Monday, October 13, 2014

धार्मिक उत्सवों से समाप्त होती धर्मिकता ना केवल चिंता का विषय है वरन इसे पुर्नजीवित करने के प्रयास करना जरूरी है
आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी। महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। लेकिन कांग्रेस से टीम राहुल की हिना कांवरे ही गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है। दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। 
धार्मिक उत्सवों में समाप्त होती धार्मिकता चिंता का विषय:-आजकल यह देखने मे आ रहा है कि धार्मिक उत्सवों में से धार्मिकता विलुप्त होते जा रही है और ये सिर्फ उत्सव ही बच गये हैं।  सिवनी का दश्हरा ऐतिहासिक और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था लेकिन धीरे धीरे यह अपनी पहचान खोते जा रहा है। पिछले कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि जब पूरे देश में दशहरा मनाया जाता है तो उसके दूसरे दिन सिवनी में दशहरा मनाने का निर्णय ले लिया जाता है। इस साल भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस कारण होता यह है कि गांव के लोग दशहरे के दिन आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं। उन्हें इस बात का पता ही नहीं रहता कि शहर में आज नहीं ब्लकि कल मनाया जाने वाला हैं। ऐसे आयोजनों में यदि भटकाव आता है तो धर्म गुरु राह दिखाते हैं। कई साल पहले शहर में मां दुर्गा के मंड़पों में नौ दिनों तक ना केवल बेतुके फिल्मी गाने बजते थे ब्लकि कई स्थानों पर फूहड़ नृत्य भी हुआ करते थे। तब जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने यह कहा कि मां जगदम्बा के पंड़ालों में फिल्मी गीत नहीं बजना चाहिये औ फूहड़ नृत्य नहीं होना चाहिये ब्लकि जस और भजन बजना चाहिये ताकि धार्मिक वातावरण बने और दर्शक पूरे श्रृद्धा भाव से मां के दर्शन कर धर्म लाभ ले सकें। इसका यह असर हुआ कि आज शहर में ना तो कोई फूहड़ नृत्य होते है और ना ही फिल्मी गाने बजते है ब्लकि मां अम्बे के जस की गूंज पूरे शहर में भक्ति भाव का संचार करते हैं। इस साल भी पं. रविशंकर शास्त्री जी ने यह कहा था कि धर्मानुसार सभी पूजन पाठ मुहुर्त के हिसाब से होना चाहिये। लेकिन दशहरा एक दिन बाद मनाने का निर्णय ले लिया गया था। जानकार लोगों का दावा है कि ऐसा इसलिये होता है क्योंकि दुर्गा चौक के माता राज राजेश्वरी मंदिर के जवारे नवमी के दिन विसर्जन के लिये निकलते हैं। कई बार जब तिथियों के घटने के कारण दशहरा भी नवमी के दिन पड़ता है तो समस्या आती है। वैसे यदि देखा जाये तो सिर्फ सिंघानिया जी के मकान से स्व.महेश मालू के घर के सामने तक की कुछ मीटर की सड़क ही ऐसी कामन है जो दशहरे के जुलूस मार्ग और जवारे के मार्ग में शामिल रहती हैं। प्रशासन के लिये तो यह मुश्किल काम हो सकता है कि एक ही दिन में दो आयोजनों को कैसे संपन्न करायें? लेकिन क्या एक ही धर्म के दो कार्यक्रमों को एक साथ या कुछ आगे पीछे संपन्न नहीं करा सकते ? यदि ऐसा संभव हो जाये तो व्यायाम शालाओं में मुहुर्त में ही शस्त्र पूजन भी हो जायेगा और दशहरा भीं मुहूर्त में मन जायेगा तथा इसकी ऐतिहासिकता और प्रसिद्धि भी धीरे धीरे पुनः स्थापित हो जायेगी।
कांग्रेस में सिवनी का कम होता महत्व:-महाराष्ट्र और हरियाणा के विस चुनावों में जिले के कुछ भाजपा नेताओं को भी अहम जिम्मेदारी दी गयी है। जिले के भाजपा के के तीन पूर्व विधायकों डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन और नरेश दिवाकर को महाराष्ट्र तथा नीता पटेरिया को हरियाणा में प्रभार दिया गया है। इसके अलावा नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और पूर्व जिला भाजप अध्यक्ष सुजीत जैन भी महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार करने गये हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश में विस के उप चुनावों में भाजपा को करारा झटका लगने के बाद ये चुनाव भाजपा के लिये प्रतिष्ठा  का प्रश्न बन गयें हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि इन दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जरूरत से ज्यादा प्रचार को महत्व दे रहें हैं। जिसके कारण उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी है। ऐसे महत्वपूर्ण मिशन में जिले के भाजपा नेताओं को भी प्रभार मिलना काफी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के लिये भी ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व ने जिले के किसी भी नेता को इन राज्यों में चुनाव में कोई जवाबदारी नहीं दी है।  और तो और टीम राहुल से भी सिर्फ बालाघाट लोस क्षेत्र की कांग्रेस उम्मीदवार रहीं विधायक हिना कांवरे कांग्रेस के प्रचार में महाराष्ट्र गयीं हैं। इससे ऐसा लगने लगा है कि कांग्रेस अलाकमान की नजरों में जिले का राजनैतिक महत्व बहुत कम हो गया है।
दिवाली के बाद लग सकती है नपा चुनाव के लिये आचार संहिताः-दीपावली के बाद नपा चुनावों को लेकर आचार संहिता लगने की संभावना है। इस बीच अध्यक्ष के लिये आरक्षण के लाट भी शायद डाल दिये जायेंगें और तब पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जावेगी।इसके बाद ही राजनैतिक दलों के साथ साथ सभी नेताओं की राजनैतिक सक्रियता भी दिखने लगेगी। वैसे तो वार्डों के आरक्षण के बाद से ही मोहल्लों में चुनावी रणवीरों ने अपने दांव पेंच दिखाने लगे है। हालांकि अभी किसी भी पार्टी ने अपने उम्मीदवार तय नहीं किये हैं लेकिन अपने अपने आकाओं के आश्वासन पर पार्षद बनने की उम्मीद रखने वाले नेताओं ने अपनी अपनी बिसात बिछाना चालू कर दी है। तब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा और कांग्रेस इस चुनाव में क्या रणनीति अपनाते है और किन मुद्दों को उठाया जाता है। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि सिवनी के निर्दलीय विधायक मुनमुन राय इस चुनाव में सीधे मैदान में उतरते हैं या फिर कोई और रणनीति बना कर किसी को लाभ पहुचाने और किसी को नुकसान करने करने की बिसात बिछाते है? राजनैतिक विश्लेषकों की इन्हीं सब पर पैनी नजर है जो चुनावों के परिणामों को प्रभावित करन वाली साबित होंगीं।“मुसाफिर” 
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
14 अक्टूबर 2014

Monday, September 29, 2014

पल्लू कांड़ को  राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये लेकिन सामाजिक रूप से उचित ठहराना संभव दिखायी नहीं देता 
विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया।  भाजपा ने इस घटना की निंदा करके चुप्पी साध ली जबकि कांग्रेस ने निंदा करने के साथ ही कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा। इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरना का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे 
मोदी के जन्म दिन पर सार्वजनिक मंच पर हुआ भाजपा नेत्री का अपमान:-विगत दिनों 17 सितम्बर को स्थानीय पॉलेटेक्निक कालेज के मैदान में कृषि महोत्सव का शासकीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन सहित कई जनप्रतिनिधि,भाजपा नेता और प्रशासकीय अधिकारी मंच पर मौजूद थे। यह भी एक संयोग ही था कि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन भी था। इसी कार्यक्रम को कवर करने के लिये लगे वीडियो कैमरों में मंच की एक अशोभनीय घटना भी कैद हो गयी। मंच पर मौजूद सिवनी के निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय ने अपने हाथों में लगी कालिख पौंछने के लिये उनके बाजू में खड़ी भाजपा की पूर्व सांसद,विधायक एवं प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रदेश भाजपा की मंत्री नीता पटेरिया की साड़ी के पल्लू का चुपके से उपयोग कर लिया। चुपके से ऐसा करने के बाद जब उन्होंने पलट कर बाजू में देखा तो उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान सी दिख रही थी और उन्होंने चेहरे पर एक ऐसी हरकत करके सिर हिलाया जिसे समाज में अच्छा नहीं माना जाता है। सोशल मीडिया पर इस घटना के दो वीडियो ने चंद घंटों में ही हड़कंप मचा दिया। इसे सार्वजनिक शासकीय मंच पर एक महिला के साथ हुये अपमान से जोड़कर देखा गया और निंदा तथा आलोचना का दौर शुरू हो गया। नीता पटेरिया ने कहा कि उन्हें वाडियो देखने के बाद घटना का पता चला तो दूसरी तरफ मुनमुन राय ने कहा कि वे नीता पटेरिया को मां,बहन और भाभी मानते हैं और मंच पर हुआ वो हास्य विनोद के क्षण थे। फिर भी यदि बुरा लगा हो तो वे माफी मांगते है। दूसरे दिन नपा के सामने मुनमुन राय का भाजपा कार्यकर्त्ताओं ने पुतला जलाया और पुलिस में घटना की कंपलेंट की लेकिन नीता पटेरिया ने रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी। इस घटना के समाचार राष्ट्रीय और प्रादेशिक चैनलों के साथ ही अखबारों की भी सुर्खी बनी और राजनैतिक हल्कों में एक भूचाल सा आ गया। 
कांग्रेस ने सौंपा ज्ञापन तो भाजपा ने की निंदा:- इस घटना को लेकर कांग्रेस और भाजपा ने विज्ञप्ति जारी कर घटना की निंदा की और इसे महिला अपमान के साथ के साथ जनादेश का अपमान भी निरूपित किया। लेकिन इसके बाद भाजपा ने चुप्पी साघ ली। कहा जाता है दूसरे वीडियों में जिला भाजपा अध्यक्ष वेदसिंह ठाकुर भी विवाद में आ गये थे। कांग्रेस नेताओं ने बाद में कलेंक्टर से मुलाकत कर ज्ञापन भी सौंपा और प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी कटघरें में खड़ा किया कि एक वरिष्ठ महिला नेत्री के साथ हुये अपमान पर सरकार और प्रशासन चुप्पी साधे हुये है। इसके अलावा भ कई संगठनों और दलों ने भी घटना की निंदा की और इसे महिला का अपमान निरूपित किया।
ब्राम्हण समाज ने दिश धरनाः- इस घटना की तीखी निंदा करने के साथ ही जिला ब्राम्हण समाज ने धरने का आयोजन किया। इसमें उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लोगों को आमंत्रित किया। इसमें पूर्व विधायक एवं कांग्रेस नेत्री नेहा सिंह और विस प्रत्याशी राजकुमार पप्पू खुराना सहिीत कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने हिस्सा लेकर धटना की निंदा कर कार्यवाही की मांग भी की। धरने के बाद नीता पटेरिया ने एस.पी. से भेंट करके एक ज्ञापन भी सौंपा और इस बात पर अपनी नाराजगी भी जताई कि मेरे बयान होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी। हालांकि यहां यह उल्लेखनीय है कि पुलिस थाने में स्वयं नीता पटेरिश ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी है। उन्होंने राज्य महिला आयोग में जरूर अपनी शिकायत दी है। 
मुनमुन ने भी किया शक्ति प्रदर्शन:- जिस दिन ब्राम्हण समाज के बैनर पर महिला अपमान के विरोध में धरना प्रदर्शन हो रहा था तो वहीं दूसरी तरफ चंद कदमों दूर विधायक मुनमुन राय अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। जिले भर से आयी सैकड़ों गाड़िया ओर में लाये गये हजारों लोगों का उत्साह देखने लायक था। राजनैतिक विश्लेषकों की आंखों के सामने वह दिन आ गया जब तत्कालीन भाजपा सांसद नीता पटेरिया की रिपोर्ट पर तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला धारा 307 के तहत कायम हुआ था तो उन्होंने न्याय रैली आयोजित की थी जिसमें ऐसी ही भीड़ जुटायी गयी थी। स्व. हरवंश सिंह ने न्याय रैली की थी तो अभी मुनमुन जनता से न्याय मांग रहे थे। अभी यदि रिपोर्ट पर पुलिस मामला कायम करती है तो वो भी धारा 354 का होता। जनता के सामने मुनमुन ने अपनी पुरानी मां,बहन और भाभी वाली सफायी देते हुये कांग्रेस और भाजपा नेताओं पर आरोप भी लगा डाला कि वे उनकी जीत  और लोकप्रियता से जलते है इसलिये धज्जी का सांप बना रहें हैं। जब वे अपने लाये हुये लोगों के सामने सफायी दे रहे थे तब ये तमाम लोग उत्साहित होकर नारे लगा रहे थे कि मुनमुन भैया संघंर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। वैसे तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से भला कितने लोगों को यह पता था कि मुनमुन  भैया तो मंच पर अपने हाथों में लगी कालिख को पौंछने के लिये नीता जी के पल्लू से संघर्ष कर रहे थे और इस मामले में घिर जाने पर ही उन्हें यहां गाड़ियां भेज कर बुलाया गया था। कुछ लोग इस बात को लेकर भी लेकर आश्चर्यचकित है कि एक ही दिन लगभग एक ही जगह एक ही मुद्दे पर आयोजित होने वाले दो विपरीत आंदोलनों के लिये अनुमति कैसे दे दी गयी? यह भी बताया गया कि शक्ति प्रदर्शन के दूसरे ही दिन वे विदेश यात्रा पर चले गये हैं। बहरहाल उस दिन मंच पर घटित पल्लू कांड़ को कितने ही राजनैतिक चश्मों से क्यों ना देखा जाये?लेकिन सामाजिक रूप से इसे उचित ठहराना तो संभव दिखायी नहीं देता है। “मुसाफिर
 sABHAR Darpan Jhoot Na Bole
Seoni 
30 Sep 2014




















   



Monday, September 15, 2014

मान ना मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर समन्वयक बने मुनमुन की बैठक में पार्षदों का ना आना सियासी हल्कों में हुआ चर्चित 
इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पार्षद आये ही नहीं। घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है। शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा।
मुनमुन की बैठक में नहीं आये पार्षदंः-इन दिनों चाहे सोशल मीडिया की हो या मीडिया दोनों पर ही नगरपालिका की राजनीति गर्मायी हुयी है। पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी और उपाध्यक्ष राजिक अकील के बीच नवीन जलावर्धन योजना को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। यहां यह विशेष् रूप से उल्लेखनीय है कि तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने अपने सिवनी प्रवास के दौरान जिले की नगरपालिका और नगर पंचायतों के लिये सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। इस संबंध में मुख्यनगरपालिका अधिकारी द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि केन्द्रसरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकाय के द्वारा दिये जाने वाले अंशदान से कुलराशि 47 करोड़ 36 लाख रु. की राशि इस हेतु स्वीकृत की गयी है। साथ ही यह भी बताया गया है कि राज्य तकनीकी समिति द्वारा 62 करोड़ 55 लाख रु. की निविदा लागत स्वीकृत की गयी है। इसमें वर्तमान तथा नवीन जलावर्धन योजना के पांच साल के रख रखाव और संचालित करने का व्यय भी ठेकेदार द्वारा किया जाना प्रसतवित है। इस योजना हेतु स्वीकृत राशि और निविदा की राशि को लेकर ही विवाद प्रारंभ हुआ है। इससे यह सवाल उठना स्वभाविक ही है कि आखिर 15 करोड़ 19 लाख रु. की अतिरिक्त राशि निविदा में कैसे आयी और अंतर की यह राशि पालिका को मिलगी कहां से? आम तौर पर यह माना जा रहा है कि ये अंतर की राशि की बंदर बांट करनंे के लिये ही बढ़ायी गयी है। इसे लेकर पालिका के कांग्रेसी पार्षद लामबंद हो गयें हैं वहीं पालिका के भाजपा पार्षदों का भी अपने अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी को समर्थन नहीं है। बीते कई दिनों से दोनों पक्षों का यह विवाद सुर्खियों में बना हुआ है। यह भी सही है कि जब किन्हीं दो पक्षों के बीच विवाद हो जाता है तो उसे सुलझाने के लिये दोनों ही पक्ष अपने किसी विश्वास प्राप्त व्यक्ति को पंच बनाकर उसे सुलझाने का काम करते है। लेकिन पालिका के इस विवाद में “मान ना मान,मैं तेरा मेहमान  ”की तर्ज में सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने इस विवाद को सुलझाने और नगर विकास को लेकर पार्षदों की एक बैठक बुला ली। लेकिन इस बैठक में पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के अलावा भाजपा पार्षद श्याम शोले के अलावा कोई भी पार्षद उसमें नहीं आया। कुछ अखबारों में यह भी छपा कि कांग्रेस पार्षद दल के नेता शफीक पार्षद भी उसमें उपस्थित थे। इसके बावजूद भी विधायक मुनमुन राय ने अपनी निधि से नगर विकास के लिये 25 लाख रु. की राशि देने की घोषणा की जो कि शायद इस बैठक का मुख्य उद्देश्य था। हालांकि यह कहना भी गलत होगा कि मुनमुन को नपा के मामलो से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि यह उनके विस क्षेत्र के मुख्यालय की पालिका है लेकिन नपा चुनाव के दो तीन महीने पहले ही नगर की सुध लेना कुछ और ही कहानी कहती नजर आ रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि नपा में चुनावों में भाजपा की जीत हार में मुनमुन की भूमिका ही निर्णायक रहने वाली है। इसमें उन्हें अपने चुनाव में नगर में मिली भारी बढ़त और मुस्लिम वार्डों में मिले वोटों को कारण बताया जा रहा है। इसमें उनकी क्या रणनीति होगी? यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा।
भाजपा राज में वेदसिंह और इंका राज में आशुतोष भी नही करा पाये थे जांचः- घटिया निर्माण कार्य के कारण चालू होते ही शहर की वर्तमान भीमगढ़ जलावर्धन योजना विवादों के घेरे में रही है। यह योजना शुरू से ही दुगनी बिजली खपत के बाद भी आधा पानी देती रही है जिसके कारण पालिका पर अक्सर ही करोड़ों रुपयों का बिजली बिल बकाया रहता रहा है।शहर के लिये सफेद हाथी साबित हो चुकी इस योजना की जांच के लिये कांग्रेस शासनकाल में सिवनी विस के इंका प्रत्याशी रहे आशुतोष वर्मा ने इस मुद्दे पर जांच की मांग तो कांग्रेस शासनकाल में जरूर उठायी लेकिन कोई कारगर जांच नहीं हो पायी। इसके बाद जब प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ तो उमा भारती के शासनकाल में जिला भाजपा अध्यक्ष रहे वेदसिंह ठाकुर ने फिर एक बार इस मामले में शिकायत की लेकिन इस परियोजना की फिर भी जांच नहीं हो पायी। इसमें घपले करने वाले हाथ काफी ताकतवर थे। इस योजना के क्रियान्वयन के दौरान सिवनी में पदस्थ पी.एच.ई. के कार्यपालन यंत्री जोशी जबलपुर संभाग के संघ के प्रमुख स्तंभ रहे स्व. बाबूराव जी परांजपे के निकट रिश्तेदार थे और उस विभाग के मंत्री उस दौरान स्व. हरवंश सिंह थे। उस वक्त इस योजना के घटिया काम को लेकर एक दुर्गा मंड़प में झांकी भी लगायी गयी थी। तकनीकी लोगों का यह मानना है कि इस योजना में निर्धारिम मानदंड़ों के पाइप नहीं लगे है। जितनी रफ्तार और मात्रा में पानी फेंकने के लिये मोटर पंप लगाये लगाये हैं उसकी लगभग आधी क्षमता के पाइप का उपयोग किया गया है। इसीलिये टेस्टिंग के समय जब पूरी रफ्तार से पानी छोड़ा गया था तो छोटे मिशन स्कूल के पास एक जमीन से उखड़कर लगभग खड़ा हो गया था और एक बड़ी दुर्घटना होने से बच गयी थी क्योंकि कुछ समय पहले ही स्कूल की छुट्ठी हो चुकी थी। उसके बाद से मोटर पंपों से लगभग आधी मात्रा ममें नियंत्रित करके पानी छोड़ा जाता है जिसके कारण पंप अपनी क्षमता से दुगने समय तक चलने के बाद भी शहर की स्ीाी टंकियशें को दिन में एक बार भी पूरा नहीं भर पाते थे जबकि तकनीकी स्वीकृति के अनुसार दिन में दो बार में 12 एमएलडी पानी टंकियों में भरा जाना चाहिये था। दुगने समय तक पंपों को चलाने कारण प्राकल्लन में किया गया विद्युत खपत का आकलन फेल हो गया और लगभग दुगनी बिजली की खपत होने लगी जिसका बोझ नगरपालिका आज भी नहीं झेल पा रही है। हाल ही में जो प्रस्ताव जलावर्धन योजना को लेकर सामने आयें हैं उसके अनुसार शहर में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी प्रतिदिन दिया जायेगा जिसमें 85 लीटर प्रति व्यक्ति नयी योजना से और 50 नीटर प्रति व्यक्ति पुरानी विवादित सफेद हाथी साबित हो चुकी योजना से प्रदाय किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे हालात में नगरपालिका को इस योजना के भारी भरकम बिल के अलावा नयी जलावर्धन योजना का बिजली का बिल भी भरना होगा। ये कैसे संभव होगा? इसे लेकर नगर के सभी कर्णधार फिलहाल तो मौन ही है। “मुसाफिर”
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
16 सितम्बर 2014 से साभार 

Wednesday, September 3, 2014

विधान सभा में मुनमुन ने बागरी जाति का मामला तो उठाया लेकिन उससे बागरी समाज के हित पूरे होते नहीं दिख रहें है
हाल ही में हुये विस सत्र में जिले के बागरी समाज के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना बंद हो जाने का मामला सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने उठाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जवाब देकर मामले को समाप्त कर दिया कि केन्द्र सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रमाण प. देना बंद किये गये हैं। बागरी समाज का यह विवाद  1998 के विस चुनाव के पहले से चल रहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रमाण पत्र जारी नही होंगें इसकी भनक जैसे ही समाज के लोगों को लगी वैसे ही पूरी समाज में हड़कंप मच गया। बागरी समाज के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हिम्मत सिंह बघेल के नेतृत्व में जिला मुख्यालय में एक विशाल जुलूस निकाला गया था। किसी पार्टी में की गयी कोई शिकायत पर भी नौ महीन बाद कार्यवाही होेती है यह पहली बार ही देखने सुनने को मिला है। जी हां प्रदेश भाजपा कार्यालय ने नवम्बर 2013 में की गयी किसी शिकायत पर सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेकाम और सिवनी के पूर्व पार्षद अजय डागोरिया सहित चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। लोग तो यह कहते भी देखे जा रहें है कि कांग्रेस में बहोरीबंद का बंद खुलता ही नजर नहीं आ रहा है कि जीत कैसे हुयी।
सवाल तो विस में उठा लेकिन बागरी समाज को मिला कुछ नहींः-हाल ही में हुये विस सत्र में जिले के बागरी समाज के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना बंद हो जाने का मामला सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने उठाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह जवाब देकर मामले को समाप्त कर दिया कि केन्द्र सरकार की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रमाण प. देना बंद किये गये हैं। बागरी समाज का यह विवाद  1998 के विस चुनाव के पहले से चल रहा है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 1978 में केन्द्र की जनता पार्टी सरकार ने जिले की बागरी समाज को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया था। उसके बाद इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र मिलना चालू हो गये थे जो कि बिना किसी बाधा के 1997 तक जारी रहे। इस दौन शिकायत होने पर प्रदेश सरकार द्वारा इस जाति की जांच के लिये वैष्ठव समिति का गठन किया था कि इस जाति के लोग अनुसूचित जाति के हैं या नहीं? जिला कलेक्टर मो. सुलेमान के कार्यकाल में वैष्ठव समिति ने  जांच हेतु बागरी बाहुल्य क्षेत्रों का भ्रमण किया था। इस कमेटी ने आपनी रिपोर्ट में इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति में शामिल करने योग्य नहीं माना था तथा इस आशय की रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रमाण पत्र जारी नही होंगें इसकी भनक जैसे ही समाज के लोगों को लगी वैसे ही पूरी समाज में हड़कंप मच गया। बागरी समाज के तत्कालीन अध्यक्ष स्व. हिम्मत सिंह बघेल के नेतृत्व में जिला मुख्यालय में एक विशाल जुलूस निकाला गया तथा समाज का पूरा आक्रोश केवलारी क्षेत्र के तत्कालीन विधायक एवं राज्य सरकार के ताकतवर मंत्री स्व. हरवंश सिंह के खिलाफ फूट पड़ा। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि केवलारी विस क्षेकत्र में सिवनी और केवलारी ब्लाक का बहुत बड़ा ऐसा इलाका शामिल था जिसमें बागरी समाज का बाहुल्य था। ऐन चुनाव के समय बागरी समाज के इस आक्रोश का थामना स्व. हरवंश सिंह के लिये राजनैतिक रूप से बहुत जरूरी था। वे प्रदेश सरकार की राजनैतिक मामलों की समिति के भी सदस्य थे। उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुये इस रिपोर्ट पर पुर्नविचार करने का प्रस्ताव लेकर उसे लंबित करा दिया था। इसके बाद उसी बागरी समाज के उनका ग्राम भोंगाखेड़ा में पगड़ी और शाल पहना कर सम्मान भी किया था। 1998 का चुनाव निपटने के बाद कब वैष्ठव समिति की रिपोर्ट अनुशंसा के साथ केन्द्र सरकार को भेज दी गयी और कब केन्द्र की एन.डी.ए. सरकार ने उसे मंजूर कर लिया? इसकी भनक तक किसी को नहीं लगी। जब प्रमाण पत्र मिलना फिर से बंद हो गये तब पता चला कि खेल खत्म हो गया है। तब से लेकर अब तक चाहे कांग्रेस हो या भाजपा उसके नेता इस सामज के लोगों को दिलाया ही देते आये हैं लेकिन किसी ने भी ऐसी पहल नहीं कह है जिससे उसे पुनः वो लाभ मिल सके। अब विधायक बनने के बाद मुनमुन ने यह मामला विधानसभा में उठाकर अखबारों की सुर्ख्राी तो बटोर ली लेकिन नतीजा सिफर ही निकला है। आज तक किसी ने भी यह मांग नहीं उठायी कि वैष्ठन समिति की रिपोर्ट पर आपत्तियों के कारण एक नयी जांच समिति बनायी जाये और उस जांच समिति के आधार पर प्रदेश सरकार अपनी नवीन अनुशंसा केन्द्र सरकार को भेजे ताकि बागरी समाज को एक बार फिर से अन.जाति के प्रमाण पत्र मिलना प्रारंभी हो सके।
विस चुनाव में भीतरघात करने का नोटिस मिला अशोक टेकाम को:-यह ताक शाष्वत सत्य है कि मां के गर्भ मे नौ महीने रहने के बाद ही शिशु का जन्म होता है। लेकिन किसी पार्टी में की गयी कोई शिकायत पर भी नौ महीन बाद कार्यवाही होेती है यह पहली बार ही देखने सुनने को मिला है। जी हां प्रदेश भाजपा कार्यालय ने नवम्बर 2013 में की गयी किसी शिकायत पर सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष अशोक टेकाम और सिवनी के पूर्व पार्षद अजय डागोरिया सहित चार नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा गया है कि क्यों ना आपके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाये? आरोप है कि उन्होंने विस चुनाव में भीतरघात किया है। हालांकि नोटिस में यह भी स्पष्ट नहीं है कि शिकायत किसने की है और किस विस क्षेत्र में इन नेताओं ने भीतरघात किया है या पूरे जिले में भाजपा की इस दुर्गति के लिये भी ये ही जवाबदार हैं?जिले के राजनैतिक क्षेत्रों में इन नोटिसों को आगामी सहकारी बैंक के चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है। 
बहोरीबंद के बंद ही नहीं खुल पा रहें हैं कांग्रेस में:-वैसे तो विधानसभा के उप चुनावों के परिणाम देश में कांग्रेस के लिये संजीवनी का काम कर गये है।बिहार और पंजाब के साथ ही कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में भी एक सीट पर जीत दर्ज की हैं। कांग्रेस ने भाजपा से बहोरीबंद सीट छीन कर जीत दर्ज की है। बहोरीबंद सीट की जीत को लेकर प्रदेश के स्टार प्रचारक एवं पूर्व मंत्री स्व. हरवंश सिंह के पहली बार विधायक बने रजनीश सिंह की प्रशंसा में एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमे युवा रजनीश को जीत का पूरा श्रेय देते हुये बताया गया कि कैसे उन्होंने वहां प्रयास कियें जो सफल हुये। जिले के कांग्रेस के दूसरे युवा विधायक योगेन्द्र सिंह बाबा, जो कि हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल उर्मिला सिंह के बेटे हैं, ने विज्ञप्ति जारी कर बहोरीबंद सीट पद कांग्रेस की जीत को जनता की जीत बताया और कहा कि कांग्रेस की एकता और क्षेंत्रीय कार्यकर्त्ताओं की मेहनत से यह जीत पार्टी को मिली है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जिस हिस्से का उन्हें प्रभारी बनाया गया था वहां से पार्टी को भारी जीत हासिल हुयी है।वहीं दूसरी ओर जिला कांग्रेस कमेटी ने इस जीत पर कोई बयान भी जारी नहीं किया है। अब ऐसे हालात में लोग तो यह कहते भी देखे जा रहें है कि कांग्रेस में बहोरीबंद का बंद खुलता ही नजर नहीं आ रहा है कि जीत कैसे हुयी। “मुसाफिर”
Sabhar Darpan Jhoot Na Baole Seoni
02 Sep 2014

लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? 
तमाम पार्टियों और नेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके लखनादौन नगर पंचायत चुनाव में कई ऐसे राजनैतिक कारनामे हो चुके हैं जिनकी आशंका हम अपने इसी कालम में व्यक्त कर चुके थे। बड़े ही नाटकीय ढंग से इस चुनाव में अध्यक्ष पद के कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव मैदान से बाहर हो गये हैं। जिले के चुनावी इतिहास में शायद यह पहला अवसर हैं जब देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी चुनावी मैदान से बाहर हैं। जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस मामले में चुप्पी    साधे हुये हैं। कांग्रेस द्वारा किये गये इस चमत्कार से भाजपा भी भौंचक रह गयी हैं। मुनमुन समर्थक उनके समर्थन में कई दलों के नेताओं का गुप्त समर्थन हासिल होने का दावा भी कर रहें हैं। ऐसे राजनैतिक हालात में लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने प्रदेश के ऐसे एक दर्जन से अधिक चुनाव क्षेत्र चिन्हित किये हैं जहां से कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हैं और ऐसे क्षेत्रों से युवा नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये हरी झंड़ी दे दी गयी हैं और उन्हें तैयारी चालू करने के निर्देश दे दिये गये हैं। ऐसे चिन्हित क्षेत्रों में सिवनी विस क्षेत्र भी शामिल हैं जहां से युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल को हरी झंड़ी दी गयी हैं।
कांग्रेस के नाम रचा गया नया इतिहास-मुसाफिर पिछले पंद्रह दिनों से सियासी सफर से अलग रहा। अब एक बार फिर सियासी चर्चा करने जा रहा हैं। लेकिन अब तक बैनगंगा नदी से काफी पानी बह चुका है। तमाम पार्टियों और नेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके लखनादौन नगर पंचायत चुनाव में कई ऐसे राजनैतिक कारनामे हो चुके हैं जिनकी आशंका हम अपने इसी कालम में व्यक्त कर चुके थे। बड़े ही नाटकीय ढंग से इस चुनाव में अध्यक्ष पद के कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव मैदान से बाहर हो गये हैं। जिले के चुनावी इतिहास में शायद यह पहला अवसर हैं जब देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी चुनावी मैदान से बाहर हैं। जिले के इकलौते कांग्रेस विधायक और विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह इस मामले में चुप्पी साधे हुये हैं। जबकि शुरू से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पूर्व अध्यक्ष दिनेश मुनमुन राय से अपनी राजनैतिक सांठ गांठ के चलते इस चुनाव में भी हरवंश सिंह उनके सहयोगी और संरक्षक की भूमिका में दिखेंगें लेकिन किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि कांग्रेस चुनाव मैदान से ही बाहर हो जायेगी। हालांकि जिला कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी ने कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी को नाम वापस लेने के कारण पार्टी से छः साल के लिये निष्कासित कर दिया हैं और कहा हैं कि मामले की जांच की जायेगी और फिर आगे कार्यवाही की जायेगी। लेकिन कौन और कब जांच करेगा? इसका खुलासा आज तक नहीं हुआ हैं जबकि 5 जुलाई को चुनाव भी हो जायेंगें। मीडिया में यह भी प्रकाशित हुआ कि प्रदेश इंकाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह खुद लखनादौन दौरे पर इन चुनावों के लिये आये थे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष पद एक प्रत्याशी भी नहीं खड़ा कर पायी। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उक्त दोनों नेताओं के दौरे के समय भी इंका विधायक हरवंश सिंह मौजूद नहीं थे। पूरे प्रदेश में ऐसा कारनामा सिर्फ सिवनी जिले में ही हुआ हैं जहां की कमान पिछले पंद्रह सालों से इंका विधायक हरवंश सिंह के हाथों में हैं जो कि प्रदेश के एक कद्दावर नेता माने जाते हैं। अब इस कारनामें के बारे में प्रदेश नेतृत्व या आलाकमान उनसे कोई सवाल जवाब भी करेगा या नहीं? इसे लेकर इंकाई हल्कों में चर्चा जारी हैं क्योंकि हरवंश सिंह ने जब जब पार्टी को चुनाव में नुकसान पहुचाया हैं तब तब वे और भी अधिक ताकतवर होकर उभरे हैं। इसलिये यह कयास लगाये जा रहें हैं कि मिशन 2013 और 2014 को लक्ष्य बनाकर चल रही कांग्रेस क्या इस बार चुनावी मैदान से कांग्रेस के बाहर हो जाने का इतिहास बनाने पर उन्हें दंड़ित किया जायेगा या एक बार फिर पुरुस्कृत किया जायेगा?
भाजपा के नेताओं ने कसी कमर-कांग्रेस द्वारा किये गये इस चमत्कार से भाजपा भी भौंचक रह गयी हैं।जिला भाजपा ने अपने उम्मीदवार तो तय कर ही लिये थे लेकिन बहुत पहले से ही जिले के कई वरिष्ठ नेताओं सहित जनप्रतिनिधियों को भी प्रभार सौंप दिया हैं।सांसद फगग्नसिंह कुलस्ते, प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविंद मैनन और अध्यक्ष प्रभात झा भी दौरा कर चुके हैं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का दौरा यहां नहीं हो रहा हैं। पूर्व नपं अध्यक्ष मुनमुन राय अपनी माताजी के पक्ष में अपने समय में किये गये विकास कार्यों को मुद्दा बना रहें हैं। इसके अलावा उनके समर्थन में कई दलों के नेताओं का गुप्त समर्थन हासिल होने का दावा भी उनके समर्थक कर रहें हैं। राजनैतिक हल्कों में जारी चर्चाओं के अनुसार इसका प्रमुख कारण सिवनी विधानसभा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मुनमुन राय का चुनाव लड़ते समय की राजनैतिक परिस्थितियां बतायी जा रहीं हैं। उल्लेखनीय हैं कि 2008 के विस चुनाव में भाजपा ने अपने दो बार के विधायक रहने वाले सिटिंग विधायक नरेश दिवाकर की टिकिट काट कर सांसद नीता पटेरिया को उम्मीदवार बनाया था। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी कई दावेदारों के दावों को खारिज कर प्रसन्न मालू को अंतिम समय में अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। ऐसे हालात में निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले मुनमुन राय को दोनों ही पार्टियों के असंतुष्टों का सहयोग मिला था और कई नामधारी छोटे और बड़े इंका तथा भाजपा के नेताओं ने अपने हाथों में अपनी अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह छोड़कर कप बसी थाम ली थी जो कि मुनमुन राय का चुनाव चिन्ह थी। ऐसे राजनैतिक हालात में लखनादौन नपं के चुनाव में किस पार्टी के किस बड़े नेता का हाथ किसकी पीठ पर आर्शीवाद देता दिख जाये? इसकी कल्पना करना भी मुश्किल हैं। जहां तक पार्टियों के समर्पित कार्यकर्त्ताओं का सवाल हैं  तो कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्त्ताओं में तो इस बात का आक्रोश हैं कि एक राजनैतिक नूरा कुश्ती के चलते अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ही मैदान से हट गये हैं। भाजपा का समर्पित कार्यकर्त्ता तो जिताने में लगा हुआ हैं लेकिन उसके मन में भी यही आशंका है कि मिशन 2013 के विस चुनावों को लेकर अभी से कोई फिक्सिंग जिले के बड़े नेताओं की ना हो जाये। रहा सवाल क्षेत्रीय भाजपा विधायक शशि ठाकुर का तो उनके लिये यह चुनाव जीतना अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से भाजपा करीब 23 हजार वोटों से हार गयी थी। वैसे यह बात भी बिल्कुल सही हैं कि यदि भाजपा जीतती हैं तो सेहरा बांधने के लिये कई सिर हाजिर हैं और यदि हार जाती हैं तो ठीकरा फोड़ने कि लिये शशि ठाकुर का सिर तो हाजिर ही हैं।
राहुल गांधी ने हरी झंड़ी दी राजा बघेल को?- स्थानीय अखबारों में प्रकाशित समाचार के अनुसार कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने ऐसे 12 चुनाव क्षेत्र चिन्हित किये हैं जहां से कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही हैं और ऐसे क्षेत्रों से युवा नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये हरी झंड़ी दे दी गयी हैं और उन्हें तैयारी चालू करने के निर्देश दे दिये गये हैं। समाचार में उल्लेख किया गया हैं कि ऐसे चिन्हित क्षेत्रों में सिवनी विस क्षेत्र भी शामिल हैं जहां से युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय समन्वयक राजा बघेल को हरी झंड़ी दी गयी हैं। इस समाचार में राहुल गांधी के साथ एक फोटो भी प्रकाशित हुआ है जिसमें राजा बघेल भी दिखायी दे रहें हैं। यह समाचार प्रदेश के एक प्रतिष्ठित अखबार के हवाले से प्रकाशि किया गया हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच चुनावों से बरघाट एवं सिवनी विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस चुनाव हार रही हैं। सन 1977 में भी सिवनी विस क्षेत्र से जीतने वाली कांग्रेस की हार की शुरुआत 1990 में हुयी थी जब कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में हरवंश सिंह चुनाव हारे थे। इसके बाद 93 और 98 के चुनाव में आशुतोष वर्मा, 2003 में राजकुमार पप्पू खुराना और 2008 के चुनाव में प्रसन्न मालू कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव हारे थे। मिशन 2013 में ऐसे क्षेत्रों को फतह करने की कांग्रेस की रणनीति और उन पर युवा प्रत्याशी को हरी झंड़ी देने की योजना पर इंकाइयों में अलग अलग किस्म की चर्चायें चल रही हैं।
 “मुसाफिर”      
दर्पण झूठ ना बोले से साभार

Wednesday, August 13, 2014

धर्म निरपेक्षता को लेकर राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के बजाय देश के विकास को सर्वोपरी माने यह समय की मांग है
आज हम 68 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे है।  आजादी के बाद हमने प्रजातंत्र को अंगीकार किया जिसमें समाजवाद के साथ धर्म निरपेक्षता को स्वीकार किया। प्रजातंत्र में सत्ता हासिल करने के लिये राजनैतिक दलों और नेताओं ने कई शार्ट कट भी अपनाये और सत्तासीन हुये। कहीं कभी क्षेत्रीयता को आधार बनाया गया तो कहीं भाषा को,तो कहीं जाति को और कहीं धर्म को। इससे सत्ता तो नेताओं को मिल गयी लेकिन विश्व बंधुत्व को मानने वाले हमारे देश में विभिन्नता में एकता भारत की विशेषता के बजाय आपस में दूरियां बढ़तीं गयीं। समाज टुकड़ों में बंटने लगा और आपसी सदभाव कम होते गया। लेकिन शार्ट कट से सत्ता का स्वाद चखने वाले नेताओं ने इससे कोई सबक नहीं लिया। ब्लकि यदि देखा जाये तो आजादी के इन 67 सालों में सबसे अधिक विवाद और बहस यदि किसी एक शब्द पर हुयी है तो वह है धर्म निरपेक्षता।  हमारे संविधान में देश के हर नागरिक को अपना अपना धर्म मानने की पूरी आजादी दी गयी है। लेकिन जबसे धर्म के नाम पर राजनीति करने की शुरुआत हुयी तबसे इस पर विवाद और बहस तेज होने लगी। देश के प्रमुख राजनैतिक दल इसकी मूल भावना को समझने के बजाय आपस में एक दूसे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने में मशगूल हो गये।  कहीं कोई किसी पर तुष्टीकरण का आरोप लगाता तो कहीं कोई किसी पर राजनैतिक मंच से धार्मिक मुद्दे उठाकर राजनैतिक लाभ लेने के आरोप लगाते देखा गया।  प्रमुख राजनैतिक दलों के ऐसे रवैये से साम्प्रदायकि सौहार्द बिगड़ने लगा और देश के कई हिस्सों में ऐसे सांप्रदायिक दंगे हुये जिन्होनें पूरी दुनिया में देश को शर्मसार कर दिया। यह भी सच है कि देश का आम आदमी अपने धर्म के प्रति बहुत संवेदनशील है। लोगों की इसी धार्मिक भावना का नेताओं ने राजनैतिक रूप से शोषण करने में कोई गुरेज नहीं किया। लेकिन हमारी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रजातंत्र में हमारी अटूट आस्था है इसीलिये हमारे देश में बड़े से बड़ा राजनैतिक परिवर्तन बुलेट के बजाय बैलेट से ही हुआ है।  जबकि इसके विपरीत हमारे ही साथ आजाद हुये पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता के कारण हालात ऐसे हो गयें है कि वहां के कई अहम परिवर्तन बुलेट से ही होते रहें है। विश्व व्यापी आर्थिक मंदी के इस दौर में भी हमारी अर्थ व्यवस्था दुनिया में चौथे नंबर पर है। देश के सर्वांगीण विकास करने के लिये बहुत सारे रास्ते खुले हुये है।  बीस साल तक देश में गठबंधन की राजनीति के दौर के बाद आज देश में एक पार्टी की मजबूत सरकार पदारूढ़ है। पूरा देश भी अच्छे दिन आने की राह देख रहा है। इसीलिये आइये स्वाधीनता दिवस के इस पावन अवसर पर हम यह संकल्प लें  कि अब हम देश ने हमें क्या दिया? यह सोचने के साथ यह भी सोचें कि हमने देश को क्या दिया? अपने संकीर्ण निजी और राजनैतिक स्वार्थों को दर किनार कर विश्व बंधुत्व और सर्व धर्म समभाव के उस मूल मंत्र अमल करना प्रारंभ कर दें जिसके लिये पूरी दुनिया में हमारा देश जाना जाता है। हमारा देश तेजी से प्रगति की ओर अग्रसर हो और स्वतंत्रता दिवस की अगली वर्षगांठ पर हम गर्व से यह कह सकें कि हमने जो संकल्प इस साल लिया था उस पर पूरी ईमानदारी से हमने अमल किया। यही स्वतंत्रता दिवस पर हमारी शुभकामनायें है।    
आशुतोष वर्मा
919425174640

Wednesday, May 28, 2014

हाल ही में हुये लोकसभा चुनाव में एक लाख से भी अधिक वोटों से हारने वाले अरुण जेटली और स्मृति ईरानी को मंत्री मंड़ल में शामिल कर तीन महत्वपूर्ण विभाग सौंपना क्या जनादेश का अनादर नहीं है? क्या लोक तंत्र का अपमान नहीं है? जरा सोचिये........

Tuesday, May 27, 2014

  • कांग्रेस ने केवलारी में विस चुनाव में जीतने और लोस चुनाव में हारने का लगातार तीसरी बार बनाया रिकार्ड
  • मंड़ला लोकसभा क्षेत्र में भाजपा के फग्गनसिंह कुलस्तें ने इंका के ओंकार सिंह मरकाम को 1 लाख दस हजार 4 सौ 63 वोटों से हरा कर अपनी पिछली हार का बदला ले लिया है। मंड़ला क्षेत्र में गौगपा  बसपा और नोटा 1 लाख 6 हजार 1 सौ 34 वोट मिलेे है जो जीत हार के अंतर के लगभग बराबर है। आदिवासी बाहुल्य इस क्षेत्र में कांग्रेस की हार इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हों गयी है क्योंकि इस क्षेत्र के आठ में चार विधायक कांग्रेस के थे। विधनसभा चुनाव में समूचे प्रदेश में चली शिवराज लहर के बावजूद भी जिले में कांग्रेस का प्रदर्शन अव्छा था। लेकिन चंद महीनों बाद ही हुये लोस चुनाव में जिले के चारों क्षेत्र में कांग्रेस को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा है। विधनसभा के 2003,2008 और 2013 और लोकसभा के 2004,2009 और 2014 के चुनावों में केवलारी विधानसभा क्षेत्र का मिजाज एक सा ही रहा है। इन चुनावों में कांग्रेस यहां से विधानसभा का चुनाव तो जीती लेकिन लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हारती रही इस बार तो 30 हजार से अधिक रिकार्ड वोटों से कांग्रेस हारी है।कांग्रेस को सिवनी क्षेत्र से 53 हजार 4 सौ 87 वोटों से हार का मुह देखना पड़ा। जबकि अल्प संख्यक मतों में सेंध लगा सकने वाली सपा प्रत्याशी अनुभा कंकर मुंजारे को मात्र 2373 वोट ही मिले। जब मात्र प्रभार मिलने से सिवनी में कांग्रेस सिग्रेट के धुयें के बजाय हुक्के के धुयें में ऐसी गुमी कि ढ़ूढ़े भी नहीं मिल रही है तो जब प्रत्याशी बनेंगें तो ना जाने क्या होगा?
  • एक लाख से अधिक वोट से जीत कर फग्गन ने लिया हार का बदला-लोकसभा चुनावों  के परिणामों को लेकर सियासी हल्कों में विश्लेषण का दौर जारी है। मंड़ला लोकसभा क्षेत्र में भाजपा के फग्गनसिंह कुलस्तें ने इंका के ओंकार सिंह मरकाम को 1 लाख दस हजार 4 सौ 63 वोटों से हरा कर अपनी पिछली हार का बदला ले लिया है। उल्लेखनीय है कुलस्ते पिछले 2009 के चुनाव में इंका के बसोरी सिह से 65 हजार 53 वोटों से हार गये थे। लेकिन इस चुनाव के परिणामों पर नजर डाली जाये तो मंड़ला क्षेत्र में गौगपा को 56 हजार 5 सौ 72, बसपा को 21 हजार 2 सौ 56 और नोटा को 28 हजार 3 सौ 6 वोट मिले हैं। इस प्रकार तीनों के वोटों को यदि जोड़ा जाये तो ये 1 लाख 6 हजार 1 सौ 34 वोट होते है जो जीत हार के अंतर के लगभग बराबर है। भाजपा के राष्ट्रीय आदिवासी चेहरे के रूप में पहचाने जाने कुलस्ते के क्षेत्र इनमें से कोई नहीं याने नोटा को 28306 वोट मिलना भी एक अलग ही राजनैतिक संकेत दे रहा है। पिछले चुनाव में कुलस्तें को भाजपा विधायकों के क्षेत्र में ही हार का सामना करना पड़ा था जबकि कांग्रेस विधायकों हरवंश सिंह और नर्मदा प्रसाद प्रजापति के क्षेत्र से उन्होंने जीत हासिल की थी। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की लहर तो सभी इलाकों में थी लेकिन  आदिवासी बाहुल्य इस क्षेत्र में कांग्रेस की हार इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हों गयी है क्योंकि इस क्षेत्र के आठ में चार विधायक कांग्रेस के थे। 
  • जिले के सभी क्षेत्रों में हुयी कांग्रेस की शर्मनाक हार-विधनसभा चुनाव में समूचे प्रदेश में चली शिवराज लहर के बावजूद भी जिले में कांग्रेस का प्रदर्शन अव्छज्ञ था। कांग्रेस ने जिले में अपनी परंपरागत सीट केवलारी पर अपना कब्जा बरकरार रखते हुये ना केवल लखनादौन सीट भाजपा से छीन ली थी वरन बरघाट भाजपा के कमल भी कमल की लाज बमुश्किल 2 सौ कुछ वोटों से ही बचाा पाये थे। जिला मुख्यालय वाली सिवनी सीट पर पिछले पांच चुनावों से अपना कब्जा बनाये रखने वाली भाजपा को  यहां निर्दलीय उम्मीदवार ने धूल चटा दी थी जबकि इस बार भाजपा ने अपने दो बार के यहीं से विधायक रहे जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर को उम्मीदवार बनाया था। चंद महीनों बाद ही हुये इस चुनाव के लिये भाजपा ने अपनी कमान वेदसिंह के हाथों सौंप दी थी वहीं दूसरी ओर इस लोस चुनाव में भी कांग्रेस अध्यक्ष हीरा आसवानी ही थे। लेकिन जिले चारों विधानसभा क्षेत्रों में में जिस तरह कांग्रेस को भारी मात मिली है उससे राजनैतिक विश्लेषक भी हैरान है। मंड़ला लोस में आने वाले केवलारी और लखनादौन क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक रजनीश हरवंशसिंह और योगेन्द्र सिंह बाबा है जहां से कांग्रेस को क्रमशः 30 हजार 37 और 11 हजार 5 सौ 56 वोटों से हार का सामना पड़ा जबकि बालाघाट लोस क्षेत्र में आने वाली सिवनी और बरघाट सीट से भी क्रमशः 53 हजार 4 सौ 87 तथा 21 हजार 9 सौ 94 वोटों से कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। जबकि इस बार रजनीश हरवंश सिंह ने जिले के सभी विस क्षेत्रों में सक्रियता दिखा कर अपने पिता के समान जिले का नेता बनने का भी प्रयास किया था। वैसे तो पूरे देश में ही कांग्रेस और भाजपा के नेताओं को चुनाव परिणामों का अंदाजा था लेकिन जो परिणाम आये उनके बारे में किसी भी पार्टी के नेता को ऐसे परिणामों की उम्मीद तो कतई नहीं ही थी। लेकिन जब समूचे उत्तर भारत में जनता लहर में कांग्रेस का सफाया हो गया था तब भी कांग्रेस ने जिले की पांचों सीटें जीत कर एक रिकार्ड बनाया था तो अब क्या हो गया? यह एक विचारणीय प्रश्न तो है ही। 
  • बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्लाह -विधनसभा के 2003,2008 और 2013 और लोकसभा के 2004,2009 और 2014 के चुनावों में केवलारी विधानसभा क्षेत्र का मिजाज एक सा ही रहा है। हमने इसी कालम में में यह लिखा कि केवलारी क्षेत्र में कांग्रेस का विस जीतने और लोस हारने की परंपरा कायम रहेगी या नया इतिहास बनेगा। लेकिन परिणामों ने बता दिया कि नया इतिहास बनने के बजाय केवलारी ने पुरानी परंपरा का ही निर्वाह किया है। विस चुनावों में 2003 की उमा भारती की आंधी में केवलारी से कांग्रेस के स्व. हरवंश सिह 8 हजार 6 सौ 58 वोटों से चुनाव जीते थे जबकि लोस चुनाव में कांग्रेस की कल्याणी पांड़े 16 हजार 3 सौ 40 वोटों से चुनाव हारीं थीं। इसी तरह 2008 के विस चुनाव में कांग्रेस के स्व. हरवंश सिंह 6 हजार 2 सौ 76 वोटों से चुनाव जीते थे जबकि 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस के सांसद चुने गये बसोरी सिंह 3 हजार 4 सौ 93 वोटों से चुनाव केवलारी से हार गये थे। यहां यह उल्लेखनीय है कि इन दोनों लोस चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी थी। शिवराज की लहर वाले 2013 के विस चुनाव में भी यहां से कांग्रेस के रजनीश हरवंश सिंह 4 हजार 8 सौ 3 वोटों से चुनाव जीते थे लेकिन 2014 के मोदी लहर वाले लोस चुनावों में कांग्रेस को यहां से 30 हजार 37 वोटों से हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की परंपरागत सीट से इतने अधिक वोटों से कांग्रेस की हार को लेकर राजनैतिक विश्लेषकों में तरह तरह की चर्चा व्याप्त है।
  • प्रभार मिला तो ये हाल प्रत्याशी होंगे तो क्या होगा?-सिवनी विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस उमीदवार राजकुमार पप्पू खुराना की 24 हजार से अधिक वोटों हार पर कांग्रेस के टिकिट के प्रबल दावेदार युवातुर्क यह कहते भी देखे गये कि सिवनी में कांग्रेस सिग्रेट के धुएं में उड़ गयी। शायद यही बात वे लोस प्रत्याशी एवं राहुल गांधी की निकटवर्ती हिना कांवरे को भी समझाने में सफल रहे। बताया जाता है कि दक्षिण सिवनी स्थित एक कांग्रेस नेता के यहां आधी रात के बाद एक गोपनीय बैठक हुयी जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार के अलावा विधायक रजनीश सिंह,प्रदेश इंका के सचिव राजा बघेल,जिला इंका अध्यक्ष हीरा आसवानी और जिला पंचायत अध्यक्ष मोहन चंदेल शामिल थे। इस बैठक में प्रभार हासिल करने के बाद चुनाव का काम प्रारंभ हुआ तो हालात कुछ अजीब से दिखे।सबको साथ लेकर चलने के बजाय ऐसा महसूस किया गया कि जानबूझ कर कुछ नेताओं को परे रखने की साजिशें पूरे चुनाव के दौरान की जाती रहीं। ऐसा माना जा रहा था कि परिणाम इस बार कुछ अलग आयेंगें लेकिन जब रिजल्ट आया तो कांग्रेस को इस क्षेत्र से 53 हजार 4 सौ 87 वोटों से हार का मुह देखना पड़ा। जबकि अल्प संख्यक मतों में सेंध लगा सकने वाली सपा प्रत्याशी अनुभा कंकर मुंजारे को मात्र 2373 वोट ही मिले जबकि इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी मुनमुन राय ना तो क्षेत्र में घुमे थे और ना ही उनकी कोई सक्रियता थी। उन्होंनें मात्र मंच से ही भाजपा को समर्थन दिया था।  वोटों से हार का मुह देखना पड़ा। कांग्रेस का एक वर्ग इन युवा तुर्कों से सिवनी विधानसभा क्षेत्र के लिये बड़ी आशायें रखता है। लेकिन जब मात्र प्रभार मिलने से सिवनी में कांग्रेस सिग्रेट के धुयें के बजाय हुक्के के धुयें में ऐसी गुमी कि ढ़ूढ़े भी नहीं मिल रही है तो जब प्रत्याशी बनेंगें तो ना जाने क्या होगा? “मुसाफिर“
  • साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले सिवनी 
  • 27 मई 2014 से साभार
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Wednesday, May 21, 2014

सदन में व्यापम घोटाले पर होने वाली चर्चा के लिये कांग्रेस में विभीषण तलाश कर भाजपा उन्हें फिर शामिल कर लेगी?
प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित जिले में भी इन दिनों दल बदल विरोधी कानून के प्रावधानों पर सियासी हल्कों में चर्चा हो रही है। प्रदेश में तीन निर्दलीय विधायक चुनाव जीते थे। इन तीनों ही निर्दलीय विधायकों ने भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सार्वजनिक चुनावी मंचों पर अपनी उपस्थिति दी थी। इसमें सिवनी से चुने गये निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय भी शामिल है। दल बदल विरोधी कानून में यह प्रावधान है कि यदि एक निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव के बाद कोई राजनैतिक दल की सदस्यता लेता है तो वह अयोग्य घोषित हो जावेगा। चर्चा गर्म है कि कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो सकते है। ये कब और कैसे भाजपा में शामिल होंगें? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें है। अविश्वास प्रस्ताव की तरह ही कांग्रेस में सेंध लगाकर भाजपा के रणनीतिकार आगामी विधानसभा सत्र में हंगामा मचा सकने वाले व्यापम घोटाले से निपटने की रणनीति बना रहें है। इसमें महाकौशल अंचल के विधायकों के नामों को लेकर तरह तरह की चर्चा व्याप्त है। नरेश खुद भी चुनाव हार गये थे। इसलिये नैतिक आधार पर उन्होंनें भाजपा के अध्यक्ष पद से स्तीफा दे दिया था। प्रदेश भाजपा ने जिले की कमान वरिष्ठ नेता वेदसिंह को सौंप दी थी। उनके नेतृत्व में जिले में भाजपा को रिकार्ड तोड़ जीत हासिल हुई और चारों विस क्षेत्रों में भाजपा ने बढ़त ली है।
यदि भाजपा की सदस्यता लेते तो विधायक नहीं रह जाते मुनमुन?-प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित जिले में भी इन दिनों दल बदल विरोधी कानून के प्रावधानों पर सियासी हल्कों में चर्चा हो रही है। लोस चुनावों के दौरान जिस तरह से भाजपा के प्रति आकर्षण दिखा और उसके चलते जो आया राम गया राम को ख्ेाल चला इसी कारण यह चर्चा जारी है। प्रदेश में तीन निर्दलीय विधायक चुनाव जीते थे। इन तीनों ही निर्दलीय विधायकों ने भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सार्वजनिक चुनावी मंचों पर अपनी उपस्थिति दी थी। इसमें सिवनी से चुने गये निर्दलीय विधायक दिनेश मुनमुन राय भी शामिल है जिन्होंने बालाघाट में मोदी के मंच पर और सिवनी में शिवराज सिंह चौहान के चुनावी मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी जिस मंच  से भाजपा को जिताने की अपील की गयी थी। लेकिन प्रदेश तीनों ही निर्दलीय विधायकों ने भाजपा में शामिल होने की घोषणा नहीं की थी। लोकसभा चुनाव में भाजपा की सभाओं में शिरकत करने के बाद भी भाजपा में शामिल ना होना चर्चित है। राजनैतिक विश्लेषकों का ऐसा मानना है कि भाजपा का ख्ुालेआम साथ देने के बाद भी भाजपा की औपचारिक रूप से सदस्यता ना लेने का कारण दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों का है। राजीव गांधी की सरकार ने 1985 में दल बदल पर रोक लगाने के लिये दल बदल विरोधी कानून पास किया था। इसमें निर्वाचित जनप्रतिनिधि के अयोग्य घोषित होने का यह प्रावधान है कि ष्प िंद पदकमचमदकमदज बंदकपकंजम रपवदे ं चवसपजपबंस चंतजल ंजिमत जीम मसमबजपवदष्याने यदि एक निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव के बाद कोई राजनैतिक दल की सदस्यता लेता है तो वह अयोग्य घोषित हो जावेगा। राजनैतिक विश्लेषकों का यह दावा है कि इसीलिये प्रदेश के निर्दलीय विधायकों को एक रणनीति के तहत भाजपा की औपचारिक रूप से सदस्यता नहीं दिलायी गयी है क्योंकि यदि ऐसा किया जाता है उनकी विधानसभा की सदस्यता समाप्त हो जावेगी और विधायक बनने के लिये उन्हें फिर से चुनाव लड़ना पड़ेगा। जिन क्षेत्रों में जिन निर्दलीय उम्मीदवारों से भाजपा हारी है वहीं उन्हीं निर्दलीय विधायकों को भाजपा की टिकिट पर फिर से चुनाव जितवाना आसान नहीं होगा। कहा जाता है कि इसीलिये इन निर्दलीय विधायकों को विधिवत सदस्यता नहीं दिलायी गयी है। 
क्या कुछ कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल होंगें ?-प्रदेश के राजनैतिक क्षेत्रों में इस बात की भी चर्चा गर्म है कि कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो सकते है। ये कब और कैसे भाजपा में शामिल होंगें? इसे लेकर तरह तरह के कयास लगाये जा रहें है। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के रणनीतिकार आगामी विधानसभा सत्र में हंगामा मचा सकने वाले व्यापम घोटाले से निपटने की रणनीति बना रहें है। उल्लेखनीय है कि पिछली विधानसभा के अंतिम सत्र में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह द्वारा लाये गये अविश्वास प्रस्ताव से निपटने के लिये भाजपा ने कांग्रेस के जवाब देने के बजाय कांग्रेस में ही सेंध लगाने की रणनीति बनायी थी। इसी के तहत कांग्रेस विधायक दल के उप नेता चौधरी राकेश सिंह ने बगावत की थी और शिवराज सरकार को घेरने की कांग्रेस की रणनीति धरी की धरी रह गयी थी। शिवराज की तीसरी पारी में व्यापम घोटाला सरकार  के गले की फांस बन रहा है। कांग्रेस भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने के प्रयास कर रही है। प्रदेश की राजनीति की अंदरूनी जानकारी रखने वालों का यह दावा है कि अविश्वास प्रस्ताव की तरह ही भाजपा इस बार भी कांग्रेस में सेंध लगाकर ही अपना बचाव करने की रणनीति पर चल रही है। कहा जा रहा है कि भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के इच्छुक कांग्रेस विधायकों से इस दौरान चौधरी राकेश सिंह की भूमिका अदा करवा कर ही उनको सदस्यता देने पर कार्यवाही की जायेगी। इस समय नेता प्रतिपक्ष के रूप में सत्यदेव कटारे विधानसभा में काम कर रहें है। जबकि पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी विधायक दल के सदस्य है। लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक एवं तत्कालीन विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह का स्वर्गवास हो जाने कारण वे अब सदन में नहीं रहेंगें। उनके स्थान पर उनके पुत्र रजनीश सिंह अब विधायक है। भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने वाले कौन विधायक हैं? इनके नामों को लेकर तमाम कयास लगाये जा रहें हैं। जानकारों का यह भी दावा है कि इनमें महाकौशल अचंल के भी कुछ विधायक शामिल है। लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली भारी सफलता के बाद इन चर्चाओं को और अधिक बल मिल गया है। अब यह तो वक्त ही बतायेगा कि कौन कौन से कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल होगें या यह चर्चा सिर्फ चर्चा ही रह जायेगी? एक चर्चा यह भी है कि भाजपा यह कोशिश में लगी है कि दल बदल कानून के प्रावधानों से बचने के लिये इतनी संख्या बढ़ाने की कोशिश की जा रही है ताकि दल बदल करने वाले विधायकों की सदस्यता बरकरार रहें। उल्लेखनीय है कि यदि सदन की सदस्य संख्या में से एक तिहायी से अधिक सदस्य अलग होते है तो वह उस राजनैतिक दल का विभाजन माना जाता है।
क्या कुछ कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल होंगें ?-विधानसभा चुनावों में जिले में भाजपा बैकपुट पर आ गयी थी। जिले की चार सीटों में से तीन पर काबिज भाजपा इस चुनाव में बमुश्किल एक सीट ही जीत पायी थी। जबकि कांग्रेस ने दो सीटें जीत ली थींे। इस दौरान जिले के पूर्व विधायक मविप्रा के पूर्व अध्यक्ष नरेश दिवाकर के हाथों में भाजपा की कमान थी। वे खुद भी चुनाव हार गये थे। इसलिये नैतिक आधार पर उन्होंनें भाजपा के अध्यक्ष पद से स्तीफा दे दिया था। प्रदेश भाजपा ने जिले की कमान वरिष्ठ नेता वेदसिंह को सौंप दी थी। उनके नेतृत्व में जिले में भाजपा को रिकार्ड तोड़ जीत हासिल हुई और चारों विस क्षेत्रों में भाजपा ने बढ़त ली है। बालाघाट लोस में आने वाली सिवनी सीट से भाजपा ने रिकार्ड 53487 तथा बरघाट सीट से 22004 वोटों से बढ़त हासिल कर ली। जबकि मंड़ला लोस में आने वाली केवलारी सीट से 28500 तथा लखनादौन विस से  9546 वोटों से जीत हासिल की है। यहां यह उल्लेखनीय है इन दोनों ही सीटों से कांग्रेस के रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह बाबा विधायक है और नवम्बर 13 की शिवराज लहर में ये दोनों चुनाव जीते थे।“मुसाफिर“
साप्ता. दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
20 मई 2014 से साभार 

Thursday, May 15, 2014

लोस चुनाव में केवलारी में बनेगा नया कीर्तिमान या विस जीतने और लोस में कांग्रेस के हारने का इतिहास रहेगा कायम?
लोकसभा चुनावों के परिणामों को लेकर लोगों में कयासबाजी के दौर चल रहें हैं। बालाघाट लोस क्षेत्र से कांग्रेस की हिना कांवरें,भाजपा के बोधसिंह भगत,सपा की अनुभा मुंजारे के अलावा आप के कर्नल चौधरी भी मैदान में थे। इस क्षेत्र से कांग्रेस के विश्वेश्वर भगत ने 2009 का चुनाव 40819 मतों से हारा था। जबकि हाल ही में हुये विस चुनाव में शिवराज की भारी लहर में इस क्षेत्र में भाजपा कांग्रेस से सिर्फ 39771 वोटों से ही आगे रही जबकि सिर्फ बालाघाट विस क्षेत्र में ही भाजपा को कांग्रेस से 66207 वोटों की बढ़त मिल गयी थी।कांग्रेस और भाजपा की जीत हार इस बात पर भी निर्भर करेगी कि सपा उम्मीदवार चुनाव को त्रिकोणी संघंर्ष में बदल पाता है या नहीं? मंडला लोकसभा क्षेत्र में भी जिले की केवलारी और लखनादौन विस सीटें शामिल हैं।  इसीलिये इस क्षेत्र के परिणामों को लेकर  भी यहां उत्सुकता के साथ विश्लेषण किया जा रहा है। वैसे मंड़ला क्षेत्र में यह प्रचार भी अंदर ही अंदर चला है कि फग्गन सिंह तो सांसद हैं ही यदि ओंकार जीत जायेगें तो जिले को दो दो सांसद मिल जायेगें। मंड़ला सेसदीय क्षेत्र में भी कांग्रेस या भाजपा की जीत गौगपा के प्रत्याशी के मत विभाजन पर निर्भर करती है।अब देखना यह है कि केवलारी क्षेत्र में कांग्रेस जीत कर एक नया कीर्तिमान बनाती है या विस में जीतने और लोस में हारने का अपना इतिहास दोहराती है ? 
बालाघाट क्षेत्र में सपा पर निर्भर है इंका या भाजपा की  जीत -लोकसभा चुनावों के परिणामों को लेकर लोगों में कयासबाजी के दौर चल रहें हैं। जिले के चार विस क्षेत्रों के आकलन के अलावा भी बालाघाट और मंड़ला लोस क्षेत्रों से कौन जीतेगा इसे लेकर भी अटकलों का दौर जारी है। बालाघाट लोस क्षेत्र से कांग्रेस की हिना कांवरें,भाजपा के बोधसिंह भगत,सपा की अनुभा मुंजारे के अलावा आप के कर्नल चौधरी भी मैदान में थे। इस क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी के समर्थन में नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने,कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और पूर्व मुूख्यमंत्री एवं कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने और सपा प्रत्याशी के समर्थन में मुलायम सिंह यादव ने सभायें ली। इस क्षेत्र से कांग्रेस के विश्वेश्वर भगत ने 2009 का चुनाव 40819 मतों से हारा था। जबकि हाल ही में हुये विस चुनाव में शिवराज की भारी लहर में इस क्षेत्र में भाजपा कांग्रेस से सिर्फ 39771 वोटों से ही आगे रही जबकि सिर्फ बालाघाट विस क्षेत्र में ही भाजपा को कांग्रेस से 66207 वोटों की बढ़त मिल गयी थी। लेकिन इस क्षेत्र में सपा की अनुभा मुंजारे ने 69493 वोट लिये थे जिनसे प्रदेश के मंत्री गौरी शंकर बिसेन सिर्फ 2500 वोटों से जीते थे। विस चुनावों में कांग्रेस ने बैहर से 32352 और लांजी से 31750 वोट की भाजपा से बढ़त ली थी। इन आंकड़ों को यदि ध्यान में रखा जाये तो यह कहना सही नहीं होगा कि बालाघाट क्षेत्र से भाजपा पांचवी बार अपना कब्जा कर ही लेगी। राजनैतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि बालाघाट संसदीय क्षेत्र के चुनाव परिणाम जातीय आधार पर भी प्रभावित होते है। इस आधार से कांग्रेस,भाजपा और सपा के प्रत्याशी क्रमशः मरार,पंवार और लोधी जाति के हैं। वैसे तो आप का प्रत्याशी भी पंवार जाति का है। यदि जातिगत आधार पर धु्रवीकरण होता है तो तो किस पार्टी को ज्यादा लाभ या नुकसान होता है? इस पर परिणाम निर्भर करेंगें। सियासी जानकारों का यह भी मानना है कि इस क्षेत्र का परिणाम आदिवासियों और मुस्लिम मतदाताओं के रुझान पर निर्भर करेगा। भाजपा में अंतिम समय तक प्रत्याशी को लेकर मची घमासान और अंत में प्रदेश के मंत्री गौरीशंकर बिसेन की बेटी मौसम की टिकिट कट कर बोध सिंह को मिल गयी। हालांकि ऐसा भी पहली बार देखने को मिला कि प्रत्याशी की अधिकृत घोषणा के पूर्व ही मौसम हरिनखेड़े की फोटो से युक्त चुनावी रथ भी पूरे क्षेत्र में भ्रमण कर चुका था। वैसे भाजपा ने नुकसान रोकने की दृष्टि से इस क्षेत्र में जीत सुनिश्चित करने के लिये मंत्री गौरीशंकर बिसेन को ही जवाबदारी सौंप दी थी। कांग्रेस और भाजपा की जीत हार इस बात पर भी निर्भर करेगी कि सपा उम्मीदवार चुनाव को त्रिकोणी संघंर्ष में बदल पाता है या नहीं? यदि सपा प्रत्याशी मुस्लिम मतदाताओं में भी सेंधमारी करता है तो कांग्रेस को नुकसान होगा और यदि जातिगत आधार पर लोधी मतदाताओं को लामबंद कर लेता है तो भाजपा को अधिक नुकसान होगा। इसलिये इस क्षेत्र में कांग्रेस या भाजपा दोनों के ही जीतने की संभावना बराबरी की बनी हुयी हैं।
मंड़ला क्षेत्र में गौगपा पर निर्भर है इंका या भाजपा की  जीत -मंडला लोकसभा क्षेत्र में भी जिले की केवलारी और लखनादौन विस सीटें शामिल हैं।  इसीलिये इस क्षेत्र के परिणामों को लेकर  भी यहां उत्सुकता के साथ विश्लेषण किया जा रहा है। पिछले लोस चुनाव में कोग्रेस के बसोरीसिंह मसराम ने भाजपा के फग्गनसिंह कुलस्ते को 65053 मतों से हराया था। फग्गन सिंह भाजपा के राष्ट्रीय आदिवासी नेता हैं। इसीलिये चुनाव हारने के बाद भी उनका राजनैतिक महत्व कम नहीं हुआ और अभी वे राज्यसभा के सदस्य है। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करने अध्यक्ष सोनिया गांधी आयीं थीं तो इस बार राहुल गांधी ने आदिवासियों की चौपाल मंड़ला में लगायी थी। 20013 के विस चुनावों में इस संसदीय क्षेत्र में भाजपा को कांग्रेस से 54279 वोटों की बढ़त मिली हुयी है।शहपुरा से 32681,निवास से 10910,गोटेगांव से 20171और बिछिया से 18316 वेटों से कांग्रेस पीछे रही है जबकि केवलारी से 4803,डिंडोरी से 6388,मंड़ला से 3827 और लखनादौन से 12781 वोटों से कांग्रेस ने भाजपा से बढ़त ली है। इस तरह कांग्रेस और भाजपा दोना ही पार्टियों के चार चार विधायक है।भाजपा की तरफ से नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने चुनावी सभायें की है। इस क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी भी कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल की पसंद के प्रत्याशी है। ये भी वर्तमान में विधायक है।वैसे मंड़ला क्षेत्र में यह प्रचार भी अंदर ही अंदर चला है कि फग्गन सिंह तो सांसद हैं ही यदि ओंकार जीत जायेगें तो जिले को दो दो सांसद मिल जायेगें। मंड़ला सेसदीय क्षेत्र में भी कांग्रेस या भाजपा की जीत गौगपा के प्रत्याशी के मत विभाजन पर निर्भर करती है।
केवलारी में बनेगा कीर्तिमान या दोहराया जायेगा इतिहास -जिले के राजनैतिक क्षेत्रों की पैनी नजर केवलारी विस के परिणामों पर लगी हुयी जहां से कांग्रेस के युवा रजनीश सिंह पहली बार विधायक बने है। इसके पहले उनके पिता स्व. हरवंश सिंह इस क्षेत्र से चार चुनाव जीते थे।लेकिन केवलारी क्षेत्र का भी अजीब इतिहास रहा है। पिछले 2003 के विस चुनाव में इस क्षेत्र से जहां कांग्रेस 8658 वोटों से जीती थी वहीं 2004 के लोस चुनाव में कांग्रेस 16340 वोटों से हार गयी थी। इसी तरह 2008 के विस चुनाव में इस क्षेत्र से 6276 वोटों से जीतने वाली कांग्रेस 2009 के लोस चुनाव में 3493 वोटों से हार गयी थी। 2013 के विस चुनावों में भी कांग्रेंस यहां से 4803 वोटों से जीती है। अब देखना यह है कि केवलारी क्षेत्र में कांग्रेस जीत कर एक नया कीर्तिमान बनाती है या विस में जीतने और लोस में हारने का अपना इतिहास दोहराती है ? “मुसाफिर”
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
6 मई 2014 से साभार

Monday, February 17, 2014

चुनाव में अपने पैसे से फोरलेन और बड़ी रेल लाइन बनाने की गर्जना करने वाले मुनमुन अब लगा रहे गुहार
अपन को गैर राजनैतिक कहने वाले जनमंच के कुछ अवशेषों को एक पत्र में फोर लेन में राजनैतिक अड़ंगे डालने के षड़यंत्र की बू आ रही थी और दूसरे पत्रों में आशा की किरण दिखायी दे रही है। अब ऐसे दोहरे चरित्र और आचरण वालों के लिये भला क्या कहा जा सकता है? जनता दरबार में प्रत्याशियों के कार्यक्रम में हजारों लोगों के सामने निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश मुनमुन राय ने कांग्रेस और भाजपा को आड़े हाथों लेते हुये गरज कर कहा था कि यदि वे चुनाव जीतते है तो अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम करा देंगें। मतदाताओं ने यह सोच कर वोट दिया था कि इधर मुनमुन जीते और उधर वे अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम प्रारंभ करा देंगें। लेकिन जनता को निराशा ही हाथ लगी है। नीता पटेरिया को प्रदेश भाजपा ने बालाघाट लोस द्वोत्र का प्रभारी बनाकर पुरुस्कृत किया या टिकटि की दौड़ से बाहर? इसका खुलासा अभी होने को है। लोकसभा चुनाव की टिकिट को लेकर जिले के कांग्रेसी हल्कों में कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। वैसे भी परिसीमन में सिवनी संसदीय क्षेत्र समाप्त होने तथा जिले के चारों विस क्षेत्र भी एक ही लोस क्षेत्र में ना रहने से जिले का राजनैतिक महत्व ही समाप्त हो गया है।
चिट्ठी चिट्ठी में भी देखते है फर्क-एक चिट्ठी वो थी एक चिट्ठी यह भी है। वो भी केन्द्रीय मंत्रियों को लिखी गयी थी ये भी एक केन्द्रीय मंत्री को लिखी गयी है। वो भी फोर लेन के लिये लिखी गयी थी ये भी फोर लेन के लिये लिखी गयी है। उसमें भी वाइल्ड लाइफ बोर्ड से व्यवधान दूर कराने का अनुरोध किया गया था इसमें भी यही किया गया है। लेकिन अपने अपन को गैर राजनैतिक कहने वाले जनमंच के कुछ अवशेषों को उसमें राजनैतिक फोर लेन में अड़ंगे डालने के षड़यंत्र की बू आ रही थी और इसमें आशा की किरण दिखायी दे रही है। जी हां हम बात कर रहें हैं फोर लेन के के लिये लिखी गयी चिट्ठियों बारे में। एक चिट्ठी जब इंका नेता आशुतोष वर्मा ने प्रधानमंत्री सहित अन्य केन्द्रीय मंत्रियों को भेजी गयी और तो उसे फोर लेन में अड़ंगा डालने के एक और षड़यंत्र की शुरुआत मानी गयी जबकि दूसरी चिट्ठी जब शिवराज सिंह और विधायक मुनमुन ने लिखी और वन मंत्री को जनमंच के संजय तिवारी और भोजराज मदने के साथ जाकर दी गयी तो उससे आशा की किरण दिखायी देने लगी। अब ऐसे दोहरे चरित्र और आचरण वालों के लिये भला क्या कहा जा सकता है?     
अपने पैसे से फोर लेन बनाने के मुनमुन के वायदे का क्या हुआ?-विस चुनाव प्रचार के दौरान गांधी चौक में दैनिक हंटर समाचार पत्र द्वारा आयोजित जनता दरबार में प्रत्याशियों के कार्यक्रम में हजारों लोगों के सामने निर्दलीय उम्मीदवार दिनेश मुनमुन राय ने कांग्रेस और भाजपा को आड़े हाथों लेते हुये गरज कर कहा था कि यदि वे चुनाव जीतते है तो अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम करा देंगें। इन दोनों समस्याओं से त्रस्त जनता ने मुनमुन को इतने अधिक वोटों से जिता दिया जितनी कि उनको भी उम्मीद नहीं रही होगी। सिवनी क्षेत्र के मतदाताओं ने यह सोच कर वोट दिया था कि इधर मुनमुन जीते और उधर वे अपने पैसे से फोर लेन और बड़ी रेल लाइन का काम प्रारंभ करा देंगें। लेकिन जनता को निराशा ही हाथ लगी। कोई भी जीतता तो शायद वो भी यहीं से प्रयास चालू करता जहां से मुनमुन ने चालू किये है। मुनमुन ने नवम्बर में चुनाव जीतने के बाद 1 फरवरी को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दौरान इन मांगों को उठाया और फिर 10 फरवरी को दिल्ली में शिवराज के साथ वन एवं पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोइली से भी मिले। इनके साथ जनमंच के वे अवशेष भी शामिल थे जिन्होंने शुरू से ही निर्वाचित जन प्रतिनिधियों पर निकम्मेपन का आरोप लगाते हुये उनसे परहेज करने की रणनीति अपना रखी थी। इसी यात्रा में मुनमुन रेलमंत्री से भी मिल लिये जबकि उन्हें इस बात की जानकारी थी कि 12 फरवरी को संसद में अनुपूरक रेल बजट पेश किया जाने वाला है। लेकिन इस सबके बाद भी मुनमुन इस बात में तो सफल हो गये कि वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के फोर लेन के लिये दिल्ली चले गये वरना वे तो पिछले पांच साल से सिवनी के प्रतिनिधिमंड़ल को दिल्ली ले जाने का वायदा करते रहें है। शिवराज ने फोर लेन जैसे ज्वलंत मुद्दे पर दिल्ली यात्रा में सिवनी के भाजपा प्रत्याशी और जिला भाजपाध्यक्ष नरेश दिवाकर से क्यों परहेज किया?जिले के किसी भी भाजपा नेता चाहे वे विधायक कमल मर्सकोले हों,या डॉ. ढ़ालसिंह बिसेन हों या नीता पटेरिया हों या फिर शशि ठाकुर के बजाय निर्दलीय विधायक मुनमुन राय को अपने साथ ले जाना क्यों पसंद किया?इसे लेकर सियासी हल्कों में तरह तरह की चर्चायें हो रहीं है। 
नीता पटेरिया बनी बालाघाट लोस क्षेत्र की प्रभारी-जिले की जनपद सदस्य,जिला पंचायत सदस्य,सांसद और विधायक रहीं भाजपा नेत्री नीता पटेरिया को बालाघाट संसदीय क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है। नीता समर्थक इसे उनकी उपलब्धि मान रहें है। विधायक रहते हुये उनकी टिकिट काट कर पूर्व विधायक नरेश दिवाकर को दी गयी थी। लेकिन इस चुनाव में पांच बार से जीतने वाली भाजपा की हालत पतली हो गयी और यहां से निर्दलीय मुनमुन राय ने उसे 22 हजार वोटों से हरा दिया। भाजपा की इस करारी हार के बाद नीता की इस नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह भी तय किया गया है कि  लोस चुनावों के लिये भाजपा ने जिन नेताओं को प्रभारी बनाया है उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकिट नहीं दी जायेगी। कुछ विश्लेषकों का ऐसा मानना है कि इस तरह प्रदेश नेतृत्व ने नीता को बालाघाट संसदीय क्षेत्र से टिकिट की दौड़ से बाहर कर दिया है। अब देखना यह है कि बहनों के भाई और भांजियों के मामा शिवराज नीता पटेरिया का क्या राजनैतिक उपयोग करना पसंद करेंगें? 
कांग्रेस में टिकिट को लेकर उत्सुकता नही -लोकसभा चुनाव की टिकिट को लेकर जिले के कांग्रेसी हल्कों में कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। वैसे भी परिसीमन में सिवनी संसदीय क्षेत्र समाप्त होने तथा जिले के चारों विस क्षेत्र भी एक ही लोस क्षेत्र में ना रहने से जिले का राजनैतिक महत्व ही समाप्त हो गया है। उल्लेखनीय है परिसीमन में जिले की बरघाट और सिवनी सीट बालाघाट लोस में तथा केवलारी और लखनादौन सीट मंड़ला (अजा) लोस में शामिल कर दिये गये है। दोनों ही क्षेत्रों 6 विस क्षेत्र अन्य जिलों के है। इसलिये जिले के कांग्रेसी हल्कों में अभी तक टिकिट को लेकर कोई गंभीर चर्चा तक नहीं हो रही है तथा ना ही दोनों क्षेत्रों के कांग्रेस की टिकिट चाहने वाले नेताओं ने ही अपनी कोई सक्रियता इस जिले में दिखायी है।पिछले चुनाव में मंड़ला से कांग्रेस के बसोरी सिंह मसराम सांसद है जिन्होंने भाजपा के दिग्गज फग्गन सिंह कुलस्ते को हराया था और बालाघाट से भाजपा के के.डी.देशमुख ने कांग्रेस के विश्वेश्वर भगत को चुनाव हराया था। लेकिन सांसद के.डी.देशमुख अब भाजपा से कटंगी क्षेत्र के विधायक बन गये है। इसलिये दोनों ही पार्टियों से नये उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चा है। इन दिनो जारी चर्चाओं के अनुसार कांग्रेस से लांजी की युवा विधायक हिना कावरे और परसवाड़ा के विधायक मधु भगत का नाम संभावित उम्मीदवारों के रूप में लिया जा रहा है। ऐसी भी चर्चायें हैं कि मंड़ला से भी कांग्रेस किसी नये प्रत्याशी पर दांव खेल सकती है। अब यह तो वक्त आने पर ही स्पष्ट हो पायेगा कि कांग्रेस किसको अपना प्रत्याश बनाती है।“मुसाफिर” 
साप्ताहिक दर्पण झूठ ना बोले सिवनी
18 फरवरी 2014 से साभार 

Friday, January 24, 2014

नरेश-राजेश के रूप में भाजपायी गुटबंदी ना केवल सड़क पर आ गयी है वरन नगर खामियाजा भी भुगतेगा
अपने आप को अनुशासित पार्टी कहने वाली भाजपा का अनुशासन तार तार हो गया है। भाजपा की गुटीय लड़ाई विस चुनाव के बाद सड़कों पर दिखायी देने लगी है। सिवनी विस से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने वाले जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर और मतदान के दिन भाजपा से निलंबित किये गये पालिका अध्यक्ष के बीच चल रही खींचतान खुले आम सड़कों पर दिखायी देने लगी है। अब तो भाजपा की आपसी गुटबंदी नगर विकास में खुलेआम बाधक बनती भी दिखने लगी है।  हार की समीक्षा करने के लिये या कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा करने के लिये अभी तक ना तो प्रदेश कांग्रेस ने कोई बैठक की और ना ही जिला कांग्रेस ने। कुछ ही महीने बाद होने वाले लोस चुनाव के लिये ऐसे हालात में कांग्रेस अपने आप को तैयार करेगी? कांग्रेस में यदि भीतर घात करने और समय समय पर धोखा देने वालों को पुरुस्कृत करने का सिलसिला यदि ऐसे जारी रहा तो भला राहुल गांधी प्रदेश में कांग्रेस को कैसे मजबूत कर पायेंगें? इन दिनों देश में आम आदमी पार्टी का आकर्षण बना हुआ है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल के चर्चे हर जगह हो रहे है। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का माना है कि चूंकि आप का प्रभाव शहरी क्षेत्रों और युवाओं में अधिक दिखायी देता है तो वह भाजपा को नुकसान पहुंचायेगी तो वहीं दूसरी ओर इसके विपरीत यह भी दावा किया जा रहा है कि धर्मनिरपेक्ष वोटों में आप जो सेंध लगयोगी उससे कांग्रेस पर भी असर पड़ेगा। 
सड़कों पर आयी भाजपा की गुटबाजी विकास में बनी बाधक-अपने आप को अनुशासित पार्टी कहने वाली भाजपा का अनुशासन तार तार हो गया है। भाजपा की गुटीय लड़ाई विस चुनाव के बाद सड़कों पर दिखायी देने लगी है। सिवनी विस से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने वाले जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर और मतदान के दिन भाजपा से निलंबित किये गये पालिका अध्यक्ष के बीच चल रही खींचतान खुले आम सड़कों पर दिखायी देने लगी है। बीते दिनों नगर पालिका की सामान्य सभा की बैठक से भाजपा पार्षदों का बहिष्कार फिर खाना खाते एक पत्रकार द्वारा खीचीं गयी फोटो को भाजपा नेताओं द्वारा जबरन डीलिट कराने का मामला अखबारों में सुर्खियों में छाया रहा।परिषद की बैठक से बहिष्कार करने वाले कुछ पार्षदों ने ही यह बयान देकर चौंका दिया कि उन्हें जिला भाजपा अध्यक्ष नरेश दिवाकर ने ही बैठक में नहीं आने दिया। भाजपा नेताओं की ही यह मांग भी अखबारों में प्रकाशित हुयी कि जिला भाजपा अध्यक्ष के पद से त्यागपत्र दे चुके नरेश दिवाकर का स्तीफा मंजूर किया जाये और पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी का निलंबन निरस्त किया जाये। सिवनी विस से दो बार विधायक रह चुके दिवाकर और उनके समर्थकों का ऐसा मानना है कि पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी नें भीतरघात किया है। इसी के चलते विवाद जारी है। लेकिन पालिका की बैठक से जिसमें नगर विकास के कई मामलों पर चर्चा होनी थी उस बैठक से भाजपा पार्षदों का बहिष्कार समझ से परे है। यदि भाजपा पार्षदों या जिला भाजपा अध्यक्ष को किसी मामले में आपत्ति थी तो उसे बैठक में जाकर उठाया जा सकता है। क्या दिवाकर यह नहीं जानते थे कि उनके ऐसा करने के बाद भी पालिका में ना केवल कोरम पूरा हो जायेंगा वरन प्रस्ताव पास भी हो जायेंगें। वैसे भी प्रदेश में भाजपा की सरकार और नगर पालिका रहते हुये भी शहर को भाजपा की गुटबाजी का बहुत खामियाजा उठाना पड़ा है। यदि जिले के शीर्ष भाजपा नेताओं की पालिका अध्यक्ष से नहीं पटती है तो बजाय शहर के विकास में अडंगा डालने के काम्पोटीशन में पालिका अध्यक्ष से बड़ी उपलब्धि शहर को दिलाते तो जनता दोनों की जय जयकार करती। लेकिन अफसोस की ऐसा नहीं हो सका और आज भी शहर विकास के कई ऐसे प्रस्ताव प्रदेश में इसी खींचतान के चलते लंबित पड़े है जो कि मील के पत्थर साबित हो सकते है। अब तो भाजपा की आपसी गुटबंदी नगर विकास में खुलेआम        बाधक बनती भी दिखने लगी है।
हार के सदमे से राहुल कैसे उबारेंगंे प्रदेश में कांग्रेस को?-विधानसभा चुनावों में कांग्रेस शर्मनाक हार के सदमे से अभी तक उबर नहीं पायी है। हार की समीक्षा करने के लिये या कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा करने के लिये अभी तक ना तो प्रदेश कांग्रेस ने कोई बैठक की और ना ही जिला कांग्रेस ने। कुछ ही महीने बाद होने वाले लोस चुनाव के लिये ऐसे हालात में कांग्रेस अपने आप को तैयार करेगी? हालांकि प्रदेश कांग्रेस कें अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया का स्तीफा मंजूर करके कांग्रेस ने प्रदेश के युवा सांसद और टीम राहुल के सदस्य अरुण यादव को नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले दिनों भोपाल का दौरा किया। उन्होंने देश भर से आयी महिला प्रतिनिधियों से कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल किये जाने वाले मुूद्दों पर चर्चा कर जानकारी ली है। इसके अलावा राहुल गांधी ने प्रदेश भर के जिला कांग्रेस,ब्लाक कांग्रेस अध्यक्षों,प्रदेश प्रतिनिधयों और 2013 के विस चुनाव के जीते और हारे प्रत्याशियों से भी चर्चा कर हार के कारणों को जानने की कोशिश की है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस की हालत सुधारने के लिये हार के कारणों को जानना भी जरूरी नहीं है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि हार के जो भी कारण है उनका निदान किया जाये और कांग्रेस को हराने वाले कांग्रेसियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाये। लेकिन आने वाले लोस चुनावों को देखते हुये ऐसा लगता नहीं है कि ऐसा कुछ हो पायेगा। लोकसभा चुनाव जीतने के लिये यह भी जरूरी है कि प्रदेश के हर लोस क्षेत्र के उन प्रमुख मुद्दों और विकास कार्यें को प्राथमिकता के आधार पर विचार कर पूरा करें जिसके लिये जन मानस में कांग्रेस के खिलाफ जनाक्रोश है। कांग्रेस में यदि भीतर घात करने और समय समय पर धोखा देने वालों को पुरुस्कृत करने का सिलसिला यदि ऐसे जारी रहा तो भला राहुल गांधी प्रदेश में कांग्रेस को कैसे मजबूत कर पायेंगें? यह एक      शोध का विषय बना हुआ है।
किसे नुकसान पहुचायेगी आप?-इन दिनों देश में आम आदमी पार्टी का आकर्षण बना हुआ है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल के चर्चे हर जगह हो रहे है। हालांकि उनके सरकार चलाने के तरीके और उनके मंत्रियों के कारनामे भी सियासी हल्कों में चर्चित है। लेकिन इसके पक्ष और विपक्ष में अलग अलग तर्क दिये जा रहें है।जिले में भी आप की सदस्यता का अभियान चल रहा है। उनका दावा है कि जिले में तकरीबन दस हजार सदस्य बन चुके है। अब इस बात के कयास लगाये जा रहें हैं कि जिले की दोनों लोकसभा सीटों याने मंड़ला और बालाघाट से आप पार्टी चुनाव लड़ेगी या नहीं? और यदि लड़ेगी तो कांग्रेस या भाजपा किसके वोटों में सेंध लगायेगी?कुछ राजनैतिक विश्लेषकों का माना है कि चूंकि आप का प्रभाव शहरी क्षेत्रों और युवाओं में अधिक दिखायी देता है तो वह भाजपा को नुकसान पहुंचायेगी तो वहीं दूसरी ओर इसके विपरीत यह भी दावा किया जा रहा है कि धर्मनिरपेक्ष वोटों में आप जो सेंध लगयोगी उससे कांग्रेस पर भी असर पड़ेगा। अभी यह कहना मुश्किल है कि आप भाजपा और कांग्रेस के कितने प्रतिशत मतों पर असर करेगी?एक संभावना यह भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं ऐसा ना हो जाये कि आप दोनों ही पार्टियों के मतों में बराबरी की सेंध लगाकर चुनावी राजनैतिक समीकरण को प्रभावित ही ना करें। वैसे तो लोस चुनाव के मुद्दे अलग होते है लेकिन दस साल से केन्द्र में सरकार चलाने वाली कांग्रेस को विपक्ष कई मामलों में कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहा है। वहीं दूसरी ओर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी सांप्रदायिक छवि और बड़बोलापन भी चुनावी मुद्दा बन सकता है। समस्याओं को गिनाना एक अलग बात होती है लेकिन जो अपने आप को विकल्प के रूप में देश के सामने रख रहा है यदि वह उनका निदान ना बताये तो कोई महत्व नहीं होता। रहा सवाल आप पार्टी का तो उसका राष्ट्रीय स्वरूप अभी नहीं है लेकिन इन चंद महीनों में वह कितना कुछ कर पायेगी?उसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी।“मुसाफिर“   
दर्पण झूठ ना बोले, सिवनी
21 से 27 जनवरी 2014 से साभार      

Thursday, January 23, 2014

26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेष
प्रलोभन में निर्णय लेता रहेगा जन तो कैसे मजबूत होगा जनतंत्र? 
आज हम गणतंत्र दिवस की 64 वीं सालगिरह मनाने जा रहें है। इन वर्षों में हमारा प्रजातंत्र कितना मजबूत हुआ और क्या खामियां विकसित हुयीं? इन पर विचार करना आवश्यक है। देश में मतदान की भागीदारी बढ़ना एक शुभ लक्षण है। लेकिन एक बात और देखी जा रही है कि चाहे राजनैतिक दल हों या फिर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने वाले हों वे अपनी नीतियों और सिद्धान्तों के स्थान पर मतदाताओं को प्रलोभन देते हुये कुछ भी वायदे करके वोट बटोर कर जीतने की कवायत में जुटे देखे जा सकते है। कहीं जातिवाद का प्रलोभन रहता है तो कहीं समाज के विभिन्न वर्गों को मुफ्त में सुविधायें उपलब्ध कराने का प्रलोभन दिया जाता है। कहीं कहीं तो ऐसा भी होंता है कि ना पूरे हो सकने वाले वायदे भी नेता कर देते है और वोट बटोर कर जीत हासिल कर लेते है। बाद में भले ही आम मतदाता अपने आप को ढ़गा हुआ महसूस करता रहें।
राजनैतिक दल और राजनेता तो चुनाव जीतने के लिये यह सब करते हों लेकिन इन 64 सालों में जन भी अपने मताधिकार का प्रयोग किसी ना किसी प्रलोभन में आकर कर लेता है और बाद में हाथ मलते रह जाता हैै। देश और आने वाली सरकार हमें क्या देगी? इस पर तो सभी विचार करते है लेकिन क्या जन को आज यह नहीं सोचना चाहिये कि हम देश को क्या दे रहें हैं? प्रजातंत्र में हमें एक वोट देने का जो अधिकार मिला है उसका भी यदि हम प्रलोभन में दुरुपयोग करने लगें तो भला प्रजातंत्र कैसे मजबूत होगा और गणतंत्र कैसे सफल होगा?
देश के कमजोर वर्ग के लिये योजनायें बनाना और सुविधायें देकर उन्हें सबके साथ चलने का मौका देना आज समय की मांग है फिर चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों ना हो। लेकिन वोटों की खातिर धर्म और जाति के नाम पर प्रचार करना और देश को बांटने की कोशिश करना किसी भी रूप में सही नहीं कही जा सकती है।
सरकार के पास अपना कुछ नहीं होता जो कुछ होता है वह जन से वसूले जाने वाले टेक्स का पैसा ही होता है। यदि सरकार जन को प्रलोभन देने वाली मदों पर अधिक राशि खर्च करेगी तो फिर उससे बेहतर विकास और अच्छी अनिवार्य सेवाओं की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। सरकार का मुख्य कार्य देश के आधारभूत विकास का होता है। यदि सरकार से यह अपेक्षा रखना है तो जन को यह तय करना पड़ेगा कि वह किसी प्रलोभन में आकर अपना निर्णय नहीं लेगा तभी यह संभव है वरना राजनैतिक दल और राजनेता तो जीतने के लिये यही करते रहेंगें जो आज तक कर रहें है। इसीलिये आज हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम प्रलोभन में आकर निर्णय नहीं लेंगें और गणतंत्र को मजबूत बनायेंगें, यही गणतंत्र दिवस पर हमारी हार्दिक शुभकामनायें हैं।
आशुतोष वर्मा,
16 शास्त्री वार्ड,सिवनी म.प्र. 480551
मो 09425174640