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Tuesday, May 15, 2012


गेहूं खरीदी केन्द्रों का दौरा स्थगित कर आखिर क्यों दिल्ली गये हरवंश?
सिवनी । जिले के इकलौते इंका विधायक एवं विस उपाध्यक्ष ठा. हरवंश द्वारा गेहूं खरीदी केन्द्रों के दौरे के घोषित कार्यक्रम को छोड़ कर अचानक दिल्ली जाने से राजनैतिक हल्कों में तरह तरह की चर्चायें जारी हो गयीं हैं। नेता प्रतिपक्ष एवं प्रदेश इंकाध्यक्ष से सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद हरवंश के दिल्ली दौरे को लेकर कयासबाजी शुरू हो गयी हैं। इंकाइयों की ही चर्चा के अनुसार कुछ का मानना हैं कि वे अपनी सफाई देकर विस उपाध्यक्ष पद बचाने गये हैं तो दूसरी तरफ कुछ इंका नेता इससे इंकार करते हुये सन 2012 में उड़ीसा के राज्यपाल और दिल्ली के उप राज्यपाल की होने वाली नियुक्ति से जोड़ कर इस यात्रा को देख रहें हैं।
उल्लेखनीय हैं कि इसी महीने के पहले सप्ताह में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लंबी मुलाकात कर उन्हें प्रदेश के राजनैतिक हालात से अवगत कराया तथा प्रदेश में चल रही कांग्रेस की गतिविधियों की भी जानकारी दी थी।
इसके तत्काल बाद ही अपने विस क्षेत्र केवलारी सहित अन्य गेहूं खरीदी केन्द्रों के अपने घाोषित दौरे को रद्द कर हरवंश सिंह अचानक पहले भोपाल और फिर वहां से प्लेन से दिल्ली कूच कर गये। उनकी अचानक हुयी इस यात्रा को लेकर तरह तरह की चर्चायें जारी हैं। 
राजनैतिक क्षेत्रों में व्याप्त चर्चा के अनुसार यह माना जा रहा हैं कांग्रेस अध्यक्ष से हुयी प्रदेश के नेताओं की हुयी मुलाकात के बाद हरवंश सिंह सफाई देकर अपना विस उपाध्यक्ष पद बचाने की जुगाड़ में गयें हैं। लोक लेखा समिति से  महेन्द्र सिंह की बिदायी के बाद विस उपाध्यक्ष पद पर किसी ओ.बी.सी. के विधायक को बैठाने की चर्चा चल पड़ी हैं। प्रदेश से राज्यसभा में ब्राम्हण और राज्पाल के पद पर मुस्लिम नेता की ताजपोशी के बाद विस उपाध्यक्ष पद पर पिछड़े वर्ग के विधायक को बिठाना उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद जरूरी माना जा रहा हैं।
दूसरी तरफ हरवंश समर्थक इंका नेताओं का दावा हैं कि ऐसा कुछ नहीं है वरन 2012 में दिल्ली के उप राज्यपाल  एवं उड़ीसा के राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त होने जा रहा हैं। प्रदेश से हाल ही में राज्यपाल के रूप में अजीज कुरैशी की नियुक्ति और केन्द्र में ठाकुर नेता के रूप में स्थापित दिग्गी राजा के यू.पी.चुनाव के बाद के हालातों को देखते हुये हरवंश सिंह राज्यपाल पद की जुगाड़ बिठाने में लगे हैं।अब इसमें सच्चायी क्या हैं? यह तो समय आने पर ही पता चलेगा।    
       




क्या नरेश की लालबत्ती खतरे में पड़ते देख जिला भाजपा ने अपना फोर लेन का आंदोलन समाप्त कर दिया?
फोर लेन फोर लेन के भाजपायी खेल का बहुत ही नाटकीय समापन हुआ। पहले दिन कमल और नरेश के साथ अध्यक्ष सुजीत जैन के अलावा विधायक द्वय नीता पटेरिया और शशि ठाकुर सहित नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी शामिल हुये। लेकिन अचानक ही ऐसा कुछ हुआ कि आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी गयी। बताया गया कि प्राधिकरण के एक प्रतिनिधि ने, जिसके नाम तक का खुलासा नहीं किया गया,सूचित किया कि काम चालू हो गया हैं इसलिये आंदोलन समाप्त कर दिया गया। चर्चा है कि नरेश ने जा पद छोड़ने की घोषणा की थी आमरण अनशन में बैठने पर वह पद वास्तव में खतरे में पड़ जाता इसलिये येन केन प्रकारेण आंदोलन समाप्त कराया गया। पिछले कई सालों से हर साल लोक कल्याण शिविर का आयोजन किया जा रहा हैं। वास्तव में जिले आम आदमी इस उम्मीद से इन शिवरों में आते थे कि उनकी समस्याओं का मौके पर ही निपटारा हो जायेगा।इन शिवरों में समस्यायें सुलझती ही नहीं हैं तो धीरे धीरे लोगों का रुझान कम होते गया और लोगों ने इन शिवरों में आना बंद कर दिया।लेकिन भाजपा नेता इसके कारण तलाश कर निदान करने के बजाय यह कहने से कोई परहेज नहीं कर रहें हैं अब जब समस्यायें ही नहीं बचीं तो भला लोग आयेंगें क्यो?  
बहुत ही नाटकीय और चौंकाने वाला रहा भाजपा का रवैया-फोर लेन फोर लेन के भाजपायी खेल का बहुत ही नाटकीय समापन हुआ। बरघाट विस क्षेत्र केभाजपा विधायक कमल मर्सकोले ने खस्ताहाल सड़क की मरम्मत के लिये पहले क्रमिक और फिर 7 मई से आमरण अनशन की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद मविप्रा के कबीना मंत्री का दर्जा प्राप्त पूर्व विधायक नरेश दिवाकर ने अनशन में साथ देने की घोषणा के साथ ही एक कदम आगे बढ़कर जरूरत पड़ने पर पद छोड़ने तक की घोषणा कर दी थी। जिला भाजपा अध्यक्ष सुजीत जैन ने भी समूची भाजपा के साथ होने की घोषणा कर दी थी। पूरे ताम झाम से अनशन की शुरुआत भी हुयी। पहले दिन कमल और नरेश के साथ अध्यक्ष सुजीत जैन के अलावा विधायक द्वय नीता पटेरिया और शशि ठाकुर सहित नपा अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी भी शामिल हुये। पहले ही दिन एन.एच.ए.आई के अधिकारी ने लिखित में ठेके की मंजूरी की सूचना देकर अनशन ना करने की गुहार लगायी थी। लेकिन क्रमिकभूख हड़ताल चालू रखी गयी। 5 मई को प्रोजेक्ट डायरेक्टर सिंधई,मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर और जिला भाजपा के अध्यक्ष सुजीत जैन की उपस्थिति में भी आमरण अनशन स्थगित करने की मांग ठुकरा दी गयी थी। अगले दिन विधायक कमल मर्सकोले पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अनशन पर बैठ गये थे और अगले दिन से उनके साथ ही पूर्व घोषणा के अनुसार केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त नरेश दिवाकर को भी आमरण अनशन पर बैठना था। लेकिन अचानक ही ऐसा कुछ हुआ कि आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी गयी। बताया गया कि प्राधिकरण के एक प्रतिनिधि ने, जिसके नाम तक का खुलासा नहीं किया गया,सूचित किया कि काम चालू हो गया हैं इसलिये आंदोलन समाप्त कर दिया गया। वरिष्ठ अधिकारियों के आग्रह को ठुकराने वाले भाजपा नेताओं को प्राधिकरण के किस प्रतिनिधि ने कान में ऐसा क्या फूंक दिया कि आंदोलन समाप्त कर दिया गया? यह यक्ष प्रश्न आज भी चर्चित हैं। 
लालबत्ती बनाम फोरलेन- राजनैतिक क्षेत्रों में यह भी चर्चा है कि यदि आमरण अनशन प्रारंभ हो जाता तो अपनी घोषणा के अनुसार मंत्री का दर्जा प्राप्त नरेश दिवाकर को भी आमरण अनशन पर बैठना पड़ता या फिर अपनी घोषणा से पीछे हटना पड़ता।इस संर्दभ में नगर के बुद्धिजीवी रवीन्द्रनाथ त्रिपाठी का बयशन बहुत ही रोचक और सही लगता हैं कि तीन लोगों नरेश,सिघई और सुजीत ने आदिवासी विधायक को छना पानी पिलाकर राजनैतिक मात दे दी। यह भी कहा जा रहा हैं कि जिस पद को जरूरत पड़ने पर छोड़ने की घोषणा नरेश दिवाकर ने की थी यदि वे आमरण अनशन पर बैठ जाते तो वह पद वास्तव में खतरे में पड़ सकता था। यदि नहीं बैठते तो राजनैतिक थू थू होना निश्चित था। इसीलिये येने केन प्रकारेण आंदलन को समाप्त करने का षडयंत्र किया जिससे ना केवल अपने क्षेत्र में कमल मर्सकोले की वरन पूरे जिले में भाजपा की स्थिति हास्यास्पद हो गयी क्योंकि सभी इस बात को जानते थे कि सड़क मरम्मत के लिये केन्द्र सरकार लगभग 17 करोड़ रुपये मंजूर कर चुकी हैं और उसके टेंड़र भी हो चुके हैं तथा अनुबंध होकर सिर्फ काम चालू होना ही शेष था। लोगों में यह भी चर्चा है कि बमुश्किल मिली लालबत्ती बचाने के लिये यह सब कुछ किया गया क्योंकि आज तक प्रदेश के इतिहास में शायद ऐसा कोई उदाहरण नहीं हैं कि कोई मंत्री या मंत्री का दर्जा प्राप्त कोई नेता आमरण अनशन में बैठा हो। लोग यह भी सवाल उठा रहें हैं कि क्या नरेश की लालबत्ती खतरे में पड़ते देख जिला भाजपा ने अपना फोर लेन का आंदोलन समाप्त कर दिया?
समस्यायें ही नहीं तो लोग शिविर में आयेंगें क्यों?- आम आदमियों की समस्याओं को सुलझाने के लिये प्रदेश सरकार जिला स्तर पर लोक कल्याण शिवरों का आयोजन करती हैं। पिछले कई सालों से हर साल यह आयोजन किया जा रहा हैं। कई बार कई जिलों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इन शिवरों में शामिल हुये हैं। एक समय था जब जिले भर से भारी संख्या में लोग इन शिवरों में आते थे और समूचा वातावरण एक मेले के जैसा हो जाता था। लेकिन धीरे धीरे हालात बिगड़ते गये और अब आम आदमियों की उपस्थिति इन आयोजनों में ना के बराबर रहने लगी।हाल ही में जिला स्तरीय लोक कल्याण शिविर गोपालगंज में आयोजित किया गया। इसके मुख्य अतिथि सिवनी के पूर्व विधायक और मविप्रा के अध्यक्ष नरेश दिवाकर थे जबकि अध्यक्षता सिवनी की विधायक एवं महिला मोर्चे की अध्यक्ष नीता पटेरिया थीं। अखबारों में प्रकाशित समाचारों से इस बात का खुलासा हुआ कि इस शिविर में ना के बराबर लोग शामिल हुये। कम उपस्थिति पर अतिथियों की यह टीप भी समाचार पत्र में प्रकाशित हुयी कि अब लोगों की समस्यायें ही नहीं रह गयीं हैं इसलिये लोग कम आते हैं।भाजपा के इन वरिष्ठ नेताओं की इस टिप्पणी से शायद ही कोई इत्फाक रखता होगा। वास्तव में जिले आम आदमी इस उम्मीद से इन शिवरों में आते थे कि उनकी समस्याओं का मौके पर ही निपटारा हो जायेगा। लेकिन लोगों ने जब देखा कि इन शिवरों में समस्यायें सुलझती ही नहीं हैं तो धीरे धीरे लोगों का रुझान कम होते गया और लोगों ने आना बंद कर दिया। आम तौर पर यह देखा जा रहा था कि लगभग सभी विभाग मौके पर समस्यायें निपटाने के बजाय अगली तारीख देकर उसे डिस्पोज्ड मान लेते थे। सरकार और प्रशासन के इस रवैरूये से परेशान होकर लोगों ने आना बंद कर दिया लेकिन भाजपा नेता इसके कारण तलाश कर निदान करने के बजाय यह कहने से कोई परहेज नहीं कर रहें हैं अब जब समस्यायें ही नहीं बचीं तो भला लोग आयेंगें क्यो? प्रदेश के जिम्मेदार भाजपा नेताओं की ऐसी टिप्पणी के बाद तो अब सुधार की कोई संभावना भी शेष नहीं रह गयी हैं।
और अंत में- भाजपा के फोर लेन आंदोलन के बाद कांग्रेस के मुंगवानी रोड़ के आंदोलन के बारे में भी लोग यही चर्चा कर रहें हैं कि कांग्रेस भी उनसे पीछे नहीं रहना चाहती हैं। मुंगवानी रोड़ के धुर्रे भी लगभग तीन साल से उड़ चुके थे। लेकिन इसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा था।हालांकि यह बात भी सही है कि पुरोने ठेकेदार को ब्लेक लिस्टेड कर दिया गया था और नया टेंड़र भी हो गया था। परंतु ठेकेदार काम ही चालू ही नहीं कर रहा था। कांग्रेस ने इस दिशा में पहल की और आंदोलन की शुरुआत कर दी थी। काम चालू हो जाने के बाद ही कांग्रेस का यह आंदोलन समाप्त हुआ। लेकिन अभी भी इस बात की जरूरतम महसूस की जा रही हैं कि ठेकेदार लगातार तेजी से काम चालू रखे और कहीं ऐसा ना हो जाये कि आंदोलन समाप्त हो जाने के बाद ठेकेदार और विभाग फिर कुंभकरणीय नींद में सो जाये। “मुसाफिर“      
साप. दर्पण झूठ ना बोले ख् सिवनी से साभार

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