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Monday, October 12, 2015

ना जाने क्या हो गया है जिले की फिजा और लोगों के मिजाज को?
एक वक्त था जब सिवनी जिला अविभाजित मध्यप्रदेश में शांति और अमन चैन का टापू माना जाता था। पूरे प्रदेश में जिले के साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल दी जाती थी। मिसाल भी ऐसे ही नहीं दी जाती थी। उसकी भी एक खास वजह थी। एक समय जब 1962 में जबलपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ था, जिसे ऊषा भार्गव कांड़ के नाम से जाना जाता है,तब इसकी चपेट में पूरा प्रदेश आ गया था लेकिन जबलपुर की सीमा से लगा सिवनी जिला इससे अछूता रहा था और यहां आपसी भाई चारा बना रहा था। जबकि सिवनी में भी शांति मार्च निकाला गया था।
जिले में पहली बार नवम्बर 1971 में सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ा था। एक व्यक्ति के पास से मांस पकड़ने की घटना हुयी थी तब उस समय जिला मुख्यालय सिवनी में कर्फ्यू भी पहली बार लगा था। लेकिन इस दौरान भी आगजनी और लूट पाट की घटनायें ही हुयीं थीं और किसी की जान नहीं गयी थी।
इस घटना के बाद जिले में ऐसी कोई सांप्रदायिक घटना नहीं घटी थी जिसके कारण कानून और व्यवस्था भंग हुयी हो। लेकिन 6 दिसम्बर 1992 के अयोध्या में घटी घटना के कारण पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव हो गया था और जगह जगह दंगे हुये थे। अयोध्या में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद लंबे समय से चल रहा था। हिन्दू घर्मावलंबी जिसे राम मंदिर कहते थे उसे ही मुस्लिम घर्मावलंबी बाबरी मस्जिद कहते थे तो सरकार उसे विवादास्पद ढ़ांचा कहती थी। इस दिन अध्येध्या में एकत्रित हुये कारसेवकों ने इसे गिरा दिया था और देश में दंगे भड़क गये थे। इस दौरान सिवनी में 19 दिन कर्फ्यू लगा रहा था जो अब तक का रिकार्ड है। इस दौरान भी आगजनी और लूट पाट की घटनायें तो हुयी लेकिन किसी की भी जान नहीं गयी थी। इस घटना के बाद ही जिले के माथे पर सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील जिला होने का कलंक लग गया और सरकार की नजर में यह संवेदनशील जिला हो गया। लेकिन इसके बावलूद भी सरकार ने ऐसे कोई सुरक्षात्मक उपाय नहीं किये कि जिले के अमन चैन को बनाये रखने के लिये जिला प्रशासन को तत्काल सुविधा हो सके। और तो और जिले में एसएएफ की एक बटालियन तक रखने की व्यवस्था नहीं की गयी जिससे वक्त आने पर फोर्स की कमी महसूस नहीं होती।
इस घटना के बाद 2013 तक जिले में कर्फ्यू लगाने की नौबत नहीं आयी हालांकि जिला मुख्यालय में सांप्रदायिक कारणों से तनाव जरूर रहे। जिला मुख्यालय में पुलिस थाने में पूंछ तांछ के दौरान 4 दिसम्बर 1995 को शरीफ नामक मुस्लिम युवक की मौत हो गयी थी। इससे शहर में सांप्रदायिक तनाव तो जरूर पैदा हो गया था परंतु कर्फ्यूू लगाने की नौबत नहीं आयी थी। बरघाट में 11 जुलाई 2004 में गा्रम खारी के एक मुस्लिम परिवार के सदस्य वारिस की हत्या से भी सांप्रदायिक तनाव हो गया था लेकिन बिना कर्फ्यू लगाये ही स्थिति नियंत्रण में कर ली गयी थी।
इसके बाद बकरीद के मौके पर 11 जुलाई 2006 को शहर में हुये ऊूंट कांड़ को लेकर भी तनाव तो जरूर फैल गया था लेकिन उस समय लोगों को कर्फ्यू का दंश नहीं झेलना पड़ा था।  इसी तरह 17 दिसम्बर 2009 को कान्हीवाड़ा थाने के अंर्तगत ग्राम सुकतरा के एक मंदिर में घटी घटना के कारण भी जिला में मुख्यालय सांप्रदायिक तनाव फैल गया था और लोग सड़कों पर उतर आये थे। लेकिन इस दौरान भी बिना कर्फ्यू लगे स्थिति नियंत्रण में हो गयी थी। 
जिले के छपारा कस्बे में 2 फरवरी 2013 केो एक आदिवासी युवक के साथ घटी घटना के कारण छपारा के साथ साथ सिवनी नगर में भी 6 फरवरी से सांप्रदायिक सदभाव बिगड़ गया था और फिर तरह तरह की घटनायें घटित होने लगीं थीं। महावीर टाकीज के पास एकत्रित अनियंत्रित हो रही भीड़ के कारण दिनांक 8 फरवरी को जिला प्रशासन ने समय दिये बिना ही तत्काल प्रभाव से कर्फ्यू लगा दिया था जिससे कई निर्दोष नागरिक भी पिट गये थे। शहर को इस कर्फ्यू से 16 फरवरी को निजात मिली थी।
बीते दिनों जिले के बरघाट कस्बे में घटी एक घटना ने सांप्रदायिक सौहार्द को तहस नहस कर के रख दिया। 4 अक्टूबर 2015 को भाजपा के बरघाट मंड़ल के महामंत्री और ग्राम पंचायत लोहारा के पूर्व सरपंच कपूरचंद ठाकरे के साथ एक छोटी सी घटना को लेकर रजा और नासिर ने उसके साथ इतनी गंभीर मारपीट कर दी थी कि वह ना सिर्फ कोमा में आ गया वरन उसी दिन रात को तीन बजे उसने नागपुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। इस गंभीर और निंदनीय आपराधिक कृत्य के लिये पुलिस ने तत्काल ही उसी दिन दोनों आरोपियों को धारा 307 के तहत हिरासत में लेकर कोर्ट में पेश कर जेल में भेज दिया था। इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी लेकिन इतनी वीभत्स्य हो जायेगी ऐसा सोचा भी नहीं था। 5 अक्टूबर को सुबह से लोगों का जुड़ना चालू हो गया और एक रैली निकाली गयी जिसने आरोपियों के घरों के अलावा कई जगह तोड़ फोड़,लूट पाट और आगजनी की घटना भी कर डाली। इसी दौरान मस्जिद से एक आपत्तिजनक एनाउंसमेंट होने का भी आरोप लगा। पुलिस बल की कमी के कारण प्रशासन भी मजबूर था। पुलिस बल के आते ही बरघाट में 5 अक्टूबर को दोपहर लगभग 3 बजे पहली बार कर्फ्यू लगा दिया गया और स्थिति को नियंत्रित किया गया। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि जब 4 अक्टूबर की रात को तीन बजे ही चोटिल भाजपा नेता की मृत्यु हो गयी तो सुरक्षात्मक उपाय क्यों नहीं किये गये? उसी समय से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाने के प्रयास क्यों नहीं किये गये? यह बात सभी मानते हैं कि पुलिस बल की कमी के कारण ही बरघाट की फिजा बिगड़ गयी थी। प्रशासन ने साक्ष्यों के आधार पर फिजा बिगाड़ने वालों पर कार्यवाही करना प्रारंभ की और 7 अक्टूबर को पांच लोगों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया जिसमें बरघाट नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष भाजपा नेता विजय सूर्यवंशी भी शामिल थे। इसके बाद ही 8 अक्टूबर को सांसद,विधायक और जिला भाजपा अध्यक्ष के नेतृत्व में एक विशाल प्रनिनिधि मंड़ल ने जिला प्रशासन से भेंट कर यह मांग कर डाली कि इस मामले में किसी भी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होना चाहिये। इसके बाद से अभी तक धर पकड़ की कार्यवाही थम गयी है। बरघाट में 12 अक्टूबर से दिन में सोलह घंटे की छूट दी गयी है।
इन घटनाओं को देखते हुये सरकार से यह अपेक्षा है कि जिले में एक एसएएफ की बटालियन रखने की व्यवस्था करे ताकि पुलिस बल की कमी के कारण जिले की फिजा फिर कभी ना बिगड़ पाये। 

दर्पण झूठ ना बोने,सिवनी
13 अक्टूबर 2015 से साभार 

Tuesday, September 15, 2015

कांग्रेस से गद्दारी कर पद पाने का सालों से चला आ रहा सिलसिला प्रदेश कांग्रेस के पुर्नगठन में बखूबी दिखायी दिया 
एक अर्से से लंबित रहा प्रदेश कांग्रेस का अंततः पुर्न गठन हो ही गया है। इस बार जिले के तीन नेताओं को इसमें स्थान दिया गया है। केवलारी के विधायक रजनीश हरवंश सिंह को महामंत्री एवं राजा बघेल और बरघाट के विनोद वासनिक को सचिव बनाया गया है। जहां एक ओर 40 सदस्यीय महामंत्रियों की सूची में रजनीश सिंह का नाम 31 वें नंबंर पर हैं तो 80 सदस्यीय सचिवों की सूची में राजा बघेल का नाम दूसरे नंबंर है। इसे भी राजनैतिक कद मापने के हिसाब से एक महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है। लेकिन विनोद वासनिक की नियुक्ति ने इसमें भी एक पेंच फंसा दिया है कि प्रदेश स्तर पर कौन किससे भारी है? जिले में यह भी चर्चित है कि जिन 16 जिलों में नये कांग्रेस अध्यक्ष बनना है उनमें सिवनी जिला भी शामिल है। इसके प्रयास में लगे नेता यह मानकर चल रहें हैं कि ऐसा होना ही है।प्रदेश कांग्रेस में लिये गये तीनों ही नेता सिर्फ कमलनाथ के प्रति ही निष्ठावान नहीं हैं। इन सभी की निष्ठा प्रदेश के अन्य क्ष्त्रपों के लिये भी है। इसलिये राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिला कांग्रेस का अध्यक्ष पद उसी केा मिलेगा जिसकी निष्ठा सिर्फ कमलनाथ के प्रति हो। इसलिये परिवर्तन होने की स्थिति में राजकुमार पप्पू खुराना की ताजपोशी निश्चित मानी जा रही है। पालिका अध्यक्ष आरती शुक्ला ने प्रस्तावों को तय करने के पहले अनौपचारिक रूप से पार्टी के पार्षदों की बैठक करके विचार भी किया गया था। लेकिन भाजपा की गुटबाजी ने एक बार फिर पालिका में पूर्ण बहुमत होने के बाद भी आखिर फजीता ही कराया।
राजा दूसरे तो रजनीश का नाम 31 वें नंबंर पर -एक अर्से से लंबित रहा प्रदेश कांग्रेस का अंततः पुर्न गठन हो ही गया है। अभी तक प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव पुरानी कार्यकारिणी से ही काम चला रहे थे। इस बार जिले के तीन नेताओं को इसमें स्थान दिया गया है। केवलारी के विधायक रजनीश हरवंश सिंह को महामंत्री एवं राजा बघेल और बरघाट के विनोद वासनिक को सचिव बनाया गया है। अखबारों में प्रकाशित समाचारों के अनुसार विनोद वासनिक की नियुक्ति को लेकर विवाद सामने आया है। बताया गया है कि हाल ही में हुये बरघाट नगर पंचायत के चुनाव में उन पर अपने अनुज निर्दलीय रंजीत वासनिक के पक्ष में काम करने का आरोप लगा था जिसे लेकर जिला कांग्रेस ने प्रदेश कांग्रेस की अनुशंसा पर 6 साल के लिये निष्कासित कर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में कांग्रेस के अनिल ठाकुर मात्र 45 वोटों से रंजीत वासनिक से चुनाव हार गये थे। ऐसी स्थिति में वे प्रदेश कांग्रेस के सचिव कैसे बन गये? यह एक शोध का विषय बना हुआ है। वैसे जिले में यह कोई एकमात्र नया उदाहरण नहीं हैं। इसके पहले भी नगरपालिका सिवनी के 2009 के चुनाव में कांग्रेस के प्रत्शयशी संजय भारद्वाज की भीतरघात की शिकायत पर राजा बघेल के खिलाफ भी अनुशासनात्मक कार्यवाही की गयी थी। लेकिन पिछली बार उन्हें भी प्रदेश कांग्रेस में सचिव बना दिया गया था। वैसे तो पिछले कई वर्षों से जिले में यह परंपरा सर चल रही है कि चुनाव में पार्टी की खिलाफत करो और बाद में पार्टी में बड़ा पद लेकर पुरुस्कृत हो जाओं। शायद जिले में कांग्रेस के पतन का यह भी एक बड़ा कारण रहा है जिससे पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्त्ता हतोत्साहित हो रहें है। पार्टी में पद देते समय पार्टी के प्रति निष्ठा के बजाय नेताओं प्रति निष्ठा भारी पड़ जाती हैं और पार्टी के लिये मरने मिटने वाले लोग मुंह ताकते रह जाते है। रालनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि सूची में क्रमांक देखा जाये तो एक बात और उभर कर सामने आती है कि जहां एक ओर 40 सदस्यीय महामंत्रियों की सूची में रजनीश सिंह का नाम 31 वें नंबंर पर हैं तो 80 सदस्यीय सचिवों की सूची में राजा बघेल का नाम दूसरे नंबंर है। इसे भी राजनैतिक कद मापने के हिसाब से एक महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है। लेकिन विनोद वासनिक की नियुक्ति ने इसमें भी एक पेंच फंसा दिया है कि प्रदेश स्तर पर कौन किससे भारी है?
यदि बदलाव हुआ तो पप्पू होंगें कांग्रेस अध्यक्ष-प्रदेश कांग्रेस के पुर्नगठन के साथ ही जिले में यह भी चर्चित है कि जिन 16 जिलों में नये कांग्रेस अध्यक्ष बनना है उनमें सिवनी जिला भी शामिल है। इसके प्रयास में लगे नेता यह मानकर चल रहें हैं कि ऐसा होना ही है। जबकि अभी प्रदेश कांग्रेस ने उन जिलों के नाम घोषित नहीं किये हैं जिनके अध्यक्ष बदले जाने का प्रस्ताव आला कमान के पास लंबित है। वैसे भी महाकौशल क्षेत्र के क्षत्रप पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ माने जाते हैं। प्रदेश कांग्रेस में कांग्रेस के जिन तीन नेताओं रजनीश सिंह,राजा बघेल और विनोद वासनिक को लिया गया है उनके लिये कमलनाथ की सहमति तो जरूर होगी लेकिन सियासी हल्कों में यह भी चर्चा है कि ये तीनों ही नेता सिर्फ कमलनाथ के प्रति ही निष्ठावान   नहीं हैं। इन सभी की निष्ठा प्रदेश के अन्य क्ष्त्रपों के लिये भी है। इसलिये राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिला कांग्रेस का अध्यक्ष पद उसी केा मिलेगा जिसकी निष्ठा सिर्फ कमलनाथ के प्रति हो। वर्तमान जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी को बदलने का प्रस्ताव यदि विचाराधीन होगा तो ऐसी स्थिति में सिवनी विस के दो बार कांग्रेस प्रत्याशी रहें तथा दो बार नगरपालिका अध्यक्ष की टिकिट दिलाने वाले राजकुमार पप्पू खुराना का अध्यक्ष बनना लगभग तय माना जा रहा है। वैसे जिले में अल्पसंख्यक नेता के रूप में असलम भाई का नाम भी चर्चा में है लेकिन तकनीकी रूप से पप्पू खुराना भी अल्पसंख्यक वर्ग में आतें हैं। राजनैतिक समीक्षकों का मानना है कि जिले के कमलनथ खेमे से किसी और नेता का नाम चर्चा में नहीं हैं इसलिये परिवर्तन होने की स्थिति में राजकुमार पप्पू खुराना की ताजपोशी निश्चित मानी जा रही है।
गुटबाजी का खामियाजा भुंगता पालिका में भाजपा ने -नगर पालिका के सम्मेलन में विचारार्थ लाये जाने वाले तीस प्रस्तावों में से कुछ को लेकर बहुम कुछ राजनैतिक दांव पेंच खेले गये है। पालिका अध्यक्ष आरती शुक्ला ने प्रस्तावों को तय करने के पहले अनौपचारिक रूप से पार्टी के पार्षदों की बैठक करके विचार भी किया गया था। लेकिन भाजपा की गुटबाजी ने एक बार फिर पालिका में पूर्ण बहुमत होने के बाद भी आखिर फजीता ही कराया। ऐसा क्यों हो रहा है? इसे लेकर भाजपायी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें सुनायी देती रहतीं है। सिवनी विधानसभा क्षेत्र से आगामी चुनाव लड़ने के इच्दुक भाजपा नेताओं की यह इच्छा नहीं हैं आरती शुक्ला का कार्यकाल अच्छा रहें क्योंकि उनकी राजनैतिक पारिवारिक पृष्ठ भूमि है और उनके ससुर स्व.महेश शुक्ला  ना केवल सिवनी विधानसभा के पहले भाजपा विधायक थे वरन पटवा सरकार में मंत्री भी रहे थे। इसीलिये अंदरूनी तौर पर भाजपा नेताओं द्वारा ही समय समय पर दांव पेंच खेले जाते रहे हैं। वैसे भी पालिका में भाजपा की गुटबाजी खुल कर देखी जा सकती है। इस बार तीन सड़कों के प्रस्ताव को लेकर भी भारी राजनीति हुयी। एसपी बंगले अपर बैनगंगा कालोनी वाली रोड़ सर्वाधिक राजनीति में फंसी क्योंकि इस रोड़ पर सिवनी विधायक मुनमुन राय का घर है। विरोध के इस एक मात्र मुद्दे ने यह तक भुला दिया कि इस रोड़ से पूरे शहर के सैकड़ों बच्चे कोचिंग के लिये दो पहिया वाहनों से जाते हैं। क्योंकि शहर की सबसे अच्छी कोंचिंग इसी रोड़ पर है। समाज के जागरूक लोगों का मुनमुन विरोध इस कदर हावी रहा है कि इस संवेदनशील मुद्दे तक को दरकिनार दिया। जनसंपर्क कार्यालय से बबरिया स्कूल तथा बाहुबली से पालेटेक्निक कालेज वाली रोड़ पर भी रानजीति गयी जबकि इन्हीं सड़कों काी जर्जर हालत के समाचार सुर्खी बने रहते थे। समय के साथ सुविधानुसार राजनीति का यह सिलसिला ही जिले के विकास में बाधक साबित हो रहा है।“मुसाफिर”
साभार
दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
15 सितम्बर 15   





Monday, August 31, 2015

लखनादौन को जिला बनाने की मांग
क्या एक विधानसभा क्षेत्र  की सीमाओं का विस्तार दो जिलों तक हो सकता है या फिर होगा परिसीमन?
तीस तक नहीं हो सकता परिसीमनःप्रस्तावित क्षेत्र में पहले दो ही विस क्षेत्र थेः अब तीन विस क्षेत्र आते हैं प्रस्तावित क्षेत्र मेंः कैसे होगा  इसका हल? 
सिवनी। लखनादौन को जिला बनाने की मांग बहुत पुरानी हैं। आज से लगभग 12-13 साल पहले सोनिया गांधी के लखनादौन प्रवास की तैयारियों की कांग्रेस की बैठक में डॉ. आनंद तिवारी ने यह मांग उठायी थी तब यह कह कर दबा दिया गया था कि जिला क्या संभाग बनाने की मांग कर लो। लेकिन अंदर ही अंदर यह मांग सुलगती रही और अब इसे लेकर विगत पंद्रह दिनों से आंदोलन चल रहा है जिसे भारी जन समर्थन भी मिल रहा है।
जब परिसीमन हुआतो लोकसभा और जिले का एक विस क्षेत्र विलुप्त हो गया तब क्षेत्र कुछ इस तरह से काटे गये कि आज लखनादौन जिले के लिये जो सीमायें प्रस्तावित की जा रहीं हैं उसमें जिले के चार में से तीन विस क्षेत्रों के हिस्से शामिल है। इन क्षेत्रों में लखनादौन के अलावा केवलारी और सिवनी विस क्षेत्र के हिस्ससे भी आ रहें हैं जो कि छपारा विकास खंड़ के इलाके है। 
यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है वर्तमान परिसीमन के पहले जिलें के लो पांच विस क्षेत्र थे एनमें से दो लखनादौन और घंसौर क्षेत्र छपारा,लखनादौन,घंसौर और धनोरा विकास खंड़ में आते थे जो कि वर्तमान में प्रस्तावित लखनादौन जिले की सीमायें है। शेष चार विकासखंड़ों सिवनी,बरघाट,केवलारी और कुरई में सिवनी,केवलारी और बरघाट विस क्षेत्र आते थे जो कि सामान्य क्षेत्र थे। 
पिछले परिसीमन के दौरान केन्द्र की अटल सरकार ने यह प्रतिबंध लगा दिया था कि सन 2030 तक इसके बाद परिसीमन नहीं हो सकेगा। वैसे हर दस साल में जनगणना के बाद देश के लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन होता था। पछिला परिसीमन 2001 की जन गणना के आधार पर हुआ था जबकि अब 2011 की जन गणना भी पूरी हो गयी है लेकिन केन्द्र सरकार के प्रतिबंध के कारण परिसीमन 2030 तक होना संभव नहीं है। 
ृ सामान्य तौर पर एक से अधिक जिलों में लोकसभा क्षेत्र की सीमायें तो विस्तारित होतीं हैं लेकिन विधानसभा क्षेत्रों के मामले में ऐसी कोंई नजीर सामने नहीं आयीं है। ब्लकि परिसीमन आयोग के निर्देश ऐसे रहते है कि विस क्षेत्रों के परिसीमन में जहां तक संभव हो ग्राम पंचायत भी ना तोड़ी जाये तो फिर जिले से ही बाहर जाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता हैं।
इस मांग को लेकर चलाये जा रहे इस आंदोलन को भारी जन समर्थन मिल रहा हैं। जन भावनाओं का प्रजातंत्र में आदर किया जाना चाहिये यह भी सही हैं लेकिन यदि विस क्षेत्रों वाला पेंच फंसा तो फिर इसका क्या और कैसे हल निकलेगा? इस पर भी विचार करना बहुत जरूरी है नहीं तो जन भावनाओं के साथ एक बड़ा खिलवाड़ हो जायेगा।  
दर्पण ढूठ ना बोले सिवनी
01 सितम्बर 2015 से साभार

Monday, August 24, 2015

अतिथि बनाकर बुलाने पर भी गौरी भाऊ से परहेज के चलते क्या सिवनी आने से  कतराते हैं सांसद बोध सिंह?
बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार गिरफ्तारी हुयी।सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है ।  
अतिथि बनने पर भी नहीं आते सांसद बोधसिंह-बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिन मतदाताओं ने उन्हें चुनकर सांसद बनाया है उनके प्रति तो उनके बहुत सारे कर्त्तव्य भी है लेकिन ना जाने क्यों वे सिवनी जिले से ना केवल मंुह चुराते है वरन यहां की समस्याओं के प्रति भी गंभीर नहीं है। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। अब भाजपा के इन दो दिग्गज नेताओं की लड़ाई का खामियाजा जिले को भुगतना पड़ रहा है। अभी हाल ही में बरघाट में नगर पंचायत में लगभग सवा करोड़ रुपयों के कामों का भूमिपूजन प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन के द्वारा किया गया जिसमें सांसद बोधसिंह भगत और फग्गनसिंह कुलस्ते दोनों ही विशिष्ट अतिथि बनाये गये थे। इसी तरह 15 अगस्त को जिले के दलसागर तालाब में दलसागर महोत्सव आयोजित किया गया इसमें भी ओनों ही सांसद विशिष्ट अतिथि थे लेकिन दोनों ही कार्यक्रमों में सांसद कुलस्ते तो आये लेकिन बोधसिंह भगत ने हमेशा की तरह कन्नी काट लिया। जबकि बरघाट और सिवनी दोनों ही विधानसभा क्षेत्र कुलस्ते के संसदीय क्षेत्र में नहीं आते है। कार्यक्रमों से परहेज करें और चाहें तो जिले में बिल्कुज ना आये लेकिन कम से कम जिले की समस्याओं के प्रति तो जागरूक रहें तो वैसा भी नहीं है। फोर लेन के मामले में जरूर उनके एक दो बयान आये लेकिन वे भी सही नहीं निकले। रामटेक गोटेगांव नई रेल लाइन और छिंदवाड़ा नैनपुर के गेज परिवर्तन के संबंध में भी ना जाने क्यों भगत जी ने चुप्पी ही साध रखी है जबकि ये तीनों ही मांगें केन्द्र सरकार से संबंधित हैं और बिना उनके प्रयास किये पूरी भी नहीं होने वाली हैं। जिले के भाजपा के इकलौते विधायक कमल मर्सकोले और दोनों भाजपा सांसदों को इसं संबंध में कारगर पहल करना चाहिये ताकि जिले के लोगों को ये मूलभूत सुविधायें मिल सकें। 
कमलनाथ के नेतृत्व में हुआ जंगी प्रर्दशनःजिले में बजी अपनी अपनी ढपली -विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इस आंदोलन में जिले के कांग्रेस नेताओं ने भी अलग अलग ग्रुप में अपनी भागीदारी की है। केवलारी के इंका विधायक रजनीश सिंह के नेतृत्व में स्व. हरवंश सिंह के समर्थकों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इसमें जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी,राजा बघेल, असलम भाई और मोहन चंदेल सहित कई नेता शामिल थे। जबकि एक अलग ग्रुप के रूप में सिवनी विस के पूर्व प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने भी हिस्सा लिया। उल्लेखनीय है कि व्यापम घोटाले की सी.बी.आई. जांच के बाद प्रदेश में यह पहला विशाल आंदोलन था जिसकी अगुवायी पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने की है। कांग्रेस की आक्रामक नीति के चलते ऐसे और भी आयोजन किया जाना प्रस्तावित है। वेस्े तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने जबलपुर संभाग के अन्य जिलों में इसमें शामिल होने के लिये कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किये थे। ऐसा दावा जिले के कांग्रेस के पदाधिकारियों का था। वैसे भी जिले में कांग्रेस या कांग्रेस के नेताओं के द्वारा कोई ऐसे संगठित प्रयास नहीं किये गये कि जिले के ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें पहुंच सकें। सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। ब्लाक कांग्रेस के लेवल पर भी कोई प्रयास नहीं हुये। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। इसीलिये सभी नेता अपनी अपनी ढपली बजाते देखे गये।
क्या मुख्यमंत्री को अपनी ही जुबान की कद्र नहीं हैं? -कई साल पहले सविनी के मिशन स्कूल की सभा में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। बीच में प्रदेश सरकार ने सदन और प्रेस कॉंफ्रेंस में दावा किया था कि केन्द्र सरकार को छिंदवाड़ा और शिवपुरी नहीं वरन मूल प्रस्ताव के अनुरुप सिवनी और सतना के प्रस्ताव भेजे गये हैं। फिर भाजपा नेताओं ने दावा किया कि यहां पीपीडी मोड का कॉलेज खुलेगा। जेकिन पीपीडी मोड के कालेजों के समय भी सरकार ने सिवनी का प्रस्ताव लंबित रख दिया और ऐसा अखबारों से पता चला है कि केन्द्र सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेजों की सूची में भी पूर्व की ही भांति छिंदवाड़ा और शिवपुरी का प्रस्ताव भेज दिया गया है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है जबकि मेडिकल कालेज के हिसाब से 80 के दशक में ही कु. विमला वर्मा के समय सरकारी अस्पताल खुल चुका था। भाजपा और उसके जनप्रतिनिधि शायद जिले के हितों का इसलिये ध्यान नहीं रखने के आदी हो गये हैं कि बिना कुछ दिये वे चुनाव जीत जाते हैं तो फिर भला कुछ देने से क्या फायदा। रहा सवाल विपक्ष याने कांग्रेस के विधायकों रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह का तो सिवनी मुख्यालय उनके क्षेत्र में नहीं आता है तो वे भी रुचि लेते नहीं दिखते है।वैसे तो एक कहावत है कि झूठ बोले कौव्वा काटे यह चरितार्थ होती है या नहीं और मुख्यमंत्री को कौव्वा काटता है कि नहीं?“मुसाफिर”   
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
24 अगस्त 2015 से साभार
अतिथि बनाकर बुलाने पर भी गौरी भाऊ से परहेज के चलते क्या सिवनी आने से  कतराते हैं सांसद बोध सिंह?
बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार गिरफ्तारी हुयी।सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है ।  
अतिथि बनने पर भी नहीं आते सांसद बोधसिंह-बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद बोधसिंह भगत भी एक अलग ही मिजाज के आदमी है। यदि कोई किसी को अतिथि बनाकर बुलाता है तो ऐसा महसूस होता है कि उसे सम्मान दिया जा रहा है और उसका सीना गर्व से फूल जाता है। लेकिन सांसद भगत तो अपने ही क्षेत्र में अपनी ही पार्टी की सरकार के कार्यक्रमों में अतिथि बनाये जाने के बाद भी परहेज कर जाते हैं और शरीक नहीं होते हैं। जबकि जिन मतदाताओं ने उन्हें चुनकर सांसद बनाया है उनके प्रति तो उनके बहुत सारे कर्त्तव्य भी है लेकिन ना जाने क्यों वे सिवनी जिले से ना केवल मंुह चुराते है वरन यहां की समस्याओं के प्रति भी गंभीर नहीं है। जबकि जिले की बरघाट और सिवनी विस सीट से उन्हें लगभग 70 हजार वोटों की बढ़त मिली थी नहीं तो बालाघाट जिले के 6 विस क्षेत्रों से तो वे मात्र 20 हजार वोट की ही लीड ले पाये थे। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सांसद जी की गौरी भाऊ से पटती नहीं हैं इसलिये वे गोल मार जाते है। अब भाजपा के इन दो दिग्गज नेताओं की लड़ाई का खामियाजा जिले को भुगतना पड़ रहा है। अभी हाल ही में बरघाट में नगर पंचायत में लगभग सवा करोड़ रुपयों के कामों का भूमिपूजन प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन के द्वारा किया गया जिसमें सांसद बोधसिंह भगत और फग्गनसिंह कुलस्ते दोनों ही विशिष्ट अतिथि बनाये गये थे। इसी तरह 15 अगस्त को जिले के दलसागर तालाब में दलसागर महोत्सव आयोजित किया गया इसमें भी ओनों ही सांसद विशिष्ट अतिथि थे लेकिन दोनों ही कार्यक्रमों में सांसद कुलस्ते तो आये लेकिन बोधसिंह भगत ने हमेशा की तरह कन्नी काट लिया। जबकि बरघाट और सिवनी दोनों ही विधानसभा क्षेत्र कुलस्ते के संसदीय क्षेत्र में नहीं आते है। कार्यक्रमों से परहेज करें और चाहें तो जिले में बिल्कुज ना आये लेकिन कम से कम जिले की समस्याओं के प्रति तो जागरूक रहें तो वैसा भी नहीं है। फोर लेन के मामले में जरूर उनके एक दो बयान आये लेकिन वे भी सही नहीं निकले। रामटेक गोटेगांव नई रेल लाइन और छिंदवाड़ा नैनपुर के गेज परिवर्तन के संबंध में भी ना जाने क्यों भगत जी ने चुप्पी ही साध रखी है जबकि ये तीनों ही मांगें केन्द्र सरकार से संबंधित हैं और बिना उनके प्रयास किये पूरी भी नहीं होने वाली हैं। जिले के भाजपा के इकलौते विधायक कमल मर्सकोले और दोनों भाजपा सांसदों को इसं संबंध में कारगर पहल करना चाहिये ताकि जिले के लोगों को ये मूलभूत सुविधायें मिल सकें। 
कमलनाथ के नेतृत्व में हुआ जंगी प्रर्दशनःजिले में बजी अपनी अपनी ढपली -विगत 20 अगस्त को व्यापम घोटाले के विरोध में जबलपुर में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में विशाल जेल भरो आंदोलन हुआ जिसमें लगभग 20 हजार लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इस आंदोलन में जिले के कांग्रेस नेताओं ने भी अलग अलग ग्रुप में अपनी भागीदारी की है। केवलारी के इंका विधायक रजनीश सिंह के नेतृत्व में स्व. हरवंश सिंह के समर्थकों ने अपनी गिरफ्तारी दी। इसमें जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी,राजा बघेल, असलम भाई और मोहन चंदेल सहित कई नेता शामिल थे। जबकि एक अलग ग्रुप के रूप में सिवनी विस के पूर्व प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने भी हिस्सा लिया। उल्लेखनीय है कि व्यापम घोटाले की सी.बी.आई. जांच के बाद प्रदेश में यह पहला विशाल आंदोलन था जिसकी अगुवायी पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने की है। कांग्रेस की आक्रामक नीति के चलते ऐसे और भी आयोजन किया जाना प्रस्तावित है। वेस्े तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने जबलपुर संभाग के अन्य जिलों में इसमें शामिल होने के लिये कोई दिशा निर्देश जारी नहीं किये थे। ऐसा दावा जिले के कांग्रेस के पदाधिकारियों का था। वैसे भी जिले में कांग्रेस या कांग्रेस के नेताओं के द्वारा कोई ऐसे संगठित प्रयास नहीं किये गये कि जिले के ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें पहुंच सकें। सभी लोगों ने अपने अपने निजी प्रयास किये और अपने नेतृत्व में अपने समर्थकों को ले जाने का प्रयास किया। ब्लाक कांग्रेस के लेवल पर भी कोई प्रयास नहीं हुये। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ के सामने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराना ही नेताओं का लक्ष्य रहा। इसीलिये सभी नेता अपनी अपनी ढपली बजाते देखे गये।
क्या मुख्यमंत्री को अपनी ही जुबान की कद्र नहीं हैं? -कई साल पहले सविनी के मिशन स्कूल की सभा में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जिले को मेडिकल कॉलेज की सौगात देने की घोषणा करके जनता की खूब तालियां बटोरीं थीं। बीच में प्रदेश सरकार ने सदन और प्रेस कॉंफ्रेंस में दावा किया था कि केन्द्र सरकार को छिंदवाड़ा और शिवपुरी नहीं वरन मूल प्रस्ताव के अनुरुप सिवनी और सतना के प्रस्ताव भेजे गये हैं। फिर भाजपा नेताओं ने दावा किया कि यहां पीपीडी मोड का कॉलेज खुलेगा। जेकिन पीपीडी मोड के कालेजों के समय भी सरकार ने सिवनी का प्रस्ताव लंबित रख दिया और ऐसा अखबारों से पता चला है कि केन्द्र सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेजों की सूची में भी पूर्व की ही भांति छिंदवाड़ा और शिवपुरी का प्रस्ताव भेज दिया गया है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सिवनी के भाग्य से मेडिकल कालेज छिन रहा है जबकि मेडिकल कालेज के हिसाब से 80 के दशक में ही कु. विमला वर्मा के समय सरकारी अस्पताल खुल चुका था। भाजपा और उसके जनप्रतिनिधि शायद जिले के हितों का इसलिये ध्यान नहीं रखने के आदी हो गये हैं कि बिना कुछ दिये वे चुनाव जीत जाते हैं तो फिर भला कुछ देने से क्या फायदा। रहा सवाल विपक्ष याने कांग्रेस के विधायकों रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह का तो सिवनी मुख्यालय उनके क्षेत्र में नहीं आता है तो वे भी रुचि लेते नहीं दिखते है।वैसे तो एक कहावत है कि झूठ बोले कौव्वा काटे यह चरितार्थ होती है या नहीं और मुख्यमंत्री को कौव्वा काटता है कि नहीं?“मुसाफिर”   
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
24 अगस्त 2015 से साभार

Thursday, August 13, 2015

तिरंगे के भगवा और हरे रंग के पक्षधर ये ना भूले कि दोनों के बीच शांति का प्रतीक सफेद रंग भी है जिसके बिना देश की प्रगति की कल्पना संभव नहीं
आज हम 69 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे है। अंग्रेजों की 2 सौ साल की गुलामी के बाद आज के दिन हमें आजादी मिली थी। जिन अंग्रेजों के राज में कभी सूरज नहीं डूबता था उन्हें अहिंसा के हथियार से हमने देश से खदेड़ दिया था। हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने का संकल्प लिया था लेकिन कुछ तबकों में फैली संप्रदायिक ताकतों के चलते  हमें देश को एक और अखंड़ रखने के लिये आजादी के बाद भी तीन तीन गांधियों,महात्मा गांधी,इंदिरा गांधी और राजीव गांधी, की शहादत देनी पड़ी। आज भी देश के कुछ हिस्सों में आतंकवाद का खतरा मंड़रा रहा है। आये दिन पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान युद्ध विराम और सीमाओं का उल्लंघन करके सीमा पर गोलीबारी करते रहता है। हमारे जवान ना केवल उनका मुंहतोड़ जवाब देते है वरन कई जवान तो शहीद भी हो जाते है। इसके अलावा सांप्रदायिक हिंसा की घटनायें भी हमें शर्मिंदा करती रहतीं हैं। हमें यह समझना और मानना पड़ेगा कि आतंवादियों और अपराधियों का कोई भी धर्म या मजहब नहीं होता। कोई भगवान या खुदा नहीं होता। वो सिर्फ आतंकवादी या अपराधी ही होता है। लेकिन आजादी के इतने साल बाद भी देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो आतंकवादियों और अपराधियों में रंग के आधार पर परहेज करते है। कभी कोई हरे रंग का पक्षधर दिखायी देता है तो कभी कोई भगवे रंग के पक्ष में लामबंदी करते दिखता है। जबकि होना यह चाहिये कि आतंकवादी हो या अपराधी उससे उसके कर्मों के आधार पर व्यवहार किया जाये ना कि धर्म या जाति के आधार पर। वैसे तो हमने अपने राष्ट्र ध्वज में भी केसरिया (भगवे) और हरे रंग का प्रयोग किया है लेकिन दोनों ही रंगों के बीच में सफेद रंग पर अशोक चक्र भी बनाया है। हालांकि इन रंगो के  प्रतीक कुछ और माने गये थे लेकिन आज के परिपेक्ष्य में देखें तो भगवे और हरे रंग के पक्षधर के रूप में जो लोग भी सामने आये है वे शायद यह भूल गयें हैं कि इन दोनों रंगों के बीच में शांति के प्रतीक सफेद रंग को भी रखा गया है। ताकि सभी वर्गों और धर्मों के बीच अमन चैन और शांति बनी रहे। सिर्फ भगवे और हरे रंग से तिरंगा पूरा नहीं हो सकता जब तक कि उसके बीच में शांति का प्रतीक सफेद रंग नहीं होगा। इसलिये आज यह समय की मांग है कि देश के सभी राजनैतिक दल जात पात,धर्म मजहब, भाषा और क्षेत्रीयता की भावना को वरीयता ना दें और संविधान की मूल भावना के अनुरूप देश को एक मजबूत और विकसित धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बनाने में प्राण प्रण से जुट जायें। तो आइये आज के दिन हम यह संकल्प लें कि आतंकवादियों और अपराधियों में हम मजहब या धर्म के आधार पर हरे या भगवे रंग का पक्षधर बनने के बजाय तिरंगें के तीनों रंगों का सम्मान करते हुये आपसी भाईचारा और अमन चैन कायम करके देश को प्रगति के पथ पर तेजी से अग्रसर करने में जुट जायेंगें। 

Monday, July 27, 2015

शहर में दो गर्ल्स कॉलेज हैं या सरकार के मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने सदन में मुनमुन के सवाल का गलत जवाब दिया है? 
   सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस कन्या महाविद्यालय के संबंध में विधानसभा में प्रश्न पूछा। इसका जवाब देते हुये प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने जवाब दिया कि,सिवनी के नेताजी सुभाषचंद्र बोस कन्या माविद्यालय के पास भवन नहीं हैं इस वजह से यूजीसी से राशि नहीं मिल पा रही है। जबकि बींझावाड़ा की भूमि पर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वोरा ने गर्ल्स कालेज का भूमिपूजन किया था जिसमें कालेज भवन के साथ साथ पचास पचास सीट के दो हास्टल भी बनाये गये थे। लेकिन शहर से दूरी को मुद्दा बनाकर जब विरोध पुनः हुआ तो तत्कालीन भाजपा विधायक नरेश दिवाकर की पहल पर उस अपने खुद के भवन को छोड़कर इस कालेज को एक बार फिर उसी जेल भवन में ले जाया गया।इसी दौरान शासकीय कन्या महाविद्यालय का नामकरण नेताजी सुभाषचंद्र बोस कन्या महाविद्यालय के रूप में कर दिया गया। लेकिन कालेज का स्थापना वर्ष तो एक ही है। व्यापम के विरोध में प्रदेश कांग्रेस के आव्हान पर 16 जुलाई को जिले में भी बंद का आव्हान किया गया था। कांग्रेस के इस बंद को जिल मुख्यालय लगभग सभी बड़े कस्बों में आशातीत सफलता मिलने से जिले के कांग्रेसी उत्साहित है। प्रदर्शनकारी युवा कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं पर पुलिस ने अश्रु गैस के गोलों के साथ जम कर लाठी भी भांजी जिसमें सिवनी जिले के बरघाट विस क्षेत्र के युवक कांग्रेस के अध्यक्ष देवेन्द्र ठाकुर भी घायल हो गये और उनके हाथ की हड्डी टूट गयी।

मुनमुन के सवाल से उठे कई सवाल-सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस कन्या महाविद्यालय के संबंध में विधानसभा में प्रश्न पूछा। इसका जवाब देते हुये प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने जवाब दिया कि,सिवनी के नेताजी सुभाषचंद्र बोस कन्या माविद्यालय के पास भवन नहीं हैं इस वजह से यूजीसी से राशि नहीं मिल पा रही है। जेल भवन की भूमि को महाविद्यालय को देने के लिये उच्च शिक्षा विभाग ने अर्धशासकीय पत्र लिखकर इस संबंध में कार्यवाही करने को लिखा है। विधायक के प्रश्न और मंत्री के द्वारा दिये गये जवाब से यह सवाल पैदा हो गया है कि क्या शहर के दो गर्ल्स कॉलेज है? ऐसा सवाल इसलिये उठ खड़ा हुआ क्योंकि सन 1980 के दशक में जिले में छात्राओं को उच्च शिक्षा मिले इसकी मांग उठने लगी थी। प्रदेश की तत्कालीन दबंग कांग्रेस सरकार की मंत्री कु. विमला वर्मा की पहल पर जिले के सिवनी मुख्यालय में शासकीय कन्या महाविद्यालय खोला गया था जो अपने शुरुआती दिनों में एमएलबी स्कूल में लगा था। फिर कुछ समय बाद इसे जेल के भवन में स्थानान्तरित कर दिया गया था। जब प्रदेश के मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा थे तब प्रदेश के उच्चशिक्षा मंत्री चित्रकांत जैसवाल जिले के प्रभारी मंत्री थे। उसी समय इस कालेज के भवन के लिये राशि स्वीकृत हुयी और जिले की प्रथ महिला कलेक्टर श्रीमती आभा अस्थाना ने निकटवर्ती ग्रात बींझावाड़ा की लगभग 40 एकड़ शासकीय भूमि चिन्हित की जिसमें से 15 एकड़ जमीन गर्ल्स कालेज के लिये आवंटित की गयी एवं शेष जमीन कलेक्टरेट सहित ऐसे शासकीय कार्यालयों को आवंटित कर दी थी जिनके स्वयं के भवन नहीं थे। इसी भूमि पर प्रदेश के मुख्यमंत्री वोरा ने गर्ल्स कालेज का भूमिपूजन किया था जिसमें कालेज भवन के साथ साथ पचास पचास सीट के दो हास्टल भी बनाये गये थे। छुट पुट स्थानीय विरोध के बाद भी गर्ल्स कॉलेज नये भवन में ले जाया गया एवं आवागमन की दिक्कत को देखते हुये एक कालेज बस भी सरकार ने दिलायी थी।लेकिन शहर से दूरी को मुद्दा बनाकर जब विरोध पुनः हुआ तो तत्कालीन भाजपा विधायक नरेश दिवाकर की पहल पर उस अपने खुद के भवन को छोड़कर इस कालेज को एक बार फिर उसी जेल भवन में ले जाया गया। और कालेज के उस भवन का तो कुछ उपयोग हो भी रहा है लेकिन हास्टल के दोनों भवन बिना चालू हुये ही खंडहर में तबदील होते जा रहे है। तात्कालिक राजनैतिक लाभ के लिये गये इस निर्णय से कालेज का कितना नुकसान हुआ इसका अंदाज तो सदन में दिये गये उच्च शिक्षा मंत्री के बयान से ही लग रहा है खुद का भवन ना होने के कारण यूजीसी के अनुदान प्राप्त नहीं हो सकते है। इससे कालेज का पूरा विस्तार ही थम गया है। इसी दौरान शासकीय कन्या महाविद्यालय का नामकरण नेताजी सुभाषचंद्र बोस कन्या महाविद्यालय के रूप में कर दिया गया। लेकिन कालेज का स्थापना वर्ष तो एक ही है। सदन में उच्च शिक्षा मंत्री गुप्ता द्वारा दिये गये बयान से प्रतीत होता है कि शहर में या तो दो गर्ल्स कॉलेज हैं या फिर उन्होंने सदन में गलत बयानी की है कि जिले के कन्या महाविद्यालय के पास अपना खुद का भवन नहीं हैं क्योंकि नेता जी सुभाषचंद्र बोस कन्या महाविद्यालय के रूप में जिले के शासकीय कन्या महाविद्यालय का ही नामकरण किया गया था। अब यह एक शोध का विषय बन गया है कि जिस कालेज का एक भवन हो और वह अपने भवन में नहीं लग रहा है तो क्या यूजीसी उसी कालेज के लिये दूसरा भवन बनाने के लिये राशि देगी? और क्या जिले की छात्राओं को दिखाये जा रहे सपने पूरे होंगें? इनके जवाब भविष्य की गर्त में छिपे हुये हैं।
व्यापम के विरोध में कांग्रेस का बंद रहा सफल-व्यापम के विरोध में प्रदेश कांग्रेस के आव्हान पर 16 जुलाई को जिले में भी बंद का आव्हान किया गया था। कांग्रेस के इस बंद में जिले भर में व्यवसायिक प्रतिष्ठान बंद रखने का आव्हान कांग्रेस ने किया था। कांग्रेस के इस बंद को जिला मुख्यालय लगभग सभी बड़े कस्बों में आशातीत सफलता मिलने से जिले के कांग्रेसी उत्साहित है। जिस तरह से भाजपा के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर बंद का विरोध किया था उससे ऐसा लगता था कि भाजपा के लोग सड़क पर उतरकर शायद बंद का विरोध करें। कुछ जानकारों का ऐसा मानना है कि भाजपा के कुछ नेताओं की ऐसी तैयारी भी थी लेकिन शहर में कांग्रेस के सभी गुट के लोगों के एक साथ सड़क पर उतर कर बंद में सहयोग देने के लिये की गयी अपील अधिक कारगर साबित हुयी और लोगों ने स्वयं ही अपने प्रतिष्ठान बंद रखे। प्रदेश के युवाओं की योग्यता के साथ किये गये शिवराज सरकार के व्यापम के खूनी खिलवाड़ के खिल
ाफ लोगों में आक्रोश था और इसी के चलते कांग्रेस को अपने बंद में सफलता मिली। राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर कांग्रेस जिस आक्रामक तरीके से इस मामले को उठा रही है उससे प्रदेश में पहली बार भाजपा और शिवराज सिंह बेकपुट पर दिखायी दे रहे हैं। इस मामले में भाजपा आला कमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के स्तीफे को लेकर चाहे जो भी निर्णय ले लेकिन इस मामले से प्रदेश में भाजपा की साख को जरूर धक्का लगा है।  
घेराव के दौरान देवेन्द्र ठाकुर की हड्डी टूटी-व्यापम के विरोध की श्रृंखला में प्रदेश युवक कांग्रेस ने मुख्यमंत्री निवास के घेराव की घोषणा की थी। इसमें जिले से कई युवा कांग्रेसी शरीक हुये थे। प्रदर्शनकारी युवा कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं पर पुलिस ने अश्रु गैस के गोलों के साथ जम कर लाठी भी भांजी जिसमें सिवनी जिले के बरघाट विस क्षेत्र के युवक कांग्रेस के अध्यक्ष देवेन्द्र ठाकुर भी घायल हो गये और उनके हाथ की हड्डी टूट गयी। कांग्रेस शासनकाल में कभी ये ही भाजपा के कार्यकर्त्ता गला फाड़ फाड़ कर नारे लगाते थे कि लाठी गोली की सरकार नहीं चलेगी चलेगी और आज भाजपा की सरकार ही अपने मुख्यमंत्री के निवास तक लोग ना पहुंच पाये इसके लिये लाठियां भांज रही है। “मुसाफिर” 
दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
28 जुलाई 2015 से साभार