपोर्ट पर पुर्नविचार करने का प्रस्ताव लेकर उसे लंबित करा दिया था। इसके बाद उसी बागरी समाज के उनका ग्राम भोंगाखेड़ा में पगड़ी और शाल पहना कर सम्मान भी किया था। 1998 का चुनाव निपटने के बाद कब वैष्ठव समिति की रिपोर्ट अनुशंसा के साथ केन्द्र सरकार को भेज दी गयी और कब केन्द्र की एन.डी.ए. सरकार ने उसे मंजूर कर लिया? इसकी भनक तक किसी को नहीं लगी। जब प्रमाण पत्र मिलना फिर से बंद हो गये तब पता चला कि खेल खत्म हो गया है। तब से लेकर अब तक चाहे कांग्रेस हो या भाजपा उसके नेता इस सामज के लोगों को दिलाया ही देते आये हैं लेकिन किसी ने भी ऐसी पहल नहीं कह है जिससे उसे पुनः वो लाभ मिल सके। अब विधायक बनने के बाद मुनमुन ने यह मामला विधानसभा में उठाकर अखबारों की सुर्ख्राी तो बटोर ली लेकिन नतीजा सिफर ही निकला है। आज तक किसी ने भी यह मांग नहीं उठायी कि वैष्ठन समिति की रिपोर्ट पर आपत्तियों के कारण एक नयी जांच समिति बनायी जाये और उस जांच समिति के आधार पर प्रदेश सरकार अपनी नवीन अनुशंसा केन्द्र सरकार को भेजे ताकि बागरी समाज को एक बार फिर से अन.जाति के प्रमाण पत्र मिलना प्रारंभी हो सके।
विस चुनाव में भीतरघात करने का नोटिस मिला अशोक टेकाम को:-यह ताक शाष्वत सत्य है कि मां के गर्भ मे नौ महीने रहने के बाद ही शिशु का जन्म होता है। लेकिन किसी पार्टी में की गयी कोई शिकायत पर भी नौ महीन बाद कार्यवाही होेती है यह पहली बार ही देखने सुनने को मिला है। जी हां प्रदेश भाजपा कार्यालय ने नवम्बर 2013 में की गयी किसी शिकायत पर सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेकाम और सिवनी के पूर्व पार्षद अजय डागोरिया सहित चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया है कि क्यों ना आपके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाये? आरोप है कि उन्होंने विस चुनाव में भीतरघात किया है। हालांकि नोटिस में यह भी स्पष्ट नहीं है कि शिकायत किसने की है और किस विस क्षेत्र में इन नेताओं ने भीतरघात किया है या पूरे जिले में भाजपा की इस दुर्गति के लिये भी ये ही जवाबदार हैं?जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में इन नोटिसों को आगामी सहकारी बैंक के चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है। 
बहोरीबंद के बंद ही नहीं खुल पा रहें हैं कांग्रेस में:-वैसे तो विधानसभा के उप चुनावों के परिणाम देश में कांग्रेस के लिये संजीवनी का काम कर गये है।बिहार और पंजाब के साथ ही कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में भी एक सीट पर जीत दर्ज की हैं। कांग्रेस ने भाजपा से बहोरीबंद सीट छीन कर जीत दर्ज की है। बहोरीबंद सीट की जीत को लेकर प्रदेश के स्टार प्रचारक एवं पूर्व मंत्री स्व. हरवंश सिंह के पहली बार विधायक बने रजनीश सिंह की प्रशंसा में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमे युवा रजनीश को जीत का पूरा श्रेय देते हुये बताया गया कि कैसे उन्होंने वहां प्रयास कियें जो सफल हुये। जिले के कांग्रेस के दूसरे युवा विधायक योगेन्द्र सिंह बाबा, जो कि हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह के बेटे हैं, ने विज्ञप्ति जारी कर बहोरीबंद सीट पद कांग्रेस की जीत को जनता की जीत बताया और कहा कि कांग्रेस की एकता और क्षेंत्रीय कार्यकर्त्ताओं की मेहनत से यह जीत पार्टी को मिली है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जिस हिस्से का उन्हें प्रभारी बनाया गया था वहां से पार्टी को भारी जीत हासिल हुयी है।वहीं दूसरी ओर जिला कांग्रेस कमेटी ने इस जीत पर कोई बयान भी जारी नहीं किया है। अब ऐसे हालात में लोग तो यह कहते भी देखे जा रहें है कि कांग्रेस में बहोरीबंद का बंद खुलता ही नजर नहीं आ रहा है कि जीत कैसे हुयी। “मुसाफिर”
Sabhar Darpan Jhoot Na Baole Seoni
02 Sep 2014