Monday, December 10, 2012


संजय और भोजराज द्वारा श्रेय लेने के प्रयास को वीरेन्द्र ने थोथी वाहवाही बटोरने और प्रेस को गुमराह करने वाली कार्यवाही बताया
फोर लेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था। यह एक गैर राजनैतिक या यू कहें कि सर्वदलीय मंच बनाया गया था। लेकिन इसके कर्त्ता धर्ता बने लोगों ने इस अपनी राजनीति करने का जब मंच बना लिया गया तो धीरे धीरे इससे लोग कटने लगे। इस मंच को कुछ स्वय भू नेताओं कुछ नेताओं की आलोचना करने का मंच बना लिया।फोर लेन के मुद्दे पर मिली सफलता को अपनी निजी सफलता मान लिया और इसके संयोजक संजय तिवारी ने नपा अध्यक्ष का चुनाव लड़कर इसे राजनैतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर डाली। जिसका जनता जनार्दन ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया। जनमंच के बचे खुचे कुछ नेताओं ने एक काम और शुरू कर दिया कहीं कुछ भी हो उस पर मेड बाय जनमंच की सील लगानी चालू कर दिया। जिले में मंड़ी चुनावों का पहला चरण समाप्त हो गया हैं। नाम वापसी के बाद इंका और भाजपा अध्यक्षों ने पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी हैं। मंड़ी चुनावों की शुरुआत से ही सियासी हलकों में यह सुगबुगाहट चल रही थी कि नूरा कुश्ती में पारंगत इंका और भाजपा नेता अपनी अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुरूप आपस में मंड़ियों का बटवारा ना कर लें। केवलारी मंड़ी में हुये इस निर्विरोध निर्वाचन को राजनैतिक विश्लेषक इसी चश्में से देख रहें हैं। शासकीय वाहन में उल्टा तिरंगा झंड़ा लगने के समाचार बीत दिनों अखबारों की सुर्खियों में रहे। वाकया केवलारी विस क्षेत्र के छपारा में आयोजित जन सूचना अभियान मेले का हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विस उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय इंका विधायक ठाकुर हरवंश सिंह थे।  

जनमंची नेता श्रेय बटोरने के आरोप के घेरे में-फोर लेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था। यह एक गैर राजनैतिक या यू कहें कि सर्वदलीय मंच बनाया गया था। लेकिन इसके कर्त्ता धर्ता बने लोगों ने इस अपनी राजनीति करने का जब मंच बना लिया गया तो धीरे धीरे इससे लोग कटने लगे। इस मंच को कुछ स्वय भू नेताओं कुछ नेताओं की आलोचना करने का मंच बना लिया। इस जनमंच को फोर लेन के मुद्दे पर मिली सफलता को अपनी निजी सफलता मान लिया और इसके संयोजक संजय तिवारी ने नपा अध्यक्ष का चुनाव लड़कर इसे राजनैतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर डाली। जिसका जनता जनार्दन ने मुंह तोड़ जवाब भी दिया। जनमंच के बचे खुचे कुछ नेताओं ने एक काम और शुरू कर दिया कहीं कुछ भी हो उस पर मेड बाय जनमंच की सील लगानी चालू कर दिया। सड़क पर होने वाले प्रर्दशनों में मना बुझा कर सबको बुलाना और फिर कोई श्रेय लेने की बात हो तो सबको दर किनार कर एक पर एक दो लोगों द्वारा उसे बटोरना इन नेताओं की आदत सी बन गयी थी। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों हुआ। सिवनी बाय पास से खवासा तक की फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी के खिलाफ इतने साल बाद हुये 12 करोड़ 94 लाख रु. के जुर्माने के बाद जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने ने हॉटल बाहुबली में एक प्रेस कांफ्रेस लेकर इसे खुद की जीत बताया और अखबारों में सुर्खियां बटोरी थीं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है किसदभाव कंपनी ने सन 2008 से अपना काम चालू किया था और यह अवैध उत्खनन का काम उसी दौरान किया गया था। यहो यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इसी दौरान जनमंच और उसका आंदोलन भी पूरे शवाब में था तब जनमंच की कमान संभाहने वाले इन्हीं नेताओं ने सदभाव कंपनी की इस काली करतूत की अनदेखी क्यों की थी? यह सवाल आज जनता के बीच उठाया जा रहा हैं। जनमंच की इस पत्रकार वार्ता के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेन्द्र सोनकेशरिया ने बाकायदा एक प्रेस नोट जारी करके इस बात का खुलासा किया कि उनने जनवरी 2011 में हाई कोर्ट में सदभाव की इस काली करतूत के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी और माननीय न्यायालय के आदेश पर जिला कलेक्टर ने एक जांच समिति गठित की थी जिसकी अनुशंसा पर खनिज विभाग द्वारा सदभाव कंपनी पर 12 करोड़ 94 लाख रु. का जुर्माना किया गया जिसके लिये वसूली अधिकारी एस.डी.एम. सिवनी को बनाया गया था। लेकिन उन्होंने पूरी गुण दोष के आधार पर पूरी सुनवायी करके जुर्माने को ही शून्य घाषित कर दिया था। इसकी पुनः शिकायत करने की बात का खुलासा करते हुये सोनकेशरिया ने बताया कि इसके बाद एक बार फिर कंपनी पर जुर्माने के आदेश हुये। इस आदेश के बाद जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने द्वारा पत्रकार वार्ता लेकर श्रेय लेने की कार्यवाही को एडवोकेट सोनकेशरिया ने थोथी वाहवाही बटोरने और प्रेस को गुमराह करने वाली कार्यवाही बताया हैं। वीरेन्द्र ने यह भी उल्लेख किया है कि 2009 में सिर्फ फोरलेन के लिये जनमंच का गठन किया गया था लेकिन अब ऐसा लगता है कि जनमंच अब बाधाओं को दूर करने के बजाय थोथी वाहवाही लूटने की जुगत में लगा रहता हैं। इस तरह के कारनामे देखकर जिले की उस जनता को घोर निराश हाथ लगी है जिसने जनमंच के फोर लेन के आंदोलन में गैर राजनैतिक मंच समझकर उसे अपना समर्थन दिया था वरना जिले के भाजपायी और इंकाई जन प्रतिनिधियों का आपसी सौदेबाजी से तो वो वैसे ही निराश हो चुकी थी।
मंड़ी चुनाव में जोड़ तोड़ शुरू-जिले में मंड़ी चुनावों का पहला चरण समाप्त हो गया हैं। नाम वापसी के बाद इंका और भाजपा अध्यक्षों ने पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी हैं। भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने अपना चुनाव अभियान भी चालू कर दिया हैं। कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई पहल अभी तक दिखी नहीं हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह के निर्वाचन क्षेत्र केवलारी मंड़ी में दो कृषक वार्डों से निर्विरोध निर्वाचन के समाचार अखबारों की सुर्खी भी बने हैं। इनमें एक वार्ड से भाजपा तथा दूसरे वार्ड से इंका के कद्दावर नेता भोयाराम चौधरी निर्वाचित हो गये हैं। अखबारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भोयाराम केवलारी जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष रहें हैं और उपाध्यक्ष रहते हुये ही उन्होंने 1198 में बरघाट विस क्षेत्र से पहले बागी होकर और फिर 2003 में इंका प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। मंड़ी चुनावों की शुरुआत से ही सियासी हलकों में यह सुगबुगाहट चल रही थी कि नूरा कुश्ती में पारंगत इंका और भाजपा नेता अपनी अपनी राजनैतिक सुविधा के अनुरूप आपस में मंड़ियों का बटवारा ना कर लें। केवलारी मंड़ी में हुये इस निर्विरोध निर्वाचन को राजनैतिक विश्लेषक इसी चश्में से देख रहें हैं।  अब कौतूहल इसबात को लेकर मचा हुआ हैं कि महाराष्ट्र सीमा वाली महत्वपूर्ण सिवनी मंड़ी के मामले में नूरा कुश्ती विशेषज्ञ कैसा बंटवारा करते हैं? यह किसी एक खाते में पूरी पूरी जायेगी या फिर इसका आधा आधा बटवारा हो जायेगा। जिले की शेंष मंड़ियों में देसरा महत्वपूर्ण स्थान राजनैतिक रूप से केवलारी मंड़ी का हैं क्योंकि वह हरवंश सिंह के क्षेत्र में आती हैं। इस पर कांग्रेस का कब्जा होना बति आवयक माना जा रहा हैं। वैसे पहले तो सिवनी और केवलारी दोनों ही प्रमुख मंड़ियों पर कांग्रेस का ही कब्जा था लेकिन अब आने वाले चुनाव परिणामों पर सभी निगाहें इस लिये भी लगी हुयीं है क्योंकि नरेश दिवाकर द्वारा जिला भाजपा अध्यक्ष का दायित्व संभाहलने के बाद जिले में यह पहला चुनाव हैं।
विस उपाध्यक्ष की गाड़ी में उल्टा झंड़ा चर्चित?-शासकीय वाहन में उल्टा तिरंगा झंड़ा लगने के समाचार बीत दिनों अखबारों की सुर्खियों में रहे। वाकया केवलारी विस क्षेत्र के छपारा में आयोजित जन सूचना अभियान मेले का हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विस उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय इंका विधायक ठाकुर हरवंश सिंह थे। वाहन पर सवार होकर हरवंश सिंह समारोह स्थल तक पहुच गये लेकिन तब तक किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया कि गाड़ी में उल्टा राष्ट्र ध्वज फहरा रहा हैं। जब लोगों में इसकी चर्चा हुयी तो तो इसे सीधा किया गया। इस बाबद जब विस उपाध्यक्ष से प्रेस ने पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें सिवनी से प्रशासन ने गाड़ी उपलब्ध करायी थी और शायद ड्रायवर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया होगा। लिा भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने कहा कि राष्ट्र ध्वज का अपमान करने वाले के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये। उन्होंने यह कहने में संकोच बरता कि राष्ट्र ध्वज का अपमान किसने किया। भाजपा ने इस मामले में पुलिस रिपोर्ट कराने से भी परहेज किया। प्रशासन शायद ही अपनी ओर से इस मामले में कोई पहल करें क्योंकि गाड़ी झंड़े सहित उसी के द्वारा उपलब्ध करायी गयी थी। ऐसा लगता है कि जिले में हुये राष्ट्र ध्वज के अपमान का यह गंभीर मामला सिर्फ अखबारों में ही सिमट कर रह जायेगा। “मुसाफिर“  

Monday, December 3, 2012


शहीदों के सम्मान में भी जिला प्रमुखों और राजनेताओं की उपेक्षा एवं राजनीति उचित नहीं कही जा सकती
आजादी के बाद 16 जनवरी 2001 को जिले की वीर आदिवासी बाला बिंदु कुमरे श्रीनगर एयर पोर्ट पर लश्कर-ए-तोएबा की गोली से शहीद हो गयीं थीं। इसके बाद जिले की माटी के ही सपूत धंसौर विकास खंड़ के गा्रम भिलाई  के प्रवीण राजपूत ने श्रीनगर में ही 27 नवम्बर 2012 को आतंकवादी हमले में देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर दी। दोनों अमर शहीदों के पार्थिव शरीर जिले में लाये गये और उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तो किया गया लेकिन जिस तरह से जिला प्रमुखों और राजनेताओं द्वारा व्यवहार किया गया वह उचित तो नहीं ही कहा जा सकता। वैसे तो जिले से होकर गुजरने वाल उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बनने वाल फोर लेन रोड़ को लेकर बहुत से आंदोलन हुये। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ा गया। लेकिन बाद में ऐसे आंदोलन अपने रास्ते से भटकने लगे। अब प्रगतिशील विकासमोर्चे के बैनर पर गैर भाजपायी और गैर इंकाई नेताओं ने इसे लेकर एक बार फिर आंदोलन चालू किया हैं। वैसे प्रदेश की शिवराज सरकार ने अध्यक्ष बाद का सीधे मतदाताओं से होने वाले चुनाव को सदस्यों के माध्यम से कराने का फैसला लेकर किसानों की सीधी पसंद और नापसंद को नकार कर चुनाव मेनेजमेंट में माहिर नेताओं को अपने अपने करतब दिखाने और चुनावी साल में अपने नाम का डंका बजवाने का सुनहरा मौका दे दिया हैं।
शहीदों के सम्मान में जिला प्रमुखों एवं राजनेताओं ने दिखायी लापरवाही-आजादी की लड़ाई में जिले की तीन आदिवासी महिलाओं और एक पुरुष ने टुरिया में अंग्रेजों की गोलियां सीने पर झेल कर देश के लिये अपनी शहादत दी थी। आजादी के बाद 16 जनवरी 2001 को जिले की वीर आदिवासी बाला बिंदु कुमरे श्रीनगर एयर पोर्ट पर लश्कर-ए-तोएबा की गोली से शहीद हो गयीं थीं। इसके बाद जिले की माटी के ही सपूत धंसौर विकास खंड़ के गा्रम भिलाई  के प्रवीण राजपूत ने श्रीनगर में ही 27 नवम्बर 2012 को आतंकवादी हमले में देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर दी। दोनों अमर शहीदों के पार्थिव शरीर जिले में लाये गये और उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार तो किया गया लेकिन जिस तरह से राजनेताओं द्वारा व्यवहार किया गया वह उचित तो नहीं ही कहा जा सकता। बिन्दु कुमरे के वक्त तत्कालीन प्रभारी मंत्री डोमन सिंह नगपुरे ने आना जरूरी नहीं समझा तो प्रवीण राजपूत के वक्त प्रभारी मंत्री नाना भाऊ ने आना जरूरी नहीं समझा। बिन्दु कुमरे का पार्थिव शरीर जब सिवनी आ रहा था तब तत्कालीन वन मंत्री हाकी टूर्नामेंट के फायनल में मुख्य अतिथि के रूप से हेलीकाप्टर से सिवनी आये थे और बाजे गाजे और आतिशबाजी के साथ अपना स्वागत करा रहें थे। शहीद प्रवीण के समय भी हरवंश सिंह समय पर सिवनी में नहीं पहुचें और बरघाट नाके में उन्होंने श्रृद्धांजली अर्पित की। दोनों की शहीदों के अंतिम संस्कार में हरवंश सिंह ने शामिल होना उचित नहीं समझा। जिा भाजपा के अध्यक्ष और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने भी जिले की सीमा पर खवासा जाना जरूरी नहीं समझा और परिसीमन के बाद की सिवनी विस की सीमा गोपालगंज में श्रृद्धांजली अर्पित की। जिले के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी कलेक्टर और एस.पी. ने तो सिवनी शहर में ही श्रृद्धांजली अर्पित की और अंतिम संस्कार में भी नहीं गये। हालांकि उनके प्रतिनिधि अंतिम संस्कार में उपस्थित थे। जिस सिवनी जिले का इतिहास आजादी की लड़ाई में शहादत देने का रहा हैं। जिले में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहें हैं। आजादी के दौरान जिस जिले के जेल में देश के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुभाष चंद्र बोस, पीर पगारो,पंड़ित रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे लोग रखे गये हों उसी जिले को आज ना जाने क्या हो गया है कि जिले के प्रशासनिक और राजनैति क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो गये कि देश के लिये अपनी जान न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों के लिये एक दिन का वक्त भी नहीं निकाल पा रहें हैं।
फोर लेन के लिये प्रगतिशील विकास मोर्चे का आंदोलन प्रारंभ-वैसे तो जिले से होकर गुजरने वाल उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत बनने वाल फोर लेन रोड़ को लेकर बहुत से आंदोलन हुये। मामला सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ा गया। लेकिन बाद में ऐसे आंदोलन अपने रास्ते से भटकने लगे। कभी किसी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के कारण तो कभी सड़क के गड्ढे भरने में उलझा दिया गया तो कभी पुरानी सड़क को ही सुधारने की बात की जाने लगी तो कभी बनाने वालों को टारगेट बनाया जाने लगा। इसी कारण फोर लेन का प्रमुख मुद्दा दर किनार होता गया और गैर राजनैतिक आंदोलन में राजनीति ही राजनीति दिखने लगी इसी कारण धीरे धीरे जनता भी इससे दूर होती गयी।अब प्रगतिशील विकासमोर्चे के बैनर पर गैर भाजपायी और गैर इंकाई नेताओं ने इसे लेकर एक बार फिर आंदोलन चालू किया हैं। 1 दिसम्बर से काला पखवाड़ा मनाने की शुरुआत की गयी हैं।इसके तहत सिवनी शहर और खवासा तक जाने वाले वाहनों में प्रतीकात्मक रूप से काला फीता बांधा जायेगा तथ नुक्कड़ सभाओं के द्वारा कुछ कांग्रेसी और भाजपायी जनप्रतिनिधियों की सांठ गांठ का खुलासा किया जायेगा। मोर्चे के कामरेड हजारी लाल हेडाऊ और याहया कुरैशी ने यह जानकारी भी प्रेस को दी हैं कि आंदोलन आगे भी जारी रहेगा। नेताओं की पोल खोलना तो उनका अधिकार है लेकिन आंदोलन संचालित करने वालों को इस बात के प्रति भी सचेत रहना होगा कि आंदोलन कहीं सिर्फ पोल खोलने तक ही सीमित होकर ना रह जाये। मूल उद्देश्य तो फोर लेन बनवाने का हैं और वर्तमान में यह मामला राज्य वन्य प्राणी बोर्ड की अनुशंसा के साथ राष्ट्रीय वन्य प्राणी बोर्ड में अंतिम स्वीकृति के लिये लंबित पड़ा हैं। इसके लिये या तो किसी सांसद के माध्यम से संसद में या फिर दिल्ली में अपने राष्ट्रीय नेताओं से दवाब बनवाना होगा। इससे मामला जल्दी सुलझ सकता हैं। अन्यथा यह आंदोलन भी अन्य आंदोलनों की भांति ही धीरे धीरे वीर गति को प्राप्त हो जायेगा। 
मंड़ी चुनाव की धूम हुयी शुरु-समूचे जिले में मंड़ी चुनावों की गहमा गहमी तेज हो गयी हैं। नाम वापसी के बाद अब शायद कांग्रेस और भाजपा अपने समर्थित उम्मीदवारों के नामों की सूची भी जारी करें। इसके बाद सभी रणबांकुरे मैदान में अपनी रसद के साथ जुट जायेंगें। वैसे प्रदेश की शिवराज सरकार ने अध्यक्ष बाद का सीधे मतदाताओं से होने वाले चुनाव को सदस्यों के माध्यम से कराने का फैसला लेकर किसानों की सीधी पसंद और नापसंद को नकार कर चुनाव मेनेजमेंट में माहिर नेताओं को अपने अपने करतब दिखाने और चुनावी साल में अपने नाम का डंका बजवाने का सुनहरा मौका दे दिया हैं। ऐसे हालात में अक्सर यह देखा गया है कि दलीय समर्थन की सूची वालों के जीतने या हारने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि चुनाव मेनेजमेंट के फंडें में माहिर नेताओं का यह मानना रहता है कि जो जीता उसे अपना माने और जो हार गया उसे अपना होने के बाद भी भूल जाओ तभी अपनी महारत बनी रह सकती हैं। इसका उदाहरण जिला पंचायत उपाध्यक्ष के चुनाव में देखा भी गया है कि कांग्रेस के समर्थित उम्मीदवार सुधीर जैन को इंका विधायक हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में ही हरा कर जीतने वाले अनिल चौरसिया आज कांग्रेस के बैनर तले ही जीत कर उपाध्यक्ष बन गये हैं। अब देखना यह है कि जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर और इंकार अध्यक्ष हीरा आसवानी अपने समर्थित उम्मीदवारों की सूची बक जारी करते है और उन्हें जिताने के लिये कितने प्रयास करते है? या फिर जो जीता वो ही सिकंदर की तर्ज पर अपनी बिसात बिछाने की रएानीति बनाते हैं। वैसे तो प्रदेश सरकार ने किसानों में व्याप्त असंतोष को देखते हुये लंबे समय तक इन चुनावों को टाला लेकिन अब मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ये चुनाव हो रहें हैं इसका कांग्रेस कितना लाभ ले पाती है और नव नियुक्त जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर अपना कितना करतब दिखा पाते हैं? इसका खुलासा तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही होगा। “मुसाफिर“