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Monday, July 30, 2012


भाजपा के सदस्यता अभियान के लिये केवलारी में नरेश दिवाकर और सिवनी में वेदसिंह को प्रभारी बनाना चर्चित
भाजपा का यह सदस्यता अभियान इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि अभी जो सदस्य बनेंगें वे ही लोकसभा और विधानसभा के चुनावों की रणभूमि में रणबांकुरे रहेंगें। संभागीय संगठन मंत्री की उपस्थिति में हुयी एक बैठक में जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन ने जिले के चारों विस क्षेत्रों  के लिये प्रभारी नियुक्त किये हैं। जिनमें लखनादौन में सुदामा गुप्ता,बरघाट में गोमती ठाकुर,सिवनी में वेद सिंह और केवलारी क्षेत्र में नरेश दिवाकर को प्रभारी बनाया गया हैं। केवलारी और सिवनी विस क्षेत्र के प्रभारियों की नुयुक्ति कुछ अलग ही राजनैतिक संकेत दे री हैं।हरवंश नरेश बिसेन त्रिकोण के तीनों कोणों को राजनीति का क ख ग जानने वाला भी बखूबी जानता हैं। पिछले एक दशक से नूरा कुश्ती के किस्से भाजपा और कांग्रेस में चलते रहें हैं जो आज भी जारी हैं। पूर्व घंसौर विस क्षेत्र के पूर्व कांग्रेस विधायक टक्कनसिंह मरकाम का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया। लेकिन सहकारिता और राजनैतिक क्षेत्रों में जिस गुमनामी में उनका अंतिम संस्कार हो गया उसके चर्चे अवश्य हो रहें है। सिवनी और बालाघाट के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की बालाघाट संसदीय क्षेत्र में बढ़ रहींे राजनैतिक गतिविधियां सियासी हल्कों में चर्चित हैं। लंबे समय से केवलारी के भाजपायी आपने पालनहार गौरी भाऊ के दर्शन के लिये भी तरस गये हैं। भाजपायी क्षेत्रों यह चर्चा जोरों पर हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो केवलारी के भाजपा के पालनहार ना केवल कहीं गुम हो गयें हैं वरन उनके कोई बयान भी इन दिनों सुर्खियों में नहीं हैं। 
भाजपा के सदस्यता प्रभारियों की नियुक्ति हुयी चर्चित-भाजपा का सदस्यता अभियान प्रारंभ हो चुका हैं। आलाकमान के निर्देशानुसार इस बार बीस प्रतिशत नये सदस्य बनाने का लक्ष्य दिया गया हैं।यह सदस्यता अभियान इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि अभी जो सदस्य बनेंगें वे ही लोकसभा और विधानसभा के चुनावों की रणभूमि में रणबांकुरे रहेंगें। संभागीय संगठन मंत्री की उपस्थिति में हुयी एक बैठक में जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन ने जिले के चारों विस क्षेत्रों  के लिये प्रभारी नियुक्त किये हैं। जिनमें लखनादौन में सुदामा गुप्ता,बरघाट में गोमती ठाकुर,सिवनी में वेद सिंह और केवलारी क्षेत्र में नरेश दिवाकर को प्रभारी बनाया गया हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में विशेषकर भाजपा में ही इस बात लेकर चर्चाओं के दौर प्रारंभ हो गये हैं कि ये नियुक्तियां क्या किसी नये चुनावी समीकरण की शुरुआत तो नहीं हैं।   एक तरफ जहां बरघाट और लखनादौन, जो कि दोनों आदिवासी क्षेत्र है, में स्थानीय नेताओं को ही प्रभारी बनाया गया हैं लेकिन केवलारी और सिवनी विस क्षेत्र के प्रभारियों की नुयुक्ति कुछ अलग ही राजनैतिक संकेत दे री हैं। सिवनी क्षेत्र से दो बार विधायक रहे नरेश दिवाकर की पिछले चुनाव में टिकिट कट गयी थी लेकिन वे आज मविप्रा के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त अध्यक्ष हैं। उन्हें सिवनी के बजाय केवलारी का प्रभारी बनाया गया हैं जबकि केवलारी से 2003 का विस चुनाव लड़ चुके भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर को सिवनी का प्रभार दिया गया हैं। वैसे तो सिवनी से भाजपा की नीता पटेरिया विधायक हैं लेकिन भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर कुछ इस तरह से मारामारी चल रही हैं मानो वहां से कांग्रेस का विधायक हो। केवलारी विस क्षेत्र से कांग्रेस के हरवंश सिंह विधायक हैं जहां का सदस्यता प्रभारी नरेश जी को बनाया गया हैं। यहां यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि पिछला विधानसभा चुनाव केवलारी से डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने लड़ा था जो कि आज प्रदेश के वित्त आयोग के लालबत्तीधारी अध्यक्ष हैं।  हरवंश नरेश बिसेन त्रिकोण के तीनों कोणों को राजनीति का क ख ग जानने वाला भी बखूबी जानता हैं। पिछले एक दशक से नूरा कुश्ती के किस्से भाजपा और कांग्रेस में चलते रहें हैं जो आज भी जारी हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष द्वारा सदस्यता अभियान का केवलारी और सिवनी का प्रभार वरिष्ठों को सम्मान देने वाला हैं या फिर इसके पीछे कुछ राजनैतिक मंसूबे फल फूल रहें हैं?इसका इसके बारे में अभी से सियासी हल्कों में पोस्टमार्टम शुरू हो गया हैं। क्योंकि आदिवासी विधायकों शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले के क्षेत्रों को प्रभार ऐसे किसी वरिष्ठ भाजपा नेता को नहीं सौंपा गया हैं।
मरकाम के निधन पर सहाकारिता एवं राजनैतिक क्षेत्र में की गयी उपेक्षा चर्चित-पूर्व घंसौर विस क्षेत्र के पूर्व कांग्रेस विधायक टक्कनसिंह मरकाम का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया। लेकिन सहकारिता और राजनैतिक क्षेत्रों में जिस गुमनामी में उनका अंतिम संस्कार हो गया उसके चर्चे अवश्य हो रहें है। स्व. मरकाम जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष सहित सहकारी बैंक के अध्यक्ष और अपेक्स बैंक के उपाध्यक्ष भी रहे है। बाद में वे भाजपा में शामिल हो गये थे। लेकिन उनके दुखद निधन पर ना तो जिला भाजपा ने,ना जिला कांग्रेस ने और ना ही सहकारी बैंक ने उन्हें श्रृद्धांजली देना जरूरी समझा। हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह और म.प्र.वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन की विज्ञप्तियां जरूर प्रकाशित हुयीं हैं। एक कद्दावर आकिदवासी नेता के निधन पर की गयी ये उपेक्षा बहुत से सवाल छोड़ जाती हैं। 
बालाघाट लोस क्षेत्र में प्रहलाद की सक्रियता बनी चर्चा का केन्द्र-सिवनी और बालाघाट के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल की बालाघाट संसदीय क्षेत्र में बढ़ रहींे राजनैतिक गतिविधियां सियासी हल्कों में चर्चित हैं। उल्लेखनीय है कि परिसीमन में सिवनी संसदीय क्षेत्र समाप्त हो जाने के बाद सिवनी लोस क्षेत्र के सिवनी एवं बरघाट विस क्षेत्र बालाघाट लास में शामिल कर दिये गयेहैं। इसके अलावा 6 विस क्षेत्र बालाघाट जिले के हैं। हाल ही में हुये लखनादौन नगर पंचायत के चुनाव  में भी प्रहलाद पटेल आये थे और हाल ही में उन्होंने बालाघाट जिले में कार्यक्रम आयोजित किया था जिसे मीडिया ने उनके शक्ति प्रर्दशन के रूप में देखा हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय हैं कि इस क्षेत्र के सांसद के.डी. देशमुख विस चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं और नगरपालिका चुनाव के दौरान वारासिवनी आये भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने भी कांग्रेस के गढ़ वारासिवनी को ढहाने के लिये के.डी. भाऊ को हरी झंड़ी सी दिखा दी हैं। ऐऐ हालात में भाजपा का एक वर्ग विशेष कर पटेल समर्थकों का मानना हैं बालाघाट लोस से प्रहलाद पटेल भी एक सशक्त दावेदार हो सकते हैं।
बालाघाट लोस क्षेत्र में प्रहलाद की सक्रियता बनी चर्चा का केन्द्र-बड़ी उम्मीदों के साथ प्रदेश भाजपा ने केवलारी विस क्षेत्र का प्रभारी सरकार के वरिष्ठ मंत्री गौरीशंकर बिसेन को बनाया था। इसके पहले राज्य सरकार के मंत्री जयसिंह मरावी प्रभारी थे। लेकिन कांग्रेस के दिग्गजों को हराने की मुख्यमंत्री की सार्वजनिक रूप से घोषित रणनीति के तहत प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने बिसेन को प्रभारी बनाया था। अपने बयानों और कार्यशैली के लिये हमेशा चर्चाओं में रहने वाले गौरी भाऊ ने अपनी धमाकेदार आमद भी केवलारी में दी थी। इसी बीच रानजैतिक समीकरणों में बदलाव हुआ और केवलारी क्षेत्र से भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़ चुके डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को कबीना मंत्री के दर्जेे के साथ प्रदेश के वित्त आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। अब लंबे समय से केवलारी के भाजपायी आपने पालनहार गौरी भाऊ के दर्शन के लिये भी तरस गये हैं। भाजपायी क्षेत्रों यह चर्चा जोरों पर हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो केवलारी के भाजपा के पालनहार ना केवल कहीं गुम हो गयें हैं वरन उनके कोई बयान भी इन दिनों सुर्खियों में नहीं हैं। वैसे तो जब गौरी भाऊ प्रभारी बनाये गये थे तभी से यह चर्चा थी कि नाटकीय शैली में राजनीति करने वाले क्षेत्रीय इंका विधायक हरवंश सिंह और गौरी शंकर बिसेन में से आखिर कौन किसको मात देगा? या कब नूरा कुश्ती चाले हो जावेगी? अब गौरी भाऊ केवलारी क्यों नहीं आ रहे हैं? इसका खुलासा तो वो ही कर सकतें हैं। “मुसाफिर“  
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले से साभार

जनभावनाओं पर हमेशा भारी पड़े षड़यंत्रकारी
षड़यंत्रों में बराबरी की भागीदारी रही हैं इंका भाजपा नेताओं की
बीते कई सालों से जिले की जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वाले षड़यंत्रकारी ही भारी साबित होते रहें हैं। फिर चाहे वो लोकसभा का परिसीमन में विलोपन का मामला हो, या जिले की बड़ी रेल लाइन का मामला हो या फिर फोर लेन का या संभाग बनाने का। इन षड़यंत्रकारियों में कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की बराबरी की भागीदारी और नूरा कुश्ती भी जिम्मेदार रही हैं। जिससे जिले में विकास के पहिये थम से गये है।   
जिले के पिछड़ेपन का रोना तो हर नेता और राजनैतिक दल रोता है और उसे दूर करने का दावा भी करता हैं। लेकिन जब किसी भी नेता तो व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ आड़े आता हैं तो जिले का हित तो छोड़ो अपनी पार्टी के हितों की भी बलि चढ़ाने संकोच नहीं करता हैं।
पिछले कई सालों में जिले को कुछ मिला तो नहीं हैं लेकिन छिन जरूर गया हैं।सन 1977 से अस्तित्व में आने वाली सिवनी लोकसभा क्षेत्र परिसीमन में समाप्त कर दी गयी। यह एक शाश्वत सत्य है कि कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेताओं के राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये एक नूरा कु श्ती खेली गयी और क्षेत्र समाप्त हो जाने के बाद दोनों ही दलों के नेताओं ने उक दूसरे को दोषी बताया और मामला खत्म हो गया।
ठीक इसी तरह जिले को बड़ी रेल लाइन से जोड़ने के लिये जब जब भी जन भावनायें सामने आयीं हैं तब जिले के राजनैतिक शिखर बैठे हुये नेताओं ने कहीं आपसी गुटबंदी तो कभी राजनैतिक प्रतिद्वंदता के चलते सहयोग करना तो दूर अड़गें तक डालने से कोई परहेज नहीं किया। यह कारनामा केन्द्र में राजग और संप्रग दोनो ही सरकारों के कार्यकाल में हुआ और परिणाम आज सामने हैं।
इसी तरह जिले को भौगोलिक स्थिति के कारण उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत फोर लेन सड़क की सौगात मिली। यह सौगात जिले को किसी के राजनैतिक प्रयासों से नहीं मिली थी। लेकिन अपने अपने आकाओं को खुश करने के लिये जिले के कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने ऐसे पेंच डाल कि मामला आज भी खटायी में पड़ा हुआ हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी उसके निर्देशानुसार प्रस्ताव बनाने का काम अभी तक राज्य और केन्द्र सरकार पूरा नहीं कर पायीं हैं। 
इसी तरह भौगोलि रूप से छिंदवाड़ा,सिवनी और बालाघाट जिले को मिलाकर बनाये जाने वाले नये संभाग का मुख्यालय सिवनी में होना चाहिये था लेकिन वह भी जिले को नसीब नहीं हुआ। चुनावी समीकरणों को देखते हुये प्रदेश के मुख्यमंत्री मामले का निपटारा करने के बजाय उसे लंबित रखना बेहतर समझा और मामला आज तक लंबित हैं। 
इन सभी मुद्दों पर जिले की जनता ने अपनी भावनाओं को अपने तरीक से व्यक्त  भी किया। समय समय पर विभिन्न आंदोलनों के जरिये जिले के हक की मांग भी गयी। विशेषकर परिसीमन और फोर लेन के मामले में ऐतिहासिक जनांदोलन भी हुये जनता ने खुलकर सड़क पर आकर अपनी भावनायें भी प्रगट की थीं। लेकिन अपने आप को जनता का प्रतिनिधि बताने वाले और भाजपा और कांग्रेस के षड़यंत्रकारी नेता हमेशा ही जनभावनाओं पर भारी पड़े। इसीलिये आज जिले में विकास के पहिये थम गये हैं। 

Monday, July 23, 2012


आमानाला कांड़ में हरवंश के खिलाफ हत्या का प्रयास करने का मामला दर्ज कराने वाली नीता पटेरिया अब चुप क्यों है ?
पेश नहीं हुआ चालान
हरवंश पहुंचे हाई कोर्ट 
सिवनी। आमानाला कांड़ में इंका विधायक हरवंश सिंह के खिलाफ धारा 307 का प्रकरण दर्ज करवाने वाली भाजपा विधायक नीता पटेरिया की लंबी चुप्पी सियासी हल्कों में चर्चित हैं। प्रकरण का चालान अभी तक पुलिस ने कोर्ट में पेश नहीं किया हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह भी हाई कोर्ट गयें हैं कि उनके खिलाफ धारा 307 का मामला नहीं बनता हैं। 
उल्लेखनीय हैं कि लगभग छः साल पहले आमानाला लघु सिंचायी परियोजना के लोकार्पण के मामले में तत्कालीन भाजपा सांद नीता पटेरिया और तत्कालीन क्षेत्रीय इंका विधायक हरवंश सिंह आमने सामने हो गये थे। कुछ हल्के फल्के वाद विवाद के बाद भाजपा सांसद नीता पटेरिया की ना केवल गाड़ी क्षति ग्रस्त हो गयी थी वरन उसी गाड़ी में उनका पुत्र भी बैठा हुआ था। सांसद पटेरिया ने आरोप लगाया था कि इंका विधायक हरवंश सिंह और उनके समर्थकों ने जान से मारने का प्रयास किया हैं। थाने में मामला दर्ज कराने के लिये जिले के तमाम भाजपा नेताओं ने थाने में धरना भी दिया था। उसके बाद जिले के बंड़ोल थाने में  इंका विधायक हरवंश सिंह सहित अन्य लोगों के खिलाफ धारा 307 सहित अन्य गंभीर धाराओं में प्रकरण भी पंजीबद्ध हो गया था। 
इंका विधायक हरवंश सिंह ने अपने खिलाफ पंजीबद्ध किये गये मामले को राजनैतिक बताते हुये एक न्याय रैली का आयोजन किया था। इस न्याय रैली में जिले सहित जबलपुर संभाग के हजारों कार्यकर्त्ताओं ने भाग लिया था। जिले की एंतिहासिक रैलियों में इस न्याय रैली को भी गिना जाता हैं।
मामला दर्ज होने के बाद हरवंश सिह सहित सभी आरोपियों को चालान पेश होते तक के लिये अग्रिम जमानत भी मिल गयी थी। लंबे समय तक चालान पेश ना होने के कारण इंका विधायक हरवंश सिंह उच्च न्यायालय की शरण में चले गये तथा यह गुहार लगायी कि उनके खिलाफ धारा 307 का मामला नहीं बनता हैं अतः उन्हें आरोप मुक्त किया जाये। यह मामला भी अभी हाई कोर्ट में लंबित हैं।
आज नीता पटेरिया सिवनी विस क्षेत्र की भाजपा विधायक हैं तथा प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष हैं। जबकि इंका विधायक हरवंश सिंह प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष है। परिसीमन के बाद इस कांड का घटना स्थल अब केवलारी के बजाय सिवनी विस क्षेत्र का हिस्सा बन गया हैं।
प्रदेश में भाजपा की सरकार हैं और पुलिस लगभग छः साल बाद भी कोर्ट में इस प्रकरण का चालान नहीं पेश कर पायी हैं। ऐसे में यह सवाल सियासी हल्कों में खासा चर्चित हैं कि भाजपा विधायक नीता पटेरिया इस मामले अब तक चुप्पी क्यों साधे हुयीं हैं? क्या उनके द्वारा उस समय बनवाया गया प्रकरण फर्जी था? या अब किन्हीं राजनैतिक समीकरणों के चलते मामला लटका हुआ है? या मुख्यमंत्री के डंपर कांड़ से इस मामले के तार जुड़े हुये? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जो कि राजनैतिक क्षेत्रों में तैर रहें हैं।         

वर्षाकालीन सत्र में घटित घटनाओं की गूंज प्रदेश सहित जिले में भी कई दिनों तक गूंजती रहेगी
बीते दिनों रानी दुर्गावती वार्ड क्ी भाजपा पार्षद माया मरकाम ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। इसकी घोषणा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष हीरा आसवानी की उपस्थिति में एक पत्रकार वार्ता में की गयी।इसमें युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल की विशेष भूमिका बतायी जा रही हैं। दक्षिण सिवनी के वार्डों में भीतरघात की मार अधिक थी। दक्षिण सिवनी क्षेत्र में ही रानी दुर्गावती वार्ड स्थित हैं जो कि शुरू से ही आदिवासी वर्ग के लिये आरक्षित और यहां से हमेशा कांग्रेस ही जीतती रही हैं। भाजपा पार्षद का कांग्रेस प्रवेश राजनैतिक हल्कों में चर्चित हैं। विधानसभा के वर्षाकालीन सत्र में जो कुछ भी हुआ उसे लेकर भारी राजनैतिक उथल पुथल मची हुयी हैं।  विपक्ष द्वारा जब अध्यक्ष को निकलने नहीं दिया तो बजाय उपाध्यक्ष के सभापति पैनल के सदस्य का आसंदी पर बैठना भी चर्चित हैं। वर्षाकालीन सत्र में घटित अशोभनीय घटनाओं ने इतिहास को कलंकित कर दिया हैं। विधानसभा  में घटित घटनाओं का जिले में भी असर हुआ हैं। भाजपा और कांग्रेस ने प्रदर्शन कर विरोध किया और लोकतंत्र को कलंकित करने का एक दूसरे पर आरोप लगाया। लेकिन इन शर्मनाक घटनाओं ने कुछ ऐसे सवाल अनुत्तरित छोड़ दिये हैं जो प्रदेश के सियासी हल्कों में कई दिनों तक गूंजते रहेंगें। 
भाजपा पार्षद का इंका प्रवेश चर्चित-बीते दिनों रानी दुर्गावती वार्ड क्ी भाजपा पार्षद माया मरकाम ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। इसकी घोषणा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष हीरा आसवानी की उपस्थिति में एक पत्रकार वार्ता में की गयी।इसमें युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल की विशेष भूमिका बतायी जा रही हैं। उल्लेखनीय हैं कि सन 2008 के विस चुनाव में इंका प्रत्याशी इंजी. प्रसन्न मालू के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश मुनमुन राय का खुलकर काम करने वाले हरवंश सिंह समर्थक नेताओं के हौसले कोई कार्यवाही ना होने से काफी बुलंद हो गये थे। इसके अलावा कई नेताओं को कांग्रेस की जमानत जप्त कराने के लिये बतौर इनाम पदों से भी नवाजा दिया गया था। इसीलिये 2009 के नगरपालिका चुनाव में भी सिवनी के   अध्यक्ष पद के प्रत्याशी संजय भारद्वाज और अधिकांश पार्षद पद के उम्मीदवारों को भारी भीतरघात का सामना करना पड़ा था। हालांकि संजय भारद्वाज ना सिर्फ हरवंश सिंह के स्वजातीय थे वरन दूर के उनके रिश्तेदार भी थे। फिर भी वे नहीं चाहते थे कि संजय चुनाव जीते। इसीलिये उनके समर्थक खुले आम विरोध में काम कर रहें थे। खासकर दक्षिण सिवनी के वार्डों में इसकी मार अधिक थी। दक्षिण सिवनी क्षेत्र में ही रानी दुर्गावती वार्ड स्थित हैं जो कि शुरू से ही आदिवासी वर्ग के लिये आरक्षित और यहां से हमेशा कांग्रेस ही जीतती रही हैं। लेकिन भीतरघात के चलते इस चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार विमला पंद्रे को जहां 446 वोट मिले थे वहीं भाजपा की माया मरकाम ने 811 वोट लेकर इस आदिवासी वार्ड में पहली बार 346 वोटों से जीतकर भाजपा का परचम फहराया था। इसी वार्ड में अध्यक्ष पद के इंका प्रत्याशी संजय भारद्वाज को 480 वोट मिले थे जबकि भाजपा के राजेश त्रिवेदी ने भी 799 वोट लेकर 319 वोटों की भारी बढ़त हासिल की थी। अब जबकि 2013 में विस चुनाव होना हैं तब भाजपा की पार्षद माया मरकाम का कांग्रेस में शामिल होना राजनैतिक हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ हैं। कुछ नेता तो यह कहते हुये देखे जा रहें हैं कि जिनने भाजपा पार्षद को चुनाव जितवाया था अब वेे ही उसे कांग्रेस में लाकर वाहवाही लूट रहें हैं।
विधानसभा का इतिहास हुआ कलंकित-विधानसभा के वर्षाकालीन सत्र में जो कुछ भी हुआ उसे लेकर भारी राजनैतिक उथल पुथल मची हुयी हैं। कांग्रेस के विधायक और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह यह चाहते थे कि आयकर विभाग द्वारा डाले गये छापे और जिनके यहां छापे डाले गये थे उनके तार मुख्यमंत्री सहित भाजपा से जुड़ने के प्रमाणों पर सदन में चर्चा हो लेकिन भापा और सरकार का यह कहना था कि एक केन्द्रीय ऐजेन्सी ने यह कार्यवाही की हैं इसलिये इस पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। इसे लेकर विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस विधायकों ने विस अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी और मुख्यमंत्री के चेम्बर के बाहर धरना दे दिया और उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया। समाान्यतः ऐसा माना जाता हैं कि सदन में जब भी कोई गंभीर संकट आता हैं तो विस अध्यक्ष,उपाध्यक्ष,सदन के नेता और नेता प्रतिपक्ष मिलकर उसे निपटाते हैं। विपक्ष द्वारा जब अध्यक्ष को निकलने नहीं दिया तो बजाय उपाध्यक्ष के सभापति पैनल के सदस्य का आसंदी पर बैठना भी चर्चित हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हैं कि विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह क्या उस दौरान सदन में उपस्थित नहीं थे या पार्टी के इस अभियान में शामिल थे ? या फिर  किसी राजनैतिक कारणों से सोची समझी साझा रणनीति के तहत उपाध्यक्ष के बजाय सभापति पैनल के आदिवासी सदस्य ज्ञानसिंह को आसंदी पर आसीन कराया गया था?यहां यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस विधायक दल के उपनेता राकेश चौधरी और कल्पना पेरुलेकर को ज्ञानसिंह के साथ अपमानजनक व्यवहार करने के कारण ही अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा हैं। पहले कांग्रेस विधायकों द्वारा विस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के चेम्बरों का घेराव और उसके बाद आसंदी पर बैठे ज्ञान सिंह के साथ आरोपित अभद्र व्यवहार और फिर विस अध्यक्ष की उपस्थिति में संसदीय कार्य मंत्री द्वारा दोनों इंका विधायकों की सदस्यता समाप्त करने का प्रस्ताव लाना और हल्ले गुल्ले के बीच बिना सफाई का अवसर दिये उसे ध्वनिमत से पारित कर देने की घटना ने प्रदेश की विधानसभा के इतिहास को कलंकित कर दिया हैं। 
भाजपाऔर इंका ने भी जिले में किया विरोध प्रर्दशन -विधानसभा  में घटित घटनाओं का जिले में भी असर हुआ हैं। पहले भाजपा ने धरना देकर कांग्रेस पर विधानसभा की गरिमा को कलंकित करने का आरोप लगाते हुये  राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। भाजपा ने यह आरोप भी लगाया कि विधानसभा में आसंदी पर बैठे सभापति पैनल के आदिवासी सदस्य ज्ञानसिंह का अपमान कर यह साबित कर दिया हैं कि कांग्रेस का लोकतांत्रिक परंपराओं में कोई विश्वास नही हैं। इस धरने में जिला भाजपा के तमाम नेता तो मौजूद थे लेकिन इस धरने में जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही। उनके निकटस्थ सहयोगियों का कहना हैं कि कुछ प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहने के कारण वे भोपाल से वापस नहीं आ पाये हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के कुछ कार्यकर्त्ताओं ने भी जिला इंकाध्यक्ष हीरा आसवानी के नेतृत्व में विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी का पुतला दहन शुक्रवारी में किया। कांग्रेसजन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का पुतला नहीं जला पाये। कांग्रेसियों ने भी राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर भाजपा पर आरोप लगाया कि उसने सदन में बहुमत का दुरुपयोग करते हुये कांग्रेस के विधायकों की सदस्यता समाप्त कर लोकतंत्र की हत्या की हैं। आनन फानन में कांग्रेस के द्वारा आयोजित इस पुतला दहन कार्यक्रम की सूचना अधिकांश कांग्रेसियो को कार्यक्रम संपन्न होने के अखबारों में प्रकाशित समाचार से ही प्राप्त हुयी। विधानसभा में जो कुछ भी घटित हुआ उस बारे में एक दूसरे पर आरोप लगाकर भाजपा और कांग्रेस ने तो अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली लेकिन जो कुछ भी शर्मनाक घटनाक्रम हुआ उसने कई सवाल अनुत्तरित ही छोड़ दिये हैं। कांग्रेस यदि भ्रष्टाचार के मामले पर स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा करना चाहती थी तो आखिर भाजपा को इसमें क्या आपत्ति थी? लेकिन कांग्रेस के सदस्यों ने आसंदी पर बैठे सभापति के साथ जो र्दुव्यवहार किया क्या वह उचित था? कांग्रेस सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने वाला प्रस्ताव अध्यक्ष की उपस्थिति में हल्ले गुल्ले में ध्वनिमत से पास करना क्या उचित था? ये तमाम सवाल प्रदेश के सियासी हल्कों में कई दिनों तक गूंजते रहेंगें। “मुसाफिर“ 
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले से साभार

Monday, July 16, 2012


स्थानीय जमीनी कांग्रेसियों की मेहनत पर पानी फेरा हरवंश-मुनमुन नूरा कुश्ती ने?
ठीकरा फोड़ने की जुगत में जुटे भाजपायी 
सिवनी। नगर पंचायत लखनादौन के चुनाव में 8 पार्षद जीतने तथा 15 वार्डों में 3226 वोट पाने वाली कांग्रेस का अध्यक्ष पद से मैदान से बाहर होना राजनैतिक हल्कों में एक बार चर्चित हो गया हैं। जबकि पूरी ताकत झोंकने के बाद भी भाजपा 3 पार्षद जीतने एवं अध्यक्ष पद के लिये 1880 और 15 वार्डों में मात्र 2375 वोट ही ले सकी हैं। सभी भाजपा नेता एक दूसरे के सिर पर इस हार का ठीकरा फोड़ने के प्रयास में जुटे हुये हैं। इंका विधायक हरवंश सिंह और मुनमुन की सांठ गांठ के कारण स्थानीय कांग्रेस नेताओं की मेहनत पर पानी फिर गया हैं। 
कांग्रेस ने किया शानदार प्रदर्शन-लखनादौन विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा हैं। आजादी के बाद से इस क्षेत्र से कांग्रेस ही जीतती रही हैं। लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों से कांग्रेस इस क्षेत्र से हार रही हैं। यहां से भाजपा की शशि ठाकुर विधायक हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस विधानसभा क्षेत्र से लगभग 23 हजार वोटों की बढ़त ली थी जो कि इंका सांसद बसोरीसिंह मसराम की जीत का एक प्रमुख कारण बनी थी। जबकि जिले के इकलौते इंका विधायक एवं विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के केवलारी विस क्षेत्र से लोस चुनाव में कांग्रेस करीब 3 हजार वोटों से हार गयी थी। पिछले लोस चुनाव की तरह ही लखनादौन क्षेत्र में हुये इस चुनाव में भी कांग्रेस ने शानदार प्रर्दशन तो किया लेकिन यहां से अध्यक्ष पद का कांग्रेस का कोई उम्मीदवार ही मैदान में नहीं था। इसके बावजूद भी कांग्रेस ने पंचायत के 15 वार्डों में से अपने 8 पार्षद जितवा कर बहुमत बनानेे में सफलता प्राप्त की हैं। इतना ही नहीं वरन कांग्रेस के पंजे को 15 वार्डों में कुल 3226 वोट मिले हैं। जबकि निर्दलीय उम्मीदवार श्रीमती सुधा राय को 6628 वोट लेकर भाजपा प्रत्याशी को 4548 वोट से भाजपा उम्मीदवार से चुनाव जीत गयी थीं।  इन राजनैतिक परिस्थितियों में कांग्रेस यदि अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ती तो परिणाम कुछ और भी आ सकते थे। राजनैतिक विश्लेषकों का ऐसा भी मानना हैं कि चुनावी वातावरण को भांप कर ही विकास के नाम पर चुनाव जीतने का दावा करने वाले मुनमुन राय अंतिम समय में फिल्मी कलाकारों के रोड़ शो करवा कर माहौल अपने पक्ष में करने का प्रयास किया था। 
दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ने की जुगत में जुटे भाजपायी - भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, संगठन मंत्री अरविंद मैनन,राज्यसभा सदस्य एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते,पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल,मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर,जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन,विधायकगण शशि ठाकुर,नीता पटेरिया एवं कमल मर्सकोले सहित तमाम भाजपायी दिग्गजों की फौज भी इस चुनाव में पंद्रह में मात्र तीन पार्षद ही जिता पायी। अध्यक्ष पद के लिये भी भाजपा को मात्र 1880 वोट ही मिल सके। नगर के पंद्रह वार्डों में पार्षद पर के भाजपा प्रत्याशियों को मात्र 2475 वोट ही मिल पाये जो कि अध्यक्ष को मिले वोटों से लगभग 500 अधिक हैं। मीडिया में कभी यह समाचार छपता कि नरेश दिवाकर को विशेष चुनाव संचालक बनाया गया हैं तो कभी यह प्रकाशित होता था कि चुनाव की कमान जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन थामे हुये हैं। जीत का सेहरा अपने सिर पर बंधाने के लिये जितने भी भाजपा नेता उतावले थे वे सभी अब खुद को बचाते हुये दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ने की जुगत जमाते देखे जा सकते हैं।
जिले में कांग्रेस के इतिहास का सर्वाधिक कलंकित अध्याय-लखनादौन के कांग्रेस के स्थानीय जमीनी कार्यकर्त्ताओं की मेहनत और तमन्नाओं पर एक राजनैतिक फिक्सिंग ने पानी फेर दिया हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि लोस चुनाव में केवलारी से कांग्रेस के हारने और क्षेत्र निर्णायक कलार समाज के वोटों पर मुनमुन राय की पकड़ से चिंतित इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह 2013 के चुनाव के लिये कोई भी खतरा मोल लेना नहीं चाहते थे। इसीलिये हरवंश सिंह ने मुनमुन रा से सांठगांठ करके यह सारा राजनैतिक खेल खेला था। वैसे भी पार्टियां सामान्य तौर पर एक डमी उम्मीदवार का भी फार्म भरातीं हैं ताकि यदि घोषित उम्मीदवार का नामांकन किन्हीं कारणों से चुनाव मैदान से बाहर हो जाये तो डमी उम्मीदवार को चुनाव लड़ाया जा सके। जिले के कद्दावर इंका नेता हरवंश सिंह इस बात से अनभिज्ञ होंगें? इसे कोई भी नहीं मानेगा। इसके बाद भी अध्यक्ष चुनाव से कांग्रेस का प्रत्याशी ना रहना बड़े ही आश्चर्य की बात हैं। वैसे अपने हित के लिये कांग्रेस की बली देना हरवंश सिंह के लिये कोई नयी बात नहीं और यही इस चुनाव में भी हुआ जिसने जिले में कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया हैं।
पूरे प्रदेश में बने इस रिकार्ड एवं जिले में कांग्रेस के इतिहास को सर्वाधिक कलंकित करने वाली इस घटना पर कांग्रेस आलाकमान की कार्यवाही पर राजनैतिक विश्लेषकों की नजरें टिकी हुयी हैं।          
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोने से साभार

लखनादौन नपं के चुनाव में निर्दलीय की जीत से कांग्रेस       और भाजपा के कई नेताओं के चेहरे बेनकाब हो गये 
 प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में हुये नगरीय निकायों के चुनावों में भाजपा को मिली रिकार्ड सफलता ने कांग्रेस के मिशन 2013 को गहरा आघात पहुंचाया हैं। प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी क्षत्रपों के क्षेत्रों के मतदाताओं ने भी इन चुनावों में शिवराज राग अलाप कर उनको कठघरे में खड़ा कर दिया हैं।इस सफलता से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और प्रदेश भाजपा अघ्यक्ष प्रभात झा की बांछें खिल गयीं हैं। प्रदेश के एक और कांग्रेसी क्षत्रप विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के गृह जिले में तो कांग्रेस के इतिहास का सबसे अधिक काला अध्याय इन चुनावों में जुड़ गया हैं जहां कांग्रेस रणछोड़दास बन गयी हैं। मुनमुन हरवंश नूरा कुश्ती के चलते ही ऐसा हो पाना संभव हुआ हैं। लखनादौन के इस चुनाव में पूरी ताकत झोंकने की बात करने वाली भाजपा का पूरी तरह सफाया होना भी राजनैतिक हल्कों में चर्चित हैं।मविप्रा के लाल बत्तीधारी   अध्यक्ष नरेश दिवाकर के अलावा जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन पूरे चुनाव की कमान संभाले हुये थे। जीत का सेहरा अपने सिर बांधने के लिये जितने भी भाजपा नेता उतावले थे वे सब मिलकर अब हार ठीकरा स्थानीय भाजपा विधायक शशि ठाकुर के सिर पर फोड़ने की योजना में जुट गये हैं।इस चुनाव में कांग्रेेस के चुनाव चिन्ह पंजे पर  15 वार्डों में 3226 मतदाताओं ने सील लगाकर वोट दिया था। ऐसे राजनैतिक हालात में अध्यक्ष पद में हुयी नूरा कुश्ती ने कांग्रेस के गढ़ रहे लखनादौन में एक बार फिर से पैर जमाने का मौका कांग्रेस ने गंवा दिया। अब इसके दुष्परिणाम 2013 के विस चुनावों में किस किस क्षेत्र में कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा और किस क्षेत्र में कांग्रेस को लाभ मिलेगा? यह तो विस चुनावों के बाद ही पता चलेगा।
कांग्रेस के क्षत्रपों के इलाके मे भी खिला कमल-प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में हुये नगरीय निकायों के चुनावों में भाजपा को मिली रिकार्ड सफलता ने कांग्रेस के मिशन 2013 को गहरा आघात पहुंचाया हैं। प्रदेश के दिग्गज कांग्रेसी क्षत्रपों के क्षेत्रों के मतदाताओं ने भी इन चुनावों में शिवराज राग अलाप कर उनको कठघरे में खड़ा कर दिया हैं।प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया,केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ, इंका महासचिव दिग्विजय सिंह,पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण यादव के क्षेत्रों में भी मतदाताओं ने कमल खिलाकर सभी को भौंचक कर दिया हैं। इस सफलता से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह और प्रदेश भाजपा अघ्यक्ष प्रभात झा की बांछें खिल गयीं हैं। वैसे तो कहने के लिये ये चुनाव आदिवासी अंचलों में हुये हैं लेकिन वास्तविकता तो यह हैं कि नगरीय क्षत्रों में आदिवासी मतदाताओं की संख्या हर जगह बहुमत में नहीं थी। इसलिये भाजपा का यह मानना कि प्रदेश का आदिवासी मतदाता उनके पक्ष में लामबंद हो गया हैं एक राजनैतिक भूल भी साबित हो सकती हैं। जहां तक प्रदेश के कांग्रेसी क्षत्रपों की बात हैं तो पिछले कई सालों से यह देखा जा रहा हैं कि सभी क्षत्रप अपने समर्थकों को ही कांग्रेस मानकर उनके सौ खून भी माफ करवा कर उन्हें ही मजबूत करने में लगे रहते हैं जिससे कांग्रेस कमजोर होते जा रही हैं। यदि प्रदेश के सभी कांग्रेसी क्षत्रप निष्ठावान एवं समर्पित,प्रताड़ित और उपेक्षित सभी कांग्रेसियों को अपना समर्थक मानकर प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने में जुट जायें तो भाजपा का प्रदेश में डटकर मुकाबला किया जा सकता हैं। अन्यथा सभी क्षत्रप तो चुनाव जीतते जायेंगें और कांग्रेस प्रदेश में ऐसे ही चुनाव हारती जायेगी और यह सिलसिला थमने वाला नहीं हैं।  
हरवंश के जिले में रणछोड़दास बनी कांग्रेस - प्रदेश के एक और कांग्रेसी क्षत्रप विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के गृह जिले में तो कांग्रेस के इतिहास का सबसे अधिक काला अध्याय इन चुनावों में जुड़ गया हैं जहां कांग्रेस रणछोड़दास बन गयी हैं। मुनमुन हरवंश नूरा कुश्ती के चलते ही ऐसा हो पाना संभव हुआ हैं। नगर पंचायत लखनादौन के चुनाव में वही हुआ जिसकी आशंका मुसाफिर अपने इस सियासी सफरनामे में व्यक्त कर चुका था। कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष पद की प्रत्याशी ने अपना नाम ही वापस ले लिया और कांग्रेस मैदान से बाहर हो गयी। इस सांठ गांठ के चलते ही कांग्रेस ने किसी भी उम्मीदवार को अपना समर्थ भी नहीं दिया। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि जब भी प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष,नेता प्रतिपक्ष या भावी मुख्यमंत्री के नामों की चर्चा चलती हैं तो मीडिया में प्रमुखता से हरवंश सिंह का नाम भी सामने आता हैं। ऐसे में उनके गृह जिले में कांग्रेस के लखनादौन जैसे गढ़ रहे इलाके में कांग्रेस एक अदद उम्मीदवार भी तलाश नहीं कर पाने को भला क्या कहा जा सकता हैं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि आजादी के बाद से लेकर 2003 तक लखनादौन विस क्षेत्र कांग्रेस का ऐसा मजबूत किला रहा हैं जिसे ना तो 77 की जनता आंधी और ना ही 1990 की रामलहर भी ढहा नहीं पायी थी। लेकिन पिछले दस पंद्रह साल में कांग्रेसी क्षत्रप हरवंश सिंह की स्वार्थपरक राजनीति के चलते पिछले दो चुनाव से भाजपा यहां से चुनाव जीत रही हैं। लेकिन इस चुनाव में पूर्व अध्यक्ष दिनेश मुनमुन राय की माता जी सुधा राय ने भाजपा को भी धूल चटा दी हैं। इस तरह चुनाव से पहले ही कांग्रेस और चुनाव के बाद भाजपा की भी यहां भद्द पिट गयी हैं। 
फिर चर्चित हुयी हरवंश नरेश नूरा कुश्ती- लखनादौन के इस चुनाव में पूरी ताकत झोंकने की बात करने वाली भाजपा का पूरी तरह सफाया होना भी राजनैतिक हल्कों में चर्चित हैं। अध्यक्ष पद में जहां भाजपा को सिर्फ 1880 वोट मिले वहीं 15 में से सिर्फ तीन पार्षद ही चुनाव जीते हैं। इसमें भी एक मजेदार बात यह हैं कि पूरे पंद्रह वार्डों में भाजपा को जो वोट मिले हैं उससे अध्यक्ष पद की प्रत्याशी को 500 से अधिक कम वोट मिले हैं। उल्लेखनीय हैं कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा और संगठन मंत्री अरविंद मैनन के दौरे भी भाजपा को पार नहीं लगा सकी। इसके अलावा जिले के सभी भाजपा   विधायकों सहित पूरी नेताओं की फौज लगी थी। मविप्रा के लाल बत्तीधारी   अध्यक्ष नरेश दिवाकर के अलावा जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन पूरे चुनाव की कमान संभाले हुये थे। भाजपायी हल्कों में ही इस बात की चर्चा हो रही हैं कि इस चुनाव में कुछ नेताओं ने आने वाले 2013 के विस चुनाव के हिसाब से बिसात बिछायी और निर्दलीय उम्मीदवार से सांठ गांठ कर ली। वैसे भी जिले के इंकाई और भाजपायी हल्कों में हरवंश नरेश नूरा कुश्ती के किस्से बहुत आम रहें हैं। 2008 के चुनाव में भाजपा विधायक नरेश दिवाकर की टिकिट कट जाने से उनके कई समर्थकों ने निर्दलीय मुनमुन राय का चुनाव चिन्ह कप प्लेट अपने हाथ में थाम लिया था। जीत का सेहरा अपने सिर बांधने के लिये जितने भी भाजपा नेता उतावले थे वे सब मिलकर अब हार ठीकरा स्थानीय भाजपा विधायक शशि ठाकुर के सिर पर फोड़ने की योजना में जुट गये हैं।
कांग्रेस का आभार हुआ चर्चित- लखनादौन नपं के चुनाव में जिला कांग्रेस ने अधिकृत विज्ञप्ति जारी कर कांग्रेसी पार्षदों को जिताने और भाजपा को सफाये के लिये मतदाताओं का आभार व्यक्त किया हैं। यह तो कुछ ऐसा ही हुआ कि अपनी दोनों आंख फूट जाने का गम मरने के बजाय सामने वाले की एक आंख फूट जाने की खुशी मनायी जा रही हो। वैसे तो चुनाव के पहले ही एक बैठक लेकर यह प्रस्ताव पास किया गया था कि अपिहार्य कारणों से अध्यक्ष पद के लिये कांग्रेस का उम्मीदवार नहीं हैं इसलिये कार्यकर्त्ता स्वविवेक से निर्णय लेकर तथा पार्षद पद के कांग्रेसी प्रत्याशियों को जितायें तथा भाजपा को हरायें। निर्दलीय उम्मीदवार श्रीमती सुधा राय जो कि पूर्व अध्यक्ष दिनेश मुनमुन राय जी की माताजी हैं जिनसे सांठ गांठ का खुले आरोप हरवंश सिंह पर लग रहे थे उनके बारे में चुप रह कर भाजपा को हराने की इस अपील ने रहा सहा काम भी पूरा कर दिया था। वैसे कांग्रेस ने 15 में से 8 पार्षद जीत कर नगर पंचायत में अपना बहुमत बना लिया हैं। इस चुनाव में कांग्रेेस के चुनाव चिन्ह पंजे पर  15 वार्डों में 3226 मतदाताओं ने सील लगाकर वोट दिया था। ऐसे राजनैतिक हालात में अध्यक्ष पद में हुयी नूरा कुश्ती ने कांग्रेस के गढ़ रहे लखनादौन में एक बार फिर से पैर जमाने का मौका कांग्रेस ने गंवा दिया। अब इसके दुष्परिणाम 2013 के विस चुनावों में किस किस क्षेत्र में कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा और किस क्षेत्र में कांग्रेस को लाभ मिलेगा? यह तो विस चुनावों के बाद ही पता चलेगा।“मुसाफिर“       
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले से साभार

Friday, July 6, 2012


लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? 
तमाम पार्टियों और नेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके लखनादौन नगर पंचायत चुनाव में कई ऐसे राजनैतिक कारनामे हो चुके हैं जिनकी आशंका हम अपने इसी कालम में व्यक्त कर चुके थे। बड़े ही नाटकीय ढंग से इस चुनाव में अध्यक्ष पद के कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव मैदान से बाहर हो गये हैं। जिले के चुनावी इतिहास में शायद यह पहला अवसर हैं जब देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी चुनावी मैदान से बाहर हैं। जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस मामले में चुप्पी    साधे हुये हैं। कांग्रेस द्वारा किये गये इस चमत्कार से भाजपा भी भौंचक रह गयी हैं। मुनमुन समर्थक उनके समर्थन में कई दलों के नेताओं का गुप्त समर्थन हासिल होने का दावा भी कर रहें हैं। ऐसे राजनैतिक हालात में लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने प्रदेश के ऐसे एक दर्जन से अधिक चुनाव क्षेत्र चिन्हित किये हैं जहां से कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हैं और ऐसे क्षेत्रों से युवा नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये हरी झंड़ी दे दी गयी हैं और उन्हें तैयारी चालू करने के निर्देश दे दिये गये हैं। ऐसे चिन्हित क्षेत्रों में सिवनी विस क्षेत्र भी शामिल हैं जहां से युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल को हरी झंड़ी दी गयी हैं।
कांग्रेस के नाम रचा गया नया इतिहास-मुसाफिर पिछले पंद्रह दिनों से सियासी सफर से अलग रहा। अब एक बार फिर सियासी चर्चा करने जा रहा हैं। लेकिन अब तक बैनगंगा नदी से काफी पानी बह चुका है। तमाम पार्टियों और नेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके लखनादौन नगर पंचायत चुनाव में कई ऐसे राजनैतिक कारनामे हो चुके हैं जिनकी आशंका हम अपने इसी कालम में व्यक्त कर चुके थे। बड़े ही नाटकीय ढंग से इस चुनाव में अध्यक्ष पद के कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव मैदान से बाहर हो गये हैं। जिले के चुनावी इतिहास में शायद यह पहला अवसर हैं जब देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी चुनावी मैदान से बाहर हैं। जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस मामले में चुप्पी साधे हुये हैं। जबकि शुरू से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पूर्व अध्यक्ष दिनेश मुनमुन राय से अपनी राजनैतिक सांठ गांठ के चलते इस चुनाव में भी हरवंश सिंह उनके सहयोगी और संरक्षक की भूमिका में दिखेंगें लेकिन किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि कांग्रेस चुनाव मैदान से ही बाहर हो जायेगी। हालांकि जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी ने कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी को नाम वापस लेने के कारण पार्टी से छः साल के लिये निष्कासित कर दिया हैं और कहा हैं कि मामले की जांच की जायेगी और फिर आगे कार्यवाही की जायेगी। लेकिन कौन और कब जांच करेगा? इसका खुलासा आज तक नहीं हुआ हैं जबकि 5 जुलाई को चुनाव भी हो जायेंगें। मीडिया में यह भी प्रकाशित हुआ कि प्रदेश इंकाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह खुद लखनादौन दौरे पर इन चुनावों के लिये आये थे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष पद एक प्रत्याशी भी नहीं खड़ा कर पायी। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उक्त दोनों नेताओं के दौरे के समय भी इंका विधायक हरवंश सिंह मौजूद नहीं थे। पूरे प्रदेश में ऐसा कारनामा सिर्फ सिवनी जिले में ही हुआ हैं जहां की कमान पिछले पंद्रह सालों से इंका विधायक हरवंश सिंह के हाथों में हैं जो कि प्रदेश के एक कद्दावर नेता माने जाते हैं। अब इस कारनामें के बारे में प्रदेश नेतृत्व या आलाकमान उनसे कोई सवाल जवाब भी करेगा या नहीं? इसे लेकर इंकाई हल्कों में चर्चा जारी हैं क्योंकि हरवंश सिंह ने जब जब पार्टी को चुनाव में नुकसान पहुचाया हैं तब तब वे और भी अधिक ताकतवर होकर उभरे हैं। इसलिये यह कयास लगाये जा रहें हैं कि मिशन 2013 और 2014 को लक्ष्य बनाकर चल रही कांग्रेस क्या इस बार चुनावी मैदान से कांग्रेस के बाहर हो जाने का इतिहास बनाने पर उन्हें दंड़ित किया जायेगा या एक बार फिर पुरुस्कृत किया जायेगा?
भाजपा के नेताओं ने कसी कमर-कांग्रेस द्वारा किये गये इस चमत्कार से भाजपा भी भौंचक रह गयी हैं।जिला भाजपा ने अपने उम्मीदवार तो तय कर ही लिये थे लेकिन बहुत पहले से ही जिले के कई वरिष्ठ नेताओं सहित जनप्रतिनिधियों को भी प्रभार सौंप दिया हैं।सांसद फगग्नसिंह कुलस्ते, प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविंद मैनन और अध्यक्ष प्रभात झा भी दौरा कर चुके हैं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का दौरा यहां नहीं हो रहा हैं। पूर्व नपं अध्यक्ष मुनमुन राय अपनी माताजी के पक्ष में अपने समय में किये गये विकास कार्यों को मुद्दा बना रहें हैं। इसके अलावा उनके समर्थन में कई दलों के नेताओं का गुप्त समर्थन हासिल होने का दावा भी उनके समर्थक कर रहें हैं। राजनैतिक हल्कों में जारी चर्चाओं के अनुसार इसका प्रमुख कारण सिवनी विधानसभा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मुनमुन राय का चुनाव लड़ते समय की राजनैतिक परिस्थितियां बतायी जा रहीं हैं। उल्लेखनीय हैं कि 2008 के विस चुनाव में भाजपा ने अपने दो बार के विधायक रहने वाले सिटिंग विधायक नरेश दिवाकर की टिकिट काट कर सांसद नीता पटेरिया को उम्मीदवार बनाया था। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी कई दावेदारों के दावों को खारिज कर प्रसन्न मालू को अंतिम समय में अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। ऐसे हालात में निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले मुनमुन राय को दोनों ही पार्टियों के असंतुष्टों का सहयोग मिला था और कई नामधारी छोटे और बड़े इंका तथा भाजपा के नेताओं ने अपने हाथों में अपनी अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह छोड़कर कप बसी थाम ली थी जो कि मुनमुन राय का चुनाव चिन्ह थी। ऐसे राजनैतिक हालात में लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। जहां तक पार्टियों के समर्पित कार्यकर्त्ताओं का सवाल हैं  तो कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्त्ताओं में तो इस बात का आक्रोश हैं कि एक राजनैतिक नूरा कुश्ती के चलते अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ही मैदान से हट गये हैं। भाजपा का समर्पित कार्यकर्त्ता तो जिताने में लगा हुआ हैं लेकिन उसके मन में भी यही आशंका है कि मिशन 2013 के विस चुनावों को लेकर अभी से कोई फिक्सिंग जिले के बड़े नेताओं की ना हो जाये। रहा सवाल क्षेत्रीय भाजपा विधायक शशि ठाकुर का तो उनके लिये यह चुनाव जीतना अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से भाजपा करीब 23 हजार वोटों से हार गयी थी। वैसे यह बात भी बिल्कुल सही हैं कि यदि भाजपा जीतती हैं तो सेहरा बांधने के लिये कई सिर हाजिर हैं और यदि हार जाती हैं तो ठीकरा फोड़ने कि लिये शशि ठाकुर का सिर तो हाजिर ही हैं।
राहुल गांधी ने हरी झंड़ी दी राजा बघेल को?- स्थानीय अखबारों में प्रकाशित समाचार के अनुसार कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने ऐसे 12 चुनाव क्षेत्र चिन्हित किये हैं जहां से कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हैं और ऐसे क्षेत्रों से युवा नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये हरी झंड़ी दे दी गयी हैं और उन्हें तैयारी चालू करने के निर्देश दे दिये गये हैं। समाचार में उल्लेख किया गया हैं कि ऐसे चिन्हित क्षेत्रों में सिवनी विस क्षेत्र भी शामिल हैं जहां से युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल को हरी झंड़ी दी गयी हैं। इस समाचार में राहुल गांधी के साथ एक फोटो भी प्रकाशित हुआ है जिसमें राजा बघेल भी दिखायी दे रहें हैं। यह समाचार प्रदेश के एक प्रतिष्ठित अखबार के हवाले से प्रकाशि किया गया हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच चुनावों से बरघाट एवं सिवनी विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव हार रही हैं। सन 1977 में भी सिवनी विस क्षेत्र से जीतने वाली कांग्रेस की हार की शुरुआत 1990 में हुयी थी जब कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हरवंश सिंह चुनाव हारे थे। इसके बाद 93 और 98 के चुनाव में आशुतोष वर्मा, 2003 में राजकुमार पप्पू खुराना और 2008 के चुनाव में प्रसन्न मालू कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव हारे थे। मिशन 2013 में ऐसे क्षेत्रों को फतह करने की कांग्रेस की रणनीति और उन पर युवा प्रत्याशी को हरी झंड़ी देने की योजना पर इंकाइयों में अलग अलग किस्म की चर्चायें चल रही हैं। “मुसाफिर”      
दर्पण झूठ ना बोले से साभार

लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? 
तमाम पार्टियों और नेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके लखनादौन नगर पंचायत चुनाव में कई ऐसे राजनैतिक कारनामे हो चुके हैं जिनकी आशंका हम अपने इसी कालम में व्यक्त कर चुके थे। बड़े ही नाटकीय ढंग से इस चुनाव में अध्यक्ष पद के कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव मैदान से बाहर हो गये हैं। जिले के चुनावी इतिहास में शायद यह पहला अवसर हैं जब देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी चुनावी मैदान से बाहर हैं। जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस मामले में चुप्पी    साधे हुये हैं। कांग्रेस द्वारा किये गये इस चमत्कार से भाजपा भी भौंचक रह गयी हैं। मुनमुन समर्थक उनके समर्थन में कई दलों के नेताओं का गुप्त समर्थन हासिल होने का दावा भी कर रहें हैं। ऐसे राजनैतिक हालात में लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने प्रदेश के ऐसे एक दर्जन से अधिक चुनाव क्षेत्र चिन्हित किये हैं जहां से कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हैं और ऐसे क्षेत्रों से युवा नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये हरी झंड़ी दे दी गयी हैं और उन्हें तैयारी चालू करने के निर्देश दे दिये गये हैं। ऐसे चिन्हित क्षेत्रों में सिवनी विस क्षेत्र भी शामिल हैं जहां से युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल को हरी झंड़ी दी गयी हैं।
कांग्रेस के नाम रचा गया नया इतिहास-मुसाफिर पिछले पंद्रह दिनों से सियासी सफर से अलग रहा। अब एक बार फिर सियासी चर्चा करने जा रहा हैं। लेकिन अब तक बैनगंगा नदी से काफी पानी बह चुका है। तमाम पार्टियों और नेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके लखनादौन नगर पंचायत चुनाव में कई ऐसे राजनैतिक कारनामे हो चुके हैं जिनकी आशंका हम अपने इसी कालम में व्यक्त कर चुके थे। बड़े ही नाटकीय ढंग से इस चुनाव में अध्यक्ष पद के कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव मैदान से बाहर हो गये हैं। जिले के चुनावी इतिहास में शायद यह पहला अवसर हैं जब देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी चुनावी मैदान से बाहर हैं। जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस मामले में चुप्पी साधे हुये हैं। जबकि शुरू से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पूर्व अध्यक्ष दिनेश मुनमुन राय से अपनी राजनैतिक सांठ गांठ के चलते इस चुनाव में भी हरवंश सिंह उनके सहयोगी और संरक्षक की भूमिका में दिखेंगें लेकिन किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि कांग्रेस चुनाव मैदान से ही बाहर हो जायेगी। हालांकि जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी ने कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी को नाम वापस लेने के कारण पार्टी से छः साल के लिये निष्कासित कर दिया हैं और कहा हैं कि मामले की जांच की जायेगी और फिर आगे कार्यवाही की जायेगी। लेकिन कौन और कब जांच करेगा? इसका खुलासा आज तक नहीं हुआ हैं जबकि 5 जुलाई को चुनाव भी हो जायेंगें। मीडिया में यह भी प्रकाशित हुआ कि प्रदेश इंकाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह खुद लखनादौन दौरे पर इन चुनावों के लिये आये थे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष पद एक प्रत्याशी भी नहीं खड़ा कर पायी। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उक्त दोनों नेताओं के दौरे के समय भी इंका विधायक हरवंश सिंह मौजूद नहीं थे। पूरे प्रदेश में ऐसा कारनामा सिर्फ सिवनी जिले में ही हुआ हैं जहां की कमान पिछले पंद्रह सालों से इंका विधायक हरवंश सिंह के हाथों में हैं जो कि प्रदेश के एक कद्दावर नेता माने जाते हैं। अब इस कारनामें के बारे में प्रदेश नेतृत्व या आलाकमान उनसे कोई सवाल जवाब भी करेगा या नहीं? इसे लेकर इंकाई हल्कों में चर्चा जारी हैं क्योंकि हरवंश सिंह ने जब जब पार्टी को चुनाव में नुकसान पहुचाया हैं तब तब वे और भी अधिक ताकतवर होकर उभरे हैं। इसलिये यह कयास लगाये जा रहें हैं कि मिशन 2013 और 2014 को लक्ष्य बनाकर चल रही कांग्रेस क्या इस बार चुनावी मैदान से कांग्रेस के बाहर हो जाने का इतिहास बनाने पर उन्हें दंड़ित किया जायेगा या एक बार फिर पुरुस्कृत किया जायेगा?
भाजपा के नेताओं ने कसी कमर-कांग्रेस द्वारा किये गये इस चमत्कार से भाजपा भी भौंचक रह गयी हैं।जिला भाजपा ने अपने उम्मीदवार तो तय कर ही लिये थे लेकिन बहुत पहले से ही जिले के कई वरिष्ठ नेताओं सहित जनप्रतिनिधियों को भी प्रभार सौंप दिया हैं।सांसद फगग्नसिंह कुलस्ते, प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविंद मैनन और अध्यक्ष प्रभात झा भी दौरा कर चुके हैं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का दौरा यहां नहीं हो रहा हैं। पूर्व नपं अध्यक्ष मुनमुन राय अपनी माताजी के पक्ष में अपने समय में किये गये विकास कार्यों को मुद्दा बना रहें हैं। इसके अलावा उनके समर्थन में कई दलों के नेताओं का गुप्त समर्थन हासिल होने का दावा भी उनके समर्थक कर रहें हैं। राजनैतिक हल्कों में जारी चर्चाओं के अनुसार इसका प्रमुख कारण सिवनी विधानसभा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मुनमुन राय का चुनाव लड़ते समय की राजनैतिक परिस्थितियां बतायी जा रहीं हैं। उल्लेखनीय हैं कि 2008 के विस चुनाव में भाजपा ने अपने दो बार के विधायक रहने वाले सिटिंग विधायक नरेश दिवाकर की टिकिट काट कर सांसद नीता पटेरिया को उम्मीदवार बनाया था। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी कई दावेदारों के दावों को खारिज कर प्रसन्न मालू को अंतिम समय में अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। ऐसे हालात में निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले मुनमुन राय को दोनों ही पार्टियों के असंतुष्टों का सहयोग मिला था और कई नामधारी छोटे और बड़े इंका तथा भाजपा के नेताओं ने अपने हाथों में अपनी अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह छोड़कर कप बसी थाम ली थी जो कि मुनमुन राय का चुनाव चिन्ह थी। ऐसे राजनैतिक हालात में लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। जहां तक पार्टियों के समर्पित कार्यकर्त्ताओं का सवाल हैं  तो कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्त्ताओं में तो इस बात का आक्रोश हैं कि एक राजनैतिक नूरा कुश्ती के चलते अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ही मैदान से हट गये हैं। भाजपा का समर्पित कार्यकर्त्ता तो जिताने में लगा हुआ हैं लेकिन उसके मन में भी यही आशंका है कि मिशन 2013 के विस चुनावों को लेकर अभी से कोई फिक्सिंग जिले के बड़े नेताओं की ना हो जाये। रहा सवाल क्षेत्रीय भाजपा विधायक शशि ठाकुर का तो उनके लिये यह चुनाव जीतना अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से भाजपा करीब 23 हजार वोटों से हार गयी थी। वैसे यह बात भी बिल्कुल सही हैं कि यदि भाजपा जीतती हैं तो सेहरा बांधने के लिये कई सिर हाजिर हैं और यदि हार जाती हैं तो ठीकरा फोड़ने कि लिये शशि ठाकुर का सिर तो हाजिर ही हैं।
राहुल गांधी ने हरी झंड़ी दी राजा बघेल को?- स्थानीय अखबारों में प्रकाशित समाचार के अनुसार कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने ऐसे 12 चुनाव क्षेत्र चिन्हित किये हैं जहां से कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हैं और ऐसे क्षेत्रों से युवा नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये हरी झंड़ी दे दी गयी हैं और उन्हें तैयारी चालू करने के निर्देश दे दिये गये हैं। समाचार में उल्लेख किया गया हैं कि ऐसे चिन्हित क्षेत्रों में सिवनी विस क्षेत्र भी शामिल हैं जहां से युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल को हरी झंड़ी दी गयी हैं। इस समाचार में राहुल गांधी के साथ एक फोटो भी प्रकाशित हुआ है जिसमें राजा बघेल भी दिखायी दे रहें हैं। यह समाचार प्रदेश के एक प्रतिष्ठित अखबार के हवाले से प्रकाशि किया गया हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच चुनावों से बरघाट एवं सिवनी विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव हार रही हैं। सन 1977 में भी सिवनी विस क्षेत्र से जीतने वाली कांग्रेस की हार की शुरुआत 1990 में हुयी थी जब कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हरवंश सिंह चुनाव हारे थे। इसके बाद 93 और 98 के चुनाव में आशुतोष वर्मा, 2003 में राजकुमार पप्पू खुराना और 2008 के चुनाव में प्रसन्न मालू कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव हारे थे। मिशन 2013 में ऐसे क्षेत्रों को फतह करने की कांग्रेस की रणनीति और उन पर युवा प्रत्याशी को हरी झंड़ी देने की योजना पर इंकाइयों में अलग अलग किस्म की चर्चायें चल रही हैं। “मुसाफिर”      
दर्पण झूठ ना बोले से साभार

अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहें हैं हरवंश?
लखनादौन नपं में कैसे गायब हुआ अध्यक्ष पद का कांग्रेस प्रत्याशी ?
हर बार पार्टी को नुकसान पहुचाने के बाद पाया नया मुकाम 
लखनादौन। नपं चुनाव में कांग्रेस के गढ़ रहे इस इलाके में अध्यक्ष के चुनाव से उसका बाहर होना ना केवल आश्चर्यजनक हैं वरन शर्मनाक भी हैं।पिछले कुछ सालों से पार्टी को होने वाले नुकसान के लिये हरवंश सिंह पर आरोप लगते रहें हैं और हर बार पार्टी को नुकसान होने के बाद भी नया मुकाम हासिल कर वे करारा जवाब भी देते रहें हैं। इस चुनाव में कांग्रेस ने एक नया इतिहास ही बना डाला हैं। राजनैतिक हल्कों में चर्चा है कि इसके बाद उन्हें कौन सा मुकाम हासिल होता हैं?
इस चुनाव के राजनैतिक समीकरणों के तार 2008 के विधानसभा चुनावों से जुड़े हुये हैं। पचौरी समर्थक कांग्रेस प्रत्याशी प्रसन्न मालू के खिलाफ दिनेश मुनमुन राय निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे। पहले चर्चा थी कि वे केवलारी से हरवंश सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ेंगें लेकिन अचानक ही क्षेत्र बदल गया था। क्षेत्र अधिकांश हरवंश समर्थकों ने खुल कर मुनमुन का साथ दिया था। इन सब बातों की प्रत्याशी ने नामजद शिकायत की थी और कुछ को पार्टी से नोटिस भी मिले थे लेकिन बाद में सब ना केवल रफ दफा हो गया वरन कई ऐसे नेताओं को पुरुस्कृत भी किया गया। मिशन 2013 को ध्यान में रखते हुये अपने क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिये ही लखनादौन नपं के चुनाव में ऐसा कमाल किया गया कि कांग्रेस मैदान से ही बाहर हो गयी और मुनमुन राय की माता जी सुधा राय की राह आसान हो गयी।
हरवंश द्वारा भीतरघात कर पुरुस्कृत होने का सिलसिला 1990 से जारी है:- कांग्रेस की चुनावी राजनीति में हरवंश सिंह को 1990 के विस चुनाव में पहला मौका मिला था। इस चुनाव में केवलारी से विमला वर्मा और घंसौर से उर्मिला सिंह प्रत्याशी थी और तीन बार के विधायक रहे सत्येन्द्र सिंह के बदले उनके पुत्र रणधीर सिंह लखनादौन से चुनाव लड़ रहे थे। केवलारी और घंसौर में भीतरघात के आरोप लगे और प्रदेश में कांग्रेस तथा खुद के चुनाव हार जाने के बाद भी हरवंश सिंह प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री बन गये थेे।
पहली बार विधायक बने हरवंश अपवाद स्वरूप कबीना मंत्री बने 1993 में:-सिवनी से हारने के बाद केवलारी से चुनाव लड़ने वाले हरवंश सिंह पर 1993 के विस चुनावों में भी सिवनी विस में भीतरघात के आरोप लगे थे। प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद पहली बार विधायक बनने के बाद भी हरवंश सिंह अपवाद के रूप में     सीधे कबीना मंत्री बन गये थे।
1996 के लोस चुनाव में विरोध के बाद गृह मंत्री बने हरवंश:-नरसिंहा राव के प्रधानमंत्री रहते हुये 1996 के लोस चुनाव सिवनी क्षेत्र से कु. विमला वर्मा चुनाव लड़ रहीं थीं। निर्दलीय आदिवासी प्रत्याशी शोभाराम भलावी को लाभ पहुचाने का आरोप हरवंश सिंह पर लगा था। शिकायत प्रामणित होने पर प्रदेश के चार मंत्रियों की सदस्यता निलंबित कर दी गयी थी। जिनमें हरवंश सिंह भी शामिल थे। लेकिन शहीद होने वाले मंत्रियों की सूची में ना केवल वे बच गये थे वरन कुछ समय बाद वे प्रदेश के गृह मंत्री बन गये थे। 
1998 के चुनाव में आरोपों के बावजूद 18 महीनों बाद मंत्री बने हरवंश:-चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवारों को भीतरघात कर नुकसान पहुंचाने का सिलसिला जारी ही रहा। इस चुनाव में सिवनी,बरघाट और लखनादौन विस क्षेत्र में हरवंश सिंह पर आरोप लगे थे। इस चुनाव में क्रमशः आशुतोष वर्मा,,महेश मिश्रा और रणधीर सिंह प्रत्याशी थे। इन तीनों ही क्षेत्रों में कांग्रेस के बागी उम्मीदवार हरवंश समर्थक ही थे। पार्टी सिवनी और बरघाट क्षेत्र से तो हार ही गयी लेकिन ले दे कर कुछ वोटों से रणधीर सिंह जीत गये थ। इस बार हरवंश सिंह को 18 महीनों तक मंत्री मंड़ल से बाहर रहना पड़ा लेकिन इसके बाद वे एक बार फिर मंत्री बन गये।
2003 के विस चुनाव में भीतरघात के बाद भी बने प्रदेश इंका उपाध्यक्ष:-इन विधानसभा चुनावों में सिवनी के कांग्रेस प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना और घंसौर की उर्मिला सिंह ने भी हार के लिये हरवंश सिंह को जवाबदार ठहराया था। लेकिन तमाम आरोपों और शिकायतों के बाद भी हरवंश सिंह प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष बनने में कामयाब हो गये थे।
2008 के विस चुनाव एक मात्र     इंका विधायक बनने वाले हरवंश बने विस उपाध्यक्ष:-भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुये 2008 के चुनाव में हरवंश सिंह ने अपनी सीट जीतने के लिये शेष सीटों पर भाजपा की राह आसान की थी। इसके लिये कई भाजपा नेताओं से सांठगांठ की बातें तो भाजपायी भी करते देखे जा सकते हैं। सिवनी और लखनादौन के कांग्रेस प्रत्याशी प्रसन्न मालू और शोभाराम भलावी ने भी खुले आम आरोप लगाये थे।सिवनी क्षेत्र में तो हरवंश समर्थ कांग्रेस नेताओं ने खुले आम निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश मुनमुन राय का काम किया था और वे लगभग 30 हजार वोट लेकर दूसरे नंबंर पर रहे थें और कांग्रेस तीसरे स्थान पर जाकर अपनी जमानत भी नहीं बचा पायी थी। लेकिन इन सबसे परे हरवंश सिंह एक बार फिर पुरुस्कृत होने में कामयाब हो गये और उन्हें राज्य मंत्री के दर्जे के साथ विधानसभा का उपाध्यक्ष बना दिया गया और वे भाजपा के राज में भी लाल बत्ती का सुख भोग रहें हैं। 
लोस चुनाव के कारनामे भी हुये नजर अंदाजः-पिछले 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार कल्याणी पांड़े और बसोरी सिंह मसराम भी हरवंश सिंह के गृह क्षेत्र केचलारी तक से चुनाव नहीं जीत पाये थे। जबकि मात्र कुछ ही महीनों पहले हुये विध्ररनसभा चुनावों 2003 और 2008 में हरवंश सिंह अच्छे वोटों से जीत कर कांग्रेस के     विधायक बने थे। केवलारी विस क्षेत्र यदि कांग्रेस का गढ़ है और वहां से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप हरवंश सिंह लगातार चार चुनाव जीत रहें हैं तो फिर ऐसा क्या हो जाता हैं कि कांग्रेस लोक सभा चुनावों में इसी क्षेत्र से हार जाती हैं? राजनैतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि ना सिर्फ केवलारी वरन पूरे जिले में जितनी कांग्रेस कमजोर हुयी हैं उतने ही हरवंश सिंह मजबूत हुये हैं। जिले के समर्पित और निष्ठावान उपेक्षित कार्यकर्त्ता इन सब बातों से दुखी तो जरूर है लेकिन कोई विकल्प ना होने कारण खामोश हो गये हैं। 
खुद के साथ भीतरघातियों को भी उपकृत कराते हैं हरवंश-जिले की कांग्रेसी राजनीति में एक खास बात और यह रही हैं कि हरवंश सिंी के निर्देश पर पार्टी को नुकासान पहुवाने वाले कांग्रेस नेताओं को वे उपकृत करने से भी पीछे नहीं हटते हैं। कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले तीन नेताओं बेनीराम परते, भोयाराम चौधरी और शोभाराम भलावी को कांग्रेस से विधानसभा चुनाव की टिकिट तक दिला दी थी। पार्टी में पद देकर उपकृत करने वाले नेताओं की फेहरिस्त तो काफी लंबी हैं।
कांग्रेस के इतिहास का सबसे काला अध्याय-आजादी के बाद से 2008 तक हर राजनैतिक तूफान झेल कर भी कांग्रेस का परचम फहराने वाले लखनादौन क्षेत्र में नगर पंचायत चुनाव में अध्यक्ष पद के लिये उसका प्रत्याशी चुनाव मैदान में होना कांग्रेस का सबसे काला अध्याय हैं। यह भी एक ओपन राजनैतिक सीक्रेट हैं कि ऐसा क्यों और किसकी मेहरबानी से यहसब कुछ हुआ? राजनैतिक क्षेत्रों में इस बात को लेकर उत्सुकता हैं हर बार कांग्रेस को नुकसान पहुचा कर ऊंचे पायदान पर पहुंचने वाले हरवंश सिंह इस बार किस मुकाम पर पहुंचते हैं?

साप्ताहिक दर्पर्ण झूठ ना बोले से साभार