Tuesday, November 2, 2010


दिवाली पर ऐसा कुछ करने का संकल्प ले जा ेराम राज की ओर ले जाये

अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व हैं दीपावली। अंधकार से आशय उस अंधेरे से नहीं हैं जो कि बिजली का बटन दबाते ही टयूब लाइट की रोशनी से समाप्त हो जाता हैं और ना ही उजाले का यह आशय हैं जो कि टयूब लाइट से निकलने वाला प्रकाश होता हैं। अंधकार से आशयसामाजिक बुराइयों से हैं और प्रकाश का आशय हैं सदगुण।

आज से 63 साल पहले हमारा देश गुलामी के अंधेरे से मुक्त हो गया हैं। ऐसा प्रतीत होता हैं कि इन सालों में अंधकार तो गहन होता गया हैं लेकिन प्रकाश की रोशनी कमजोर पड़ती जा रही हैं। आज सामाजिक बुराइयों को साधन बनाकर खुद को इतना अधिक प्रकाशवान कर लेते हैं कि वे समाज के आदर्श बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने में लोगों को संकोच तक नहीं होता हैं। भ्रष्टाचार समाज में शिष्टाचार का रूप लेता जा रहा हैं। अत्याचार पर रोक लगाने का जिन कंधों पर दायित्व हैं वे परदे के पीछे उनके संरक्षक की भूमिका में दिखते हैं। अधिकार संपन्न लोग अपनी सनक में कुछ भी करते देखे जा सकते हैंं। इन अंधकारों में गुणव्यक्ति कहीं खो गयाहैं जिसे देश में कभी गुणों के कारण सम्मान मिला करता था।

रावण बुराइयों और अत्याचार का प्रतीक था जिसका सदगुणों के प्रतीक राम ने वध यिा था और ऋषि मुनियों तथा मानव मात्र को अत्याचार से छुटकारा दिलया था। यह विजय प्राप्त करके राम जब अयोध्या वापस आये थे तब अयोध्यावासियों ने घी के दिये जलाकर उनका स्वागत किया था जिसे हम आज भी दीपावली के त्यौहार के रूप में मनाते हैं। दीप जलाकर,फटाके फोड़ कर और मां लक्ष्मी की पूजन करने मात्र से दिवाली मनाने का उद्देश्य पूरा नहीं होता हैं। आज आवश्यकता इस बात की हैं कि जिन आर्दशों और सदगुणों के माध्यम से राम ने रावण का वध किया था उन आदशोZं को अंगीकार करें और सामाजिक बुराइयों के रूप स्थापित होते जा रहे रावण राज के अन्त की दिशा में अपने कदम बढ़ायें। अन्यथा हर साल रावण का पुतला तो हम जलाते रहेंगें लेकिन आसुरी शक्तियां देश में फलती फूलती रहेंगी और राम राज का सपनी देखने वाले इस भारत वर्ष में राम ना जाने कहां गुम हो जायेंगें।

इस दिवाली पर हम ऐसा कुछ कर गुजरने का संकल्प ले जो कि हमें राम राज की ओर ले जाये यही दीपावली पर हमारी शुभकामनायें हैं।

दिवाली पर ऐसा कुछ करने का संकल्प ले जा राम राज की ओर ले जाये

अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व हैं दीपावली। अंधकार से आशय उस अंधेरे से नहीं हैं जो कि बिजली का बटन दबाते ही टयूब लाइट की रोशनी से समाप्त हो जाता हैं और ना ही उजाले का यह आशय हैं जो कि टयूब लाइट से निकलने वाला प्रकाश होता हैं। अंधकार से आशयसामाजिक बुराइयों से हैं और प्रकाश का आशय हैं सदगुण।

आज से 63 साल पहले हमारा देश गुलामी के अंधेरे से मुक्त हो गया हैं। ऐसा प्रतीत होता हैं कि इन सालों में अंधकार तो गहन होता गया हैं लेकिन प्रकाश की रोशनी कमजोर पड़ती जा रही हैं। आज सामाजिक बुराइयों को साधन बनाकर खुद को इतना अधिक प्रकाशवान कर लेते हैं कि वे समाज के आदर्श बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने में लोगों को संकोच तक नहीं होता हैं। भ्रष्टाचार समाज में शिष्टाचार का रूप लेता जा रहा हैं। अत्याचार पर रोक लगाने का जिन कंधों पर दायित्व हैं वे परदे के पीछे उनके संरक्षक की भूमिका में दिखते हैं। अधिकार संपन्न लोग अपनी सनक में कुछ भी करते देखे जा सकते हैंं। इन अंधकारों में गुणव्यक्ति कहीं खो गयाहैं जिसे देश में कभी गुणों के कारण सम्मान मिला करता था।

रावण बुराइयों और अत्याचार का प्रतीक था जिसका सदगुणों के प्रतीक राम ने वध यिा था और ऋषि मुनियों तथा मानव मात्र को अत्याचार से छुटकारा दिलया था। यह विजय प्राप्त करके राम जब अयोध्या वापस आये थे तब अयोध्यावासियों ने घी के दिये जलाकर उनका स्वागत किया था जिसे हम आज भी दीपावली के त्यौहार के रूप में मनाते हैं। दीप जलाकर,फटाके फोड़ कर और मां लक्ष्मी की पूजन करने मात्र से दिवाली मनाने का उद्देश्य पूरा नहीं होता हैं। आज आवश्यकता इस बात की हैं कि जिन आर्दशों और सदगुणों के माध्यम से राम ने रावण का वध किया था उन आदशोZं को अंगीकार करें और सामाजिक बुराइयों के रूप स्थापित होते जा रहे रावण राज के अन्त की दिशा में अपने कदम बढ़ायें। अन्यथा हर साल रावण का पुतला तो हम जलाते रहेंगें लेकिन आसुरी शक्तियां देश में फलती फूलती रहेंगी और राम राज का सपनी देखने वाले इस भारत वर्ष में राम ना जाने कहां गुम हो जायेंगें।

इस दिवाली पर हम ऐसा कुछ कर गुजरने का संकल्प ले जो कि हमें राम राज की ओर ले जाये यही दीपावली पर हमारी शुभकामनायें हैं।