Wednesday, October 2, 2013

गांधीगिरी दिखाकर कांग्रेसियों ने शिवराज से पूछे सवाल
सवनी । आज सुबह मु यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जब उर्दू स्कूल में आयोजित आदिवासी सम्मेलन में शामिल होने पहुंच रहे थे उसके पूर्व ही कांग्रेसियों ने अपनी पूर्व घोषणा अनुसार बस स्टेंड में खड़े होकर मुख्यमंत्री को उनके द्वारा की गई अब तक की घोषणाओं का स्मरण पत्र सौंपने का कार्यक्रम निश्चित किया था। कहीं कोई अप्रिय स्थिति न बने इस हेतु कांग्रेस के जमावड़े को देखकर एसडीओपी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पुलिस बल यहां आ गया और एसडीओपी द्वारा कांग्रेसियों को यहां से हटने की समझाईश दी गई लेकिन इंका कार्यकर्ता इसके लिये तैयार नहीं हुये। आखिरकार जैसे ही मुख्यमंत्री का काफिला कार्यक्रम स्थल के लिये यहां पहुंचा तो पुलिस बल ने कांग्रेसियों के समक्ष अपनी दीवार खड़ी कर दी।
इस स्थति को देख मुख्यमंत्री स्वयं रूके और उन्होंने वाहन से उतरकर कांग्रेस के प्रमुख प्रतिनिधियों से वह स्मरण पत्र लिया। जिसमें कांग्रेस के द्वारा दस प्रमुख मांगों का उल्लेख किया गया। इनमें पहली मांग जिले को संभाग का दर्जा देना, दूसरा मेडीकल कालेज तीसरा नर्सिंग कॉलेज तथा लखनादौन अस्पताल का उपनयन, दो आकाशवाणी केन्द्र, छपारा और केवलारी को नगर पंचायत का दर्जा, पलारी में उप तहसील, कान्हीवाड़ा में पूर्ण तहसील एवं उसे विकासखंड बनाना, जिले को प्रदेश में नंबर एक बनाना, फोरलेन के रूके कार्य को पूरा कराना, सिवनी को मॉडल नगर बनाना और दल सागर तालाब को रमणीक स्थल बनाना शामिल हैं।
अंत में सौंपे गये स्मरण पत्र में उल्लेख है कि उक्त स्थितियों के चलते जब आपने सिवनी नगर को कोरी घोषणाओं के अलावा कुछ नहीं दिया तो यहां की जनता आपको अपना आर्शीवाद क्यों दे?
स्मरण पत्र सौंपते समय जिला       अध्यक्ष हीरा आसवनी एवं नगर अध्यक्ष इमरान पटेल ने मुख्यमंत्री से कहा कि आपकी कोई भी घोषणा अब तक पूरी नहीं हुई है तो  गुलाब का फूल लेते हुये मुस्कुराकर मुख्यमंत्री ने जवाब दिया कि जनाब आप निश्चिंत रहें सारी घोषणाएं पूरी होंगी। मुख्यमंत्री जब आगे बढऩे लगे तो कांग्रेसियों ने जमकर नारेबाजी की। इस अवसर पर जिला इंका अध्यक्ष हीरा आसवानी, वरिष्ठ नेता आशुतोश वर्मा, नेहा सिंह, पप्पू खुराना, असलम खान, ठा. रजनीश सिंह, जिला पंचायत के अध्यक्ष मोहनसिंह चंदेल,जकी अनवर,फिरोज खॉन, शिव सनोडिया, सुरेन्द्र करोसिया, सोहेल अलवी,,  सुबोध मालू,सुनील संजय बघेल, सोहेल पाशा, आनंद व संतोष पंजवानी, शाहिद खान सहित अन्य इंका के लोग उपस्थित थे।

साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
1 अक्टूबर 2013 से साभार

Wednesday, September 25, 2013

आडवानी का मोदी विरोध महज एक दिखावा या संघ की रणनीति
भारतीय जनता पार्टी के पितृ पुरुष माने जाने वाले लालकृष्ण आडवानी के विरोध को दो बार दर किनार करके नरेन्द्र मोदी को पहले चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और फिर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना क्या उतना ही सहज सरल और पारदर्शी है, जितना दिखायी दे रहा है या फिर पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और है? क्या भाजपा में संघ के आर्शीवाद से उदारवादी अटलबिहारी वाजपेयी और हिन्दूवादी लालकृष्ण आडवानी की जोड़ी को सुनियोजित तरीके से अब उदारवादी लालकृष्ण आडवानी और हिन्दूवादी नरेन्द्र मोदी के रूप में बदला जा रहा है? ये यक्ष प्रश्न आज देश के राजनैतिक क्षितिज में उत्सुकता के साथ चर्चित है।
स्मरणीय है कि सन 1977 में भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ था। जनता पार्टी की पहली गैर कांग्रेसी केन्द्र सरकार में अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी दोनों ही मंत्री बने थे। लेकिन जनता पार्टी की सरकार के मात्र ढ़ाई साल में गिर जाने का कारण भी इसमें शामिल समाजवादी दलों के नेताओं द्वारा जनता पार्टी और आर.एस.एस. की दोहरी सदस्यता का मसला ही था। इसके बाद पूर्व जनसंघ घटक के नेताओं ने एक अलग पार्टी बनायी जिसका नाम भारतीय जनता पार्टी रखा गया। केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी दूसरी गैर कांग्रेसी सरकार भी भाजपा के बाहरी समर्थन से बनी थी। इस दौरान भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी राम रथ पर सवार होकर  सोमनाथ से अयोध्या की यात्रा पर राम मंदिर के मुद्दे को लेकर निकल पड़े थे। यह वाकया भी कम रोचक नहीं है कि जब मीडिया ने इस पर अटल जी से आगे की रणनीति पर टिप्पणी मांगी थी तो अटल जी ने यह कहा था कि ये तो शेर की सवारी है आगे जो भी करेगा वो शेर ही करेगा। बिहार में लालू यादव द्वारा रथ यात्रा को रोककर आडवानी को गिरफ्तार कर लिया तो भाजपा के समर्थन वापस लेने से केन्द्र की दूसरी गैर कांग्रेसी सरकार भी गिर गयी थी।
भाजपा के गठन से ही निरंतर कुछ ऐसे राजनैतिक घटनाक्रम होते गये कि अटल जी एक उदारवादी नेता के रूप में उभरे तो दूसरी ओर आडवानी जी की छवि एक हिन्दूवादी नेता की बनती रही।  अतीत के इस दौर में संघ चट्टान की तरह आडवानी जी के पीछे खड़ा दिखायी देता था। अटल आडवानी की इस जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा ने केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व में सरकार बनायी और आडवानी जी गृह मंत्री बने। इस दौर में उन्हें लोह पुरुष का दर्जा भी भाजपा में दिया गया। जबकि आडवानी के गृह मंत्री रहते हुये ही काश्मीर के कट्टरपंथी आतंकवादियों को विदेश मंत्री जसवंत सिंह कांधांर तक छोड़ कर आये थे। हालांकि इस दौरान अटल आडवानी द्वारा की जाने वाली रोजा अफ्तार की दावतें भी बहुत चर्चित रहती थीं। एन.डी.ए. के ऐजेन्डे में राम मंदिर का मुद्दा ना होने को कारण बता कर भाजपा ने इससे भी किनारा कर लिया था। 
अस्वस्थ हो जाने के कारण देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से दूर हो गये। ऐसे में देश की राजनीति की मांग के अनुरूप भाजपा और संघ को अटल जी के बदले एक उदारवादी चेहरे की आवश्यकता थी। ऐसा माना जा सकता है कि इसकी सुनियोजित शुरुआत उस वक्त हुयी जब पाकिस्तान के दौरे पर गये देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी ने जिन्ना की मजार पर जाकर फूल चढ़ाये। संघ ने इसका भारी विरोध किया जिससे आडवानी की धर्म निरपेक्ष छवि बनना प्रारंभ हुई। दूसरी तरफ गुजरात के गोधरा कांड़ के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कट्टरवादी हिन्दू नेता के रूप में उभर कर सामने आ गये। हालाकि गोधरा कांड़ के बाद अटल जी ने मोदी राजधर्म निभाने की सलाह तो दी लेकिन कोई कठोर कार्यवाही नहीं की थी। गुजरात में तीसरी पारी खेलने के बाद मोदी के व्यक्तित्व को संघ के इशारे पर विशाल रूप में प्रचारित किया गया।
संघ ने मोदी पर दांव लगाने का फैसला किया और उन्हें चुंनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित करने के लिये भाजपा पर दवाब बनाया। लेकिन आडवानी इस वक्त मोदी की घोषणा के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि नवम्बर 2013 में राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद यह घोषणा की जाये। अपने मोदी विरोध के चलते आडवानी गोवा में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुये। लेकिन उनके विरोध को दरकिनार करते हुये संघ के दवाब में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित कर दिया। इससे नाराज आडवानी ने भाजपा में अपने सभी पदों से स्तीफा दे दिया था जिसे चंद दिनों बाद ही वापस भी ले लिया। हाल ही में नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया। आडवानी इस बार भी इस पक्ष में नहीं थे कि यह घोषणा अभी की जाये। अपने विरोध के चलते इस बार भी आडवानी भाजपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में नहीं गये लेकिन संघ के दवाब में भाजपा ने आडवानी के विरोध को एक बार फिर दरकिनार करते हुये मोदी की घोषणा कर डाली। अपनी नाराजगी के बाद भी आडवानी ने दो दिन बाद ही छत्तीसगढ़ केे एक शासकीय समारोह में अपने भाषण में मोदी की जमकर तारीफ कर डाली। आडवानी का रूठना और मानना भी कहीं ऐसा ही तो नहीं है जैसे अटल जी ने मोदी को राज धर्म निभाने की सलाह देकर चुप्पी साध ली थी। शायद इीलिये अब यह धारणा बन गयी है कि संध आडवानी की धर्म निरपेक्ष छवि बनाये रखने के लिये उनका दिखावटी विरोध कर रहा है।
ऐसे हालात में यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि क्या आडवानी जैसा एक अत्यंत अनुभवी और उम्रदराज नेता एक ही गलती बार बार दोहरा सकता है? क्या आडवानी के मोदी विरोध को दरकिनार करने का साहस भाजपा ने इसलिये किया कि वो यह जानती थी कि ये विरोध महज एक दिखावा है? मोदी को लेकर दो बार दर्ज कराये गये अपने विरोध के चलते आडवानी अल्पसंख्यकों में यह संदेश देने में तो सफल हो गये कि वे उनके हित चिंतक है। ऐसा करके उन्होंने उनके उदारवादी नेता की छवि में तो इजाफा कर ही लिया है। इन्हीं सारे तथ्यों को देखते हुये ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि आडवानी का मोदी विरोध संघ की एक सुनियोजित रणनीति का ही हिस्सा था। संघ की यह योजना बहुत हद तक सफल भी रही कि जिस तरह भाजपा में अटलबिहारी वाजपेयी की उक उदारवादी नेता की छवि थी वैसे स्वरूप में अब आडवानी आ गये है और कट्टरवादी हिन्दू नेता के रूप में आडवानी की जगह नरेन्द्र मोदी ने ले ली है। इस तरह संघ अटल आडवानी की जोड़ी को आडवानी मोदी की जोड़ी के रूप में स्थापित करने में सफल हो गया है। अब यह तो आगामी लोकसभा चुनावों के बाद ही स्पष्ट हो पायेगा कि संघ का यह प्रयोग कितना सफल होता है। 
               लेखक:- आशुतोष वर्मा,16 शास्त्री वार्ड, बारापत्थर सिवनी 480661 मो. 9425174640 



 

Tuesday, September 17, 2013

क्या बिल्डर माफिया तय करायेगा केवलारी की भाजपा टिकिट?
1977 मे राजेन्द्र अग्रवाल,1985 और 2003 में वेदसिंह ठाकुर को स्थानीय प्रत्याशी के रूप में टिकिट दी गयी थी: 62 और 90 में बाहरी गैर कांग्रेसी ही जीते थे चुनावं
सिवनी। जिले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण केवलारी विस क्षेत्र से कांग्रेस और भाजपा से कौन चुनाव लड़ेगा? इसे लेकर उत्सुकता बनी हुयी है। इंका विधायक हरवंश सिंह की मृत्यु के बाद भाजपा में टिकिट के लिये घमासान मचा है। कुछ भाजपायी स्थानीय और बाहरी उम्मीदवार की लड़ाई लड़ रहें तो कुछ दबी जुबान से यह कहने से नहीं चूक रहें हैं कि इस सीट का फैसला प्रदेश के बिल्डर माफिया करायेगें।
इस क्षेत्र से लगातार चार बासर चुनाव जीतने वाले इंका नेता हरवंश सिंह की मृत्यु के बाद ऐसा माना जा रहा है कि उनके पुत्र रजनीश सिंह ही कांग्रेस के उम्मीदवार होंगें। वैसे डॉ. वसंत तिवारी,कु. शक्ति सिंह  और जकी अनवर जैसे नाम भी चर्चित है लेकिन अधिकांश कांग्रेसी यह मान कर चल रहें हैं कि रजनीश सिंह ही प्रत्याशी होंगें।
टिकिट को लेकर इस बार भाजपा में ज्यादा घमासान मचा हुआ है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछला चुनाव भाजपा के पूर्व मंत्री डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन ने लड़ा था और स्व. हरवंश सिंह बमुश्किल लगभग 59 सौ वोटों से ही जीत पाये थे। इस बार हरवंश सिंह के ना रहने से बहुत से समीकरणों के बदलने के आसार भी दिखायी दे रहें है।
केवलारी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति शुरू से ऐसी रही है कि पूरे विस क्षेत्र में प्रभाव बना सकने वाले स्थानीय नेता बहुत कम ही रहते है। इसीलिये ज्यादातर चुनाव जिला स्तरीय बाहरी नेता ही इस क्षेत्र से जीतते आये हैं चाहे वे कांग्रेस के हों या गैर कांग्रेस दल के हों। सन 1957 में कांग्रेस के एम.पी.जठार, 62 में राम राज्य परिषद के दादू योगेन्द्रनाथ सिंह,67 से 85 तक कांग्रेस की कु. विमला वर्मा,93 से 2008 तक कांग्रेस के हरवंश सिंह चुनाव जीते थे जो कि सभी केवलारी क्षेत्र के बाहर के निवासी थी। 2008 के चुनाव में नये परिसीमन के बाद छपारा क्षेत्र जुड़ जाने के कारण हरवंश सिंह जरूर स्थानीय उम्मीदवार हो गये थे। 
सन 1977 में जनता पार्टी ने पलारी निवासी राजेन्द्र अग्रवाल को और 1985 तथा 2003 में भाजपा ने वेदसिंह ठाकुर के रूप में स्थानीय उम्मीदवार को टिकिट जरूर दी थी लेकिन वे जीत नहीं पाये थे। जबकि 1977 में जनता पार्टी की तथा 2003 में उमा भारती की लहर चल रही थी।
अब एक बार फिर भाजपा में स्थानीय उम्मीदवार को टिकिट देने की भाजपा में मांग उठ रही है। कई नेताओं का ऐसा मानना है कि हरवंश सिंह के निधन के कारण अब कोई भी चुनाव जीत सकता है।
वहीं दूसरी ओर भाजपा में यह चर्चा भी जोरों से चल रही है कि स्थानीय प्रत्याशी के नाम पर बीसावाड़ी निवासी और लंबे समय से भोपाल में रह रहे डॉ. सुनील राय को टिकिट दिलाने की योजना बनायी गयी। प्रशासनिक अमले द्वारा उन्हें दिये जाने वाले महत्व ने इन हवाओं को और पुख्ता करने का काम किया है। भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार डॉ. राय दिलीप बिल्डिकॉन के मालिक दिलीप सूर्यवंशी के रिश्तेदार है। बताया तो यह भी जा रहा है कि डॉ. राय और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी बहुत पुरानी एवं घनिष्ठ सहेलियां हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में यह दावा करने वालों की भी कोई कमी नहीं है कि शिवराज केवलारी में कमजोर प्रत्याशी देकर स्व. हरवंश सिंह का राजनैतिक कर्ज उतारने के लिये ऐसा कर भी सकते हैं। हालाकि यह भी बताया जा रहा है कि रायशुमारी के दौरान डॉ. राय का नाम किसी भी मंड़ल से तीसरे नंबंर पर भी नहीं गया है। प्रदेश में तीसरी पारी खेलने को बेताब भाजपा इस क्षेत्र में किसे चुनाव लड़ायेगी? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं।
सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
17 सितम्बर 2013 

प्रदेश में अरविंद मैनन के पर कतरे जाने से जिले की भाजपा राजनीति में भी चुनाव के समय भारी बदलाव आ सकते है
 सिवनी विस क्षेत्र में भाजपा की घमासान थमने का नाम नहींे ले रही है। नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे जो सिवनी से लगना चालू हुये थे उनकी गूंज भोपाल तक पहुच गयी है। पर्दे के पीछे चल रही चर्चाओं के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा ने इस बार अरविंद मैनन के पर कतर दिये हैं। यदि यह सही है तो जिले की भाजपा की राजनीति में इसका असर होना स्वभाविक है। कांग्रेस में भी टिकिट आवंटन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक भी संपन्न हो गयी है। वर्तमान विधायकों के अलाव पिछला चुनाव एक हजार से कम वोटों से हारने वाले नेताओं के साथ ही स्व. हरवंश सिंह के पुत्र रजनीश सिंह का नाम भी आगे बढ़ा दिया गया है। भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर मचे घमासानकी चर्चाओं के बीच जिले के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हुआ। उन्होंने श्रीवनी में कार्यकर्त्ताओं की एक बैठक भी ली और फिर पत्रकारों से भी रूबरू हुये। भाजपा सूत्रों का यह भी दावा है कि सिवनी की टिकिट तय हाने में अब प्रहलाद पटेल की भूमिका महत्व पूर्ण हो सकती है। छपारा में हुआ तेंदूपत्ता वितरण कार्यक्रम इन दिनों विवादों में छाया हुआ है। इस कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री ठा. रजनीश सिंह मुख्य अतिथि थे। इसे लेकर भाजपा नेताओं में उबाल आया हुआ है।
भाजपा के असंतोष के पीछे कौन?-सिवनी विस क्षेत्र में भाजपा की घमासान थमने का नाम नहींे ले रही है। नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे जो सिवनी से लगना चालू हुये थे उनकी गूंज भोपाल तक पहुच गयी है। बीते दिनों भोपाल में प्रदेश भाजपा नेताओं के सामने भी कार्यकर्त्ताओं ने अपनी नाराजगी व्यक्त की और मांग उनके सामने रखी। पर्दे के पीछे चल रही चर्चाओं के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा ने इस बार अरविंद मैनन के पर कतर दिये हैं। बताया जा रहा है कि जबलपुर के एक सेक्स स्केंडल के कारण यह निर्णय लिया गया है। बताया जा रहा है कि प्रदेश के पूर्व संगठन मंत्री कप्तान सिंह सौलंकी और भगवत शरण माथुर को आगे लाया गया हैै। यदि यह सही है तो जिले की भाजपा की राजनीति में इसका असर होना स्वभाविक है। जिला भाजपा के कई नेताओं से मैनन के प्रगाण संबंध थे। कई नेताओं को मैनन ने ही आश्वस्त किया था कि उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ना है। ऐसे में अब नये समीकरणों में क्या होगा? यह कहना अभी संभव नहीं रह गया है। भाजपा में जो हालात देखे जा रहें और जिस तरीकेे से कार्यकर्त्ताओं का असंतोष उभर कर सामने आ रहा है उससे भाजपा का पार्टी विथ डिफरेंस का दावा तार तार हो गया है। सिवनी विधानसभा में ब्राम्हणों और बनियों के विरोध में जो कार्यकर्त्ता लामबंद हो रहे है उन्हें किसकी शह है? यह तो उजागर नहीं हुआ है लेकिन जिस तरीके से विधायक नीता पटेरिया और पूर्व विधायक तथा जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर के विरोध में सिवनी से लेकर भोपाल तक नारेबाजी हुयी है उसे महज चंद कार्यकर्त्ताओं की ही आवाज ना मान कर इसके पीछे किसी बड़े नेता का हाथ होना माना जा रहा है।तीसरी पारी खेलने को बेताब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे कैसे संभालेंगें? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें हैं।वैसे तो भाजपा नेताओं का यह भी दावा है कि जिन भाजपा विधायकों की टिकिट पर तलवार लटक रही है उनमें नीता पटेरिया भी शामिल हैं। लेकिन उनका ब्राम्हण होने के साथ साथ महिला होना तथा केन्द्रीय भाजपा नेताओं के साथ उनके संपंर्कों को भी नकारा नहीं जा सकता। इसलिये अभी यह दावा करना कि कोई नया प्रत्याशी ही सामने आयेगा?यह कहना अभी संभव नहीं दिख रहा है।
कांग्रेस की प्रदेश चुनाव समिति ने चालू किया काम -कांग्रेस में भी टिकिट आवंटन की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक भी संपन्न हो गयी है। इस बैठक में समिति ने प्रदेश के कांग्रेस विधायकों सहित पिछला चुनाव एक हजार से कम वोटों से हारने वाले नेताओं का नाम भी आगे बढ़ा दिया है। इसमें जिले की केवलारी विधानसभा क्षेत्र से स्व. हरवंश सिंह के पुत्र ठा. रजनीश सिंह का नाम भी आगे बढ़ा दिया है। अब इन नामों पर प्रदेश की स्क्रीनिंग कमेटी और फिर केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में विचार होगा जिसके बाद ही टिकिटों का अंतिम फैसला होगा। इसके अलावा अब प्रदेश की चुनाव समिति की अगली बैठक 17 सितम्बर को दिल्ली में होना है। जिसमें बाकी बची टिकटों के बारे में चर्चा होगी। इसमें या अगली बैठक में जिले की शेष तीन सीटों के बारे में विचार होना है। इनमें लखनादौन से हिमाचल की राज्यपाल उर्मिला सिंह के पुत्र योगेन्द्र सिंह, पूर्व विधायक बेनी परते और जनपद अध्यक्ष राजेश्वरी उइके के बीच घमासान है। जिले की दूसरी आदिवासी सीट बरघाट में भी रोचक स्थिति बनी हुयी है जहां एक प्रत्याशी अर्जुनसिंह काकोड़िया के विरुद्ध बाकी 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये है। यहां आदिवासियों में गौड़ और परघान का विवाद मचा हुआ है। जिले में सबसे अधिक घमासान जिला मुख्यालय की सिवनी सीट पर मचा हुआ है। इस बार यह मांग भी जबरदस्त रूप में उठी हुयी है कि जिले में एक सीट अल्प संख्यक वर्ग को दी जाये। यदि केवलारी से रजनीश सिंह का नाम फायनल हो जाता है तो यह दवाब सिवनी सीट पर ही बन जायेगा। पांच बार से हारने वाले इस क्षेत्र से 38 लोगों ने टिकिट मांगी है। इनमें से किसके नाम पर टिकिट आयेगी? यह कहना तो अभी संभव नहीं है। 
प्रहलाद पटेल का दौरा भाजपाइयों में हुआ चर्चित  -भाजपा में सिवनी की टिकिट को लेकर मचे घमासानकी चर्चाओं के बीच जिले के पूर्व सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का सिवनी आगमन हुआ। उन्होंने श्रीवनी में कार्यकर्त्ताओं की एक बैठक भी ली और फिर पत्रकारों से भी रूबरू हुये। सियासी हल्कों में जारी चर्चाओं के अनुसार वे भाजपा के असंतोष को दूर करने के लिये आये थे। भाजपा के सूत्रों का दावा है कि इस विवाद में चूंकि जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर खुद एक पार्टी बने हुये हैं इसीलिये प्रदेश नेतृत्व ने प्रहलाद पटेल को सुलझाने की जवाबदारी दी है। भाजपा सूत्रों का यह भी दावा है कि सिवनी की टिकिट तय हाने में अब प्रहलाद पटेल की भूमिका महत्व पूर्ण हो सकती है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि प्रहलाद पटेल के सांसद रहते ही भाजपा ने पहली बार सिवनी सीट 1990 में कांग्रेस के स्व. हरवंश सिंह को हरा कर स्व. पं. महेश शुक्ला ने जीती थी और यह सिलसिला आज तक जारी है। 
बोनस वितरण कार्यक्रम के कांग्रेसीकरण पर बौखलाये भाजपायी-छपारा में हुआ तेंदूपत्ता वितरण कार्यक्रम इन दिनों विवादों में छाया हुआ है। इस कार्यक्रम में जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री ठा. रजनीश सिंह मुख्य अतिथि थे। इसे लेकर भाजपा नेताओं में उबाल आया हुआ है। सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र टांक ने इस मामले में विज्ञप्ति जारी कर विभागीय अधिकारियों में दोषारोपण किया। फिर भाजपा के छपारा मंड़ल के महामंत्री शाहिद पटेल ने भी इसी आशय की विज्ञप्ति जारी कर विरोध जताया। स्थानीय भाजपा नेताओं के इस विरोध ने कई सवाल खड़े कर दिये है। प्रदेश में सरकार भाजपा की है। मुख्यमंत्री से लेकर जिले के तीन विधायक भाजपा के है। उसके बाद भी यदि अधिकारी किसी शासकीय कार्यक्रम में किसी कांग्रेस नेता को मुख्य अतिथि बनाता है तो इसमें गलती किसकी है? यदि अधिकारियों की गलती है तो फिर विज्ञप्ति जारी करने के बजाय उसके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं करते? या फिर स्थानीय भाजपा नेताओं इस बात से भयभीत है कि उनके चाहने के बाद भी वे अपनी सरकार से कार्यवाही नहीं करा सकते है इसलिये सिर्फ विज्ञप्ति जारी कर अपना असंतोष व्यक्त कर रहें है। बीते कई सालों से चल रहा भाजपा का नूरा कुश्ती का दौर अभी भी खत्म होगा या नहीं? इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें होती रहती है। “मुसाफिर”
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
17 सितम्बर 2013 से साभार

Monday, August 26, 2013

जिला मुख्यालय की सीट से टिकिट के लिये इंका और भाजपा में मची भारी घमासान से राजनैतिक हल्कों में  सरगर्मी बढ़ी
 जिला मुख्यालय की राजनैतिक रूप से सर्वाधिक मूहत्वपूर्ण सिवनी विधानसभा सीट के लिये टिकिट की मारामारी कांग्रेस और भाजपा में तेज हो गया हैं। पिछले पांच चुनावों से भाजपा इस सीट से जीत रही है। इसलिये भाजपा नेताओं का मानना है कि सिर्फ टिकिट मिल जाये जीतना तो सुनिश्चित है ही। जिले की कांग्रेसी राजनीति में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का सीधा हस्तक्षेप बढ़ गया है इसीलिये राजनैतिक जानकारों का मानना है कि जिले में कांग्रेस की चुनावी रणनीति में होने ंवाला आमूल चूल परिवर्तन भाजपा की डगर आसान नहीं रहने देगा और जिले चारों विस क्षेत्रों में बिना कठिन परिश्रम किये जीतना संभव नहीं होगा। कांग्रेस भी टिकिट की लड़ायी में उलझी हुयी हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में टिकटार्थियों के लिये बनाये गये मानदंड़ और टिकिट का आवेदन लगाने वालों से मांगी गयी जानकारियों के कारण समीकरण काफी उलझ गये है। वैसे कांग्रेस इस द्वोत्र से 1990 से चुनाव हार रही हैं। लेकिन यह भी राजनैतिक रूप से कम महत्वपूर्ण बात नहीं है कि इस क्षेत्र से टिकिट मांगने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है। इस बार कांग्रेस और भाजपा के आलाकमान ने टिकिट देने की प्रक्रिया निर्धारित की है उससे एक बात तो हुयी है कि चुनाव लड़नें इच्छुक नेता जो मंड़ल या ब्लाक के पदाधिकारियों को अपने आधीन समझते थे उन्हें अपनी ही टिकिट ले लिये उनके दर पर पहुंचना पड़ रहा है। 
आयती जीत की संभावना नहीं फिर भी मची भाजपा में होड़ -जिला मुख्यालय की राजनैतिक रूप से सर्वाधिक मूहत्वपूर्ण सिवनी विधानसभा सीट के लिये टिकिट की मारामारी कांग्रेस और भाजपा में तेज हो गया हैं। पिछले पांच चुनावों से भाजपा इस सीट से जीत रही है। इसलिये भाजपा नेताओं का मानना है कि सिर्फ टिकिट मिल जाये जीतना तो सुनिश्चित है ही।इस क्षेत्र से दो बार स्व. महेश शुक्ला, दो बार नरेश दिवाकर चुने गये और वर्तमान में नीता पटेरिया भाजपा से विधायक है। भाजपा में टिकिट के लिये इस बार नीता और नरेश के अलावा पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी दावेदार के रूप में उभर कर सामने आयें है।लेकिन कार्यकर्त्ताओं एक वर्ग ने ब्राम्हण बनिया विरोधी मोर्चा खोल रखा है। क्षेत्र के कार्यकर्त्ता सम्मेलन में यह मुहिम जोरदार तरीके से चली भी थी। इसके बाद भाजपा में अब यह चर्चित हे गया है कि चौथा कौन? चौथा कौन की चर्चा चालू होते ही पूर्व मंत्री स्व. महेश शुक्ला कि पुत्र अखिलेश शुक्ला एवं पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष द्वय प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब,सुदर्शन बाझल एवं सुजीत जैन के नामों की चर्चा भी चाले हो गयी हैं। लेकिन ये सभी संभावित नाम भी ब्राम्हण एवं बनिया वर्ग से ही हैं। इन वर्गों के विरोध में मुहिम चलाने वाला तबका अपनी ओर से किसी सशक्त दावेदार का नाम आम सहमति से सामने नहीं ला पाया है। वैसे राजेन्द्रसिंह बघेल,नरेन्द्र टांक, घासीराम सनोड़िया, राजेश उपाध्याय,ज्ञानचंद सनोड़िया आदि नेताओं के नाम भी दावेदारों के रूप में सामने आ रहें है। इनमें से कौन बाजी मार लेगा? इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है लेकिन इस बार का चुनाव पिछले चुनावों जैसा नहीं होगा यह बात भाजपा आलाकमान भी जानता है कि सिवनी क्षेत्र में भाजपा को बिना कमर कस कर चुनाव लड़े आयती जीत नहीं मिलने वाली हैं। जिले के कांग्रेस के पुरोधा हरवंश सिंह के आकस्मिक निधन के बाद जिले की कांग्रेसी राजनीति में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का सीधा हस्तक्षेप बढ़ गया है इसीलिये राजनैतिक जानकारों का मानना है कि जिले में कांग्रेस की चुनावी रणनीति में होने ंवाला आमूल चूल परिवर्तन भाजपा की डगर आसान नहीं रहने देगा और जिले चारों विस क्षेत्रों में बिना कठिन परिश्रम किये जीतना संभव नहीं होगा। 
सिवनी क्षेत्र से कांग्रेस में भी मची है घमासान-कांग्रेस भी टिकिट की लड़ायी में उलझी हुयी हैं। एक तरफ तो राहुल गांधी के नाम पर राजा बघेल की टिकिट काफी पहले से सुनिश्चित मानी जा रही थी। लेकिन टिकिट की कवायत चालू होने के बाद बहुत सारा पानी बैनगंगा के पुल के नीचे से बह चुका है। राहुल गांधी के नेतृत्व में टिकटार्थियों के लिये बनाये गये मानदंड़ और टिकिट का आवेदन लगाने वालों से मांगी गयी जानकारियों के कारण समीकरण काफी उलझ गयें हैं। वैसंे तो कांग्रेस में 38 लोगों ने टिकिट मांगी थी लेकिन अनुशासनहीनता के आरोपों के चलते जिले के उपाध्यक्ष खुमान सिंह के निष्कासन के बाद यह संख्या अब 37 रह गयी है। कांग्रेस के प्रमुख दावेदारों में राजकुमार खुराना,नेहा सिंह,दिलीप बघेल,रमेश जैन, मोहन चंदेल, चंद्रभान सिंह बघेल,ठा. धमेन्द्र सिंह के अलावा अल्पसंख्यक नेताओं में जकी अनवर, सुहेल पाशा, असलम भाई,आरिफ पटेल,साबिर अंसारी प्रमुख हैं। वैसे कांग्रेस इस द्वोत्र से 1990 से चुनाव हार रही हैं। लेकिन यह भी राजनैतिक रूप से कम महत्वपूर्ण बात नहीं है कि इस क्षेत्र से टिकिट मांगने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है। हाल ही में प्रदेश कांग्रेस के निर्देश पर इस क्षेत्र में कांग्रेस संदेश यात्रा भी प्रारंभ हो गयी हैं। 24 अगस्त से प्ररंभ यह यात्रा 30 अगस्त चलेगी। इस यात्रा में सभी संबंधित ब्लाक कांग्रेस के पदाधिकारी एवं टिकटार्थी शामिल हो रहें हैं। इस यात्रा के दौरान कांग्रेस नेता एक फोल्डर के माध्यम से कांग्रेस की केन्द्र सरकार की उपलब्धि और भाजपा की प्रदेश सरकार की पोल भी खोल रहें है। कांग्रेस में एक यह मांग भी जबरदस्त तरीके से उठ रही है कि इस बार सिवनी या केवलारी क्षेत्र से मुस्लिम नेता को टिकिट दी जाये। राहुल गांधी की गाइड लाइन,कांग्रेस के पर्यवेक्षकों की कवायत एवं नव नियुक्त प्रदेश प्रभारी मोहनप्रकाश के सख्त निर्देशों के चलते किसे टिकिट मिली है यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना जरूर है कि अच्छे उम्मीदवार को टिकिट और कांग्रेसी यदि एक रहे तो भाजपा के लियें सीट गंवाने का खतरा भी हो सकता है। 
तो कांग्रेस और भाजपा में उत्साह का संचार तो हो ही जायेगा-इस बार कांग्रेस और भाजपा के आलाकमान ने टिकिट देने की प्रक्रिया निर्धारित की है उससे एक बात तो हुयी है कि चुनाव लड़नें इच्छुक नेता जो मंड़ल या ब्लाक के पदाधिकारियों को अपने आधीन समझते थे उन्हें अपनी ही टिकिट ले लिये उनके दर पर पहुंचना पड़ रहा है। राहुल गांधी के भोपाल प्रवास के दौरान अधिकांश पदाधिकारियों ने उन्हें महत्व ना मिलने की बात की थी। राहुल गांधी के निर्देश पर कांग्रेस पर्यवेक्षकों ने इस बार ब्लाक कांग्रेस कमेटी से भी सुझाव मांगे तथा तीन तीन नाम प्रस्तावित करने को कहा। इससे यह हुआ कि अपने आप को बहुत बड़ा नेता मानकर टिकिट मांगने वालों को अपनी मनुहार लेकर उनके दर तक जाना पड़ा। इसी तरह भाजपा में भी रायशुमारी देने का जिन कार्यकर्त्ताओं को अधिकार दिये गये हैं उनके पास अपनी जुगाड़ जमाने के लिये वर्तमान और भावी विधायक पहुंच रहें हैं।दोनों ही पार्टियों द्वारा इस प्रक्रिया को अपनाने से पार्टी के कार्यकर्त्ताओं की प्रतिक्रिया संतोषजनक देखी जा रही हैं। यदि वास्तव में इसी के आधार पर टिकटें बंटतीं हैं तो इससे कार्यकर्त्ताओं में उत्साह का संचार तो हों ही जायेगा। 
“मुसाफिर“ 
सा. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी से साभार
27 अगस्त 2013   

Thursday, August 15, 2013

राजनैतिक हित साधने के लिये  धर्म , जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर नफरत के बीज बोने से परहेज करें वरना देश में विकास के पहिये थम जायेंगें
आज पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की 66 वीं वर्षगांठ मना रहा हैं। आजादी के बाद देश ने प्रजातंत्र के साथ साथ धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त को भी अंगीकार किया है। इसके तहत सर्व धर्म समभाव की नीति का पालन किया गया। हर धर्म के मानने वाले नागरिकों को अपने अपने  धर्मानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता तो दी गयी है लेकिन किसी दूसरे के धर्म की आलोचना का अधिकार नहीं दिया गया हैं। लेकिन धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण कर सत्ता के गलियारे तक पहुंचने की ललक ने देश के राजनीतिज्ञों को धर्म की आड में राजनीति करने का रास्ता खोल दिया। धर्म,जाति और क्षेत्रीयता के शार्ट कट से सत्ता पाने का लालच राजनीतिज्ञ छोड़ नहीं पाये और इसी कारण वासुदैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को मानने वाले देश में तरह तरह के विभाजन दिखायी देने लगे हैं। अब धर्मनिरपेक्षता और छद्म धर्मनिरपेक्षता के शब्द राजनैतिक गलियारों में आरोप प्रत्यारोप लगाने में उपयोग होते दिखायी दे रहें हैं। कोई राजनैतिक दल अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहता है तो दूसरा उसे मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर छद्म धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगाता हैं। वहीं दूसरी ओर आरोप लगाने वाले खुद ही सत्ता में आने के बाद वही कुछ करते नजर आते हैं जिनके आधार पर वे दूसरे दल पर छद्म धर्मनिरपेक्षता का आरोप लगाते हैं। एक ही राजनैतिक दल के दो मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से अलग अलग आचरण करते दिखायी दे रहें है। एक मुख्यमंत्री सदभावना मंच पर एक मौलवी द्वारा पहनायी जा रही टोपी पहनने से इंकार कर कट्टर हिन्दू होने का संकेत देता है तो दूसरा मुख्यमंत्री ईद मिलन समारोह में इस्लामी टोपी पहनकर खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाने का प्रयास करता है। लेकिन मंशा दोनों की ही एक है कि वे अपनी पार्टी को मजबूत करना चाहते है। क्या राजनेताओं का यह आचरण उचित है? लेकिन यह शाश्वत सत्य है कि विभिन्नता में एकता ही भारत की विशेषता है। हमारे देश में अलग अलग धर्म और जाति के लोग आपस में भाई चारे के साथ रहते है। इसीलिये धर्म और जाति को आधार मानकर राजनैतिक बिसात बिछाना देश के लिये हितकारी नहीं हैं। भारत एक विकासशील देश है। विकास की प्रक्रिया सतत जारी रखने के लिये यह आवश्यक है कि देश में अमन चैन कायम रहे। आज यह समय की मांग है कि देश में राजनैतिक नेतृत्व करने वाले राजनेता अपने राजनैतिक हित साधने के लिये  धर्म और जाति के आधार पर नफरत के बीज बोने से परहेज करें वरना देश में विकास के पहिये थम जायेंगें और देश के नौनिहालों का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा और आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।़ इसलिये आइये आज के दिन हम यह संकल्प लें कि हम अपने राजनैतिक हितों के लिये हम धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के आधार पर समाज को बंटने नहीं देंगें और देश के समग्र विकास का मार्ग प्रशस्त करेंगें।     

Tuesday, August 6, 2013

विस चुनाव के इस दौर में जिले में अभी से टिकिट के बजाय के बजाय मंत्री बनने का ताना बाना बुन रहे हैं भाजपा के शीर्ष नेता
 इन दिनों नगरपालिका की लीज को लेकर समाचार पत्रों में तरह तरह के समाचार प्रकाशित हो रहें हैं। बताया जा रहा है कि गंज क्षेत्र के कुछ व्यापारियों की लीज का नवीनीकरण होना हैं। इसमें अधिकांश व्यापारी संघ एवं भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। पालिका अध्यक्ष एवं भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी का सहयोग ना मिलने पर इन व्यापारियों ने युवा इंका नेता राजा बघेल एवं जिला इंका के महामंत्री चीकू सक्सेना से संपंर्क साधा । कांग्रेस पार्षदों के सहयोग से परिषद में प्रस्ताव भी पारित कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने के लिये मुनपा अधिकारी को अधिकृत कर दिया गया। कांग्रेस में पर्यवेक्षकों के दौरों के बाद टिकिट मांगने वाले नेताओं ने प्रादेशिक नेताओं से मेल मुलाकात का दौर चालू कर दिया है। मोहन समर्थकों में चल रही चर्चा के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष होने के नाते मोहन चंदेल अपने आप को महिमा मंड़ित कर स्वयमेव नेता दिखने के राजनैतिक संदेश देने में सफल रहें हैं। जिला भाजपा में चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के तार विधानसभा चुनाव से जुड़े बताये जा रहें है। दरअसल में इस स्थानीय समीकरण के पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि सरकार बनने पर मंत्री बनने की जुगाड़ हैं। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है?
संघ और भाजपा में सेंध लगायी इंकाइयो ने?-इन दिनों नगरपालिका की लीज को लेकर समाचार पत्रों में तरह तरह के समाचार प्रकाशित हो रहें हैं। बताया जा रहा है कि गंज क्षेत्र के कुछ व्यापारियों की लीज का नवीनीकरण होना हैं। इसमें अधिकांश व्यापारी संघ एवं भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। इन समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि पालिका अध्यक्ष एवं भाजपा नेता राजेश त्रिवेदी का सहयोग ना मिलने पर इन व्यापारियों ने युवा इंका नेता राजा बघेल एवं जिला इंका के महामंत्री चीकू सक्सेना से संपंर्क साधा और कांग्रेस पार्षदों के सहयोग से परिषद में प्रस्ताव भी पारित कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने के लिये मुनपा अधिकारी को अधिकृत कर दिया गया। प्रकाशित समाचारों में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारी लेन देन के बाद भी मामला अटकाया जा रहा हैं जिससे व्यापारियों में आक्रोश है। राजनैतिक हल्कों में चर्चा है कि चुनावी समय में इस तरीके से इंकाइयों द्वारा संघ और भाजपा में सेंध लगाने का काम किया गया है जो कि चुनाव में लाभ दायक होगा। भाजपा के पालिका अध्यक्ष होने के बाद भी संघ समर्थक व्यापारी इंका नेताओं के संपंर्क में आये और उनकी मदद से परिषद में प्रस्ताव होने और लीज का नवीनीकरण ना होने से भाजपा के प्रति आक्रोश पैदा हो गया है।बताया जा रहा है कि मुनपा अधिकारी का कहना है कि नियमानुसार परिषद तीन साल से अधिक की लीज नहीं दे सकती जबकि व्यापारियों का कहना है कि भाजपा की पिछली परिषद की तरह इस बार भी 30 साल के लिये नवीनीकरण किया जाय। लेकिन मुनपा अधिकारी अपने अभिमत पर अड़े हुये है कि तीन साल से अधिक की लीज के लिये प्रकरण राज्य शासन को भेजने होंगें। सियासी हल्कों में दूसरी तरफ यह भी चर्चा है कि मामला लेन देन के इर्द गिर्द ही घूम रहा है कि लेन देन कहां हुआ, किसके साथ हुआ और यदि नियम नहीं था तो भाजपा की पिछली परिषद ने तीस साल के लिये लीज कैसे दी? इन सारे सवालों के जवाब तो नगर पालिका परिषद के कर्त्ता धर्त्ता या पालिका के मामलों में विशेष योग्यता हासिल कर चुके नेता ही बता सकते हैं लेकिन इतना तो तय है कि या तो पिछली भाजपा की परिषद ने नियम के विपरीत जाकर तीस साल की लीज दी थी या भाजपा की ही वर्तमान परिषद नियम होने के बाद भी तीस साल की लीज नहीं दे रही है। पालिका परिषद और प्रशासन से इस बात की अपेक्षा करना कोई बेमानी नहीं होगी कि वें इस बात का खुलासा करें कि भाजपा की पिछली परिषद ने नियम विपरीत काम किया है या वर्तमान परिषद नियम विपरीत काम कर रही है? 
प्रदेश के नेताओं के यहां दस्तक दी इंका टिकटार्थियों ने-कांग्रेस में पर्यवेक्षकों के दौरों के बाद टिकिट मांगने वाले नेताओं ने प्रादेशिक नेताओं से मेल मुलाकात का दौर चालू कर दिया है। जिले में पांच बार से हारने वाले सिवनी से 38 और आदिवासी क्षेत्र बरघाट से 19 नेताओं ने टिकिट के लिये आवेदन लगाये है। दोनों ही क्षत्रों क्रमशः 22 और 18 नेता लामबंद हो गये हैं। इन नेताओं ने बीते दिनों छिंदवाड़ा में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ से भेंट कर अपना पक्ष रखा था। पिछले दिनों सिवनी के 22 नेताओं के समूह ने भोपाल जाकर कांग्रेस नेताओं के यहां दस्तक दी है। इन नेताओं ने प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह,प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष से भेंट कर अपना पक्ष रखा और मांग की है कि इस बार प्रत्याशी ग्रामीण क्षेत्र से ही बनाया जाना चाहिये क्योंकि शहरी क्षत्र के नेता पिछले पांच बार से चुनाव हार रहें हैं। भोपाल गये लगभग 16 टिकटार्थियों में जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल और सिवनी के पूर्व विधायक रमेश जैन भी शामिल थे। मोहन समर्थकों में चल रही चर्चा के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्ष होने के नाते मोहन चंदेल अपने आप को महिमा मंड़ित कर स्वयमेव नेता दिखने के राजनैतिक संदेश देने में सफल रहें हैं।इस प्रतिनिधिमंड़ल द्वारा यह बताये जाने पर कि इस क्षेत्र से 38 नेताओं ने टिकिट के लिये आवेदन लगाया हैं तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आश्चर्य व्यक्त किया कि पांच बार से हारने वाले क्षेत्र से इतने आवेदक? कांग्रेसी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार सिवनी और बरघाट से आवेदकों की संख्या बढ़ने का कारण यह बताया जा रहा है कि इस चुनाव में कांग्रेस में बिलोरन होने की संभावना कम है और कांग्रेस जीत भी सकती हैं। हालांकि इस तर्क के आधार अलग अलग लोग अलग ही बता रहें हैं लेकिन इससे इस बात से भी इंकार नहीं सकता कि हो रहे इस बिखराव को रोकना आसान नहीं होगा। 
भाजपा में मंत्री पद को लेकर बुने जा रहें हैं ताने बाने-जिला भाजपा में चल रही नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के तार विधानसभा चुनाव से जुड़े बताये जा रहें है। नेरश नीता गुट इस मामले में आमने सामने हैं। नरेश समर्थकों का मानना है कि सिवनी विस से नीता पटेरिया का जीतना संभव नहीं है। इसीलिये भाजपा को प्रत्याशी बदल कर नरेश को टिकिट देना चाहिये। केवलारी के इंका विधायक हरवंश सिंह के निधन के कारण आसान हो चुकी सीट को भाजपा को जीतने के लिये नीता पटेरिया को केवलारी से चुनाव लड़ाना चाहिये।वहीं केवलारी क्षेत्र के प्रबल दावेदार डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को बालाघाट संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाना चाहिये। दरअसल में इस स्थानीय समीकरण के पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि सरकार बनने पर मंत्री बनने की जुगाड़ हैं। यदि नरेश चुनाव जीतते है तो वे तीसरी बार के विधायक होगें,नीता केवलारी से जीततीं है तो वे दूसरी बार की विधायक होंगी जबकि यदि केवलारी से चुनाव लड़कर डॉ. बिसेन चुनाव जीतते है तो वे जिले के पांचवी बार के विधायक होंगें और भाजपा की उमा और गौर सरकार में वे मंत्री भी रह चुके है। इस तरह यदि डॉ. बिसेन को लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिये कहा जाता है तो नरेश और नीता के मंत्री बनने की होड़ में नरेश बाजी मार सकते है। वैसे वर्तग्मान में डॉ. बिसेन और नरेश दोनों ही केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त नेता हैं। मंत्री पद को लेकर बुने जा रहे इस ताने बाने के लिये ही भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही है और नरेश अपने ही किसी समर्थक को जिला भाजपा का अध्यक्ष बनाकर बाजी अपने हाथ में रखना चाह रहें हैं। यह तो समय आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है? “ मुसाफिर “    
सा. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
06 अगस्त 2013  

Tuesday, July 30, 2013

क्या जिला भाजपा में होगा नेतृत्व परिवर्तन?
क्या सुजीत या वेदसिंह ठाकुर होगें जिला भाजपा के नये अध्यक्ष
सिवनी। क्या जिला भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन होने वाला है? यदि ऐसा हुआ तो किसके हाथ में आयेगी कमान?ये सवाल इन दिनों जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चित है।
विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर जहां एक ओर सभी राजनैतिक दल अपने अपने प्रत्याशी चयन और चुनावी बिसात बिछाने में लगे हुये हैं वहीं दूसरी ओर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा में जिले में नेतृत्व परिर्वतन की खबरें चल रहीं हैं। नेतृत्व परिर्वतन की बात करने वाले नेता इस आधार पर यह बात कर रहें हैं कि इसीलिये भाजपा जिले में अभी तक प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं कर रही है। जबकि कांग्रेस के एक राष्ट्रीय और एक प्रादेशिक पर्यवेक्षक जिले की चारों विधानसभा सीटों का दौरा कर प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया को चालू कर चुके हैं। 
वर्तमान में जिला भाजपा की कमान सिवनी के पूर्व विधायक एवं महाकौशल विकास प्राधिकरण के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त कद्दावर भाजपा नेता के हाथों में हैं। फिर आखिर ऐसे क्या कारण है कि चुनाव के चंद महीनों पहले प्रदेश का भाजपा नेतृत्व जिले में नेतृत्व परिवर्तन की सोच रहा है।
यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि भाजपा के संगठन चुनाव के दौरान तत्कालीन अध्यक्ष सुजीत जैन की दोबारा ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही थी। लेकिन उस वक्त नरेश दिवाकर ने अपने ही समर्थक सुजीत जैन के बजाय वरिष्ठ महिला नेत्री एवं लगातार चार बार जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीतने वाली गोमती ठाकुर का नाम आगे कर दिया था। लेकिन काल चक्र कुछ ऐसा घूमा कि नरेश भले ही सुजीत को रोकने में तो सफल हो गये पर गोमती ठाकुर के बजाय उन्हें खुद ही जिला भाजपा अध्यक्ष बनना पड़ा।
यह बात भी एक ओपन सीक्रेट है कि सिवनी से दो बार विधायक रहे नरेश दिवाकर अपनी टिकिट कटने का दंश भूल नहीं पाये थे और मविप्रा का अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने ताबड़ तोड़ सिवनी विस क्षेत्र के दौरे भी चालू कर दिये थे। भाजपा विधायक श्रीमती नीता पटेरिया और नरेश दिवाकर के इसी कारण मनमुटाव समय समय पर जगजाहिर होते रहें हैं। अभी नरेश दिवाकर इस बात के लिये जी तोड़ मेहनत कर रहें कि आगामी चुनाव में भाजपा से उन्हें ही विस की टिकिट मिले।
राजनैतिक विश्लेषकों का दावा है कि इसी कारण प्रदेश भाजपा का नेतृत्व जिले में परिवर्तन के बारे में विचार कर रहा हैं। प्रदेश के नेताओं का ऐसा मानना है कि प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया ऐसे हालात में चालू करना उचित नहीं हैं जब जिले का अध्यक्ष स्वयं ही टिकिट का दावेदार हो।
भाजपायी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार नरेश दिवाकर ने अध्यक्ष पद के लिये उन्हीं सुजीत जैन का नाम आगे बढ़ा दिया है जिसे उन्होंने ही दूसरी पारी नहीं खेलने दी थी। जिला भाजपा अध्यक्ष पद के लिये दूसरे सबसे ताकतवर दावेदार के रूप में दो बार जिलाध्यक्ष रह चुके वरिष्ठ नेता वेदसिंह ठाकुर का नाम सामने आया हैं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इन दिनों भाजपा में कार्यकर्त्ताओं का एक खेमा लगातार बैठकें करके ब्राम्हण और जैन ेनताओं को भाजपा में मिल रहे अत्यधिक महत्व को लेकर उनके विरोध में लामबंद हो रहा है और प्रदेश नेतृत्व से यह मांग कर रहा है अन्य वर्ग के नेताओं को भी महत्व मिलना आवयक है अन्यथा उनमें उभर रहा असंतोष भाजपा के लिये नुकसानदायक होगा।
ऐसे हालात में प्रदेश भाजपा नेतृत्व जिले में नेतृत्व परिवर्तन करेगा या नही? और करेगा तो कमान किसे देगा? और नरेश दिवाकर सिवनी विस क्षेत्र से टिकिट ला पायेंगें या नहीं? यह सब कुछ तो फिलहाल भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है?
सा. दर्पण झूठ बोले, सिवनी से साभार   
चुनावी साल में  वृक्षारोपण के शासकीय कार्यक्रम में  किसी शाही पर्यावरण मित्र  का अतिथि बनना सियासी हल्कों में  हुआ चर्चित
जिला मुख्यालय के पांच बार से जीतने वाले सिवनी विस क्षेत्र में इस बार एक नयी पहल प्रारंभ हुयी है। अपने आप को भाजपा का निष्ठावान कार्यकर्त्ता बताने वाले कई नेता बैठकों का दौर कर रहें हैं कि इस बार पार्टी का उम्मीदवार किसी भी ब्राम्हण या बनिये को नहीं बनाना चाहिये। कांग्रेस में भी नजारा  कुछ अलग नहीं है। सिवनी विस क्षेत्र के 38 में से 22 और बरघाट विस क्षेत्र से 19 में से 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये हैं।  सिवनी में ये सभी टिकटार्थी स्वयं को ग्रामीण परिवेश का बता रहें हैं और उनका कहना है कि पार्टी पांच बार से यहां से चुनाव हार रही है और पांचों बार शहरी क्षेत्र के उम्मीदवारों को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया था।  लेकिन कोई भी चुनाव जीत नहीं पाया।बरघाट के टिकटाथियों का कहना है कि पार्टी के खिलाफ दो बार चुनाव लड़ चुके अर्जुन काकोड़िया को प्रत्याशी नहीं बनाया जाना चाहिये। चुनावी साल में वृक्षारोपण के किसी शासकीय कार्यक्रम में कोई शाही पर्यावरण मित्र अतिथि बने और सियासी हल्कों में कोई चर्चा ना हो ये भला कैसे हो सकता है? ऐसा ही कुछ बीते दिनों इस जिले में हुआ है। अब देखना यह है कि ये सूबे के शहंशाह के नजदीकी शाही पर्यावरण मित्र चुनावी साल में अपनी आमद से कांग्रेस या भाजपा में से किस पार्टी का राजनैतिक प्रदूषण समाप्त करेंगें।
भाजपा में खुला ब्राम्हण बनिया विरोधी मोर्चा-आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा में भी गतिविधियां तेज हो गयीं है। जिला मुख्यालय के पांच बार से जीतने वाले सिवनी विस क्षेत्र में इस बार एक नयी पहल प्रारंभ हुयी है। अपने आप को भाजपा का निष्ठावान कार्यकर्त्ता बताने वाले कई नेता बैठकों का दौर कर रहें हैं कि इस बार पार्टी का उम्मीदवार किसी भी ब्राम्हण या बनिये को नहीं बनाना चाहिये। इन नेताओं का यह कहना है कि भाजपा में पार्टी के जिला अध्यक्ष एवं सिवनी विस क्षेत्र के अधिकांश उम्मीदवार अभी तक इन दो वर्गों से ही रहे है। भाजपा के इस धड़े का यह भी कहना है कि स्व. पं. महेश शुक्ला,प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब,स्व. चक्रेश जैन,सुदर्शन बाझल,सुजीत जैन और अब नरेश दिवाकर पार्टी के जिलाध्यक्ष है। पार्टी में अब तक सिर्फ दो बार वेदसिंह ठाकुर,कीरत सिंह बघेल और डॉ. ढ.ालसिंह बिसेन ही अन्य ऐसे नेता है जिन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया है। इसी तरह सिवनी विस क्षेत्र से 85 में प्रमोद कुमार जैन,90 और 93 में स्व0 महेश शुक्ला, 98 और 2003 में नरेश दिवाकर और 2008 में नीता पटेरिया को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया और जनता ने पांच बार यह सीट भाजपा की झोली में डाली है। भाजपा के इन नेताओं का यह कहना है कि इन कारणों से जनता में यह संदेश जा रहा है कि भाजपा ब्राम्हणों और बनियों की पार्टी बन कर रह गयी है। इससे पार्टी के अन्य कार्यकर्त्ताओं में अब उपेक्षा की भावना घर करने लगी है। इसलिये इस बार पार्टी को सिवनी से किसी अन्य वर्ग के नेता को पार्टी का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिये। चुनाव के पहले भाजपा में उठ रही यह असंतोष की लपटें कितना नुकसान पहुंचाने वाली साबित होंगी? यह कहा जाना अभी संभव नहीं हैं। 
सिवनी और बरघाट में भी कांग्रेस के टिकटार्थी हुये लामबंद-कांग्रेस में भी नजारा कुछ अलग नहीं है। सिवनी विस क्षेत्र के 38 में से 22 और बरघाट विस क्षेत्र से 19 में से 18 टिकटार्थी लामबंद हो गये हैं। सिवनी में ये सभी टिकटार्थी स्वयं को ग्रामीण परिवेश का बता रहें हैं और उनका कहना है कि पार्टी पांच बार से यहां से चुनाव हार रही है और पांचों बार शहरी क्षेत्र के उम्मीदवारों को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 90 में स्व. ठा. हरवंश सिंह, 93 और 98 में आशुतोष वर्मा, 2003 में राजकुमार पप्पू खुराना और 2008 में प्रसन्न मालू को उम्मीदवार बनाया था और कोई भी जीत नहीं पाया था इसलिये इस बार ग्रामीण क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया जाये। इसी तरह बरघाट विस क्षेत्र में भी कांग्रस पांच बार से चुनाव हार रहीं है। लेकिन परिसीमन के बाद पिछले चुनाव से जिले की यह सीट आदिवासी वर्ग के लिये आरक्षित हो गयी है। लेकिन इस सीट से भी कांग्रेस की टिकिट के लिये 19 नेताओं ने आवेदन दिया है। इनमें से अर्जुन काकोड़िया को छोड़कर शेष 18  टिकटार्थी लामबंद हो गये हैं कि उनके अलावा 19 में से किसी को भी पार्टी टिकिट दे क्योंकि वे पार्टी के खिलाफ दो बार इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। 
केवलारी क्षेत्र में शाही पर्यावरण मित्र की आमद हुयी चर्चित-हर साल बारिश आती है। बारिश में हर साल वृक्षारोपण होता है। हर शासकीय या अशासकीय वृक्षारोपण के कार्यक्रम में कोई ना कोई अतिथि पर्यावरण मित्र भी होता है। लेकिन जब चुनावी साल में वृक्षारोपण के किसी शासकीय कार्यक्रम में कोई शाही पर्यावरण मित्र अतिथि बने और सियासी हल्कों में कोई चर्चा ना हो ये भला कैसे हो सकता है? ऐसा ही कुछ बीते दिनों इस जिले में हुआ है। जी हां हम बात कर रहें है छपारा के एक शासकीय कार्यक्रम में उपस्थित हुये एक शाही पर्यावरण मित्र की उपस्थिति की जो कि अखबारों की सुर्खी बना था। केवलारी विस क्षेत्र के छपारा कस्बे में आयोजित एक शासकीय वृक्षारोपण कार्यक्रम में  चुनावी मौसम में अचानक ही प्रगट हुये एक शाही पर्यावरण मित्र अपने आप को सूबे के शहंशाह के किचिन केबिनेट के खास मेम्बर का रिश्तेदार बता रहें हैं। केवलारी विधानसभा क्षेत्र में सूबे के शहंशाह से नजदीकी बता कर आमद देने वाले पर्यावरण मित्र किस पार्टी का राजनैतिक प्रदूषण दूर करेंगें और किसमें प्रदूषण फैलायेंगें? इसे लेकर क्षेत्र के सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें होने लगीं हैं। वैसे भी जिले का केवलारी विस क्षेत्र कांग्रेस का एक ऐसा मजबूत गढ़ है जहां से कांग्रेस सिर्फ दो चुनाव,1962 और 1990 में,ही हारी है। अन्यथा 1967 से 1985 तक के पांच विस चुनाव कांग्रेस की कु. विमला वर्मा और 1993 से 2008 तक के चार विस चुनाव कांग्रेस के स्व. हरवंश सिंह चुनाव जीते है। आगामी विस चुनाव में स्व. हरवंश सिंह के ज्येष्ठ पुत्र रजनीश सिंह कांग्रेस के प्रबल दावेदार है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सूबे के शहंशाह स्व. हरवंश सिंह को एक शासकीय समारोह के सार्वजनिक मंच से स्व. हरवंश सिंह को एक शानदार और जानदार राजनेता बता चुके हैं। अब देखना यह है कि ये सूबे के शहंशाह के नजदीकी शाही पर्यावरण मित्र चुनावी साल में अपनी आमद से कांग्रेस या भाजपा में से किस पार्टी का राजनैतिक प्रदूषण समाप्त करेंगें।
और अंत में -जिले के राजनैतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा केवलारी विस क्षेत्र इस बार भी महत्वपूर्ण ही रहेगा। यहां से इस बार कांग्रेस के विधायक रहे स्व0 हरवंश सिंह के ज्येष्ठ पुत्र रजनीश सिंह टिकटि के प्रबल दावेदार हैं। इनके अलावा क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व जनपद अध्यक्ष डॉ. वसंत तिवारी,जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष शक्ति सिंह,ब्लाक इंका के पूर्व अध्यक्ष दिलीप दुबे, जिला इंका के उपाध्यक्ष जकी अनवर और क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं प्रदेश प्रतिनिधि मो. शफीक पटेल के पुत्र अतीक पटेल ने भी टिकिट की दावेदारी की हैं। हालांकि कांग्रेस में किसी भी विस क्षेत्र टिकिट मांगने वालों की यह संख्या सबसे कम हैं लेकिन सियासी हल्कों में यह इसलिये चर्चित हैं कि 20 साल में पहली बार इस क्षेत्र से टिकिट की मांग अन्य नेताओं ने भी की हैं। क्षेत्री विधायक रहे स्व. हरवंश सिंह के निधन के चंद महीनों बाद ही उनके गृह क्षेत्र में नेताओं की आवाज मुखर होना महत्वपूर्ण माना जा रहा हैंमु।”साफिर”
सा. दर्पण झूठ ना बोले
30 जुलाई 13

Monday, July 8, 2013

अत्यंत घिनौने कृत्य के आरोप में स्तीफा देने वाले  वित्त मंत्री राघवजी का पुतला जलाया कांग्रेसियों ने 
 बीते दिनों जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक बरघाट में सम्पन्न हुयी। इस बैठक में राहुल गांधी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक पल्लब लोचनदास भी उपस्थित थे। राहुल गांधी के भोपाल प्रवास के दौरान ब्लाक और जिला संगठन के पदाधिकारियों द्वारा कोई अधिकार नहीं होने की शिकायत की थी। कांग्रेस आला कमान द्वारा प्रत्याशी चयन जैसे महत्वपूर्ण को में ब्लाक और जिला कांग्रेस कमेटियों को यह अधिकार दिया गया था। लेकिन एक दूसरे से बुराई ना होने के चक्कर में संगठन ने ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा। इन दिनों प्रदेश का राजनैतिक तापमान एकदम से बढ़ गया हैं। इसकी तपिश ने प्रदेश के 80 वर्षीय बुजुर्ग वित्त मंत्री राघवजी की बलि ले ली हैं। राजधानी के हबीबगंज थाने में उनके एक नौकर रामकुमार दांगी ने उन पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाते हुये शपथ पत्र दिया। इसके बाद पटेरिया,ताजकुमार के पिता और उसके भाई के बयान आदि केस को कमजोर करने वाले साबित होंगें। नपा उपाध्यक्ष राजिक अकील के साथ अन्य युवा कांग्रेसियों ने भी राघवजी का पुतला जलाया।गौगपा के रोको,टोको और ठोंको अभ्यिान का पहला शिकार मुनमुन राय हो गये हैं। सिवनी विस क्षेत्र के एक गांव से उन्हें गौगपा के कार्यकर्त्ताओं ने गांव में घुसने नहीं दिया और बेरंग वापस जाने के लिये मजबूर कर दिया। यह समाचार अखबारों में सुर्खियों में इसलिये आ गया क्योंकि पिछले विस चुनाव में मुनमुन ने लगभग 30 हजार वोट लेकर कांग्रेस को तीसरे नंबंर पर ढ़केल दिया था।
जिला कांग्रेस ने अलाकमान को किया अधिकृत-बीते दिनों जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक बरघाट में सम्पन्न हुयी। इस बैठक में राहुल गांधी द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक पल्लब लोचनदास भी उपस्थित थे। यह बैठक आगामी विधानसभा चुनाव के लिये कि जिले के चारों विस क्षेत्रों के लिये कांग्रेस के प्रत्याशियों के चयन के लिये रखी गयी थी। बताया जा रहा था कि इस बैठक में हर विस क्षेत्र से तीन तीन उम्मीदवारों का पैनल बनाना था। उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी के भोपाल प्रवास के दौरान ब्लाक और जिला संगठन के पदाधिकारियों द्वारा कोई अधिकार नहीं होने की शिकायत की थी। बताया जा रहा है कि इसी को ध्यान में रखते हुये कांग्रेस आला कमान द्वारा प्रत्याशी चयन जैसे महत्वपूर्ण को में ब्लाक और जिला कांग्रेस कमेटियों को यह अधिकार दिया गया था। लेकिन एक दूसरे से बुराई ना होने के चक्कर में संगठन ने ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा। जिला कांग्रेस कमेटी की इस बैठक मे सख्ती के साथ इस बात का ध्यान रखा गया था कि जिले के पदाधिकारियों के अलावा अन्य नेता बैठक में शामिल ना हों। इसीलिये सिवनी नगर कांग्रेस कमेटी के महामंत्री संतोष उर्फ नान्हू पंजवानी से जिला इंका अध्यक्ष हीरा आसवानी ने अधिकृत नेताओं के नामों की सूची को पढ़वाया। बैठक में सिवनी के पूर्व प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना और प्रसन्न मालू भी शामिल हो गये थे लेकिन पर्यवेक्षक द्वारा उन्हें बाद में मिलकर अपनी बात रखने को कहा और वे बैठक से बाहर चले गये। वैसे जिला इंकाध्यक्ष ने जिले के सभी पूर्व प्रत्याशियों को बरघाट आमंत्रित किया था और कहा था कि बैठक के बाद पर्यवेक्षक आपसे चर्चा करेंगें। कांग्रेसी हल्कों में चर्चा है कि जब दो पूर्व प्रत्याशियों को बैठक में शामिल नहीं होने दिया गया तो फिर एक दर्जन से अधिक जिला कांग्रेस के महामंत्री होने के बाद भी पदाधिकारियों की सूची नगर कांग्रेस के महामंत्री से क्यों पढ़वायी गयी जबकि वे इस बैठक में शामिल होने की पात्रता भी नहीं रखते थे।  राहुल गांधी और आला कमान के निर्देश और गाइड लाइन भले ही पूरे प्रदेश के लिये लागू हो लेकिन जिले में इसको धता बताने में किसी को संकोच नहीं हुआ। इतनी महत्वपूर्ण बतायी जाने वाली इस बैठक में एक मात्र दो लाइन का प्रस्ताव पास करके सभी आवेदन कांग्रेस आला कमान को भेज दिया गया तथा जिला कांग्रेस की ओर से उन्हें अधिकृत कर दिया गया। बैठक के बाद पर्यवेक्षक से मिलकर पूर्व प्रत्याशी आशुतोष वर्मा, राजकुमार पप्पू खुराना,प्रसन्न मालू और नपा अध्यक्ष के पूर्व प्रत्याशी संजय भारद्वाज ने चर्चा कर राजनैतिक स्थिति से अवगत कराया।
अत्यंत घिनौने आरोप में नप गये राघवजी-इन दिनों प्रदेश का राजनैतिक तापमान एकदम से बढ़ गया हैं। इसकी तपिश ने प्रदेश के 80 वर्षीय बुजुर्ग वित्त मंत्री राघवजी की बलि ले ली हैं। राजधानी के हबीबगंज थाने में उनके एक नौकर रामकुमार दांगी ने उन पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाते हुये शपथ पत्र दिया और साथ में एक सी.डी. भी पुलिस को सौंप दी हैं। उसने अपने शपथपत्र में कहा है कि यह सी.डी. उसके दोस्त ने बनायी है। मूल दस्तावेज लेने वो जो गया है तो उसका पता नही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के निर्देश पर राघवजी का स्तीफा मंजूर हो गया है।स्तीफे के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और विदिशा के ही भाजपा नेता एवं प्रदेश के पूर्व निगम अध्यक्ष शिवशंकर पटेरिया ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेस लेकर यह दावा किया कि यह सी.डी. उन्होंने बनवायी है और वे भाजपा से गंदगी साफ करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने 22 सी.डी. बनवायीं हैं। प्रदेश भाजपा ने पटेरिया को निलंबित कर दिया है। इसके बाद दो दिनों से लापता राजकुमार के पिता ने मीडिया को यह बयान देकर सबको चौंका दिया है कि उनका पुत्र मांसिक रूप से बीमार है और उसने पहले भी एक बुजुर्ग आदमी पर ऐसा इल्जाम लगाकर उसके पैसा वसूला था। उसके पिता ने यह प्रमाणपत्र भी दे डाला कि राघवजी उसके पुत्र को बेटे की तरह रखते थे। इसके साथ ही राजकुमार के भाई ने विदिशा जिले के कुरवायी थाने में यह रिपोर्ट दर्ज करायी है कि मांसिक रूप से बीमार उसका भाई तीन महीनों से लापता हैं। अब यहां एक सवाल यह उठना स्वभाविक ही है कि यदि राजकुमार तीन तहीनों से लापता था तो भोपाल में राघवजी के खिलाफ शपथपत्र देने और दो दिनों से लापता होने के बाद ही उसके भाई के द्वारा यह रिपोर्ट क्यों दर्ज करायी गयी? अब राजकुमार ने खुद मीडिया के सामने आकर यह बयान दिया है कि उसके पिता और भाई को धमकी देकर यह सब कराया जा रहा हैं। विधि के विशेषज्ञों का यह मानना है कि थाने में शपथपत्र के साथ राजकुमार द्वारा आवेदन देने के बाद ऐसे तमाम बयान केस को कमजोर करने वाले साबित होंगें और भाजपा तथा प्रदेश सरकार अपने बुजुर्ग नेता राघवजी को बचाने के लिये ये सारे दांव पेंच खेल रही है। राघवजी के विरोध में पूरे प्रदेश में कांग्रेसी उनके पुतले जलाकर उनके खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग कर रहें हैं। इसी क्रम में नपा उपाध्यक्ष राजिक अकील के साथ अन्य युवा कांग्रेसियों ने भी राघवजी का पुतला जलाया। मुख्य प्रश्न तो यह है कि आखिर राजनीति के शिखर में बैठे ऐसे जिम्मेदार नेता ही ऐसा आचरण और अपना चरित्र पेश करेंगें तो उनके अनुयायी और युवा पीढ़ी आखिर किस बात के लिये प्रेरित होंगें?
गौगपा ने मुनमुन को गांव में घुसने नहीं दिया-गौगपा के रोको,टोको और ठोंको अभ्यिान का पहला शिकार मुनमुन राय हो गये हैं। सिवनी विस क्षेत्र के एक गांव से उन्हें गौगपा के कार्यकर्त्ताओं ने गांव में घुसने नहीं दिया और बेरंग वापस जाने के लिये मजबूर कर दिया। यह समाचार अखबारों में सुर्खियों में इसलिये आ गया क्योंकि पिछले विस चुनाव में मुनमुन ने लगभग 30 हजार वोट लेकर कांग्रेस को तीसरे नंबंर पर ढ़केल दिया था। उल्लेखनीय है कि मुनमुन इस बार फिर कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाने लिये चुनाव लड़ना चाह रहें हैं। अभी यह कहना मुश्किल हैं कि मुनमुन की सेंधमारी उन्हें जिताने लायक साबित होती हैं या फिर भाजपा को जिताने में मददगार होती है? गौगपा के ऐसे तीखे तेवरों से यह अंदेशा हो रहा है कि पिछले चुनाव में छपारा ब्लाक की 34 पंचायतों में मुनमुन ने आदिवासियों के काफी वोट ले लिये थे वो अब संभव हो पायेगा या नही? आदिवासी और मुस्लिम वोटों के भरोसे इस बार मुनमुन कितनी सेंधमारी कर पायेंगें? यह कहना फिलहाल संभव नहीं हैं। “मुसाफिर“

साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले 
09 जुलाई 2013 से साभार 
पांच बार से हारने वाले सिवनी विस क्षेत्र के इंका ग्रामीण पृष्ठभूमि के बाईस टिकटार्थी हुये लामबंद
जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष धर्मेन्द्र सिंह की पहल लायी रंग
सिवनी।जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष ठा. धर्मेन्द्र सिंह की पहल पर ग्रामीण क्षेत्र के इंका के टिकटार्थियों की एक बैठक संपन्न हुयी जिसमें उनमें से किसी को भी टिकिट देने का प्रस्ताव पास किया गया।
सिवनी विधानसभा क्षेत्र्ा के लिय्ो कांग्रेस पार्टी केे ३८ नेताओं ने टिकिट की मांग की है। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया है कि पार्टी हाईकमान द्वारा उनका आग्रह न माने जाने की स्थिति में जिस किसी भी व्य्ाक्ति को पार्टी का उम्मीदवार बनाय्ाा जाय्ोगा उसे विजय्ाी बनाने के लिय्ो जीतोड मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोडी जावेगी।
इस बैठक में ३८ में से जो २२ दावेदार एकत्र्ाित हुय्ो थे वे सभी मूलतः ग्रामीण परिवेश से जुडे हुय्ो हैं। उनके पैतृक घर और कारोबार सभी कुछ गांव पर निर्भर हैं। य्ाद्यपि इनमें से कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने बाल बच्चों के भविष्य्ा को ध्य्ाान में रखकर नगरीय्ा परिवेश में भी निवास करते हैं। किंतु है वे मूलतः ग्रामीण ही और इसी आधार पर य्ो सभी लोग इन २२ में से किसी एक को पार्टी की टिकिट दिय्ो जाने की मांग को लेकर आगामी १२ जुलाई को केन्द्रीय्ा मंत्र्ाी कमलनाथ से मिलने छिंदवाडा पहंुचने वाले हैं।
आज की बैठक में ग्रामीण परिवेश से जुडे जो २२ लोग एकमत होकर शामिल हुय्ो थे उनमें सर्वश्री रमेश जैन,आरिफ  खान, गुलाब साहू, श्रीमती फ रिदा अंसारी, धर्मेन्द्र सिंह ठाकुर, चंद्रभान सिंह बघेल, बसीर खान, बहादुर सनोडिय्ाा, पदम सनोडिय्ाा, शिवराम सनोडिय्ाा, आशा सनोडिय्ाा, कविता कहार, कीरतसिंह बघेल, आदित्य्ा सिंह, मृत्य्ाुंजय्ा सेंगर, मोहन चंदेल, सेवकराम चंद्रवंशी, श्रीमती रंजीता बघेल, जय्ादीप सिंह बैस व ओम प्रकाश तिवारी का समावेश है। ३८ में से कुल ग्रामीण परिवेश के २४ दावेदार हैं। जिनमें दिलीप बघेल और प्रदीप राय के आने का उल्लेख किया गया हैं।
बैठक में उपस्थित इन २२ लोगों ने आपस में विचार विमर्श करने के बाद जिन तथ्य्ाों को पार्टी के हाईकमान और वरिष्ठ नेताओं को अवगत कराने का निर्णय्ा लिय्ाा है उसके अनुसार सिवनी विधानसभा क्षेत्र्ा में ७॰ से ८॰ प्रतिशत मतदाता ग्रामीण क्षेत्र्ा के हैं और इसी आधार पर वे य्ाह चाहते हैं कि इस बार पार्टी की टिकिट ग्रामीण परिवेश से जुडे व्य्ाक्ति को ही दी जाय्ो। बैठक में यह भी बताया गया कि 1985 में ग्रामीण परिवेश के रमेश जैन को टिकिट देने और उनके जीतने के बाद भी सन 1990 से सभी नगरीय क्षेत्र से प्रत्याशी बनाये गये और कांग्रेस तभी से चुनाव हार रही हैं। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 1990 में स्व. हरवंश सिंह को टिकिट दी थी और वे चुनाव हार गये थे। 
इन्हें नहीं माना गया ग्रामीण परिवेश का
सिवनी। जिला कांग्रेस में सिवनी विस क्षेत्र के लिये टिकिट मांगने वाले नेताओं को ग्रामीण परिवेश का नहीं माना गया। इनमें श्रीमती पुष्पा रमेशचंद जैन,जकी अनवर खान, राजकुमार खुराना, राजा बघेल,हाजी सोहेल पाशा, संजय ारद्वाज, मो.असलम खान,घनश्याम जड़ेजा,श्रीमती नेहा सिंह,अजय पेशवानी,सुश्री हेमलता जैन, श्रीमती अल्पना राणा, खुमान सिंह,जयकिशोर वर्मा,विजय चौरसिया के नाम शामिल हैं। इस बैठक को लेकर कांग्रेस से टिकिट मांगने वाले नेताओं के बीच इस बात को लेकर जमकर चर्चायें जारी हैं कि गांव और शहर की बात चलने के पीछे आखिर कारण क्या है,इसे कौन शह दे रहा हैं और अंततः इससे किसको लाभ होगा?  
बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि उनके इस आग्रह के बाद भी य्ादि पार्टी किसी अन्य्ा व्य्ाक्ति को अपना उम्मीदवार बनाती है तो भी य्ो सभी २२ लोग उसे विजय्ाी बनाने में अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं रहने देंगे। उपस्थित दावेदारों ने कहा है कि पार्टी को विजय्ाी बनाने का संकल्प लेने ही आज वे मातृधाम में अपनी इस बैठक को आय्ाोजित किय्ो हैं और माता राजराजेश्वरी के सामने संकल्पबद्घ हो गय्ो हैं।
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले 
09 जुलाई 2013 से साभार 

Monday, June 24, 2013

कमलनाथ को काले झंड़े दिखाने वाले जनमंच ने शिवराज के आने पर विज्ञप्ति जारी कर लगायी गुहार
जनमंच ने कमलनाथ के आगमन पर काले झडे़ं दिखायश्े जबकि शिवराज सिंह के आगमन पर केवल विज्ञप्ति जारी अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली। इससे क्या यह प्रमाणित नहीं होता हैं कि जनमंच पर भाजपा की बी टीम बन कर आरोप गलत नहीं हैं? शायद इसीलिये जनमंच से जन दूर हो गया है और केवल मंच ही शेष रह गया है। जिले के केवलारी विस क्षेत्र से डॉ. वसंत तिवारी की दावेदारी के समचार अखबारों में सुर्खियां बने हुये हैं। अपने दावे को पुख्ता बताने के लिये डॉ. तिवारी के समर्थन में प्रकाशित होने वाले समाचारों में सन 1993 के टिकिट वितरण के मामले को उछाला जा रहा हैं। बताया जा रहा है कि तत्कालीन सांसद कु. विमला वर्मा ने अपने कर्म क्षेत्र केवलारी को छोड़कर अपने कोटे की टिकिट सिवनी से आशुतोष वर्मा को दिलवा दी। लेकिन यह तथ्य सही नहीं हैं। केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के दौरे के बाद सिवनी विस क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडने वाले मुनमुन राय का बयान अखबारों में सुर्खियों में रहा कि उन्हें किसी नाथ की जरूरत नहीं हैं उनके साथ 30 हजार मतदाताओं का साथ हैं। यह जगजाहिर से उन्हें भाजपा और इंका के असंतुष्टों ने खुले आम मदद की थी। इंका के क्षत्रप का तो उन्हें खुला समर्थन प्राप्त था। 
नाथ के लिये काले झंड़े शिवराज के लिये सिर्फ विज्ञप्ति..वाह जनमंच-जिले के नागरिकों द्वारा फोर लेन के संघर्ष के लिये जनमंच नामक गैर राजनैतिक संगठन का गठन किया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सिवनी का मामला दर्ज हो जाने के बाद इसके चंद कर्त्ता धर्त्ताओं ने इसके राजनीतिकरण करने का प्रयास प्रारंभ कर दिया था। कार्यक्रमों में जहां एक तरफ कांग्रेस नेताओं का विरोध तो किया जाता था लेकिन भाजपा के नेताओं पर निशाना साधने से परहेज किया जाने लगा था। इस कारण धीरे धीरे कई प्रमुख लोगों ने इससे किनारा करना चालू कर दिया था। धीरे धीरे यह जन धारणा बनने लगी थी कि जनमंच भाजपा की टीम बन गयी है। एक तरफ तो केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ पर आरोप लगा कि उन्होंने फोर लेन में व्यवधान डाले तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी स्थानीय मिशन स्कूल ग्राउंड़ में यह सिंह गर्जना की थी कि सूरज चाहे पूरब की जगह पश्चिम से ऊगने लगे लेकिन फोर लेन सिवनी से ही जायेगी। इतना ही नहीं जनमंच के प्रतिनधिमंड़ल को भी शिवराज सिंह ने दो बार यह आश्वासन दिया था कि वो जनमंच का प्रतिनधि मंड़ल अपने साथ दिल्ली ले जायेंगें और प्रधानमंत्री सहित अन्य केन्द्रीय मंत्रियों से मिलवा कर समस्या को दूर करने का प्रयास करेंगें। यह बात जनमंच के संजय तिवारी ने खुद अखबारों में विज्ञप्तियां प्रकाशित कर छपवायी थी। हाल ही 13 जून को केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का सिवनी आगमन हुआ था। इस दौरान जनमंच ने उनको काले झंड़े दिखाकर अपना विरोध प्रगट किया था। इसके ठीक  9 दिन बाद जब प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिवनी आये तो जनमंच ने उनसे विज्ञप्ति जारी करके गुहार लगाना ही उचित ही समझा। जनमंच ने उनको काले झंड़े दिखाना जरूरी नहीं समझा। जनमंच के इस दोहरे चरित्र से यह स्पष्ट हो गया है कि जनमंच अब एक गैर राजनैतिक संगठन नहीं रह गया हैं। होना तो यह था कि शिवराज को भी काले झंड़े दिखाये जाते और उनकी कई अधूरी घोषणाओं के पूरे ना होने पर उनका विरोध किया जाता। इन तमाम बातो ऐसा लगना स्वभाविक ही है कि जनमंच अब भाजपा की बी टीम के रूप में काम करने वाला मंच बन कर रह गया है जिससे जन दूर हो गये है।
केवलारी से वसंत का दवाःतथ्यों को तोड़ मरोड़ कर परोसा -जिले के केवलारी विस क्षेत्र से डॉ. वसंत तिवारी की दावेदारी के समचार अखबारों में सुर्खियां बने हुये हैं। अपने दावे को पुख्ता बताने के लिये डॉ. तिवारी के समर्थन में प्रकाशित होने वाले समाचारों में सन 1993 के टिकिट वितरण के मामले को उछाला जा रहा हैं। इसमें कुछ तथ्यों को ऐसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है जिसमें जिले की वरिष्ठ इंका नेत्री कु. विमला वर्मा कां इंगित कर डॉ. तिवारी के त्याग को प्रचारित किया जा रहा हैं। बताया जा रहा है कि तत्कालीन सांसद कु. विमला वर्मा ने अपने कर्म क्षेत्र केवलारी को छोड़कर अपने कोटे की टिकिट सिवनी से आशुतोष वर्मा को दिलवा दी। लेकिन यह तथ्य सही नहीं हैं। सन 1990 में सिवनी क्षेत्र से स्व. हरवंश सिंह चुनाव लड़े थे और वे 6086 वोटों से चुनाव हार गये थे। कांग्रेस ने यह नीति बनायी थी कि पिछला चुनाव पांच हजार से अधिक वोटों से हारने वालों को टिकिट नहीं देगी। स्व. हरवंश सिंह उन दिनों प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री थे और वे ये बात जानते थे कि उनको सिवनी से टिकिट नहीं मिलेगी। इसीलिये उन्होंने कु विमला वर्मा के सांसद बन जाने के बाद केवलारी जैसे सुरक्षित क्षेत्र से टिकिट पाने की रणनीति बनायी थी। उल्लेखनीय है कि 1967 से लेकर 1985 तक कांग्रेस से विमला वर्मा ही चुनाव जीत रहीं थीं। 1990 में वे चुनाव हारीं थीं। अपनी रणनीति के तहत स्व. हरवंश सिंह ने जब जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज से बर्रा में भागवत करायी थी तब से ही उन्होंने केवलारी के केन्द्र में रख कर काम करना चालू कर दिया था। सांसद के रूप में विमला वर्मा ने केवलारी क्षेत्र से जिन तीन नामों का पैनल दिया था उसमें डॉ. वसंत तिवारी,स्व. ठा. रामनारायण सिंह और दादू राघवेन्द्रनाथ सिंह के नाम शामिल थे।लेकिन प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री होने के नाते अपनी राजनैतिक रसूख के साथ उन्होंनें स्वामी जी का भी आर्शीवाद प्राप्त कर लिया था जो कि उनकी टिकिट में निर्णायक साबित हो गया था। इन सब बातों को डॉ. वसंत तिवारी भी जानते हैं। लेकिन एक सच्चे कांग्रेसी के रूप में उन्होंनें केवलारी में कांग्रेस का काम किया और बाद में वे जनपद अध्यक्ष भी बने। अब वे यदि टिकिट की दावेदारी कर रहें हैं तो अपना दावा खें इसमें कोई बुरायी नहीं हैं लेकिन तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने वाले कोई तथ्य यदि अखबारों में प्रकाशित होते है तो उनका खंड़न करने का साहस भी उन्हें दिखाना चाहिये। 
कोई नाथ की चाह नहीं मुनमुन को-केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के दौरे के बाद सिवनी विस क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लडने वाले मुनमुन राय का बयान अखबारों में सुर्खियों में रहा कि उन्हें किसी नाथ की जरूरत नहीं हैं उनके साथ 30 हजार मतदाताओं का साथ हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि ऐसे समाचार आये थे कि उन्होंने कांग्रेस में प्रवेश हेतु कमलनाथ से प्रयास किया था। इसके संबंध में उन्होंने यह बयान जारी किया है। मुनमुन राय ने 2008 का चुनाव सिवनी से लड़ा था। यह जगजाहिर से उन्हें भाजपा और इंका के असंतुष्टों ने खुले आम मदद की थी। इंका के क्षत्रप का तो उन्हें खुला समर्थन प्राप्त था। उनके तमाम समर्थकों ने सरेआम अपने हाथों में पंजे के बजाय कप बसी थाम ली थी। यह बात अलग है कि कांग्रेस में या भाजपा में किसी के भी खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं हुयी थी। लेकिन कम से कम मुनमुन राय तो इस बात को भली भांति समझते ही है कि उन्हें तीस हजार वोट कैसे और किसके सहारे मिले थे? हालांकि वे इस बार भी सिवनी से चुनाव लड़ने की तैयारी में है लेकिन इस बार उन्हें नये सिरे से रणनीति बनाये बिना सम्मानजनक स्थिति बनाये रखना बहुत ही कठिन होगा। जिले में कांग्रेस का नया परिवेश कितनामजबूत होगा और भाजपा और निर्दलीयों के लिये कितना चुनौतीपूर्ण होगा? यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। “मुसाफिर“ 

दर्पण झूठ ना बोले
25 जून 2013 से साभार
फिर ठगे गये शिव की नगरी के वासी शिवराज से
सिवनी। शिव की नगरी सिवनी से ना जाने शिवराज का क्या बैर है कि उनके राज में जिले को कुछ मिला तो नहीं छिन जरूर गया। जिले की लगभग पेंतीस ऐसी घोषणायें है जो आज तक पूरी नहीं हुयीं है। यह भी पहला मौका है कि उनके राज में जिला मंत्री विहीन रहा है। 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राज में शिव की नगरी सिवनी सबसे ज्यादा नुकसान में रही है। उनका हर दौरा जिले के साथ छलावा ही रहा है। मुख्यमंत्री ने घोषणाओं का तो हर दौरे में अंबार लगा दिया और जिले के भाजपा नेताओं ने उनकी घोषणाओं पर आभार भी खूब व्यक्त किया लेकिन अंततः वे घोषणावीर ही साबित हुये। उनकी ज्यदातर घोषणायें अपने पूरा होने का इंतजार ही कर रहीं है। इसमें यदि यह कहा जाये कि जिले के भाजपा के जनप्रतिनिधि भी बराबरी के दोषी हैं तो कोई गलत बात नहीं होगी। वे भी हर बार उनके आगमन पर नयी नयी मांग तो करतें गये लेकिन पूर्व की घोषणाओं पर अमल के लिये अपने ही मुख्यमंत्री को मजबूर नहीं करा पाये। 
इस दौरे में तो हद ही हो गयी। मुख्यमंत्री ने अपनी ही पूर्व में की गयी अधूरी घोषणाओं को ही एक बार फिर से करने का करतब भी दिखा डाला है। चाहे वह नर्सिंग कॉलेज की हो या फिर फोर लेन की हो। 
फोर लेन के मामले में शिवराज ने सफाई दी कि वे इस मामले में जयराम रमेश से मिल थे। लेकिन उनकी इन मुलाकातों के जितने भी समाचार सूचना प्रकाशन विभाग से जारी हुये उनमें विभिन्न योजनाओं का तो जिक्र था लेकिन सिवनी की फोर लेन का नहीं था। और तो और केन्द्र में लगभग साल भर से जयंती नटराजन वन एवं पर्यावरण मंत्री है जिनका अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने जिक्र तक नही किया। उन्होंने यह भी कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार के बीच एक पेंच फंसा हुआ हैं जबकि फोर लेन का मामला नेशनल टाइगर कंजरवेश अर्थारिटी ऑफउ इंड़िया में एन.ओ.सी. के लिये लंबित है। इससे यह साफ जाहिर होता है सिवनी में सिंह गर्जना करने के अलावा मुख्यमंत्री इस मामले में कितने गंभीर है। मेडिकल कॉलेज, एग्रीकल्चर कॉलेज,संभाग जैसी कई मांगें हैं जिनका कोई समाधान नहीं हुआ है। सिवनी का एक और रिकार्ड शिवराज के नाम दर्ज हो गया हैं। अंतरिम सरकार से लेकर अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि सत्तादल का जिले से विधायक जीता हो और जिले से मंत्रीमंड़ल में कोई मंत्री ना बना हो। एक बार सन 1977 में जरूर जिले से कोई मंत्री नहीं बना था क्योंकि सत्तारूढ़ जनता पार्टी का एक भी विधायक जिले सें जीता नहीं था। जिले की पांचों विस सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के दोनों कार्यकाल के लगभग आठ वर्षों से जिले में चार में तीन भाजपा के विधायक होने के बाद भी किसी को शिवराज ने मंत्री नहीं बनाया। और तो और प्रदेश में जिन सांसदों को विस चुना लड़ाया था उनमें नीता पटेरिया को छोड़कर सभी मंत्री बन गये। हालांकि दो भाजपा नेताओं को लालबत्ती जरूर दी गयी है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि जब बिना कुछ दिये सांसद,तीन विधायक और नगर पालिका काचुनाव भाजपा जीत जाती हैं तो भला शिवराज शिव की नगरी को कुछ क्यों देंगें?
दर्पण झूठ ना बोले
25 जून 2013 से साभार

Tuesday, June 11, 2013

भाजपा में टिकिट को लेकर मची भारी धमासान विस की चुनावी जंग में पड़ सकती है भारी
कांग्रेस के कद्दावर नेता और केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का 13 जून को आगमन को हो रहा हैं। उनके इस कार्यक्रम के साथ ही प्रदेश कांग्रेस  से यह भी जानकारी दी गयी है कि प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रति पक्ष अजय सिंह भी आ रहे हैं। जिले के सभी कांग्रेसियों के बीच समन्वय बनाते हुये कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास किये जा रहें है। जिले के बदले हुय राजनैतिक हालात में कमलनाथ, कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह का यह दौरा कांग्रेसियों में कितनी ऊर्जा का सुचार करता है? इस पर ही कांग्रेस की भावी राजनीति निर्भर करेगी। मिशन 2013 को लेकर जिले में सपा,बसपा और गौगपा की रानजैतिक गतिविधयां भी जोर पकड़ रहीं है। हालांकि इन पार्टियों का जिले में ऐसा वर्चस्व नही है कि वे कोई भी सीट जीत सकें लेकिन चुनावी गणित बिगाड़ने में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। राजनैतिक रूप से देखा जाये भाजपा के लिये मिशन 2013 की जंग कोई कठिन नहीं है। चार में से तीन विधायक भाजपा के है और दो नेताओं के पास लाल बत्ती है। नपा अध्यक्ष भी भाजपा का है। लेकिन टिकिट को लेकर भाजपा में मची भारी घमासान ही उसके लिये घातक साबित हो सकती हैं।
कमलनाथ,भूरिया और अजय सिंह का दौरा निर्णायक होगा- इन दिनों कांग्रेस की राजनीति में काफी हल चल मची हुयी हैं। जिले के इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के निधन के बाद यह पहला मौका है कि कांग्रेस में एक राजनैतिक उत्सुकता पैदा हुयी हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के कद्दावर नेता और केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का 13 जून को आगमन को हो रहा हैं। उनके इस कार्यक्रम के साथ ही प्रदेश कांग्रेस  से यह भी जानकारी दी गयी है कि प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रति पक्ष अजय सिंह भी आ रहे हैं। इसलिये यह कार्यकर्त्ता सम्मेलन के साथ ही परिवर्तन यात्रा के रूप में भी मानी जा रही हैं। पड़ोसी सांसद कमलनाथ ने अपने विश्वस्त अबरार अहमद और पं. राममूर्ति मिश्रा को पर्यवेक्षक बना कर भेजा हैं। छिंदवाड़ा जिला इंका के उपाध्यक्ष रिजवी भी यहां दौरे कर रहें हैं। जिले के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में कमलनाथ के विश्वस्त ये नेता स्वयं मीटिंग लेकर तैयारियों का जायजा ले रहें हैं और सभी उन नेताओं से मिल रहें हैं जो पिछले दस पंद्रह सालों से उपेक्षा के चलते घर बैठ गये थे। हालांकि मीडिया में सिवनी लोस क्षेत्र के विलापन,फोर लेन,बड़ी रेल लाइन और संभाग को लेकर नाथ की भूमिका पर सवालिया निशान लगाने वाले समाचार भी प्रकाशित हुये हैं। अब देखना यह है कि इन मुद्दों पर कमलनाथ क्या कार्यवाही करते हैं?
यह अभी भविष्य की गर्त में हैं। इंकाइयों में व्याप्त चर्चा के अनुसार मिशन 2013 और 2014 के लिये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा जो प्रभार तय किये गये हैं उनमें महाकौशल का प्रभार केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को दिया गया हैं। प्रदेश कांग्रेस ने नव गठित कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के बीच विधानसभा वार जो प्रभार सौंपा है उसमे महाकौशल क्षेत्र की विधानसभाओं का प्रभार नाथ समर्थकों को ही दिया गया है। इसी के तहत प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष मो. अबरार अहमद को सिवनी जिले के चारों विस क्षेत्रों का प्रभारी बनाया गया है। इसे दृष्टिगत रखते हुये जिले के सभी कांग्रेसियों के बीच समन्वय बनाते हुये कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास किये जा रहें है। जिले के बदले हुये राजनैतिक हालात में कमलनाथ, कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह का यह दौरा कांग्रेसियों में कितनी ऊर्जा का सुचार करता है? इस पर ही कांग्रेस की भावी राजनीति निर्भर करेगी।  
सपा,बसपा और गौगपा की गतिविधियंा बढ़ीं- मिशन 2013 को लेकर जिले में सपा,बसपा और गौगपा की रानजैतिक गतिविधयां भी जोर पकड़ रहीं है। हालांकि इन पार्टियों का जिले में ऐसा वर्चस्व नही है कि वे कोई भी सीट जीत सकें लेकिन चुनावी गणित बिगाड़ने में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सपा और बसपा मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पैठ बनाने के प्रयास में है तो वहीं  गौगपा भी आदिवसियों के साथ ही मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित  करने का प्रयास कर रही हैं। वैसे एक बात यह भी सच है कि बहुसंख्यक मुस्लिम और आदिवासी नेता यह नहीं चाहते हैं कि भाजपा चुनाव जीते। लेकिेन चुनाव के दौरान इनके ऐसे रहनुमा पैदा हो जाते है जो कि उनमें से कुछ नेताओं को चुनावी जादूगर यह सब्जबाग दिखा देते हैं कि जीत के समीकरण शत प्रतिशत तुम्हारे ही पक्ष में हैं। इस बहकावे में मुस्लिम और आदिवासी वर्ग के नेता इन पार्टियों से या निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में  के रूप में चुनाव लड़ जाते हैं। लेकिन ये उम्मीदवार चुनाव तो नहीं जीतते लेकिन इतने वोट जरूर ले लेते है कि जिससे भाजपा की जीत हो जाती है जो कि इन वर्गों का बहुसंख्यक मतदाता नहीं चाहता है। एक तरह से यह भाजपा की जीत की अघोषित रणनीति बन चुकी है और चुनावी जंग में इसमें रसद भी झोंकी जाती हैं। कांग्रेस के असंतुष्ट इस आग में घी झोंकने के काम से कोई परहेज नहीं करते रहें हैं। इसीलिये कभी कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाला यह जिला आज भाजपा का मजबूत किला बन चुका हैं। 
जिला भाजपा में मची है टिकिट की घमासानं- भाजपा में भी मिशन 2013 को लेकर तैयारियां प्रारंभ हो चुकी हैं। जिले के चार विधानसभा क्षेत्रों में से तीन विस क्षेत्रों में भाजपा का कब्जा हैं। जिले के दोनों आदिवासी क्षेत्रों से भाजपा के विधायक के रूप में शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले चुने गये हैं। सिवनी विस सीट से भाजपा की ही नीता पटेरिया विधायक हैं। भाजपा के दो पूर्व विधायकों डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और नरेश दिवचाकर को शिवराज सरकार ने लाल बत्ती दे रखी हैं। सिवनी नगर पालिका के अध्यक्ष के रूप में भाजपा के ही राजेश त्रिवेदी बैठे हैं। इस लिहाज से देखा जाये भाजपा के लिये मिशन 2013 की जंग कोई कठिन नहीं है। लेकिन भाजपा में मची भारी घमासान ही उसके लिये घातक साबित हो सकती हैं। जहां तक दोनों आदिवासी विधायकों शशि ठाकुर और कमल मर्सकोले की बात है तो कमल के लिये भी टिकिट में अशोक टेकाम आड़े आ सकते हैं। वरना दोनो की टिकिट पक्की समझी जा रही हैं। लेकिन सिवनी को लेकर घमासान मची हुयी हैं। सिवनी के पूर्व विधायक ,मविप्रा एवं जिला भाजपा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर खुद सिवनी से टिकिट के प्रबल दावेदार हैं। नरेश समर्थकों के गणित के अनुसार नीता पटेरिया को केवलारी से लड़ाने का सुझाव है और रहा सवाल डॉ. बिसेन का तो उन्हें बालाघाट संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारने की बात कही जा रही हैं। लेकिन प्रदेश भाजपा के सूत्रों का कहना है कि केवलारी से डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन को ही लड़ाया जायेगा। यदि ऐसा होता है तो सिवनी से किसी अन्य नेता को टिकिट तभी मिल सकती है जब कि नीता पटेरिया की टिकिट कटे। इस स्थिति में नरेश के अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी टिकिट के दावेदार बन सकते है। राजेश समर्थकों का तर्क है कि नीता की टिकिट काट कर यदि भाजपा ब्राम्हण को टिकिट नहीं देगी तो जिले भर के ब्राम्हण मतदाता नाराज हो जायेंगें जो कि भाजपा के लिये नुकसान दायक होगा। इन हालातों में यदि ज्यादा घमासान मचा तो भाजपा वर्तमान विधायक नीता पटेरिया को ही मैदान में फिर से उतार सकती है। इन परिस्थितियों में भाजपा के चारो प्रत्याशी ही एक बार फिर अपनी किस्मत आजमायेंगें। “मुसाफिर”
दर्पण झूठ ना बोले
11 जून 2013 से साभार
कमलनाथ,भूरिया और अजय सिंह परिवर्तन यात्रा में होंगें शामिल
सिवनी। कांग्रेस के कार्यकर्त्ता सम्मेलन और परिवर्तन यात्रा में शामिल होने केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ,प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का आगमन 13 जून को हो रहा है। 
जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक एवं विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह के आकस्मिक दुखद निधन के बाद यह पहला बड़ा कार्यक्रम हैं जो सिवनी जिले में हो रहा है। ठा. हरवंश सिंह के जीवन काल में जिले की सारी राजनति उनके इर्द गिर्द की घूमती थी।
जिले के कांग्रेसजनों में इस दौरे को लेकर काफी उत्साह दिखायी दे रहा हैं। जिला कांग्रेस द्वारा आयोजित 5 जून की बैठक के बाद सभी ब्लाक कांग्रेस कमेटियों ने अपनी अपनी बैठकें करके कार्यक्रम को सफल बनाने के प्रयास किये है।
इस कार्यक्रम के लिये प्रदेश कांग्रेस ने भी अपने पर्यवेक्षक के रूप में उपाध्यक्ष एवं जिले के प्रभारी मो. अबरार अहमद एवं जबलपुर के वरिष्ठ इंका नेता राममूर्ति मिश्रा को नियुक्त किया हैं। इसके साथ ही छिंदवाड़ा के जिला कांग्रेस के उपाध्यक्ष जनाब रिजवी भी जिले का सघन दौरा कर रहें हैं।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी,नगर कांग्रेस अध्यक्ष इमरान पटेल एवं प्रदेश प्रतिनिधि राजकुमार पप्पू खुराना सहित सभी कांग्रेस के पदाधिकारी इसे सफल बनाने में जुटे हुये हैं।
इस परिवर्तन यात्रा और कार्यकर्त्ता सम्मेलन से जिले की विकास यात्रा और कांग्रेस की राजनीति में भी परिवर्तन की राजनैतिक विश्लेषकों को अपेक्षा हैं। जानकारों का मानना है कि जिले की बदली हुयी राजनैतिक परिस्थितियों में बदलाव अवश्यंभावी हैं और बदलाव जिले के विकास में सहायक होगा।
अब देखना यह है कि इस सब कवायद से जिले की विकास यात्रा और कांग्रेस की राजनीति में कोई बदलाव आता हैं या नतीजा वही ढाक के तीन पात निकलता है? यह तो अभी भविष्य की गर्त में छिपा हुआ हैं।
फिर टला अटल अभियान
सिवनी। पूरे प्रदेश में चौबीस घंटें बिजली देने के लिये चलाये जा रहा अटल ज्योति अभियान जिले में तीसरी बार फिर टल गया हैं। यह कार्यक्रम बार बार क्यों टल रहा है? इसका जवाब देने को तैयार नहीं हैं। 
ृजानकारों का मानना है कि इसका एक प्रमुख कारण जिला भाजपा की गुटबंदी हैं। लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों का यह दावा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिले में आने से इसलिये कतरा रहें है कि उनके द्वारा की गयी 35 घोषणायें अभी तक पूरी नहीं हुयी है। जिसमें फोरलेन और सतपुड़ा संभाग का मामला प्रमुख है। चुनावी साल में मुख्यमंत्री का इस तरह मुह चुराना सियासी हल्कों में चर्चित है। 
 दर्पण झूठ ना बोले
11 जून 2013 से साभार

Monday, June 3, 2013

जिले में भाजपा में ब्राम्हणों और जैनियों को मिल रही प्राथमिकता अन्य लोगों में नाराजगी का करण बन रही है
 विगत 14 मई को जिले के केवलारी क्षेत्र के विधायक और विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह का आकस्मिक दुखद निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार और त्रयोदशी संस्कार में कांग्रेस और भाजपा के कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने शोक संवेदना व्यक्त कर परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की। पक्ष एवं विपक्ष के नेताओं की उपस्थिति उनके राजनैतिक कद की परिचायक हैं। चुनावी साल में भाजपा की गुटबंदी जिले थमने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर,विधायक नीता पटेरिया और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी का त्रिकोण इन दिनों सियासी हल्कों में चर्चित हैं। हाल ही में हुये प्रदेश कांगेस के फेर बदल में सिवनी जिले के किसी भी नेता कों शामिल नहीं किया गया। और तो और प्रदेश कांग्रेस की महामंत्री गीता सिंह को भी निकाल दिया गया। भाजपा में पंड़ितों और जैनियों को जिले में सालों से मिल रही प्राथमिता के कारण पिछड़ा वर्ग,मुस्लिमों, आदिवासी और हरिजनो के मन में यह भावना घर करते जा रही है कि भाजपा में उनका अपना कोई भविष्य नहीं है। अगले चुनाव के लिये यह शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र तोमर के लिये एक चिंता का विषय बन सकता है।

स्व. हरवंश सिंह को मुसाफिर की श्रृद्धांजलीे- विगत 14 मई को जिले के केवलारी क्षेत्र के विधायक और विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश सिंह का आकस्मिक दुखद निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार और त्रयोदशी संस्कार में कांग्रेस और भाजपा के कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं ने शोक संवेदना व्यक्त कर परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की। पक्ष एवं विपक्ष के नेताओं की उपस्थिति उनके राजनैतिक कद की परिचायक हैं। जिले की राजनीति में वे लंबे समय से एक मात्र केन्द्र बिन्दु बने हुये थे। चौपाल से भोपाल तक का उनका सफर कई उतार चढ़ाव से भरा हुआ था। ऐसे कद्दावर इंका नेता के चुनावी साल में एका एक निधन से एक रिक्तता आ गयी है जो कैसे भरी जायेगी? इसे लेकर राजनैतिक क्षेत्रों में उत्सुकता बनी हुयी हैं। मुसाफिर स्व. ठा. हरवंश सिंह को अपनी विनम्र श्रृद्धांजली अर्पित करता है तथा परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि वो उन्हें विर शांति प्रदान करे और उनके परिजनो तथा शुभचिंतकों को यह गहन दुख वहन करने की शक्ति प्रदान करें।  
अविश्वास प्रस्ताव बनाम भाजपायी गुटबंदीे-चुनावी साल में भाजपा की गुटबंदी जिले थमने के बजाय और बढ़ती जा रही हैं। जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर,विधायक नीता पटेरिया और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी का त्रिकोण इन दिनों सियासी हल्कों में चर्चित हैं। नीता पटेरिया सिवनी की विधायक हैं। नरेश सिवनी के पूर्व विधायक है और फिर टिकिट की जुगत में हैं। राजेश पालिका अध्यक्ष है और सिवनी से युवा और नये चेहरे के रूप में टिकिट पाना चाह रहें हैं। फिलहाल तो सिवनी सीट भाजपा में खाली नहीं है लेकिन ना जाने क्यों इसे खाली मानकर ही टिकिट की जुगाड़ और इसके लिये राजनैतिक दांव पेंच चालू हो चुके हैं। पिछले दिनों जिला भाजपा कार्यालय में पालिका के भाजपा पार्षदों की बैठक हुयी जिसमें पालिका के कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजिक अकील के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का निर्णय लेकर कलेक्टर के यहां पेश कर दिया गया। भाजपायी हल्कों में चर्चा है कि इस निर्णय में भाजपा के ही पालिका अध्यक्ष को विश्वास में नहीं लिया गया। इसमें रणनीति यह बतायी जा रही है कि यदि अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया तो यश जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर को मिलेगा और यदि प्रस्ताव गिर गया तो ठीकरा पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के सिर पर फोड़ दिया जायेगा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि परिषद में कांग्रेस के 13 और भाजपा के अध्यक्ष और 11 पार्षद हैं जबकि अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के लिये कुल संख्या के दो तिहायी वोट प्रस्ताव के पक्ष में पड़ना चाहिये। एक तरह से यह निश्चित माना जा रहा है कि इस खेल में भाजपा को मुंह की खानी पड़ सकती हैं। यह सब जानते हुये भी अविश्वास प्रस्ताव लाना भाजपा की गुटबंदी का ही परिणाम हैं। जिला भाजपा में एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में वो नगर विकास अवरुद्ध हो रहा है जिसका वायदा चुनाव के समय रोड़ शो करके प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया था।
गीता की छुट्टी प्रदेश कांग्रेस में प्रतिनिधित्व समाप्त-हाल ही में हुये प्रदेश कांगेस के फेर बदल में सिवनी जिले के किसी भी नेता कों शामिल नहीं किया गया। और तो और प्रदेश कांग्रेस की महामंत्री गीता सिंह को भी निकाल दिया गया। उल्लेखनीय है कि गीता सिंह कांग्रेस के विधायक स्व. रणधीर सिंह की पत्नी हैं। आपके आजा ससुर दीप सिंह और ससुर सत्येन्द्र सिंह भी विधायक थे। युवा रणधीर की अकाल मृत्यु के बाद हुये उप चुनाव में गीता को कांग्रेस की टिकिट नहीं मिली थी। उसके बाद से वे कांग्रेस की राजनीति में हासिये थीं। लेकिन जब दिग्गी समर्थक कांतिलाल भूरिया प्रदेश अध्यक्ष बने तो उन्हें एकदम से प्रदेश में महामंत्री जैसे पद की जवाबदारी मिल गयी। लेकिन ना जाने क्यों इसके बाद भी वे अपने पद के अनुसार सक्रिय नहीं हो पायीं और अपने प्रभार के जिले में भी एक बार भी नहीं गयीं। इन्हीं सब कारणों से शायद उनकी छुट्टी हो गयी। इसके साथ ही प्रदेश कांग्रेस में जिले का प्रतिनिधित्व ही समाप्त हो गया। एक समय था जब 1977 की जनता लहर में जिले की पांचों सीटें कांग्रेस ने जीत कर समूचे उत्तर भारत में एक रिकार्ड बनाया था। लेकिन आज जिले की चार में से तीन सीटें भाजपा के पास है जिसमें से दो बरघाट और सिवनी में भाजपा पांच बार से चुनाव जीत रही हैं।ऐसे हालात में जिले में कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिये नेतृत्व को ध्यान देना होगा अन्यथा मिशन 2013 और 2014 को फतह करना एक कठिन काम होगा।
भाजपा में पंड़ितों और जैनियों के वर्चस्व से अन्य निराश- भाजपा में पंड़ितों और जैनियों को जिले में सालों से मिल रही प्राथमिता के कारण पिछड़ा वर्ग,मुस्लिमों, आदिवासी और हरिजनो के मन में यह भावना घर करते जा रही है कि भाजपा में उनका अपना कोई भविष्य नहीं है। ऐसा मानने वाले यह तर्क देते है कि चाहे जिला भाजपा अध्यक्ष पा पद हो या सिवनी विस की टिकिट सालों से इन पर ब्राम्हणों और जैनियों का ही कब्जा रहा है। स्व. महेश शुक्ल,प्रमोद कुमार जैन कंवर साहब, चक्रेश जैन, सुदर्शन बाझल, सुजीत जैन और अभी नरेश दिवाकर भाजपा के जिलाध्यक्ष हैं। बीच में वेद सिंह ठाकुर,डॉ ढ़ालसिंह बिसेन और कीरत सिंह बघेल जरूर अध्यक्ष रहें हैं। इसी तरह सिवनी विस की टिकिट भी 1985 से इन्हीं के कोटे में जा रही हैं। 85 में प्रमोद कुमार जैन,90 और 93 में स्व. पं. महेश शुक्ला,09 और 2003 में नरेश दिवाकर और 2008 में नीता पटेरिया को भाजपा ने टिकिट दी थी। सन 1990 से यहां से भाजपा का विधाय ही जीत रहा है इसीलिये इस रणनीति को बदलने के बारें में भाजपा में कभी विचार भी नहीं हुआ। अगले विस चुनाव में भी टिकिट इन्हीं के बीच मिलना तय माना जा रहा है। इसी कारण पिछड़ा वर्ग,अल्प संख्यक,आदिवासी और हरजिन वर्ग के कार्यकर्त्ताओं में धीरे धीरे यह भावना बैठती जा रही है कि भाजपा में हमारा कोई भविष्य नहीं है? भाजपा नेतृत्व यान शिवराज सिंह और नरेन्द्र तोमर के लिये यह मिशन 2013 और 2014 के लिये यह एक चिंता का विषय होे सकता है।“मुसाफिर”  

सा. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
04 जून 2013 से साभार

Monday, April 29, 2013


राहुल के सामने खुलासा नहीं हुआ कि सिवनी में बागियों को टिकिट और भीतरघातियों को पद क्यों देते है हरवंश ?
इस बात का आभास तो राहुल को पहले से ही था कि प्रदेश में कांग्रेस दिग्गी,कमलनाथ,सिंधिया,पचौरी और भूरिया गुट में बंटी हुयी हैं। लेंकिन अपने प्रवास के दौरान इस बात को खुलकर देख लिया कि उनके सामने भी यह रुकी नहीं। हालांकि राहुल गांधी ने काफी सख्त लहजे में गुटबाजी समाप्त करने की नसीहत दी है लेकिन प्रदेश के दिग्गजों पर इसका कितना असर होगा? यह कहना अभी संभव नहीं हैं। राहुल गांधी को शायद इस बात की जानकारी ही नहीं लग पायी कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस में जिले भी पट्टेदारों के बीच बंटे हुये हैं।ये पट्टेदार इतना अधिक सिर्फ अपना हित साधने के आदी हो चुके हैं कि वे अपने ही नेता के अन्य समर्थकों का हित भी नहीं देखना चाहते है। ऐसी स्थिति में उनसे कांग्रेस के हित देखने की तो कल्पना भी करना बेमानी ही होगी।कई अधिकृत नेता तो पहुंच ही नहीं पाये और पट्टेदारों के कृपा पात्र नेताओं को ना सिर्फ पास जारी कर दिये गये वरन उन्होंने मुखर होकर अपनी बात भी रखी। सिवनी जिला कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। अब कांग्रेस का एक ही विधायक हैं।ऐसा क्यों और किसके कारण हो रहा है? इसका खुलासा भी राहुल के सामने नहीं हो पाया। जिन नेताओ ने कहना मान कर कांग्रेस के खिलाफ विधानसभा का चुनाव बागी होकर लड़ लिया उन्हें उसी क्षेत्र से विस की टिकिट और जिन्होंने कांग्रेस को हराने के लिये भीतरघात कर पार्टी को हराने का काम किया उन्हें संगठन में पद देकर नवाजने का सिलसिला सालों से बदस्तूर जारी हैं। 
राहुल भी रूबरू हुये प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी से- विगत 24 और 25 अप्रेल का दिन प्रदेश की कांग्रेस की राजनीति के लिये बहुत ही अहम रहा हैं। इन दिनों कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी मिशन 2013 और 2013 की नब्ज टटोलने के लिये आये थे। प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता भी चिंतित थे कि ना जाने कब कौन सी बात जानलेवा बन जाये। अपने दो दिनों के प्रवास में वैसे तो राहुल गांधी ने अपनी तरफ से प्रदेश में कांग्रेस की जमीनी हकीकत पता करने के पूरे प्रयास कियो लेकिन उन्हें कितनी हकीकत पता लग पायी इसे लेकर तरह तरह की चर्चायें हैं। इस बात का आभास तो राहुल को पहले से ही था कि प्रदेश में कांग्रेस दिग्गी,कमलनाथ,सिंधिया,पचौरी और भूरिया गुट में बंटी हुयी हैं। लेंकिन अपने प्रवास के दौरान इस बात को खुलकर देख लिया कि उनके सामने भी यह रुकी नहीं। केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ तो इस दौरान आये ही नहीं। जो बड़े नेता थे उनके समर्थक भी अलग अलग खेमों में दिखायी दिये। चुनाव जीतने के लिये इन दिग्गजों में एका करना सबसे बड़ी जरूरत हैं। हालांकि राहुल गांधी ने काफी सख्त लहजे में गुटबाजी समाप्त करने की नसीहत दी है लेकिन प्रदेश के दिग्गजों पर इसका कितना असर होगा? यह कहना अभी संभव नहीं हैं। 
कांग्रेस में जिले भी बंटे हुये है पट्टेदारों के बीच-कांग्रेस के सिस्टम को आमूल चूल बदल देने का संकल्प लेने वाले राहुल गांधी को शायद इस बात की जानकारी ही नहीं लग पायी कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस में जिले भी पट्टेदारों के बीच बंटे हुये हैं। प्रदेश के किसी ना किसी दिग्गज नेता का पट्ठा हर जिले का पट्टेदार बना बैठा है। ये पट्टेदार इतना अधिक सिर्फ अपना हित साधने के आदी हो चुके हैं कि वे अपने ही नेता के अन्य समर्थकों का हित भी नहीं देखना चाहते है। ऐसी स्थिति में उनसे कांग्रेस के हित देखने की तो कल्पना भी करना बेमानी ही होगी। हालात यह हैं कि ऐसे पट्टेदारों का ना सिर्फ समूचे संगठन पर उनका उही कब्जा है वरन स्थानीय निकायों के जन प्रतिनिधि भी उनके अपने ही चुने जाते हैं। यदि किसी दूसरे नेता को कांग्रेस की टिकिट भी मिल जाती है तो वे उसे निपटाने में भी कोई परहेज नहीं कर पाते है। पट्टेदार खुद के भले के लिये भाजपा नेताओं के साथ नूरा कुश्ती खेलने में भी संकोच नहीं करते हैं। ऐसे में प्रदेश में जिलों के हालात यह हो गये हैं कि इनमें पट्टेदार कों ताकतवर हो गये हैं लेकिन कांग्रेस का सफाया सा हो गया हैं। 
पोल ना खुलने की जुगत में लगे रहे पट्टेदार-कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सामने कहीं अपनी पोल ना खुल जाये इसकी जुगत जमाने में ही पट्टेदार लगे रहे। इस प्रयास में यह तक किया गया कि किस नेता को उनके कार्यक्रम में जाने की पात्रता है और किसे नही? इसका खुलासा ही नहीं किया गया। प्रदेश कांग्रेस के निर्देश के अनुसार नेताओं से उनके फोटो तो मंगवा लिये गये लेकिन आखरी तक यह नहीं बताया गया कि उन्हें राहुल के कार्यक्रम में जाना हैं। ऐसी स्थिति में कई अधिकृत नेता तो पहुंच ही नहीं पाये और पट्टेदारों के कृपा पात्र नेताओं को ना सिर्फ पास जारी कर दिये गये वरन उन्होंने मुखर होकर अपनी बात भी रखी। ऐसे हालात में कितनी सच्चायी राहुल के सामने आयी होगी इसका अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। 
सिवनी जिले के पट्टेदार बन बैठे हैं हरवंश-पिछले लगभग पंद्रह सालों से जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह पट्टेदार बने हुये हैं। यह जिला कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। सन 1952 से लेकर 1990 तक जिले के सभी विस क्षेत्रों पर कांग्रेस का कब्जा रहा करता था। सिर्फ 1962 का चुनाव ऐसा था जिसमें कांग्रेस तीनों सामान्य सीटें राम राज्य परिषद से हार गयी थी लेकिन दोनों आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस की ही जीत हुयी थी। लेकिन पांच साल बाद ही कांग्रेस ने 1967 में पुनः पांचों सीटें जीती और 1977 की जनता लहर में भी कांग्रेस का यह किला सुरक्षित रहा और समूचे उत्तर भारत में इसने एक रिकार्ड बनाया था। कांग्रेस में जिले में गुटबाजी तब भी थी लेकिन टिकिट मिलने में एक दूसरे के प्रत्याशी को कटवाने तक सीमित थी लेकिन टिकिट मिलने के बाद कांग्रेस को निपटाने का काम नहीं होता था जो अब होने लगा हैं। आज हालात यह हैं कि हरवंश सिंह तो केवलारी से 1993 से लगातार कांग्रेस के विधायक हैं लेकिन उनके ही क्षेत्र से कांग्रेेस लोकसभा में नहीं जीतती हैं। इसके लिये उनसे कभी सवाल जवाब भी नहीं किया गया। सिवनी और बरघाट सीट से कांग्रेस पांच चुनाव लगातार हार चुकी हैं। और तो और 1977 और 1990 के चुनाव मे भी कांग्रेस के सबसे मजबूत किले रहे लखनादौन को भी भाजपा 2003 में ध्वस्त कर चुकी हैं। ऐसा क्यों और किसके कारण हो रहा है? इसका खुलासा भी राहुल के सामने नहीं हो पाया। 
बागियों को टिकिट और भीतरघातियों को बांटे गये पद-अक्सर यह कहा जाता है कि बड़ा काम करने वाले को बड़ा और छोटा काम करने वाले को छोटा इनाम दिया जाता हैं। ऐसा ही कुछ इस जिले में होता रहा है। जिन नेताओ ने कहना मान कर कांग्रेस के खिलाफ विधानसभा का चुनाव बागी होकर लड़ लिया उन्हें उसी क्षेत्र से विस की टिकिट और जिन्होंने कांग्रेस को हराने के लिये भीतरघात कर पार्टी को हराने का काम किया उन्हें संगठन में पद देकर नवाजने का सिलसिला सालों से बदस्तूर जारी हैं। जब हरवंश सिंह प्रदेश के पंचायत मंत्री थे तब उनके गृह जिले से 1998 का चुनाव बागी हाकर कांगेस के जनपद अध्यक्ष बेनी परते ने लड़ा और 2001 में हुये उप चुनाव में ही उन्हें उसी क्षेत्र से कांग्रेस की टिकिट मिल गयी।हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र के जनपद के उपाध्यक्ष भोयाराम ने 1998 का चुनाव बरघाट क्षेत्र से बागी होकर लड़ा और 2003 में उन्हें बरघाट से ही पार्टी की टिकिट मिल गयी। 1996 में कांग्रेस की विमला वर्मा के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले आदिवासी नेता शोभाराम भलावी ने 44 हजार वोट लेकर कांग्रेस को हराने में अहम भूमिका निभायी उन्हें 1997 एवं 2000 में केबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ निगम अध्यक्ष बनाया गया और फिर 2003 में लखनादौन से विस चुनाव में टिकिट दे दी गयी। कहा जाता है कि प्रदेश में गौड़वाना गणतंत्र पार्टी की नींव यहीं से मजबूत हुयी थी। भीतरघातियों को पार्टी संगठन में पद देने वालों की संख्या तो इतनी अधिक है कि उसका उल्लेख करना ही संभव नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी के सामने कोई भी तथ्य सामने ना आये हों। नेताओं ने आदिवासी और मुस्लिम वोटों के कांग्रेस से खफा होने का उल्लेख जरूर किया लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? इसका खुलासा नहीं हो पाया। अपने कर,फर और बल से हरवंश सिंह इस बार भी सफल रहें कि राहुल गांधी के सामने उनकी पोल खुलने से बच गयी। “मुसाफिर”  
दर्पण झूठ ना बोले
30 अप्रेल 2013 से साभार