Thursday, September 27, 2012


राष्ट्रवाद पर हावी होते क्षेत्रीयतावाद के खतरे से बचने के उपाय तलाशना जरूरी
भारतीय राजनीति का इन दिनो संक्रमण काल चल रहा हैं। सन 1996 से प्रारंभ हुये गठबंधन की राजनीति का दौर जारी हैं। केन्द्र में सरकार  इन गठबंधनों की ही बन रही हैं। इन सोलह सालों में देश हित में हुआ तो बहुत कुछ है लेकिन गठबंधन की मजबूरियों के कारण बहुत कुछ ऐसा भी है जो नहीं हो पाया हैं।
देश में 7 राष्ट्रीय एवं 45 क्षेत्रीय मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल हैं। राष्ट्रीय पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी, सी.पी.आई.,सी.पी.एम.,राष्ट्रवादी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी शामिल हैं। 
कांग्रेस हमेशा से मास बेस पार्टी रही हैं लेकिन पिछले कुछ समय से क्षेत्रीय दलों द्वारा उसके वोट बैंक में सेध लगाने के कारण जनाधार कमजोर हुआ हैं। परंतु राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस आज भी सबसे बड़ा राजनैतिक दल हैं। भाजपा केडर बेस पार्टी हैं लेकिन उसका प्रभाव अभी भी दक्षिण भारत में नहीं जम पाया हैं। दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में भाजपा ने सरकार तो बनायी लेकिन जिस तरह से सरकार चल रही है उससे सबसे अलग दिखने का भाजपा का दावा कमजोर ही हुआ हैं। वाम दलों सहित राकपा,सपा और बसपा कहने को तो राष्ट्रीय दल हैं लेकिन वास्तविकता यह हैं कि इनका राजनैतिक अस्तित्व भी क्षेत्रीय दलो से कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता है। इस प्रकार यह कहने में कोई संकोच नही हैं कि इन दिनों राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के प्रभामंड़ल में जो कमी आयी हैं वही गठबंधन की राजनीति प्रारंभ होने का मूल कारण हैं। 
मान्यता प्राप्त 45 क्षेत्रीय दलों में डी.एम.के.,ए.आई.ए.डी.एम.के.,तृणमूल कांग्रेस,बीजू जनता दल,जनता दल यू.,आर.जे.डी.,तेलगू देशम पार्टी,शिव सेना और टी.आर.एस. जैसे कई राजनैतिक दल हैं जो कि गठबंधन की सरकारों के गठन और पतन में महत्वपूर्ण राजनैतिक भूमिका निभाते रहें हैं। इसका दंश देश ने देखा और भोगा है फिर चाहे वो भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार हो या कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार हो।
अंर्तराष्ट्रीय और अंर्तराज्यीय मुद्दों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की सोच में फर्क रहता है। जहां एक ओर राष्ट्रीय पार्टियों की सोच राष्ट्रीय स्तर की होती हैं। वहीं क्षेत्रीय पार्टियों की प्राथमिकता उनके प्रभाव क्षेत्र तक सीमित होकर रह जातीं हैं। सोच का यही अंतर सरकार के कामकाज पर निर्णायक असर डालता हैं। गठबंधन की सरकारों के 16 सालों के काम काज को देखते हुये अब यह समय की मांग हैं कि इनसे बचने के लिये उपायों पर विचार किया जाये। 
मेरे विचार से संविधान में कुछ ऐसा प्रावधान किया जाना क्या न्याय संगत नहीं होगा कि चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को पंचायत से लेकर विधानसभा चुनाव लडने की पात्रता दी जाये और यदि किसी गठबंधन के साथ ऐसे क्षेत्रीय दल लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो गठबंधन का नेतृत्व करने वाली राष्ट्रीय पार्टी के चुनाव चिन्ह पर ही उन्हें चुनाव लड़ने की पात्रता दी जाये? ऐसा करने से कम से कम दल बदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत सरकार की स्थिरता पर तो कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा। मेरे इस विचार का हो सकता है कि इस आधार पर विरोध भी हो कि यह सुझाव प्रजातंत्र के मूल सिद्धान्तों के खिलाफ है। लेकिन बीते दिनों क्षेत्रीय दलों और उनके नेताओं की भूमिेका और सौदे बाजी ने आज यह सोचने को तो जरूर मजबूर कर दिया हैं कि ऐसे उपाय किये जाना जरूरी हैं जो कि बढ़ते हुये क्षेत्रीयतावाद  और कमजोर पड़ते राष्ट्रवाद के बीच समन्वय बना सके। अन्यथा देश की अखंड़ता और एकता पर बढ़ते हुये क्षेत्रीयतावाद के खतरे से इंकार नहीं किया जा सकता हैं।
समय समय पर देश में इस बात पर भी बहस होती रही हैं कि राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू होना चाहिये या नहीं ? क्या देश एक बार फिर ऐसे दौर से नहीं गुजर रहा हैं कि जिसमें राष्ट्रपति शासन प्रणाली देश हित में हैं या नही? इस पर विचार होना चाहिये। मेरे विचार से क्षेत्रीयतावाद के बढ़ते हुये प्रभाव को देखते हुये और उसे रोकने के लिये यह भी एक कारगर उपाय हो सकता हैं जिसमें देश का हर मतदाता सीधे राष्ट्रपति का चुनाव कर पांच साल के लिये एक स्थायी सरकार तो चुन सकता है। 
देश की एकता और अखंड़ता पर मंड़राते क्षेत्रीयतावाद के खतरे से बचने के और भी उपाय हो सकते हैं लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं हैं कि अब यह समय की मांग है कि इनसे बचने के कारगर उपाय तलाश कराना देश हित में अत्यंत आवश्यक हैं।
आशुतोष वर्मा
अंबिका सदन,बारा पत्थर  सिवनी (म.प्र.) 480661
मो. 91 9425174640  ं    

Monday, September 24, 2012


नगर पंचायत लखनादौन चुनाव के मामले में भी  आला कमान ने यदि कार्यवाही नहीं की गर्त में चली जायेगी कांग्रेस
 बीते कई सालों से जिले में कांग्रेस को कांग्रेसियों से ही हरवाने का चलन चल रहा हैं। इसी कारण कभी 1977 की जनता लहर में भी जिलंे की पांचों विधानसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब सिमट कर एक सीट पर रह गयी हैं और यह जिला भाजपा का गढ़ माने जाने लगा हैं। समय समय पर आलाकमान को शिकायतें भी हुयी हैं लेकिन रह बार किसी ना किसी बढ़े नेता ने अपने खिदमतगार हरवंश सिंह को बचा ही लिया। इन सबका असर यह हुआ कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के दोनों प्रत्याशियों ने नगर पंचयात लखनादौन के अध्यक्ष पद के चुनाव  में आपने नामांकन पत्र ही उठा लिये और क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव से बाहर हो गयी। कांग्रेसी हल्कों में यह चर्चा जोरों से है कि यदि हमेशा की तरह इस बार भी कुछ नहीं हुआ तो कांग्रेस के मिशन 2013 और 14 में विपरीत असर पड़ सकता हैं। नरेश और राजेश के विचार बिल्कुल नहीं मिलते लेकिन वे एकसाथ मिलकर विहार जरूर कर लेते हैं। ऐसा ही एक वाकया दलसागर में नौका विहार के दौरान देखने को मिला। वैसे तो जिला सहकारी बैक के शताब्दी समारोह की तैयारियां जोर शोर से चल रहीं हैं। अध्यक्ष अशोक टेकाम की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेश  दिवाकर और विधायक नीता पटेरिया ने भी हिस्सा लिया था।यहां यह उल्लेखनीय है कि अब कुछ हीदिनों बाद बैंक के चुनाव होना हैं। इसलिये अभी से पैतरेबाजी भी प्रारंभ हो गयी हें। 
जिले में कांग्रेस को हराने वाले दंड़ित होने के बजाय पुरुस्कृत होते रहे-बीते कई सालों से जिले में कांग्रेस को कांग्रेसियों से ही हरवाने का चलन चल रहा हैं। इसी कारण कभी 1977 की जनता लहर में भी जिलंे की पांचों विधानसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब सिमट कर एक सीट पर रह गयी हैं और यह जिला भाजपा का गढ़ माने जाने लगा हैं। तारीफ की बात तो यह हैं कि कांग्रेस को हराने वाले कांग्रेसियों को सजा मिलने के बजाय पुरुस्कृत किया जाता रहा हैं। और तो और बागी होकर विस चुनाव लड़ने और कांग्रेस को हराने वाले कांग्रेसियों को उप चुनाव या अगले चुनाव में ही पार्टी की टिकिट तक मिली हें। और यह सब आज के जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह की सरपरस्ती में हो रहा हैं। समय समय पर आलाकमान को शिकायतें भी हुयी हैं लेकिन रह बार किसी ना किसी बढ़े नेता ने अपने खिदमतगार हरवंश सिंह को बचा ही लिया। इन सबका असर यह हुआ कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के दोनों प्रत्याशियों ने नगर पंचयात लखनादौन के अध्यक्ष पद के चुनाव  में आपने नामांकनपत्र ही उठा लिये और क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव से बाहर हो गयी जिस क्षेत्र से आजादी के बाद से 2003 तक कांग्रेस का कब्जा रहा हैं। और यह सब कुछ हुआ हरवंश सिंह और दिनेश राय मुनमुन की नूरा कुश्ती के चले हुये। इंका नेता आशुतोष वर्मा ने मेल के द्वारा चुनाव के दौरान ही इसकी शिकायत कांग्र्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, महासचिव राहुल गांधी और प्रभारी महासचिव बी.के.हरप्रिसाद से की थी।  यहां यह विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं कांग्रेस ने इस चुनाव में शानदा प्रर्दशन किया और उसके 15 में से ना सिर्फ आठ पार्षद जीते वरन सभी वार्डों में कांग्रेस ने 3226 वोट लिये जबकि भाजपा के अध्यक्ष पद के प्रत्याश्ी को कुल 1880 वोट मिले और निर्दलीय प्रत्याशी मुनमुन राय की माताजी सुधा राय को 6628 वोट मिले थे। यह भी तय है कि कांग्रेस के वोट भाजपा को तो गये नहीं होंगें इसीलिये यदि सुधा राय के वोटों में से कांग्रेस के वोट घटा दिये जायें तो उन्हें 3402 वोट ही मिलते। ऐसये हालात में कहा जा सकता हैं कि यदि कांग्रेस का अध्यक्ष पद का प्रत्याशी मैदान में होता तो ना केवल बराबरी की टक्कर होती वरन कांग्रेस चुनाव जीत भी सकती थी। इन्हीं सब कारणों के चलते बताया जा रहा है कि हाल ही में भोपाल में हुयी प्रदेश कांग्रेस की तीन दिन की बैठकों में भी यह मामला प्रभारी बी.के.हरप्रिसाद और दिग्विजय सिंह के सामने भी  जोरदारी से उठाया गया हैं। बताते हैं कि कांग्रेस आला कमान ने भी इसे काफी गंभीरता से लिया हैं। लेकिन कांग्रेसी हल्कों में यह चर्चा जोरों से है कि यदि हमेशा की तरह इस बार भी हरवंश सिंह को बरी कर दिया जाता हैं तो जिले में कांग्रेस के मिशन 2013 और 2014 पर विपरीत असर पड़ सकता हैं।
विचार मिले या ना मिलें साथ में विहार तो कर ही लेते हैं नरेश और राजेश -गुटबाजी के राज रोग से भाजपा भी अछूती नहीं हैं।जिले में भाजपा के कई गुट है जो कि आपस में गलाकाट प्रतियोगिता भी करते रहतें हैं। भाजपायी हलके में हमेशा से यह चर्चित रहा है के मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी दो अलग अलग धु्रवो पर रहते हैं। इनके विचार बिल्कुल नहीं मिलते और आपस में एक दूसरे को फूटीं आंख भी नहीं सुहाते हैं। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि विचार आपसमें मिले या ना मिले वे एकसाथ मिलकर विहार जरूर कर लेते हैं। ऐसा ही एक समाचार बीते दिनों अखबारों में फोटो के साथ सुर्खियों में रहा जिनमें ये दोनो युवा नेता दलसागर तालाब में एक साथ नौका विहार करते दिख रहे थे जिसेें लोगों ने चटखारे लेकर पढ़ा। भाजपाइयों में तो यहां तक चर्चा है कि इसी दलसागर तालाब में चेकर्स टाइल्स लगानें में की गयी गड़बड़ियों को लेकर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजिक अकील ने जो शिकायत की थी और उस पर जिला प्रशासन ने जो फुर्ती दिखायी थी उसके पीछे नरेश दिवाकर का ही हाथ था।  अब यह कहां तक सही हैं? यह तो नरेश जी ही जानते होंगें लेकिन फिर  भी दोनों भाजपा नेताओं का यह विहार चर्चित जरूर हो गया हैं। 
शताब्दी समारोह के संग चल रही है नरेश की कूटनीति? -वैसे तो जिला सहकारी बैक के शताब्दी समारोह की तैयारियां जोर शोर से चल रहीं हैं। इसके लिये बैक में अध्यक्ष अशोक टेकाम की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक में महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेश  दिवाकर और विधायक नीता पटेरिया ने भी हिस्सा लिया था। वैसे तो इस बैंक ने इन सौ सालों में कई बार उतार चढ़ाव देखें हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस बैंक के संचालक मंड़ल के चुनावों में ज्यादातर कांग्रेस का ही कब्जा रहा हैं। या फिर जिला कलेक्टर इसके अध्यक्ष रहें हैं। लेकिन पहली बार भाजपा ने इन चुनावों में बाजी मार कर संचालक मंड़ल में अपना कब्जा किया और युवा आदिवासी नेता अशोक टेकाम इस बैं के अध्यक्ष बनें। वैसे तो चुनाव के दौरान तत्कालीन जिला भाजपा अध्यक्ष वेद सिंह ठाकुर को अध्यक्ष ना बनने देने की रणनीति के तहत तत्कालीन विधायक नरेश दिवाकर ने टेकाम से हाथ मिलाकर अपने समर्थक सुनील अग्रवाल को उपाध्यक्ष बनवा लिया था। उनकी योजना यह थी कि अग्रवाल के माध्यम से बैंक पर पूरा नियंत्रण रख्रेंगें। लेकिन तेज तर्रार अशोक टेकाम के चलते जब यह संभव नहीं हुआ तो फिर दोनों के बीच तकरार हो गयी। लेकिन बीते दिनों फोर लेन के मामले में कुरई के अनशन के दौरान बरघाट के विधायक कमल सर्मकोले से नरेश की तकरार हो जाने के बाद नरेश अशोक के बीच फिर एका होने की चर्चायें भाजपायी हल्कों में सुनायी देने लगीं हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि अब कुछ हीदिनों बाद बैंक के चुनाव होना हैं। इसलिये अभी से पैतरेबाजी भी प्रारंभ हो गयी हें। बैंक की राजनीति से नाता रखने वालों का दावा है कि इस बार बैंक पर अपना कब्जा करने के लिये नरेश दिवाकर ने अभी से ताना बाना बुनना शुरू करा दिया हैं। वे सोसायटियों के पुराने धुरंधरों से संपर्क में हैं और यह कोशिश कर रहें हैं कि संचालक मंड़ल में उनके अधिक सदस्य आ सकें तथ बैंक पर अशोक टेकाम के बजाय उनका कब्जा हो जाये। ऐसे हालात में उन्हें बरघाट से विधानसभा की टिकिट दिलाने का प्रलोभन भी दिया जा सकता हैं।इस खेल में कौन कितना सफल होगा? यह तो भविष्य में ही पता चल पायेगा। “मुसाफिर“   




सप्ताह मुसाफिर आपसे मुखातिब नहीं हो पाया था। इसलिये इस हफ्ते पुराने और नये राजनैतिक घटनाक्रमों पर हम चर्चा करेंगें। बीते दिनो सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम छिंदवाड़ा जिले में हुआ। जहां केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र में रेल मंत्री मुकुल राय ने परासिया माडल रेल्वे स्टेशन की आधारशिला रखी,अब प्रतिदिन चलने वाली छिंदवाड़ा दिल्ली ट्रेन को हरी झंड़ी दिखाया और अभी पूरी ना होने वाली छिंदवाड़ा नागपुर बा्रडगेज के विद्युतीकरण की भी आधार शिला रखी जो कि आमला नागपुर के नाम से स्वीकृत हुयी हैं। इसी कार्यक्रम के दौरान एक पत्रकार वार्ता के दौरान कमलनाथ ने  छिंदवाड़ा के विकास की चर्चा करते हुये यह कह दिया कि इतना विकास तो पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा और सिवनी का भी नहीं हुआ हैं और चाहो तो ये हरवंश सिंह बैठे हैं इनसे पूछ लो।इस पर हरवंश सिंह ने जवाब दे दिया कि मैं भी तो छिंदवाड़ा का हूं। जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले हरवंश सिंह का यह जवाब स्थानीय समाचार पत्रों में सुर्खियां भी बना। वैसे भी कांग्रेसियों में नाथों के नाथ कमलनाथ कहलाते हैंऔर वे गोद लेने के भी आदी रहें हैं। चुनाव प्रचार के दौरान वे जिले की अधिकांश विधानसभा सीटों को भी गोद ले चुके हैं। अब तो कांग्रेसियों के बीच चटखारे लेकर ख्ह चर्चा भी होने लगी हैं कि अच्छा हो कि कमलनाथ हरवंश सिंह का ही गोद लेकर अपने जिले से ही, जो कि हरवंश सिंह की मातृ भूमि भी है, से चुनाव लड़वा दें तो कम से कम जिला नाथ रहते हुये भी ऐसा अनाथ तो नहीं रहेगा जैसा कि पिछले दिनों देखा गया हैं और जिले को भी एक मौका मिल जायेगा कि वो अपना नया नाथ तलाश कर सके। वैसे हरवंश सिंह के इस कथन से उन पर पहले लगे ये आरोप सही लगने लगे है कि उन्होंने छिदवाड़ा के हितों के लिये सिवनी के हितों को कुर्बान किया है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि परिसीमन में सिवनी लोकसभा के विलोपन,फोर लेन में आये अड़ंगें,संभाग मुख्यालय सिवनी ना बनने,बड़ी रेल के ना बनने आदि में हरवंश सिंह पर आरोप लगते रहें हैं कि उन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिये सिवनी के हितों पर कुठाराघात किया हैं। मातृ भूमि के लिये प्यार होना चाहिये यह तो ठीक है लेकिन उस कर्म भूमि के कर्जे को भी नहीं भूलना चाहिये जिसने उन्हें मातृ भूमि में मंच पर बैठाल कर सम्मान दिलाया। यह तो कम से कम नहीं ही भूलना चाहिये कि किस बुरे स्थिति और अपमानजनक हालात में मातृ भूमि को छोड़ना पड़ा था। वैसे हरवंश समर्थकों का कहना हैं कि इससे साहब को कोई नुकसान नहीं होगा ब्लकि ऐसा कहकर कमलनाथ ने अपने आप को महाकौशल के बजाय सिर्फ छिंदवाड़ा जिले का नेता ही मान लिया हैं।
चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश ने मंत्री से की चर्चा-जंगल मे मोर नाचा किसने देखा की कहावत बहुत पुरानी हैं। लेकिन इन दिनों यह कहावत एक बार फिर चर्चा में आ गयी हैं। छिंदवाड़ा में रेल मंत्री मुकुल राय के कार्यक्रम के दो दिन के बाद जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश की तरफ से बाकायदा एक प्रेस नोट जारी कर यह बताया गयी कि रेल्वे के सैलून में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ की उपस्थिति में उन्होंने छिंदवाड़ा से नैनपुर रेल लाइन के गेज परिवर्तन और रामटेक से गोटेगांव नयी रेल लाइन के बारे में चर्चा की और डिब्बे में मौजूद रेल्वे बोर्ड के सदस्य मिश्रा ने उन्हें जानकारी दी है कि नैनपुर बड़ी रेल लाइन के मिट्टी के काम का टेंड़र लगने वाला हैं और दो साल में छिंदवाड़ा से सिवनी तक बड़ी रेल लाइन का काम पूरा हो जायेगा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छिंदवाड़ा से नागपुर के 125 कि.मी. गेज कनर्वशन का काम कमलनाथ के रहते हुये भी पांच साल में पूरा नहीं हो पाया हैं  तो भला सिवनी से छिंदवाड़ा का 70 कि.मी. का गेज कनर्वशन का काम दो साल में हरवंश कैसे पूरा करा लेंगें?यह एक विचारणीय प्रश्न हैं। रहा सवाल रामटेंक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन का तो इसके लिये इंका नेता आशुतोष वर्मा सन 2007 से अभियान चलाये हुये हैं। इसमें दो बार पत्र लिखो अभियान चलाया गया जिसमें जिले के सैकड़ों जन प्रतिनिधियों सहित हजारों नागरिकों ने भाग लिया लेकिन हरवंश सिंह ने चिट्ठी लिखना भी पसंद नहीं किया। अब यह एक सोचने वाली बात है कि चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश सैलून में मंत्री से चर्चा भला क्या और कैसी की होगी?सैलून में हरवंश की चर्चा को लेकर स्थानीय अखबारों में भी सुर्खियां बनी हैं और इस चर्चा को उनकी कार्यप्रणाली के विपरीत निरूपित किया हैं। लेकिन इस सबसे और कुछ हुआ हो या नहीं हुआ हो लेकिन जिले में लोग चटखारे लेकर यह कहते हुये जरूर देखे जा रहें हैं कि सैलून में सिंह नाचा किसने देखा?
प्रधानमंत्री का पुतला तो जल जाता है पर मुख्यमंत्री का नहीं-वैसे तो यह आम बात है कि प्रदेश सरकार के विरोध में कांग्रेस और केन्द्र सरकार के विरोध भाजपा आंदोलन,प्रदर्शन कर पुतले जलाती रहती हैं। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सत्तारूढ़ दल हैं और जनता के लिये जो भी समस्यायें होती हैं उनके लिये कमोबेश दोनों ही जवाबदार होती हैं लेकिन अपने को बचाते हुये दूसरे पर राजनैतिक हमलें करने की संस्कृति इन दिनों खूब फल फूल रही हैं। राजनैतिक विश्लेषकों ने एक बात और विशेषकर नोट की हैं कि जब प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभाहने वाली भाजपा कोई आंदोनल करती है और प्रधानमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती हैं तो वो पुतला जल लेती हैं लेकिन जब कांग्रेस प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती है तो पुलिस येन केन प्रकारेण पुतला नहीं जलने देती चाहे इसके लिये आंदोलनकारियों से ही सांठगांठ क्यों ना करनी पड़े। ऐसा क्यों होता हैं? यह समझ से परे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों ही पद संवैधानिक पद है और दोनों ही जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों के मुखिया होते हैं। बीते दिनों भाजपायुमो ने जिला अध्यक्ष नवनीत सिंह ठाकुर के नेतृत्व में डीजल और रसोई गैस की कीमतों की गयी वृद्धि के खिलाफ प्रर्दशन किया और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बाकायदा पुतला भी जलाया। यह बात सही है कि इससे आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा लेकिन इसके लिये प्रदेश सरकार द्वारा डीजल और रसोई गैस पर लिया जाने वाला वेट टेक्स भी कम जवाबदार नहीं हैं। उसमें कुछ कमी करके राज्य सरकार भी जनता को राहत पहुंचा सकती थी जैसी कि केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर प्रति लिटर पांच रुपये से अधिक एक्साइज डयूटी कम करके उसकी कीमत को बढ़ने से रोक कर किया है। कुछ राज्यों ने भी अपने टेक्स में कमी करके जनता को राहत पहुंचायी हैं। लेकिन राजनीति के लिये राजनीति करना आजकल नेताओं का शगल बन गया हैं। “मुसाफिर”    

Monday, September 17, 2012



शिवराज का जनदर्शन अधर में?
सिवनी।मुख्य मंत्री शिवराज सिंह के प्रदेश स्तरीय जन दर्शन कार्यक्रम में सिवनी का कार्यक्रम अधर में लटक गया हैं। पिछले प्रवासों में की गयी घोषणायें पूरी ना होने के कारण यह निरस्त तो नहीं हो गया है?यह सवाल सियासी हल्कों में चर्चित हैं।
बीते दिनों यह चर्चा थी कि शिव की नगरी सिवनी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जनदर्शन कार्यक्रम 14 सितम्बर को होने वाला हैं। फिर 17 की तारीख सुनने को मिली लेकिन दो दिन पहले पालेटेक्निक ग्राउंड़ में कार्यक्रम के लिये लगयो गये खंबे भी उखाड़ लिये गये हैं। इससे इस चर्चा को बल मिला है कि शिवराज का नजदर्शन कार्यक्रम अधर में लटक गया हैं।
सियासी हल्कों में इस बात को लेकर यह चर्चा चल रही है कि मुख्यमंत्री ने जिले के अपने पूर्व के दौरों में जो भी घोषणायें की थीं वे सिर्फ घोषणा ही रह गयी हैं। फिर चाहे वो मेडिकल,कृषि या इंजीनियरिंग कालेज की हो या फोर लेन की हो या फिर शहर को माडल शहर बनाने की हो। इमनें से सिर्फ एक घोषणा पर अमल हुआ है वो दलसागर तालाब का जिसका काम केन्द्र की बी.आर.जी.एफ. योजना के तहत किया गया हैं। यह काम भी कैसा हुआ है? यह जगजाहिर हैं। लेकिन प्रशासन इस तालाब को सुन्दर दिखने लायक बनाने का इन दिनो ताबड़तोड़ प्रयास कर रहा हैं।सौन्दर्यीकरण के नाम पर इसमें कैसी पैसों की होली खेली गयी है? यह किसी से छिपा नहीं हैं।
इन सब कारणों से अब ऐसा माना जा रहा हैं कि शिवराज का जनदर्शन तो घोषणाओं की तरह ही अधर में लटक गया हैं लेकिन हो सकता है कि वे तेदूं पत्ता बोनस वितरण कार्यक्रम में भाग लेने शायद जल्दी ही सिवनी आ जायें।  


नाथ यदि हरवंश को गोद लें ले तो नाथ रहते हुये भी अनाथ रहने वाले जिले को नया नाथ चुनने का मौका  मिल जायेगा
बीते दिनो सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम छिंदवाड़ा जिले में हुआ। एक पत्रकार वार्ता के दौरान कमलनाथ ने  छिंदवाड़ा के विकास की चर्चा करते हुये यह कह दिया कि इतना विकास तो पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा और सिवनी का भी नहीं हुआ हैं और चाहो तो ये हरवंश सिंह बैठे हैं इनसे पूछ लो।इस पर हरवंश सिंह ने जवाब दे दिया कि मैं भी तो छिंदवाड़ा का हूं। हरवंश सिंह के इस कथन से उन पर पहले लगे ये आरोप सही लगने लगे है कि उन्होंने छिदवाड़ा के हितों के लिये सिवनी के हितों को कुर्बान किया है। जंगल मे मोर नाचा किसने देखा की कहावत बहुत पुरानी हैं। लेकिन इन दिनों यह कहावत एक बार फिर चर्चा में आ गयी हैं।विज्ञप्ति जारी कर हरवंश सिंह ने बताया है कि छिंदवाड़ा से नैनपुर रेल लाइन के गेज परिवर्तन और रामटेक से गोटेगांव नयी रेल लाइन के बारे में चर्चा की और बोर्ड के सदस्य मिश्रा ने उन्हें जानकारी दी है कि छिंदवाड़ा सिवनी बड़ी रेल लाइन दो साल में पूरा हो जायेगी। इस सबसे और कुछ हुआ हो या नहीं हुआ हो लेकिन जिले में लोग चटखारे लेकर यह कहते हुये जरूर देखे जा रहें हैं कि सैलून में सिंह नाचा किसने देखा? जनता के लिये जो भी समस्यायें होती हैं उनके लिये कमोबेश इंका और भाजपा दोनों  ही जवाबदार होती हैं लेकिन अपने को बचाते हुये दूसरे पर राजनैतिक हमलें करने की संस्कृति इन दिनों खूब फल फूल रही हैं। प्रधानमत्री का पुतला तो जला दिया जाता है लेकिन पुलिस मुख्यमंत्री का पुतला नहीं जलने देती हैं। 
हरवंश को ही गोद लें ले नाथ-बीते सप्ताह मुसाफिर आपसे मुखातिब नहीं हो पाया था। इसलिये इस हफ्ते पुराने और नये राजनैतिक घटनाक्रमों पर हम चर्चा करेंगें। बीते दिनो सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम छिंदवाड़ा जिले में हुआ। जहां केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र में रेल मंत्री मुकुल राय ने परासिया माडल रेल्वे स्टेशन की आधारशिला रखी,अब प्रतिदिन चलने वाली छिंदवाड़ा दिल्ली ट्रेन को हरी झंड़ी दिखाया और अभी पूरी ना होने वाली छिंदवाड़ा नागपुर बा्रडगेज के विद्युतीकरण की भी आधार शिला रखी जो कि आमला नागपुर के नाम से स्वीकृत हुयी हैं। इसी कार्यक्रम के दौरान एक पत्रकार वार्ता के दौरान कमलनाथ ने  छिंदवाड़ा के विकास की चर्चा करते हुये यह कह दिया कि इतना विकास तो पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा और सिवनी का भी नहीं हुआ हैं और चाहो तो ये हरवंश सिंह बैठे हैं इनसे पूछ लो।इस पर हरवंश सिंह ने जवाब दे दिया कि मैं भी तो छिंदवाड़ा का हूं। जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले हरवंश सिंह का यह जवाब स्थानीय समाचार पत्रों में सुर्खियां भी बना। वैसे भी कांग्रेसियों में नाथों के नाथ कमलनाथ कहलाते हैंऔर वे गोद लेने के भी आदी रहें हैं। चुनाव प्रचार के दौरान वे जिले की अधिकांश विधानसभा सीटों को भी गोद ले चुके हैं। अब तो कांग्रेसियों के बीच चटखारे लेकर ख्ह चर्चा भी होने लगी हैं कि अच्छा हो कि कमलनाथ हरवंश सिंह का ही गोद लेकर अपने जिले से ही, जो कि हरवंश सिंह की मातृ भूमि भी है, से चुनाव लड़वा दें तो कम से कम जिला नाथ रहते हुये भी ऐसा अनाथ तो नहीं रहेगा जैसा कि पिछले दिनों देखा गया हैं और जिले को भी एक मौका मिल जायेगा कि वो अपना नया नाथ तलाश कर सके। वैसे हरवंश सिंह के इस कथन से उन पर पहले लगे ये आरोप सही लगने लगे है कि उन्होंने छिदवाड़ा के हितों के लिये सिवनी के हितों को कुर्बान किया है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि परिसीमन में सिवनी लोकसभा के विलोपन,फोर लेन में आये अड़ंगें,संभाग मुख्यालय सिवनी ना बनने,बड़ी रेल के ना बनने आदि में हरवंश सिंह पर आरोप लगते रहें हैं कि उन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिये सिवनी के हितों पर कुठाराघात किया हैं। मातृ भूमि के लिये प्यार होना चाहिये यह तो ठीक है लेकिन उस कर्म भूमि के कर्जे को भी नहीं भूलना चाहिये जिसने उन्हें मातृ भूमि में मंच पर बैठाल कर सम्मान दिलाया। यह तो कम से कम नहीं ही भूलना चाहिये कि किस बुरे स्थिति और अपमानजनक हालात में मातृ भूमि को छोड़ना पड़ा था। वैसे हरवंश समर्थकों का कहना हैं कि इससे साहब को कोई नुकसान नहीं होगा ब्लकि ऐसा कहकर कमलनाथ ने अपने आप को महाकौशल के बजाय सिर्फ छिंदवाड़ा जिले का नेता ही मान लिया हैं।
चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश ने मंत्री से की चर्चा-जंगल मे मोर नाचा किसने देखा की कहावत बहुत पुरानी हैं। लेकिन इन दिनों यह कहावत एक बार फिर चर्चा में आ गयी हैं। छिंदवाड़ा में रेल मंत्री मुकुल राय के कार्यक्रम के दो दिन के बाद जिले के इकलौते इंका विधायक हरवंश की तरफ से बाकायदा एक प्रेस नोट जारी कर यह बताया गयी कि रेल्वे के सैलून में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ की उपस्थिति में उन्होंने छिंदवाड़ा से नैनपुर रेल लाइन के गेज परिवर्तन और रामटेक से गोटेगांव नयी रेल लाइन के बारे में चर्चा की और डिब्बे में मौजूद रेल्वे बोर्ड के सदस्य मिश्रा ने उन्हें जानकारी दी है कि नैनपुर बड़ी रेल लाइन के मिट्टी के काम का टेंड़र लगने वाला हैं और दो साल में छिंदवाड़ा से सिवनी तक बड़ी रेल लाइन का काम पूरा हो जायेगा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि छिंदवाड़ा से नागपुर के 125 कि.मी. गेज कनर्वशन का काम कमलनाथ के रहते हुये भी पांच साल में पूरा नहीं हो पाया हैं  तो भला सिवनी से छिंदवाड़ा का 70 कि.मी. का गेज कनर्वशन का काम दो साल में हरवंश कैसे पूरा करा लेंगें?यह एक विचारणीय प्रश्न हैं। रहा सवाल रामटेंक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन का तो इसके लिये इंका नेता आशुतोष वर्मा सन 2007 से अभियान चलाये हुये हैं। इसमें दो बार पत्र लिखो अभियान चलाया गया जिसमें जिले के सैकड़ों जन प्रतिनिधियों सहित हजारों नागरिकों ने भाग लिया लेकिन हरवंश सिंह ने चिट्ठी लिखना भी पसंद नहीं किया। अब यह एक सोचने वाली बात है कि चिट्ठी लिखने से परहेज करने वाले हरवंश सैलून में मंत्री से चर्चा भला क्या और कैसी की होगी?सैलून में हरवंश की चर्चा को लेकर स्थानीय अखबारों में भी सुर्खियां बनी हैं और इस चर्चा को उनकी कार्यप्रणाली के विपरीत निरूपित किया हैं। लेकिन इस सबसे और कुछ हुआ हो या नहीं हुआ हो लेकिन जिले में लोग चटखारे लेकर यह कहते हुये जरूर देखे जा रहें हैं कि सैलून में सिंह नाचा किसने देखा?
प्रधानमंत्री का पुतला तो जल जाता है पर मुख्यमंत्री का नहीं-वैसे तो यह आम बात है कि प्रदेश सरकार के विरोध में कांग्रेस और केन्द्र सरकार के विरोध भाजपा आंदोलन,प्रदर्शन कर पुतले जलाती रहती हैं। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सत्तारूढ़ दल हैं और जनता के लिये जो भी समस्यायें होती हैं उनके लिये कमोबेश दोनों ही जवाबदार होती हैं लेकिन अपने को बचाते हुये दूसरे पर राजनैतिक हमलें करने की संस्कृति इन दिनों खूब फल फूल रही हैं। राजनैतिक विश्लेषकों ने एक बात और विशेषकर नोट की हैं कि जब प्रदेश में सत्ता की बागडोर संभाहने वाली भाजपा कोई आंदोनल करती है और प्रधानमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती हैं तो वो पुतला जल लेती हैं लेकिन जब कांग्रेस प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री का पुतला जलाने की घोषणा करती है तो पुलिस येन केन प्रकारेण पुतला नहीं जलने देती चाहे इसके लिये आंदोलनकारियों से ही सांठगांठ क्यों ना करनी पड़े। ऐसा क्यों होता हैं? यह समझ से परे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दोनों ही पद संवैधानिक पद है और दोनों ही जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों के मुखिया होते हैं। बीते दिनों भाजपायुमो ने जिला अध्यक्ष नवनीत सिंह ठाकुर के नेतृत्व में डीजल और रसोई गैस की कीमतों की गयी वृद्धि के खिलाफ प्रर्दशन किया और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बाकायदा पुतला भी जलाया। यह बात सही है कि इससे आम जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा लेकिन इसके लिये प्रदेश सरकार द्वारा डीजल और रसोई गैस पर लिया जाने वाला वेट टेक्स भी कम जवाबदार नहीं हैं। उसमें कुछ कमी करके राज्य सरकार भी जनता को राहत पहुंचा सकती थी जैसी कि केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर प्रति लिटर पांच रुपये से अधिक एक्साइज डयूटी कम करके उसकी कीमत को बढ़ने से रोक कर किया है। कुछ राज्यों ने भी अपने टेक्स में कमी करके जनता को राहत पहुंचायी हैं। लेकिन राजनीति के लिये राजनीति करना आजकल नेताओं का शगल बन गया हैं।    

Sunday, September 2, 2012


राघव जी ने साबित कर दिया कि नये सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय सिवनी में होना  ही कम खर्चीला होगा
हाल ही में विक्रयकर विभाग द्वारा भामाशाह पुरुस्कार वितरण का समारोह सिवनी जिले में आयोजित किया गया। इस समारोह में बालाघाट,छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के लोगों को पुरुसक्ृत् किया जाना था। बड़ी होशियारी से वित्त मंत्री राधव जी ने एक हाथ से खजाने से निकाल कर दूसरे हाथ से इनाम की अधिकांश खजाने में ही जमा कर लेने का कमाल कर दिखाया। होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययतिा बरतने के लिये े इन तीन जिलों का कार्यक्रम बीच में स्थित सिवनी जिले में आयोजित कर राघव जी ने लोगों पर एक बहुत बड़ा उपकार भी किया है। वित्त मंत्री के निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सिवनी का दावा उचित हैं इसीलिये अब जिले के तमाम जन प्रतिनिधियाों का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस आधार पर जिले को जायज हक  दिलायें। मिशन 2013 और 2014 की कांग्रेा की जिले में कोई तैयारी नहीं दिख रही हैं। ना तो कमेटियों में प्रभारी महामंत्री नियुक्त हो पाये हैं और ना ही ध्वजवाहिनी समिति की कोई हलचल ही दिख रही हैं। पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर भाजयुमो द्वारा विवेकानंद संदेश यात्रा के नाम पर मोटर सायकिल रैली आयोजित की गयी हैं। युवा मोर्चे के नाम पर निकाली जाने वाली रैली का भार अपने वजनदार नेताओं के कंधों पर डाल दिया हैं। भाजपायियों में चल रही चर्चा के अनुसार भाजपा ने विधायक पद के जीते हारे प्रत्याशियों के साथ ही संभावित प्रत्याशियों को भी अभी से बोझ लाद दिया हैं।
संभाग की मांग को जायज ठहरा गये राघव जी-वित्त मंत्री मितव्ययिता ध्यान नहीं रखेगा तो भला कौन रखेगा? और ऐसा ही किया वित्तमंत्री राघव जी ने। हाल ही में विक्रयकर विभाग द्वारा भामाशाह पुरुस्कार वितरण का समारोह सिवनी जिले में आयोजित किया गया। इस समारोह में बालाघाट,छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के लोगों को पुरुसक्ृत् किया जाना था। जिसके मुख्य अतिथि वित्तमंत्री राघव जी और अध्यक्षता विस उपाध्यक्ष एवं इंका विधायक हरवंश सिंह ने की थी। इसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रभारी मंत्री नाना भाऊ,सांसद द्वय के.डी. देशमुख एवं बसोरी सिंह,विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर एवं कमलमर्सकोले, केबिनेट मंत्री के दर्जा प्राप्त वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर थे। इस समारोह में ना जाने क्यों राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते को आतंत्रित नहीं किया गया।इसमें हर जिले में सर्वाधिक टेक्स देने वालों को पुरुस्कृत किया जिसमें प्रथम इनाम एक लाख रु. द्वितीय इनाम 50 हजार रु. एवं तृतीय इनाम 25 हजार रु. का दिया गया। तीनों जिलों में प्रथम एवं द्वितीय पुरुस्कार तो शासकीय विभागों को ही मिले। इसमें बड़ी होशियारी से वित्त मंत्री राधव जी ने एक हाथ से खजाने से निकाल कर दूसरे हाथ से इनाम की अधिकांश खजाने में ही जमा कर लेने का कमाल कर दिखाया। होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययतिा बरतने के लिये े इन तीन जिलों का कार्यक्रम बीच में स्थित सिवनी जिले में आयोजित कर राघव जी ने लोगों पर एक बहुत बड़ा उपकार भी किया है। प्रस्तावित नये सतपुड़ा संभाग का मुख्यालय सिवनी को बनायश जाने की मांग लंबे समय से चल रही हैं। इसका प्रमुख कारण भी यही बताया गया था कि छिंदवाड़ा और बालाघाट जिले के बीच में सिवनी स्थित है इसलिये प्रशासनिक एवं आर्थिक रूप से इसे ही मुख्यालय बनाया जाना चाहिये। लेकिन छिंदवाड़ा को मुूख्यालय बनाने की अपनी घोषणा के कारण मुख्यमंत्री जिले की इस जायज मांग को नहीं मान रहें हैं और मामले को लंबित रखे हुये हैं।वित्त मंत्री के निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सिवनी का दावा उचित हैं इसीलिये अब जिले के तमाम जन प्रतिनिधियाों का यह दायित्व बन जाता है कि वे इस आधार पर जिले को जायज हक विस औा लोस चुनाव के पहले दिलायें वरना मामला फिर लटक जायेगा।
जिले में ना प्रभारी महामंत्री और ना ध्वज दिख रहा है  ना ही वाहिनी -राजनैतिक हल्कों में चर्चित है कि मिशन 2013 एवं 2014 का कांग्रेस का कार्यक्रम काफी शिथिल चल रहा हैं। राजनैतिक सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक जिला एवं ब्लाक कांग्रेस कमेटियों में प्रभारी महामंत्री की नियुक्ति तक नहीं हो पारयी हैं। कांग्रेसजनों में व्याप्त चर्चा के अनुसार कांग्रेस के जिले के पट्टेदार एवं इकलौते विधायक हरवंश सिंह ने अपने ही गुट के उप गुटों में तालमेल बिठाने चक्कर में इन पदों के लिये कई कई नेताओं को आश्वासन दे दिया था। लेकिन बनना तो एक ही को था इसलिये अब वे यह तय नहीं कर पा रहें हैं कि चुनाव के समय नेताओं की नाराजगी मोल ली जाये या फिर बिना प्रभारी महामंत्री के ही काम चलने दिया जाये। जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी की भी मजबूरी यह है कि बिना हरवंश सिंह की अनुमति के वे कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं। प्रदेश कांग्रेस ने मिशन 2013 एवं 2014 के लिये केन्द्र की ध्वजवाहिनी योजनाओं की निगरानी एवं प्रचार प्रसार के लिये ध्वज वाहिनी समितियों का जिला स्तर पर गठन किया हैं। लेकिन जिले में यह पद भी अपने ही उप गुटों में संतुलन बिठाने की भेंट चढ़ गया है। इस पद पर मां. असलम खॉन की नियुक्ति की गयी हैं। वे जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार थे लेकिन इस पद पर हीरा आसवानी बैठ गये है। इसके बाद जिला इंका में उन्हें कोई पर ना दिया जाय ऐसा दवाब हरवंश समर्थक 14 नेताओं ने बनाया था। इसमें कुछ नेता ऐसे भी थे जिनका हरवंश सिंह के केवलारी क्षेत्र में प्रभाव था। वैसे असलम भाई को जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल का खुला समर्थ था लेकिन उसके बावजूद भी असलम भाई को जिला कांग्रेस में कोई सम्मानजनक पद नहीं मिल पाया था। इसीलिये मौका हाथ लगते ही हरवंश सिंह ने उन्हें ध्वज वाहिनी योजनाओं की समिति का जिले का अध्यक्ष बना दिया। लेकिन उनके द्वारा काम नहीं करने की बात जब केई बार हुयी तो उनके समर्थक यह तक कहते देखे गये कि असलम भाई ने तो स्तीफा दे दिया हैं। इसमें सच्चायी क्या है? यह तो असलम भाई या हरवंश सिंह ही बता सकते हैं लेकिन यह जरूर है कि जिलें ना तो ध्वज दिख रहा है और ना ही वाहिनी,ऐसे में कांग्रेस चुनावी मिशन में कैसे कामयाब होगी? यह चर्चा का विषय बना हुआ हैं। 
हर्रा लगे ना फिटकरी,रंग चोखा के चोखा-पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर भाजयुमो द्वारा विवेकानंद संदेश यात्रा के नाम पर मोटर सायकिल रैली आयोजित की गयी हैं। इंदौर और उज्जैन संभाग की रैली फेल हो जाने कारण जबलपुर संभाग की रैली पर भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने विशेष ध्यान दिया और युवा मोर्चे के नाम पर निकाली जाने वाली रैली का भार अपने वजनदार नेताओं के कंधों पर डाल दिया हैं। भाजपायियों में चल रही चर्चा के अनुसार भाजपा ने विधायक पद के जीते हारे प्रत्याशियों के साथ ही संभावित प्रत्याशियों को भी अभी से बोझ लाद दिया हैं। जिले के भाजयुमो अध्यक्ष ठा. नवनीत सिंह और जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन के नेतृत्व में भारी संख्या में जिले से कार्यकर्त्ता रैली में भाग लेने जबलपुर गये। इस आयोजन में कुछ ऐसा ही हुआ कि हर्रा लगे ना फिटकरी रंग चोखा के चोखा। भाजपा के किस बड़े नेता पर कितना आर्थिक बोझ पड़ा और कैसे और किससे इसकी व्यवस्था की गयी?इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जिले के 17 मंड़लों में हर मंड़ल से पचास पचास मोटर साइकिल भेजने का लक्ष्य रखा गया था। नाम तो इा आयोजन का विवेकानंद संदेश यात्रा रखा गया था लेकिन वास्तव में शिवराज विवेकानंद जी पर भारी पड़े और हर जगह उनका ही गुणगान किया जाता रहा।“मुसाफिर“       



खुद के हित पर जनहित को कुर्बान कर देने वाले जन  प्रतिनिधियों को क्या जनता कभी सबक सिखायेगी?
सिवनी। बीते दस पंद्रह सालों से कांग्रेस और भाजपा नेताओं की नुरा कुश्ती के कारण जन          प्रतिनिधि अपने हित के लिये जन हित को कुर्बान करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहें हैं। इसका खामियाजा इस पिछड़े हुये जिले को भुगतना पड़ रहा हैं और पड़ोसी जिलो की तुलना में सिवनी और पिछड़ता जा रहा हैं। क्या जनता कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को सबक सिखायेगी? यह सवाल सियासी हल्कों में चर्चित हैं।
बात चाहे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव द्वारा घोषित रामटेक सिवनी गोटेगांव नयी रेल लाइन की हो या मुख्यमंत्री शिवराजसिंह द्वारा घोषित इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज और नगर को माडल शहर बनाने की घोषणा हो उन्हें पूरा कराने की दिशा में जनप्रतिनिधियों की अनदेखी किसी से भी छिपी नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनो के ही जन प्रतिनिधियों ने इस हेतु ना तो सदन में और ना ही सड़क पर कभी कोई दवाब बनाया।
कांग्रेस और भाजपा के जन    प्रतिनिधियों की नूरा कुश्ती के चलते भी जिले ने बहुत कुछ खो दिया हैं। इसी नूरा कुश्ती के चलते सिवनी लोकसभा और घंसौर विधानसभा परिसीमन में समाप्त हो गयी। जिले के किसी भी नेता के प्रयासों के बिना जो फोर लेन सड़क जिले को मिल रही थी उसमें भी नूरा कुश्ती के चलते जो ग्रहण लगा हैं तो वह आज तक नहीं हट पाया हैं। पहली बार जब यह प्रस्ताव राज्य नेशनल लाइफ बोर्ड के पास गया था तो प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसे अस्वीकार कर केन्द्र को भेज दिया था। जब  दूसरा प्रस्ताव राज्य से भेजा गया तब तक नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुका था। उसके बाद मामला जो उलझा तो आज तक सुलझ नहीं पाया हैं। शिवराज की गर्जना और दिल्ली ले जाकर जनमंच के प्रतिनिधि मंड़ल को मिलवाने की घोषणा भी दोनों तरफ की ढील के चलते नाकामयाब ही रही। 
कृषि महाविद्यालय की मांग भी लंबे समय से लंबित हैं। महिला महाविद्यालय का हास्टल सहित भवन,बीज निगम और कृषि विज्ञान केन्द्र की सुविधा के बावजूद भी यह मांग आज तक पूरी नहीं हो पायी हैं। भीमगढ़ जलावर्धन योजना का बिजली का बिल उसकी लागत से अधिक हो गया हैं लेकिन ना तो कांग्रेस के राज में और ना ही भाजपा के राज में इसका कोई निदान निकाला गया।
कहने को इस जिले में ती सांसद भाजपा के के.डी.देशमुख और राज्यसभा सदस्य फग्गनसिंह कुलस्ते,विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह,बकीना मंत्री का दर्जा प्राप्त डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन,नरेश दिवाकर,प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष विधायक नीता पटेरिया,शशि ठाकुर,कमल मर्साकेले, जिला पंचायत के युवा जुझारू अध्यक्ष मोहन चंदेल एवं नपा के एुवा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी हैं लेकिन इतने नाथ होने के बाद भी जिला अनाथों की भांति भुगत रहा हैं। इसमें इंका भाजपा की नूरा कुश्ती और दोनों ही पार्टियशें की गुटबाजी भी कम जवाबदार नहीं हैं।    
  
सदभाव से अब दुर्भाव क्यों?
सिवनी। जिले में आजकल फोरलेन में रुचि लेने वालों के बीच में चटखारे लेकर यह चर्चा होती देखी जा रही हैं कि सिवनी से खवासा तक फोर लेन बनाने वाली सदभाव कंपनी से कुछ उसके पुरानें अंध भक्त अब दुर्भाव क्यों रखने लगे हैं? सन 2007 से फोर लेन का काम करने वाली सदभाव कंपनी ने इस दौरान जो भी अनियमिततायें की उन्हें नजर अंदाज कर उनके प्रवक्ता क्ी भूमिका अदा करने वाले ही आज जनहित की बात करते हुये सदभाव से दुर्भाव रखते हुये उनकी कब्र्र खोदते देखे जा रहें हैं?यदि अनिमिततायें करके सदभाव ने चोरी की है तो उन्हें सजा मिलनी चाहिये लेकिन अचानक ही हुये इस हृदय के कारणों को लेकर तरह तरह की बात करते देखे जा रहे हैं।