Monday, May 31, 2010

शिव राज में मन्त्री विहीन शिव की नगरी अब प्रभारी अधिकारीमय होती जा रही है
सिवनी। शिव के राज में मन्त्री विहीन रहने वाली शिव की नगरी अब अधिकारी विहीन भी होती जा रही हैं। जाने वाले अधिकारी तो चले जातें हैं लेकिन आने वाले आते ही नहीं हैं। अधिकांश विभागों में ना केवल कई कई पद रिक्त पड़े हुये हैं वरन प्रभारी अधिकारियों का जो जलवा इस जिले में हैं शायद वो कहीं और नहीं होगा।
प्रदेश में भाजपा सरकार का नेतृत्व जबसे मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह के हाथों में आया हैं तब सें ही शिव की नगरी सिवनी को वो सम्मान नहीं मिल पा रहा हैं जो पहले मिला करता था।कांग्रेस शासन काल में तो अधिकांश समय दो मन्त्री ही रहा करते थे। दिग्गी राजा के दूसरे कार्यकाल के अन्तिम दिनों में तों जिले में सात सात लालबत्ती घूमा करती थीं। शिवराज सिंह जब मुख्यमन्त्री बने थे तो जिले के पांच विधायकों में से तीन विधायक भाजपा के थे। नये परिसीमन के बाद वर्तमान में जिले के चार विधायकों में से तीन विधायक भाजपा के हैं। इनमें एक शिक्षित युवा आदिवासी विधायक हैं तो दूसरी शिक्षित आदिवासी महिला विधायक हैं तो तीसरी ब्राम्हण समाज की विधि स्नातक महिला विधायक हैं जो कि सांसद भी रह चुकीं हैं। प्रदेश के चारों सांसदों में से विधायक बनी नीता पटेरिया ही एकमात्र शेष बचीं हैं जिन्हें शिवराज ने मन्त्री नहीं बनाया हैं। अन्य तीन गौरीशंकर बिसेन,रामकृष्ण कुसमारिया और सरताज सिंह तीनों ही कबीना मन्त्री बनाये जा चुकें हैं।
मन्त्री नहीं बनने का दर्द तो शिव की नगरी सिवनी झेल ही रही थी लेकिन शिव राज में अब तो अशिकारी विहीन भी होती जा रही हैं। जिले के अधिकांश विभागों का नेतृत्व या तो प्रमोटी अधिकारी कर रहें हैं या फिर प्रभारी अधिकारी जुगाड़ जमा कर बैठे हुये हैं। डॉ. रमनसिंह सिकरवार इस जिले के पहले नॉन आई.पी.एस. पुलिस अधीक्षक हैं। जिले में आठ उप जिलाध्यक्षों के पद हैं जो वर्तमान में तो सभी भरे हुयें हैं लेकिन एस.डी.एम.जैन तथा अतिरिक्त कलेक्टर अलका श्रीवास्तव का तबादला हो चुका हैं और उनके बदले किसी की नियुक्ति नहीं हुयी हैं। सिंचाई विभाग में मुख्य अभियन्ता से लेकर अनुविभागीय अधिकारी तक अधिकांश प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। स्वास्थ्य विभाग में तो प्रभारी सी.एम.ओ. डॉ.पटेरिया,जो कि भाजपा विधायक नीता पटेरिया के पति हैं, के स्थान पर डॉ. चौहान प्रभारी बन कर आ चुके हैं। इस विभाग में अधिकांश पद खाली पड़े हैं। जिससे स्वास्थ्य सेवायें चरमरा गईं हैं।
आबकारी और वन विभाग में कमान अधिकांश प्रमोटी अधिकारियों के हाथों में हैं। लोक निर्माण और ग्रामीण यान्त्रिकी विभाग में कार्यपालन यन्त्री तो नियमित हैं लेकिन एस.डी.ओ. के पद पर प्रभारी अधिकारी की परंपरा बदस्तूर जारी हैं। शायद ही जिले में कोई भी कॉलेज ऐसा होगा जिसमें पढ़ाने वालों के सभी पद भरे होंगें। सहायक आयुक्त आदिवासी विभाग ऊषा सिंह तो ऐसी बहुचर्चित अधिकारी रहीं जिन्हें पूरी भाजपा भी हटा नहीं पायी थी और जब वे गईं तो अपने मन से ही गई और कई दिनों तक उनसे चार्ज लेने वाले को इन्तजार करना पड़ा। ऐसा लगता हैं कि शिवराज शिव की नगरी सिवनी के लिये मन्त्री तो मन्त्री अधिकारी भी प्रभारी देकर ही काम चलाना चाहते हैं। ऐसी परिस्थिति में मतदाता अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा हैं।

Saturday, May 29, 2010

धोखाधड़ी याने धारा 420 और इंका नेता हरवंश सिंह के बीच क्या चोली दामन का साथ नज़र आता हैं
भूमि घोटाले से सम्बंधित प्रकाशित समाचार और हरवंश सिंह के खंड़न करने से कुछ ऐसे सवाल पैदा हो गयें हैं जिनका लोग उत्सुकता के साथ जवाब तलाश रहें हैं। इन तमाम सवालों के जवाब यदि जल्दी ही खुलकर जनता के सामने आ जाये तो इस मामले में अपने आप दूध का दूध और पानी का पानी हो जावेगा वरना यह भी लफ्फाजी के दौर में गुम कर रह जायेगा। इसे महज एक संयोग कहें या कुछ और कि भादंवि की धारा 420 याने धोखाधड़ी का हरवंश सिंह के खिलाफ यह कोई पहला मामला नहीं हैं।ब्लकि ऐसा कुछ रहा हैं कि मानो दोनों के बीच चोली दामन का साथ रहा हो। इसके पहले भी तीन मामले और चर्चित रहें हैं। एक फर्म के पार्टनर के रूप में आदिवासियों द्वारा, एक वकील के रूप में पिछड़े वर्ग की विधवा महिला द्वारा और सरकार के मन्त्री के रूप गलत हलफनामा देकर प्लाट लेने और फिर पटवा द्वारा मामला पेश होने पर प्लाट लौटाने के धोखेधड़ी के मामले हरवंश सिंह के खिलाफ चर्चित रहें हैं। म.प्र.राज्य परिवहन निगम के अध्यक्ष के रूप में तत्कालीन गृहमन्त्री हरवंश सिंह को न्यायलय के अवमानना के दोषी पाते हुये दो हजार रूपये का जुर्माना तथा एक माह की कैद की सजा सुनायी थी। इसके हरवंश सिंह सहित अन्य दोनों आरोपियों ने कोर्ट में बिना शर्त माफी मागी थी तथा कोर्ट के आदेश का पालन किया था तब कहीं जाकर कोर्ट ने हरवंश सिंह सहित सभी आरोपियों को कुछ हिदायतें देकर सजा समाप्त की थी।ß
एक बार फिर भूमि खरीदी विवाद में उछला हरवंश का नाम-
इस हफ्ते जमीन खरीदी के मामले में इंका विधायक हरवंश सिंह और उनके पुत्र विवाद में उलझे हैं या नहींर्षोर्षो यही मामला मीडिया और लोगों की जुबान पर रहा हैं। मामले की शुरूआत यूं हुई कि जबलपुर से प्रकाशित होने वाले पीपुल्स समाचार पत्र ने जबलपुर डेट लाइन से एक समाचार प्रकाशित किया कि लख्नादौन की एक अदालत में एक परिवाद पेश हुआ हैं जिसमें इंका विधायक हरवंश सिंह और उनके पुत्र विवाद में आ गये हैं। कोर्ट ने पुलिस को निर्देशित किया हैं कि 18 जून 2010 तक जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करे। इस समाचार में धनोरा थाने के अंर्तगत आने वाले ग्राम आमानाला के खसरा नंबंर 221,373,385 और 400 दिये गये थे जिनकी भूमि विक्रीत की गई हैं। इसक बाद दूसरे दिन स्थानीय दैनिक सिवनी युगश्रेष्ठ ने समाचार के कुछ और तथ्यों के साथ प्रकाशित किया और इसे इलेक्ट्रानिक मीडिया ने भी कवर किया। इसके एक दिन बाद विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ने एक खंड़न जारी कर यह कहा कि इस जमीन खरीदी में वे या उनके पुत्र का कोई लेना नहीं हैं। इस खंड़न के लगभग सभी प्रमुख अखबारों में प्रमुखता से छपने से पाठकों को घटना की जानकारी हो गई। यह हमेशा की तरह उन्हें बदनाम करने की साजिश की हैं।भूमि घोटाले से सम्बंधित प्रकाशित समाचार और हरवंश सिंह के खंड़न करने से कुछ ऐसे सवाल पैदा हो गयें हैं जिनका लोग उत्सुकता के साथ जवाब तलाश रहें हैं। ग्राम आमानाला के उक्त प्रकाशित खसरों की भूमि के मालिक कितने और कौन कौन हैंर्षोर्षो क्या एक से अधिक मालिकाना हक वाली भूमि का विक्रय किसी एक मालिक ने बीते दिनों किया हैंर्षोर्षो क्या कानून के अनुसार ऐसा विक्रय किया जा सकता हैंर्षोर्षोक्या ऐसी रजिस्ट्री रजिस्ट्रार द्वारा पास कर दी गई हैं या अभी जप्त हैंर्षोर्षो यदि पास कर दी गई हैं तो क्या किसी सामान्य आदमी की ऐसी रजिस्ट्री सामान्य तौर पर पास हो सकती हैर्षोर्षो यदि हरवंश सिंह और उनके पुत्र के नाम ऐसी कोई रजिस्ट्री नहीं हुयी हैं तो फिर ऐसा कौन वजनदार बेनामी व्यक्ति हैं जिसके खिलाफ फरियादी की ना तो पुलिस ने सुनी और ना ही किसी अन्य अधिकारी नेर्षोर्षो क्या ऐसी कोई रजिस्ट्री किसी ऐसे खास बेनामी के नाम तो नहीं हुयी हैं जिसे भारी राजनैतिक या प्रशासनिक संरंक्षण प्राप्त हैं जिसक चलते फरियादी को कोर्ट की शरण लेना पड़ार्षोर्षोक्या जिले में ऐसे कोई ताकतवर कांग्रेसी या विपक्षी दल के नेता शेष बचे हैं जो हरवंश सिंह के खिलाफ षड़यन्त्र रचकर उन्हें फंसाने का प्रयास कर सकता हैंर्षोर्षो ये तमाम सवाल ऐसे हैं कि जिनके जवाब यदि जल्दी ही खुलकर जनता के सामने आ जाये तो इस मामले में अपने आप दूध का दूध और पानी का पानी हो जावेगा वरना यह भी लफ्फाजी के दौर में गुम कर रह जायेगा।
क्या धारा 420 और हरवंश सिंह में हैं चोली दामन का साथ-
इसे महज एक संयोग कहें या कुछ और कि भादंवि की धारा 420 याने धोखाधड़ी का हरवंश सिंह के खिलाफ यह कोई पहला मामला नहीं हैं।ब्लकि ऐसा कुछ रहा हैं कि मानो दोनों के बीच चोली दासमन का साथ रहा हो। इसके पहले भी तीन मामले और चर्चित रहें हैं। एक फर्म सतपुड़ा एग्रीकल्चर के पार्टनर के रूप में हरवंश सिह पर बकोड़ा सिवनी के आदिवासियों को दिये जाने वाले डीजल पंपों में धोखाधड़ी करने के आरोप सहायक पंजीयक सहकारी संस्था सिवनी ने अपने न्यायालय में सही पाये थे और 21 जून 1982 को पुलिस थाना सिवनी में एफ.आई.आर. दर्ज कराके कार्यवाही करने की मांग की थी। बाद में यह मामला विधानसभा में भी उठा था। दूसरा मामला सी.जे.एम. सिवनी के कोर्ट में क्र. 1650/84 धारा 420 एवं 34 में दर्ज हुआ जिसमें एक पिछड़े वर्ग का विधवा औरत गंगा बाई ने अपने वकील हरवंश सिंह पर यह आरोपित किया था कि उसने धोखे से उसकी जमीन पहले अपने भाई और फिर अपने नाम करा ली। मामला हाई कोर्ट तक गया लेकिन इसी बीच फरियादी गंगा बाई की मृत्यु हो गई। एक मन्त्री के रूप में हरवंश सिंह द्वारा गलत शपथ पत्र देकर हाउसिंग बोर्ड से प्लाट लेने और फिर पूर्व मुख्यमन्त्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा मामला हाई कोर्ट में पेश करनें के बाद प्लाट वापस कर देने का मामला भी चला था। इस जनहित याचिका का क्रमांक 5064/98 था। जिसमें कोर्ट ने आरोपियों को कुछ हिदायतें भी दी थी तथा सुभाष यादव के मामले में याचिका कत्ताZ पटवा को फटकार भी लगायी थी। और अब विधानसभा उपाध्यक्ष के पद पर रहते समय उन पर एक अल्पसंख्यक ने जमीन के मामले में हरवंश सिंह पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया हैं जिसका उन्होंने पुरजोर खंड़न किया हैं। लेकिन कोर्ट ने 18 जून तक मामले की जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के लिये पुलिस को निर्देशित किया हैं। एक स्थानीय अखबार ने ऐसा कोई सगा नहीं जिसे ठाकुर ने ठगा नहीं हैडिंग से एक समाचार छापा था। इन्हें नजदीक से जानने वालों का दावा हैं कि वे अपने सियासी सफर में जब भी किसी नये पायदान पर पहुंचें हैं तो पिछले पायदान पर पहुंचाने वाले को धोखा देकर ही पहुंचें हैं। इतना ही इनके दरबार के नव रत्नों में एक भी रत्न ऐसा बाकी नहीं हैं जिसने धोखा ना खाया हो। विधि शास्त्र की किताब बन्द कर यदि राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र की किताब खोले तो धोखा खाने वालों की संख्या इतनी अधिक हो जावेगी कि यदि एक किस्से की दो लाइनें भी लिखी जायें तो एक महाग्रन्थ तैयार हो सकता हैं। इसलिये उनके निकटस्थ साथी ही अब यह कहने से नहीं चुकते हैं कि जिसने धोखा देने को ही सफलता का मूलमन्त्र बना लिया हो उससे अपन खुद बच कर निकल जाओ यही बड़ी उपलब्धि होगी।
माफी मांगने पर कोट्रZ के अवमानना की सजा हुई थी समाप्त हरवंश की-
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंड़ पीठ ने कंपलेंट पिटीशन सिविल/6/2002 में अपने निर्णय दिनांक 27 मार्च 2002 को म.प्र.राज्य परिवहन निगम के अध्यक्ष के रूप तत्कालीन गृहमन्त्री हरवंश सिंह को न्यायलय के अवमानना के दोषी पाते हुये दो हजार रूपये का जुर्माना तथा एक माह की कैद की सजा सुनायी थी। तीन आरोपियो पर यह आरोपित था कि उन्होंने कोर्ट के आदेशानुसार राज्य परिवहन निगम के कर्मचारी को भुगतान नहीं कर कोर्ट की अवमानना की हैं। फरियादी ने अवमानना की पिटीशन दायर की थी जिस पर हाई कोर्ट ने यह सजा सुनायी थी। इसके हरवंश सिंह सहित अन्य दोनों आरोपियों ने कोर्ट में बिना शर्त माफी मागी थी तथा कोर्ट के आदेश का पालन किया था तब कहीं जाकर कोर्ट ने हरवंश सिंह सहित सभी आरोपियों को कुछ हिदायतें देकर सजा समाप्त की थी।

Monday, May 24, 2010

पहला तीर ही प्रभात का क्या अंधेरे में हो जायेगा गुम
भोपाल। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष पद पर पत्रकार प्रभात झा की ताजपोशी के बाद कुछ बदलाव की अपेक्षा की जा रही थी। हुआ भी ऐसा ही। सीधी साधी राजनीति करने के आदी रहे प्रभात झा को अध्यक्ष बनने के बाद जैसे ही पहला मौका मिला उन्होंने कांग्रेस पर राजनैतिक वार कर डाला।
प्रदेश की भाजपा सरकार ने स्विर्णम मध्यप्रदेश बनाने के मुख्यमन्त्री के संकल्प पर सुझाव लेने के लिये सदन का विशेष सत्र आमन्त्रित किया था। काग्रेस ने इस सत्र के बहिष्कार का निर्णय ले लिया था। कांग्रेस के इस निर्णय के पालन करने में सिवनी जिले के केवलारी विधानसभा क्ष़्ोत्र से लगातार चौथी बार चुनाव जीतने वाले कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह भी शामिल थे जो कि विधानसभा के उपाध्यक्ष पद पर बैठे हुये हैं जो कि एक संवैधानिक पद हैं। वैसे इसके पहले भी कांग्रेस ने कई बार सदन से बहिष्कार किया था लेकिन प्रदेश इंका के उपाध्यक्ष और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस बहिष्कार में शामिल नहीं हुये थे। इस बार उनका यह निर्णय लेना सियासी हल्कों में चर्चित हैं। बस इसे आधार बना कर भाजपा अध्यक्ष ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री एवं वरिष्ठतम नेता कैलाश जोशी तथा पूर्व प्रदेश संगठन मन्त्री कप्तान सिंह सौलंकी के साथ प्रदेश संवैधानिक प्रमुख महामहिम राज्यपाल से मिलकर एक ज्ञापन सौंपा तथा विस उपाध्यक्ष के विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही करने की गुहार कर डाली।
लेकिन संविधान और संसदीय कार्यवाहियों के विशेषज्ञों का यह मानना हैं कि विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन सदन के सदस्य करते हैं इसलिये राज्यपाल को इनके विरुद्ध कार्यवाही करने का कोई अधिकार नहीं होता हैं। यदि कोई कार्यवाही करनी होती हैं तो संसदीय कार्य मन्त्री सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाकर विधि अनुसार उस पर बहस करवा कर एवं मतदान के जरिये उन्हें पद से अलग कर सकते हैं। वैसे भी प्रजातान्त्रिक परंपरा का पालन करते हुये विस उपाध्यक्ष का पद प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को दिया गया हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक श्री हरवंश सिंह उपाध्यक्ष हैं। हालांकि जब श्री हरवंश सिंह के नाम पर भाजपा ने सहमति दी एवं उनका इस पद पर निर्वाचन हुआ तब उन पर उनके ही गृह जिले में भाजपा की तत्कालीन सांसद एवं वर्तमान विधायक नीता पटेरिया एवं उनके ड्रायवर की शिकायत पर बंड़ोल थाने में धारा 307 का आपराधिक प्रकरण लंबित था। लेकिन फिर भी हरवंश सिंह निर्विरोध विधान सभा के उपाध्यक्ष चुने गये। इस व्यवस्था को देखते हुये प्रदेश भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं की सलाह पर प्रदेश अहध्यक्ष प्रभात झा ने भाजपा विधायक दल से अविश्वास प्रस्ताव लाने के निर्देश दिये हैं। अब इस मामले में कहा जाता हैं कि गेन्द मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के पाले में चली गई हैं।
हालांकि प्रदेश की राजनीति में सन 1980 के दशक से आज तक कांग्रेस और भाजपा में नूरा कुश्ती के किस्से जब चाहे तब चर्चित रहें हैं। अपनी ही पार्टी के अन्दर प्रदेश के कई कद्दावर नेताओं को इन आरोपों का सामना करना पड़ा हैं। इनमें कांग्रेस के अर्जुन सिंह,कमलनाथ,दिग्विजय सिंह,हरवंश सिंह तो भाजपा के सुन्दरलाल पटवा,बाबूलाल गौर,शिवराजसिंह चौहान आदि के नाम शामिल बताये जाते हैं। अब यह तो समय ही बतायेगा कि भाजपा विधायक दल अपने नव निर्वाचित प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा के पहले ही राजनैतिक तीर को निशाने पर लगने देगा और विस उपाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लायेगा या फिर यह भी नूरा कुश्ती की भेंट चढ़कर अंधेरे में कहीं गुम हो जावेगा।

Wednesday, May 19, 2010

बिजली महंगा करना मतदाताओं साथ छल
सिवनी। बिजली महंगा करना प्रदेश के मतदाताओं के साथ भाजपा सरकार का छलावा हैं। वितरण में क्षरण,भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण और सफेद हाथियो से बिजली के बिल का बकाया की वसूली यदि सरकार कर ले तो विद्युत मंड़ल मुनाफे में आ सकता हैंं। ना तो सरकार का प्रशासन पर नियन्त्रण है और ना ही अपराधियों पर पुलिय का नियन्त्रण रह गया हैं इसलिये पूरे प्रदेश में अंधेर नगरी चौपट राजा का आलम व्याप्त हो गया हैं।
उक्ताशय की बात जिले के वरिष्ठ इंका नेता आशुतोष वर्मा ने प्रेस को जारी एक विज्ञप्ति में कहते हुये कहा हैं कि आज से छ: साल पहले बिजली,पानी और सड़क को मुद्दा बना कर भाजपा ने जनादेश प्राप्त किया था। भाजपा ने वायदा किया था कि एक साल के अन्दर पूरे प्रदेश में चौबीसों घंटे बिजली दी जायेगी। उनका यह वायदा तो मुगेरी लाल का हसीन सपना साबित होकर रह गया हैं। बिजली की आंख मिचोली आज भी जारी हैं। भीषण गर्मी में लोग बून्द बून्द पानी को तरस रहें हैं। इसके विपरीत प्रदेश की भाजपा सरकार जब देखो तब बिजली महंगी कर प्रदेश के भोले भाले मतदाताओं के साथ बार बार छल कर रही हैं।
इंका नेता वर्मा ने कहा हैं कि भाजपा के शासनकाल में पूरे प्रदेश में भ्रष्टाचार इतना अधिक अनियन्त्रित हो चुका हैं कि वह सर्वव्यापी हो गया हैं। सरकार और विद्युत मंड़ल यदि वितरण में होने वाले बिजली के क्षरण को रोक ले तो उत्पादन और मांग के बीच के अन्तर को काफी कम किया जा सकता हैं।भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण करके भी लोगो को राहत पहुचायी जा सकती हैं। प्रदेश के कई बड़े बड़े उद्योंगों और समूचे प्रदेश के नगर निगमों,नगरपालिकाओं और नगर पंचायतों पर बिजली के बिलों का अरबों रुपये बाकी है। यदि सरकार इन सफेद हाथियों से बिजली के बिल की बकाया राशि सख्ती से वसूल कर ले तो ही विद्युत मंड़ल को बिजली महंगी करने का आवयक्ता नहीं पड़ेगी। यह सब उपाय करने के बजाय प्रदेश की भाजपा सरकार बार बार बिजली महंगी करके लोगों की जेबों पर डाका डाल रही हैं।
इंका नेता आशुतोष वर्मा ने विज्ञप्ति में आगे कहा हैं कि प्रदेश में सरकार का प्रशासन पर कोई नियन्त्रण नहीं रह गया हैं। हालात यहां तक बदतर हो चुके हैं कि सत्तादल के जनप्रतिनिधि भी जन समस्याओं का अधिकारियों से निराकरण कराने में अपने आप को निरीह कहते दिखायी दे रहे हैं। ऐसे ही पुलिस का अपराधियों पर कोई नियन्त्रण नहीं रह गया हैं। तभी तो सिवनी जैसे शान्त शहर में बीच बाजार हत्या जैंसी जघन्य घटना घट जाती हैं और हत्या का आरोपी पूरा शहर लांघकर कोर्ट में समर्पण करने पहुंच जाता हैं और पुलिय वहां से उसे पकड़कर अपनी पीठ खुद ही थपथपाती नज़र आती है। यही हाल बिजली चोरी के मामले में भी हैं। इसीलिये पूरे प्रदेश में अंधेर नगरी चौपट राजा का आलम व्याप्त हो गया हैं और प्रदेश का मतदाता अपने आप को ढ़गा हुआ सा महसूस कर रहा हैं।जिसका माकूल जवाब वो समय आने पर देगा।

Sunday, May 16, 2010

सांसद निधि के बीस लाख रुपये की बरबादी का जवाबदार कौन
क्या तकनीकी स्वीकृति देने वाले अधिकारी को जिला प्रशासन दंड़ित करेगा
सिवनी। शहर के मुख्य बाजार बुधवारी के मार्ग के सौन्दयीZकरण करने के लिये सांसद निधि से 20 लाख रुपये खर्च करके डिवायडर और लोहे की मजबूत जालियां लगायीं गईं थीं। डिवायडर में बिजली के खंबों पर सुन्दर लाइटिंग की गई थी और फुटपाथ भी बनाया गया था। लेकिन अतिक्रमण के कारण यातायात की समस्या समस्या जस की तस रही और फिर व्यापारियों की मांग पर तत्कालीन विधायक की पहल पर लोहे की जालियां हटा ली गई। अब खंबों को भी हटाने की मांग की जा रही हैं। क्या यह कार्य तकनीकी रूप से सही नहीं थार्षोर्षोयदि हां तो इसे तकनीकी स्वीकृति देने वाले अधिकारी क्या दोषी नहीं हैंंर्षोर्षो क्या यह जनता के पैसे का दुरुपयोग नहीं हैंर्षोर्षो इन सवालों का जवाब तलाश करना आवयक हैं।
सिवनी के तत्कालीन सांसद रामनरेश त्रिपाठी ने बुधवारी बाजार के महेश मालू के घर के सामने से लेकर रामस्वरूप फतेहचन्द की किराना दुकान तक के मार्ग के सौन्दयीZकरण के लिये सांसद निधि से 19 लाख 61 हजार रूपये की राशि स्वीकृत की थी। 12 जून 2003 को इसका लोकार्पण किया गया था जिसका पत्थर आज भी नायक क्लाथ स्टोर्स के पास लगा हैं। इस राशि से यातायात को सुगम बनाने के लिये डिवायडर बनाये गये थे। इनमें लोहे की सुन्दर और मजबूत जालियां लगायी गईं थी। टाइल्स के फुटपाथ भी बनाये गये थे। सड़क के बीचों बीच खंबों पर खूबसूरत लाइट भी लगायीं गईं थीं। लोकार्पण समारोह में बड़े शहरों सी सुविधा उपलब्ध हो जाने का दावा भी किया गया था।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद जालियों के दोनों ओर हाथ िढलियों के लगने और दुकानदारों के अतिक्रमण के कारण यातायात की समस्या और बढ़ने लगी। अतिक्रमण हटाने की दृढ़ इच्छा शक्ति ना हाने के कारण हमेशा यह अभियान आधा अधूरा ही रह जाता हैं। धीरे धीरे व्यापारियों के द्वारा बीच में लगी लोहे की जालियां हटाने की मांग की जाने लगी। तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर की पहल पर पालिका ने ये लोहे की जालियां हटवा दीं। ये जालियां कहां लगी या इनका क्या उपयोग किया गयार्षोर्षो इसका कोई पता नहीें हैंं। अब सड़क के बीच में लगे खंबों को भी हटाने की मांग उठने लगी हैं। कुल मिला कर सांसद निधि से खर्च किये गये बीस लाख रुपये बरबाद हो गये ही कहे जा सकते हैं।
इस मामले को देख कर यह सवाल उठना स्वभाविेक ही हैं कि यदि यह तकनीकी रूप से सही नहीं था तो इसकी तकनीकी स्वीकृति क्यों दी गईर्षोर्षो और यदि सही था तो फिर बीच की लोहे की जालियां क्यों हटायी गईर्षोर्षो क्या नेताओं की मनमर्जी के आधार पर यह सब किया जाता हैं। आखिर जनता के पैसे की इस बरबादी का जवाबदार कौन हैंर्षोर्षो क्या उसे जिले का प्रशासनिक अमला दंड़ित करेगार्षोर्षोये ज्वलन्त प्रश्न अभी तो अनुत्तरित ही हैं।
हरवंश सिंह का सदन से बहिष्कार पार्टी प्रेम हैं या कुछ बेहतर पाने के लिये किया जा रहा राजनैतिक ढ़ोंग
इस सप्ताह की सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना विधान सभा के विशेष सत्र में विस उपाध्यक्ष, प्रदेश इंका के उपाध्यक्ष और जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह का बहिष्कार करना और यह बयान देना कि उनके लिये उनकी पार्टी बड़ी हैं फिर वे उपाध्यक्ष हैं।हरवंश सिंह की राजनीति को जानने वालों का दावा हैं कि वे इतने नादान नहीं हैं कि अनजाने में इतना बड़ा कदम उठा लेें। रहा सवाल पार्टी बड़ी होने का तो जिले में चोट खाये कई कांग्रेसी बैठे हैं जो इनके पार्टी प्रेम को अच्छी तरह जानते हैं। इन दिनों कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद में बदलाव होने की चर्चायें जोरों पर हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इनमें से किसी एक पद पर उनकी निगाहें लगी हों और इसीलिये एक सोची समझी रणनीति के तहत उन्होंने यह कदम उठाया हो। प्रदेश भाजपा द्वारा राज्यपाल को ज्ञापन देकर विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के खिलाफ कार्यवाही की मांग करना, संसदीय कार्य मन्त्री द्वारा सदन में मामला उठाने के बाद भी विस अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी द्वारा कोई व्यवस्था ना देना तथा जिला भाजपा द्वारा की गई बयानबाजी इस मामले में अखबारों में चर्चित हुयी हैं। प्रदेश के जिन कुछ इंका नेताओं की भाजपा के साथ नूरा कुश्ती चलने के किस्से सियासी हल्कों में चर्चित रहतें हैं उनमें इंका नेता हरवंश सिंह का नाम भी शामिल हैं। ऐसे में मात्र रस्म अदायगी वाली जो भी कार्यवाहियां होतीं हैं उसे लोग अपने आप ही शंका की निगाहों से देखने लगते हैं।
हरवंश सिंह का बहिष्कार : पार्टी प्रेम या ढ़ोंग-
इस सप्ताह की सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनैतिक घटना विधान सभा के विशेष सत्र में विस उपाध्यक्ष, प्रदेश इंका के उपाध्यक्ष और जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश सिंह का बहिष्कार करना और यह बयान देना कि उनके लिये उनकी पार्टी बड़ी हैं फिर वे उपाध्यक्ष हैं।इस पर जिला भाजपा ने बयान जारी किया और प्रदेश भाजपा ने अपने नवनिर्वाचित अध्यक्ष प्रभात झा,पूर्व मुख्यमन्त्री कैलाश जोशी और कप्तान सिंह सौलंकी के साथ राज्यपाल से भेंट कर उन्हें ज्ञापन सौंप कर कार्यवाही करने की मांग की हैं। संसदीय कार्य मन्त्री ने भी सदन में मामले को उठाया लेकिन अध्यक्ष ने इस पर कोई व्यवस्था नहीे दी। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनैतिक हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हैं। हरवंश सिंह की राजनीति को जानने वालों का दावा हैं कि वे इतने नादान नहीं हैं कि अनजाने में इतना बड़ा कदम उठा लेें। वे छोटी छोटी बातों में अपने संवैधानिक पद की दुहायी देकर ऐसे राजनैतिक कामों से बचते रहें हें जिन्हें वे नहीं करना चाहते थे। तो फिर सदन की कार्यवाही से सम्बंधित बहिष्कार जैसे कदम को क्या उन्होंने बिना सोचे समझे उठा लिया होगा र्षोर्षो इसे कैसे माना जा सकता है। इन दिनों कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद में बदलाव होने की चर्चायें जोरों पर हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इनमें से किसी एक पद पर उनकी निगाहें लगी हों और इसीलिये एक सोची समझी रणनीति के तहत उन्होंने यह कदम उठाया हो। उनके द्वारा दिया गया यह बयान क्या इसी बात का प्रमाण नहीं हैं कि पार्टी उनके लिये बड़ी हैं बाद में विस उपाध्यक्ष पद। ऐसा बयान देकर वे पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा का इजहार करते हुये शायद शहीद होकर आलाकमान की सहानुभूति बटोरना चाह रहें हैं। रहा सवाल पार्टी का उनके लिये बड़ी होने का तो इसे सिवनी जिले के कई कांग्रेसी भली भान्ति जानते हें जो कि इनके कारनामों से चुनाव हारकर राजनैतिक गुमनामी के दौर में चले गये हैं। और आज पार्टी का जिले में यह हाल हैं कि जिले से वे अकेले विधानसभा का चुनाव जीते हैं। लोकसभा के तीन तीन चुनाव पार्टी लगातार हार चुकी हैं। सिवनी और बरघाट विधानसभा पांच बार तथ लखनादौन विधान सभा में कांग्रेस दो बार चुनाव हार गई हैं। सिवनी नगर पालिका में भी लगातार तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हार गई हैे। लगभग हर चुनाव में हरवंश सिंह पर भीतरघात करने के आरोप चस्पा होते रहें हैं। यह वही सिवनी जिला हैं जहां 1977 में कांग्रेस ने जनता लहर में विधानसभा की पांचों सीटें जीत कर समूचे उत्तर भारत में एक रिकार्ड बनाया था। हरवंश सिंह का विशेष सत्र से बहिष्कार करना उनका पार्टी प्रेम हैं या राजनैतिक ढ़ोंग से लेकर लोगों के अलग अलग विचार सुनने को मिल रहें हैं।
भाजपा ने उपाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव क्यों नही लाया-
प्रदेश भाजपा द्वारा राज्यपाल को ज्ञापन देकर विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के खिलाफ कार्यवाही की मांग करना, संसदीय कार्य मन्त्री द्वारा सदन में मामला उठाने के बाद भी विस अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी द्वारा कोई व्यवस्था ना देना तथा जिला भाजपा द्वारा की गई बयानबाजी इस मामले में अखबारों में चर्चित हुयी हैं। भाजपा की कार्यवाही से कुछ सवाल अपने आप ही उठ खड़े हुये हैं। क्या भाजपा को यह नहीं मालूम था कि कांग्रेस ने जब हरवंश सिंह का चयन उपाध्यक्ष पद के लिये था तब उन पर अदालत में 307 का मामला कायम था था जो कि भाजपा की तत्कालीन सांसद एवं वर्तमान विधायक नीता पटेरिया के साथ आमानाला में हुयी घटना पर आधारित था और जिले की पूरी भाजपा ने बंड़ोल थाने में धरना देकर मामला कायम करवाया था। फिर भी उन्हें सर्वसम्मति से उपाध्यक्ष चुना गया। क्या भाजपा को अभी तक यह नहीं मालूम था कि विस उपाध्यक्ष बनने के बाद भी हरवंश सिंह ने प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं दिया था और वे उस रूप में अपने राजनैतिक दायित्वों का निर्वाह करते आ रहे थे। क्या भाजपा को यह नहीं मालूम कि राज्यपाल महोदय के पास ज्ञापन देने के बजाय सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाकर निर्धारित समयावधि के बाद अपने बहुमत के बूते पर उपाध्यक्ष पद से पृथक करना भाजपा के लिये ज्यादा आसान थार्षोर्षो यदि भाजपा यह मानती हैं कि विधानसभा उपाध्यक्ष के संवैधानिक पद पर रहते हुये हरवंश सिंह ने कांग्रेस के सदन से बहिष्कार के निर्णय को मानकर अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह नहीं किया हैं तो उसे सीधे सीधे सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश करना था तथा निर्धारित समयावधि के बाद अगले सत्र में उस पर बहस करके अपने खुद के बहुमत के आधार पर पास कर लेना था। इसके लिये कहीं किसी की मदद और किसी के पास जाने की भाजपा को जरूरत ही नहीं थी। वैसे भी प्रदेश के जिन कुछ इंका नेताओं की भाजपा के साथ नूरा कुश्ती चलने के किस्से सियासी हल्कों में चर्चित रहतें हैं उनमें इंका नेता हरवंश सिंह का नाम भी शामिल हैं। ऐसे में मात्र रस्म अदायगी वाली जो भी कार्यवाहियां होतीं हैं उसे लोग अपने आप ही शंका की निगाहों से देखने लगते हैं। वैसे प्रदेश भाजपा के नव निर्वाचित अध्यक्ष प्रभात झा से ऐसे राजनैतिक और कूटनीतिक दांव पेंचों की अपेक्षा नहीं की जा रही हैं। लेकिन भाजपा में भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं हैं जो अपने हित साधनें के लिये ऐसे इंका नेताओं से सांठ गांठ किये बैठे हैं जिन पर विपक्ष में रहते हुये भ्रष्टाचार के आरोप लगाते थे और अब दोनों एक दूसरे के हित साध रहें हैं। इस पूरे प्रकरण में मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान की चुप्पी ने भी सियासी हल्कों का ध्यानाकषिZत किया हैं। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि पार्टी प्रेम दिखाकर यदि कुछ बेहतर मिल जाये तो ठीक हैं अन्यथा जो पास में हैं वो बचा रहे इस रणनीति पर हरवंश सिंह चल रहें हैं। अब देखना यह हैं कि उनकी रणनीति कितनी सफल होती हैं
और अन्त में-
प्रदेश विधान सभा के उपाध्यक्ष और इंका विधायक हरवंश सिंह ने एक बयान जारी कर सिवनी आकर जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन से पाठ पढ़ने की इच्छा जाहिर की हैं। श्री सिंह ने कहा हैं कि वे संवैधानिक दायित्व और नैतिकता पर सुजीत जैन से सबक सीखेंगें। वैसे तो ये सबक भोपाल में ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा,कैलाश जोशी जी या स्वजातीय कप्तान सिंह जी से ही सीख सकते थे पर ना जाने क्यों उन्होंने इसके लिये सुजीत को ही उपयुक्त पात्र समझा हैं।


Monday, May 10, 2010

नेता तो बन गये भागीरथ लेकिन गंगा कर्जदार हो गई
22 करोड़ की योजना का 12 करोड़ रु. बिजली का बिल बकाया : पालिका को मिलने वाले 80 लाख रु. सरकार ने कराये समायोजित :सरचार्ज हो माफ और शेष प्रदेश सरकार दे अनुदान

सिवनी। वरदान कही जाने वाली भीमगढ़ जलावर्धन योजना अब शहर के लिये अभिशाप बन चुकी हैं। फरवरी 2010 तक इस परियोजना का 13 करोड़ 51 हजार रुपये का बिजली का बिल बकाया हैं जिसमे राज्य शासन ने इस साल पालिका को मिलने वाले 80 लाख रुपये का समायोजन कराया हैं। इसमें 5 लाख रुपये नपा ने मार्च में नगद जमा कराये हैं। इसके बावजूद भी अभी पालिका को 11 करोड़ 45 लाख 27 हजार रुपये पटाना हैं।
राज्य सरकार ना जाने क्यों इस परियोजना के घटिया निर्माण कार्य की जांच कराने से क्यों कतरा रही हैं जबकि दुगना बिजली का बिल पटाने के बाद भी नागरिकों को आधा पानी ही मिल रहा हैं। शहर के लिये वरदान मानी जाने वाली भीमगढ़ जलावर्धन योजना अपने घटिया निर्माण के कारण अब अभिशाप बन गई हैं। इस योजना के बनते समय भाजपा ने इसका भारी विरोध किया था। दुगाZ उत्सव के वक्त एक समय इसकी झांकी भी लगायी गई थी। बिजली की दुगनी खपत के बाद भी लोगों को आधा पानी मिलने की इंका नेता आशुतोष वर्मा ने एक अभियान चलाया था। इस पर मुख्यमन्त्री कार्यालय से जांच भी आदेशित हुयी थी लेकिन फिर वह ठंड़े बस्ते में चली गई थी। भाजपा की सरकार बनने के बाद तत्कालीन जिला भाजपाध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर ने भी इस परियोजना की जांच कराने के लिये मुख्यमन्त्री को पत्र लिखा था। लेकिन इसके बाद भी जांच नहीं हो पायी। ऐसा लगता हैं कि इस घटिया काम करने वाले हाथ इतने अधिक पावरफुंल हैं कि इंका और भाजपा दोनों ही सरकारें इन पर हाथ डालने से कतरा गईं हैे।
कभी भगीरथी प्रयासों से लायी गई यह योजना अब अभिशाप बन गई हैं। चालू वित्त वर्ष में माह फरवरी 2010 तक श्रीवनी का बिजली का बिल 7 करोड़ 18 लाख 99 हजार रुपये बाकी था जबकि सुआखेड़ा का बिल 5 करोड़ 81 लाख 52 हजार रुपये बाकी था। कई बार लाइन काटने का नोटिस भी विद्युत मंड़ल देता रहता हैं। इस दवाब के चलते हर साल राज्य सरकार भोपाल से पालिका को विकास कार्य के लिये मिलने वाली राशि का एक अच्छा खासा हिस्सा विद्युत मंड़ल को समायोजित कर देती हैं। इस साल भी मार्च 2010 में सरकार ने 80 लाख रुपये की राशि समायोजित कर दी हैं। पालिका ने भी मार्च 2010 में 5 लाख रुपये की नगद राशि जमा कर दी हैं। इसके बावजूद भी श्रीवनी का 6 करोड़ 51 लाख 76 रु. तथा सुआ खेड़ा का 5 करोड़ 93 लाख 51 हजार रु. इस तरह कुल 11 करोड़ 45 लाख 27 हजार रु. देना बाकी हैं। पालिका पर बाकी बिजली के बिल पर इतना अधिक सरचार्ज लग रहा हैं कि बिल कम करने के लिये जो भी राशि पटायी जा रही हैं वह सरचार्ज की राशि में ही समाहित हो जाती हें और मूल बकाया जस का तस रह जाता हैं। पालिका हर महीने जो पांच रुपये पटा रही हैं उसका भी यही हाल हो रहा है। इसका खुलासा मार्च 2010 के बिजली के बिल से हो जाता हैं। इस महीने श्रीवनी का बिल 17 लाख 87 हजार रु. एवं सुआखेड़ा का बिल 12 लाख 17 हजार रु. आया हैे। इस तरह इस योजना में लगभग 1 लाख रु. रोज की बिजली जल रही हैं।
यहां यह विशेष रूप से उल्लेंखनीय है कि इंका और भाजपा शासन में बन और प्रस्तावित लगभग 22 करोड़ रुपये की योजना का श्रेय लेकर भागीरथ बनने के दावे तो कई नेता करते रहें हें लेकिन 22 करोड़ की इस योजना के 12 करोड़ रुपये के बिजली के बिल के बकाये के जवाबदारी लेने को कोई तैयार नहीं हैं। नेता तो भागीरथ बन गये लेकिन गंगा कर्जदार हों गई हैं। इससे मुक्ति के दो ही उपाय हैं। पहला या तो घटिया काम की जांच कर योजना को तकनीकी स्वीकृति के अनुसार ठीक करायें और यदि राजनैतिक मजबूरियों से ऐसा करना सम्भव ना हो तो प्रदेश सरकार विद्युत मंड़ल से बकाया बिजली के बिल का सरचार्ज माफ कराये और शेष राशि के भुगतान के लिये विशेष अनुदान दे जो सिवनी नगर पालिका को मिलने वाली से ना काटा जाये तथा इसके बाद पालिका इस सफेद हाथी के रख रखाव का आकलन कर जल कर की राशि बढ़ाये और इसे सुचारू रूप से संचालित करने का प्रयास करें। अन्यथा हर साल यही कहानी दोहरायी जायेगी और हर साल पालिका को विकास कार्यों के लिये मिलने वाली राशि का सरकार ऐसे ही समायोजन कराते रहेगी।

Sunday, May 9, 2010

शिवराज द्वारा महेश्वर बांध को प्राथमिकता देकर फोर लेन को दर किनार करना बिना कुछ कहे अपने आप ही बहुत कुछ कह जाता है
फिर गर्माने लगा हैं जिले में फोर लेन कॉरीडोर का मामला -

जिलें में इन दिनों एक बार फिर फोर लेन के चर्चे चल पड़े हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित हैं लेकिन उस पर राजनीति एक बार फिर गर्माने लगी हैं।सबसे पहले भाजपा नेता एवं नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने दिल्ली में कमलनाथ से भेंट कर शहर के अन्दर से जा रही एन.एच. को माडल रोड बनाने की मांग की। इसी मुलाकात के दौरान हुयी चर्चा में नाथ ने सिवनी के फोर लेन के मामले में अपना कोई हाथ होने से इंकार किया। यह समाचार प्राय: सभी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। राजेश की इस मुलाकात के बाद दो तीन दिन के अन्दर ही अखबारों में जिले के इकलौते इंका विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह का बयान छपा कि जिले के सभी बायपासो के बीच के वर्तमान मार्गों का भी निर्माण किया जाये और सिवनी के फोर लेन मामले में आ रही अड़चनों को दूर किया जाये। इन बयानों पर चर्चा चल ही रही थी कि जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन का बयान आ गया कि मुख्यमन्त्री की पहल पर फोर लेन मामले की अड़चनें जल्दी ही खत्म हो जायेंगीं। उन्होंने प्रधानमन्त्री से भेंट कर इस सम्बंध में जानकारी दी हैं और पर्यावरण विभाग की मंजूरी दिलाने का मसला उठाया हैं। इसके साथ ही मुख्यमन्त्री जी ने महेश्वर बांध का मामला भी उठाया था। इन सभी बयानबाजियों पर सोने में सुहागे का काम कर गया भू तल परिवहन मन्त्री कमलनाथ का तेन्दूखेड़ा में दिया गया भाषण कि फोर लेन नरसिंहपुर से छिन्दवाड़ा होते हुये नागपुर जायेगी। जैसे ही अखबारों में यह छपा जिले में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुयी। जनमंच ने भी एक बार फिर चेतावनी दी हैं कि यदि जिले की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता हें तो हम चुप नहीं रहेंगें। इन बयान बाजियों पर यदि गौर करें तो इनमें बहुत से दांव पेंच समझ में आते हैं। यदि नाथ ने भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी को यह स्पष्ट कर दिया कि उनका कोई हाथ नहीं हें और यह अखबारों की सुर्खियां बन चुका था तो भला हरवंश सिंह को कमलनाथ से मिलकर फोर लेन की गेन्द भला एक बार फिर उनके पालें में डालने की क्या जरूरत थीर्षोर्षो जिला भाजपा के लोग इस बात को सोच रहें हैं कि भला राजेश त्रिवेदी को कमलनाथ से हुयी भेंट का सारा विवरण प्रेस को क्यों देना थार्षोर्षो मुख्यमन्त्री प्रधानमन्त्री से मिले और दूसरे ही दिन सचिव स्तर की चर्चा में महेश्वर बांध को पर्यावरण विभाग की स्वीकृति देने पर सहमति बन गई लेकिन उसमें फोर लेन का जिक्र भी नहीं दिखा इसके बाद भी जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के बयान पर हरवंश समर्थक जिला इंका ने कोई प्रतिक्रिया क्यों व्यक्त नहीं कीर्षोर्षो सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के बाद भी कमलनाथ ने तेन्दूखेड़ा में फोर लेन का फैसला क्यों सुना दियार्षोर्षो इसकी श्ुारुआत में यदि जाकर देखा जाये तो मामला जब कोर्ट में लगा था औरसी.ई.सी.,पर्यावरण मन्त्रालय,एमायकस क्यूरी सहित सभी इस पक्ष में थे कि रात सात बजे के बाद ये रोड़,सिवनी नागपुर,बन्द कर दी जाये।उस समय भू तल परिवहन मन्त्रालय ने सी.ई.सी. को अपने जवाब जो विकल्प दिये थे उनमे पहले विकल्प फ्लायी ओवर सहित सभी शामिल थे और तो और मन्त्रालय पर्यावरण विभाग की अनुमति पाने के लिये टनल तक बनाने को सहमत था। पर कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं था। लेकिन जनमंच के आन्दोलन और सुप्रीम कोर्ट में इंटरवीनर बनने के बाद स्थिति में बदलाव आया और पिछले दौर में यह स्थिति बन गई कि भू तल परिवहन विभाग और एमायकस क्यूरी वर्तमान सड़क को तीस मीटर चौड़ी करने पर सहमत थे तो सी.ई.सी. और पर्यवरण विभाग फ्लायी ओवर पर सहमत था। यह बात पूरी तरह से साफ हो गई थी कि इस रोड़ को बन्द करने की बात कहीं बची ही नहीं थी। कोर्ट लगभग सभी पक्षों को सुन चुका हैं और मामला अन्तिम चरण में हैं। ऐसे वातावरण में भू तल परिवहन मन्त्री कमलनाथ का नरसिंहपुर छिन्दवाड़ा होकर फोर लेन जाने सम्बंधी बयान आना और मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह द्वारा महेश्वर बांध को प्राथमिकता देकर सिवनी फोर लेन के मामले का दर किनार कर देना बिना कुछ कहे अपने आप ही बहुत कुछ कह जाता हैैं। सिवनी जिले के लोगों को अपने हक के लिये एक बार फिर सड़क पर उतरना पडे़गा क्योंकि हमारे अपने धनी धोरी इतने अधिक मैेंं में सिमट कर रहें गये हैं कि मेरी बुरायी भर ना हो भले ही जिले को इसकी कुछ भी कीमत ही क्यों ना चुकाना पड़ेर्षोर्षो
ढ़ालसिंह के राष्ट्रीय परिषद में चुने जाने से भाजपा में हलचल -
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में सांसद प्रभात झा चुन लिये गये। इसके साथ ही प्रदेश से राष्ट्रीय परिषद के लिये 29 सदस्यों का भी निZविरोध चुनाव हो गया। जिले के कई भाजपायी धुरंधर यह मान रहे थे कि चुनाव हारने के बाद डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन राजनैतिक हाशिये पर चले गये हैं। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के दौरान उन्हें जिस तरह बुला कर पहले प्रस्तावक बनवाया गया तथा फिर उन्हें राष्ट्रीय परिषद में लिया गया उससे ऐंसा कयास लगाने वाले तमाम लोग भौंचक रह गये हैें। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि डॉ. बिसेन को बालाघाट संसदीय क्षेत्र से राष्ट्रीय परिषद के लिये चुना गया हैं जहां से पंवार समाज के ही कद्दावर नेता सहकारिता मन्त्री गौरीशंकर बिसेन भी आते हैं। इसके अलावा सिवनी एवं बालाघाट के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मन्त्री प्रहलाद पटेल को नरसिंहपुर होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से चुना गया हैं। जिनके भाजपा प्रवेश का भी गौरी शंकर बिसेन ने भारी विरोध किया था। इसके अलावा मंड़ला के पूर्व सांसद फगग्न सिंह कुलस्तें को भी उनकी संसदीय सीट मंड़ला से चुना गया हैं। महाकौशल क्षेत्र के इन तीनों नेताओं को राष्ट्रीय परिषद में चुने जाने का जिले की भाजपायी राजनीति में असर पड़ने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। भाजपा के तीनो ही नेताओं का जिले में अपना अपना प्रभाव हैं। प्रदेश कार्यकारिणी घोषित होने के बाद ही इसका खुलासा हो पायेगा कि भाजपा में अब नये सिरे से कैसा और क्या ध्रुवीकरण होता हैे।
और अन्त में-
इंका विधायक हरवंश सिंह का ताजा बयान छपा जिसमें उन्होंने कमलनाथ के फोर लेन के मामले में हमेशा सकारात्मक रुख रहने की बात कही हैं और कहा है कि मैं फिर उनसे मिलकर मामले को हल करने की बात कहूंगा। यदि हरवंश सिंह वास्तव में इसका हल कराना चाहते हैं तो वे कमलनाथ से फ्लायीओवर बनाने के लिये उनके विभाग की स्वीकृति कोर्ट में दिलवा दें तो मामला ही समाप्त हो जावेगा क्योंकि पर्यावरण विभाग और सी.ई.सी. इसके लिये तैयार हैं। अन्यथा उनकी और कमलनाथ की भेंट तो होती ही रहती हैं।

Wednesday, May 5, 2010

गेहूं खरीदी में मचा चहुं ओर हाहाकार
प्रशासन और जनप्रतिनिधि चितिन्त:पुर्वानुमान हुआ फेल या समय पर नहीं हो पाया इन्तजाम या पड़ोसी प्रदेशों से आ रहा हैं गेहूंर्षोर्षोक्या जिम्मेदारों को दंड़ित करेगी सरकारर्षोर्षो
सिवनी। गेहूं खरीदी में बदइन्तजामी और भ्रष्टाचार के किस्से पूरे जिले में चर्चित हैं। ऐसा होने के क्या कारण हैंर्षोर्षो क्या जिले में लगाये गये पूर्वानुमान से अधिक गेहूं खरीदी के लिये आ रहा हैंर्षोर्षो या पूर्वानुमान के लिये किये जाने वाले इन्तजाम भी समय पर नहीं हुयेर्षोर्षो या फिर ऐसा होना नियति बन गई हैर्षोर्षो या फिर बोनस के कारण पड़ोसी प्रदेशों का गेहूं व्यापारियों के माध्यम से खरीदी केन्द्रों पर आ रहा हैंर्षोर्षो गेहूं खरीदी में किसानो को हो रही तकलीफों से अखबार भरे पड़े हैं। जिले तमाम जनप्रतिनिधि भी इसके लिये चिन्तित हैं। पूरा प्रशासनिक अमला भी इी में उलझा हुआ है। लेकिन अभी तक कोई निदान नहीं हो पाया हैं। रोज नये नये निर्देश दिये जा रहें हैं लेकिन उनका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा हैं। सामान्य तौर पर ऐसा होता हें कि जिले का कृषि विभाग इस बात का पूर्वानुमान लगाता हें कि जिले में इस साल गेहूं की कितनी फसल होगी और किसान अपना माल बेचने के लिये खरीदी केन्द्रों पर लायेंगें। इसी अनुमान को आधार बना कर प्रशासन बारदाने, भंड़ारन परिवहन और पैसे की व्यवस्था करता हैं। इस साल पानी ऐसा गिरा था कि आम आदमी भी यह मान रहा था कि गेहूं की फसल अधिक होगी। इसकी मुख्य वजह यह थी कि असिंचित गेहूं को भी अर्ध सिचिन्त याने तीन पानी बरसात के ही मिल गये थे। इसलिये इस बात को देखना चाहिये कि क्या खरीदी केन्द्रों में पूर्व में लगाये गये अनुमान से ज्यादा गेहूं बाजार में आ गया हैं और यह अनुमान फेल हो गया है। यदि ऐसा हैं तो गलत पूर्वानुमान लगाने वाले अमले से इसका कारण पूछना चाहिये और यदि इसमें लापरवाही की गई हैं तो उन्हें दंड़ित करना चाहिये ताकि भविष्य में ऐसा फिर ना हो। यदि पूर्वानुमान के अनुसार ही गेहूं बाजार में आ रहा हैं और उसके बाद भी यह बदइन्तजामी हुयी हैं तारे इसका साफ आशय यह हैं कि इस खरीदी में जो आवश्यक इन्तजाम जिन्हें करना था वो समय पर इसे नहीं कर पाये। यदि ऐसा हैं तो फिर इसके लिये जिम्मेदार ऐजेंसियो को दंड़ित करना होगा। क्या सरकार या प्रशासन ऐसा करेगार्षोर्षो यह तो अभी भविष्य की गर्त में छिपा हैं। इसका तीसरा पहलू यह भी हैं कि यदि पूर्वानुमान भी सही हैं और उनके अनुसार समय पर सभी आवश्यक इन्तजाम भी कर लिये गये हें तो फिर इस बदइन्तजामी का कारण सिर्फ यही हो सकता हैं कि सौ रुपये बोनस के चक्कर में पड़ोसी राज्यों का गेहूं व्यापारियों के जरिये खरीदी केन्द्रों में आ रहा हैं जिससे आवक बढ़ गई और जिले के किसानों या कुचबुन्दिया व्यापारियों को तकलीफ हो रही हैं। यदि ऐसा हो रहा हैं तो इसके लिये जिम्मेदार अमले को दंड़ित किया जाना चाहिये। इसमें सत्यता क्या हैंर्षोर्षो इसका पता बारीकी से प्रशासन को लगाना चाहिये और उसका निदान करना चाहिये अन्यथा जिले में हर साल ऐसा होना एक परंपरा बन जायेगी और किसानों को हर साल ऐसी तकलीफें उठानी पड़ेगीं।

Tuesday, May 4, 2010

भाई की शादी में चोरी, भतीजे के जन्म के बाद लिखी गई रिपोर्ट
क्या भतीजे की शादी तक मिल जायेगा चोरी गया माल

ये हेड़िंग पढ़ कर आप चौकिये नहीं यह एक हकीकत हैं और किसी और के साथ नहीं वरन मेरे स्वयं के साथ सिवनी में ही घटित हुयी हैं। मैं अपने चचेरे भाई आशीष सक्सेना की शादी से पटना से दिनांक 28 अप्रेल 2009 को राजेन्द्रनगर अरनाकुलत एक्सप्रेस से लौट रहा था। रात करीब दो बजे बनारस के आसपास ट्रेन में चोरी हो गई। जिसमें नगदी,सोने के जेवर और कपड़ों के साथ दो मोबाइल भी थे। मैं 29 तारीख की शाम लगभग सात बजे सिवनी पहुंचा और रात्रि 9 बजे मैंने थाने में आवेदन देकर पावती ली तथा प्रथ सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया था। रिपोअZ दर्ज करने में हीला हवाला करने पर मैंने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को एक फ्ेक्स एवं मेल करके प्रकरण से दिनांक 30 अप्रेल 2009 को अवगत कराया था। पुनिस महानिदेशक को मेल करने के बाद मुझे 19 मई 2009 को एस.डी.ओ.पी. केवलारी से सूचना प्राप्त हुयी कि आपके द्वारा प्रषित शिकायत की जांच मैं कर रहा हूंं अत: आप 21 मई को उपस्थित होकर बयान दे। मैंने निर्धारित तिथि में बयान भी दे दिये। मुझे इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि जांच किसने आदेशित की पुलिस महानिदेशक ने या फिर जिला पुलिय अधीक्षक नेर्षोर्षो और इसमें जांच के क्या बिन्दु थेर्षोर्षो और उन पर जांच अधिकारी किस नतीजे पर पहुंचेंर्षोर्षो इसके बाद मामला ना जाने कहां खो गया। अभी अचानक कुछ दिनों पहले सिवनी थाने से यह सूचना मिली कि रिपोर्ट लिखना हैं तथा मामाला जीरो में कायम कर बनारस भेजना है।ं तब मैंने यह कहा कि अब रिपोर्ट दर्ज करने से क्या फायदार्षोर्षो भाई की शादी में चोरी हुयी थी और अब भतीजे के जन्म के बाद एफ. आई. आर. दर्ज कराके क्या करेंगेंर्षोर्षो फिर 24 अप्रेल 2010 को रिपोर्ट दर्ज की गई और मुझे उसकी कापी दी गई। मैं अपने आप को यहां का एक तीसमारखां समझता था। ऐसे में जब लगभग साल भर बाद सिवनी थाने में जीरो पर मामला कायम कर बनारस भेज दिया गया हैं तो भला कैसी,क्या और कब कार्यवाही होगीर्षोर्षो इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती हैं। मोबाइल का आई.एम.ई.आई. नंबर दिया गया था लेकिन एक साल बाद भी पुलिस ने अपने थाने में मौजूद साइबर सैल का उपयोग करना आवश्यक नहीं समझा। जब अपने यहां यह हाल हैं तो फिर दूसरी जगह से क्या उम्मीद की जा सकती हैंर्षोर्षो लेकिन कहावत है कि आशा पर आकाश टिका हैं। इसी कहावत पर विश्वास करते हुये मैंने पुलिस महानिदेशक महोदय को भाई की शादी पर हुयी चोरी की भतीजे के जन्म के बाद सिवनी पुलिस थाने द्वारा रिपोर्ट लिखे जाने के लिये धन्यवाद देते हुये यह विश्वास भी व्यक्त कर दिया हैं कि शायद भतीजे की शादी तक चोरी गया माल भी शायद ऐसे ही बरामद हो जायेगा जैसे एक साल बाद रिपोर्ट लिख ली गई हैं।

Monday, May 3, 2010

हैं बजा कि खूबियों का जिक्र हो दिल खोलकर ।खामियां भी बेहिचक मुंह पर गिनानी चाहिये ।।
जनप्रतिनिधि भी सम्मानित हुये ब्राम्हण समाज के सम्मेलन में -जिला ब्राम्हण समाज द्वारा आयोजित जिला स्तरीय सम्मेलन कुछ कारणों से राजनैतिक क्षेत्रों में कुछ अधिक ही चर्चित हो गया हैं। तीन चरणों में हुये इस सम्मेलन के एक चरण में निर्वाचित वर्तमान और पूर्व जन प्रतिनिधियों का सम्मान भी किया गया। इनमें पूर्व सांसद रामनरेश त्रिपाठी,पूर्व सांसद एवं विधायक नीता पटेरिया,केवलारी के इंका विधायक हरवंश सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चन्देल एवं नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी शामिल हैं। यह भी महज एक संयोग है या कुछ और कि पूर्व सांसद रामनरेश त्रिपाठी ने कु. विमला वर्मा को, नीता पटेरिया ने कु. कल्याणी पांड़ें को और नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी ने संजय भारद्वाज को कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हरा कर जीत हासिल की थी। यह भी एक संयोग ही है कि हारने वाले ये तीनों इंका नेता जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी महाराज के अनन्य भक्त हैें। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि इन तीनों इंका नेताओं हारने के बाद राजनैतिक हल्कों में यह भी चर्चा रही हैं कि इनकी हार में हरवंश सिंह की भूमिका भी रही हैं। जिला ब्राम्हण समाज के कार्यक्रम में सम्मानित किये जाने वाले सभी जनप्रतिनिधियों की तारीफ में भी काफी कुछ कहा गया। समाज के ही एक हिस्से में इस बात को लेकर तीखी प्रतिक्रिया भी देखी गई कि हर बार इंका विधायक हरवंश सिंह को ही क्यों बुला लिया जाता हैं। कुछ लोग तो यह चर्चा करते भी देखे गये कि भगवान परशुरुराम ने तो मानव मात्र को आतंक आतंक,अत्याचार,दुष्टता और अन्याय से मुक्त कराने के लिये समाज के आतताइयों, अत्याचारियों और दुष्टों का 21 बार नर संहार किया था। हम उनके अनुयायी हैं तो फिर हमारे आचरण में भी उसकी झलक तो दिखनी ही चाहिये। सामाजिक कार्यक्रम में बार बार गैर समाज के जनप्रतिनिधि को बुलाकर उसे महिमा मंड़ित करना भी लोगों में चर्चा का विषय बना रहा। कुछ लोगों का यह भी कहना था कि तारीफ करना तो ठीक हैं लेकिन यदि कुछ बुरायी हो तो समाज के मार्गदर्शक होने के नाते हमारा यह भी तो कत्तZव्य होता हैं कि हम उन्हें भी गिनायें और समाज को आगाह करें जैसा कि एक शायर सागर त्रिपाठी ने कहा हैं कि हैं बजा कि खूबियों का, जिक्र हो दिल खोलकरखामियां भी बेहिचक मुंह पर गिनानी चाहिये
योजना समिति के चुनाव में हुआ विवाद-
जिला योजना समिति के चुनाव भी इस दौरान संपन्न हुये हैं। इसमें जिला पंचायत से 14 और सिवनी नपा से एक प्रतिनिधि चुना गया है। लखनादौन नपं का चुनाव ना होने के कारण बरघाट और लख्नादौन नपं से चुना जाना सदस्य नहीं चुना जा सका। पहले ये चुनाव 21 अप्रेल का होने थे जिसकी बाकायदा सूचना भी जारी कर दी गई थी। लेकिन अचानक ही इन चुनावों को आगे बढ़ा दिया गया और फिर ये चुनाव 27 अप्रेल को कराये गये। चुनाव की निष्पक्षता पर इसी से सवालिया निशान लग गया था। राजनैतिक क्षेत्रों यह चर्चा भी रही कि स्थानीय भाजपा नेताओं के दवाब में ये चुनाव बढ़ाये गये क्योंकि 21 अप्रेल को भाजपा की महंगायी के विरोध में दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की रैली आयोजित थी। इंका के नपा के उपाध्यक्ष सहित पार्षदों ने विरोध भी किया था जिसे दरकिनार कर दिया गया। जिला पंचायत के 14 में से 11 सदस्य कांग्रेस के एवं तीन सदस्य भाजपा के चुने गये हैं। नपा सिवनी में भाजपा को सफलता मिली और उसके उम्मीदवार संजय खंड़ाइत चुनाव जीत गये। उन्होंने कांग्रेस की नारायणी सक्सेना को 12 के मुकाबले 13 मतों से पराजित किया। यहां यह उल्लेखनीय हें कि भाजपा के पालिका के अध्यक्ष सहित 13 और कांग्रेस के उपाध्यक्ष सहित 12 सदस्य हैं। दोनों ही दल एक दूसरे की टूट फूट पर अपनी रणनीति बनाये हुये थे लेकिन इस चुनाव में दोनों ही पार्टियों ऐसा कुछ नहीं हुआ। लेकिन सिवनी नपा का चुनाव विवादों में रहा। भाजपा के नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी एवं पार्षद राजेश साहू ने अपना वोट ना केवल खुले में दिया वरन उसे दिखाते हुये उनकी वीडियो शूटिंग भी पुलिस की रिकार्डिंग में कैद हो गई थी। इस पर कांग्रेसियों ने विरोध कियौ इंकाइयों की मांग थी कि इससे मतदान की गोपनीयता भंग हुयी हैं और ये दोनों वोट निरस्त करना चाहिये। मौके पर ही इंका नेताओं ने इसकी सूचना फोन पर जिला कलेक्टर को दी लेकिन इसे निर्वाचन अधिकारी ने गम्भीरता से नहीं लिया और उन वोटों को निरस्त नहीं किया। इससे चुनाव परिणाम जो भी आया हो लेकिन इससे एक सवाल तो पफदा हो ही जाता हें कि क्या भाजपा को अपने ही नपा अध्यक्ष पर क्या विश्वास नहीं था जो उन्हें इस तरह दिखाकर वोट देना पड़ा। वैसे भाजपा ने इस चुनाव की जीत का श्रेय नव निर्वाचित जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन और नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी की रणनीति को दिया गया हैं। एक दृष्टि से यह सही भी हैं क्योंकि आज कल अपनी ही पार्टी के सभी सदस्यों से अपनी ही पार्टी को वोट डलवा पाना भी कठिन काम हो गया हैं।
गेहूं खरीदी में अनियमितता बनाम नेतागिरी-
गेहूंं,बारदाना,परिवहन,मंड़ी,किसानों के शोषण ने सभी को बुरी तरह हलाकान कर दिया हैें। प्रशासन हो या नेता सभी को सिर्फ यही दिखायी दे रहा हैं। समर्थन मूल्य पर गेहू खरीदी को लेकर बवाल शुरू से ही चल रहा हैं। खरीदी केन्द्रों पर किसानों के बजाय अधिकतर कुचिया व्यापारी ही माल ला रहें हैं। जो कुछ भी असुविधा और परेशानी हो रही हैं वह उन्हें तो हो रही हैं। वे भी कुछ चालाकियां करने से बाज नहीं आ रहें हैं। जिसके हाथ में जो भी जवाबदारी हैं वो उसी में से ज्यादा से ज्यादा गोलमाल करने का प्रयास कर रहें हैं। कहीं नये बारदाने के बदले पुराने बारदाने मिलने की बात की जा रही हैं तो कहीें तौल में हेरा फेरी की बात की जा रही हैं तो कहीं माल ढ़लाने के लिये पैसे लगने की बात की जा रही है तो कहीं अपना तुलाने के लिये भी पैसे देने की बात की जा रही हैं तो कहीं भुगतान जल्दी मिल जाये इसके लिये चढ़ोत्री चढ़ाने की बात की जा रही हैं। जब सब जगह पैसा लग रह हैं तो फिर इसे रोकने वाला अमला आखिर क्या कर रहा हैं। रहा सवाल नेताओं का तो वे अपने साथ ही कैमरा, वीडियो कैमरा और पत्रकारों को साथ ले जा रहे हैं। खरीदी केन्द्र में ये नेता अपनी फोटो खिंचवाते हैं, वीडियो कैमरे में अपना इंटरव्यू देते हैं और उपस्थित सरकारी अमले को निर्देश देते हैं। अखबारों में समाचार छप जाते हैं तो फिर ये नेता यह भी नहीं देखते कि उनके निर्देशों का कितना पालन और व्यवस्था में कुछ सुधार भी आया कि नहींर्षोर्षो

Sunday, May 2, 2010

पीड़ित पिता की गुहार पर 45 दिनो तक लड़की की तलाश ना कर पाने वाली पुलिस ने कोर्ट के निर्देश पर तीन दिनों मे तलाश कर लिया
सिवनी। पिछले 45 दिनों से अपहृत बालिका को उसके अपहरण कत्ताZ के साथ नागपुर में गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर दिया गया हैं। गरीब पिता की गुहार पर जो पुलिस 45 दिनों में भी बालिका को नहीं तलाश कर पायी थी उसी पुलिस ने उच्च न्यायालय के निर्देश पर मात्र तीन दिनों के अन्दर ही उसे ढूंढ निकाला हैं। बताया जाता है कि जिले के बंड़ोल थाने के ग्रात सोनाडोंगरी निवासी डहेरिया परिवार की बालिका को उसी गांव के एक युवक ने अपहृत कर नागपुर ले गया था। जहां अपने एक रिश्तेदार के यहां उसने रखा और दोनों ने ही उसका शारीरिक शोषण भी किया। कक्षा 9 मी में पढ़ने वाली उक्त बालिका 9 मार्च को परीक्षा देने गई फिर लोटी ही नहीं। 11 मार्च को लड़की के पिता ने बण्डोल थाने में अपनी रिपोर्ट दर्ज करायी थी। रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं होने पर उसने जिला पुलिस अधीक्षक से मिलने की कोशिश की लेकिन उसमें वो सफल नहीं हों पाया था। अपहरित की गई लड़की के पिता के निराश होर म.प्र. उच्च न्यायालय में बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी जिस पर कोर्ट ने जिला पुलिस को फटकार लगाते हुये तीन दिन के अन्दर लड़की को कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिये थे। कोर्ट के निर्देश मिलते ही पुलिस ने तेजी से तलाश जारी की और निर्धारित समय से पहले ही लड़की और अपराधियों को तलाश ककर लिया और कोर्ट में पेश कर दिया। एक पीड़ित पिता की फरियाद पर यदि पुलिस 45 दिनों तक टालमटोल नहीं करती रहती तो इस गरीब आदमी को हाई कोर्ट जाने की जेहमत नहीं उठानी पड़ती। पुलिस की इस प्रकरण में की गई कार्यवाही से कुछ विचारणीय सवाल तो जरूर उठ खड़े हुये जिनका निदान जन हित मे भविष्य में किया जाना आवश्यक प्रतीत होता हैं।