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Monday, July 30, 2012


जनभावनाओं पर हमेशा भारी पड़े षड़यंत्रकारी
षड़यंत्रों में बराबरी की भागीदारी रही हैं इंका भाजपा नेताओं की
बीते कई सालों से जिले की जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वाले षड़यंत्रकारी ही भारी साबित होते रहें हैं। फिर चाहे वो लोकसभा का परिसीमन में विलोपन का मामला हो, या जिले की बड़ी रेल लाइन का मामला हो या फिर फोर लेन का या संभाग बनाने का। इन षड़यंत्रकारियों में कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की बराबरी की भागीदारी और नूरा कुश्ती भी जिम्मेदार रही हैं। जिससे जिले में विकास के पहिये थम से गये है।   
जिले के पिछड़ेपन का रोना तो हर नेता और राजनैतिक दल रोता है और उसे दूर करने का दावा भी करता हैं। लेकिन जब किसी भी नेता तो व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ आड़े आता हैं तो जिले का हित तो छोड़ो अपनी पार्टी के हितों की भी बलि चढ़ाने संकोच नहीं करता हैं।
पिछले कई सालों में जिले को कुछ मिला तो नहीं हैं लेकिन छिन जरूर गया हैं।सन 1977 से अस्तित्व में आने वाली सिवनी लोकसभा क्षेत्र परिसीमन में समाप्त कर दी गयी। यह एक शाश्वत सत्य है कि कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेताओं के राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये एक नूरा कु श्ती खेली गयी और क्षेत्र समाप्त हो जाने के बाद दोनों ही दलों के नेताओं ने उक दूसरे को दोषी बताया और मामला खत्म हो गया।
ठीक इसी तरह जिले को बड़ी रेल लाइन से जोड़ने के लिये जब जब भी जन भावनायें सामने आयीं हैं तब जिले के राजनैतिक शिखर बैठे हुये नेताओं ने कहीं आपसी गुटबंदी तो कभी राजनैतिक प्रतिद्वंदता के चलते सहयोग करना तो दूर अड़गें तक डालने से कोई परहेज नहीं किया। यह कारनामा केन्द्र में राजग और संप्रग दोनो ही सरकारों के कार्यकाल में हुआ और परिणाम आज सामने हैं।
इसी तरह जिले को भौगोलिक स्थिति के कारण उत्तर दक्षिण गलियारे के तहत फोर लेन सड़क की सौगात मिली। यह सौगात जिले को किसी के राजनैतिक प्रयासों से नहीं मिली थी। लेकिन अपने अपने आकाओं को खुश करने के लिये जिले के कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने ऐसे पेंच डाल कि मामला आज भी खटायी में पड़ा हुआ हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी उसके निर्देशानुसार प्रस्ताव बनाने का काम अभी तक राज्य और केन्द्र सरकार पूरा नहीं कर पायीं हैं। 
इसी तरह भौगोलि रूप से छिंदवाड़ा,सिवनी और बालाघाट जिले को मिलाकर बनाये जाने वाले नये संभाग का मुख्यालय सिवनी में होना चाहिये था लेकिन वह भी जिले को नसीब नहीं हुआ। चुनावी समीकरणों को देखते हुये प्रदेश के मुख्यमंत्री मामले का निपटारा करने के बजाय उसे लंबित रखना बेहतर समझा और मामला आज तक लंबित हैं। 
इन सभी मुद्दों पर जिले की जनता ने अपनी भावनाओं को अपने तरीक से व्यक्त  भी किया। समय समय पर विभिन्न आंदोलनों के जरिये जिले के हक की मांग भी गयी। विशेषकर परिसीमन और फोर लेन के मामले में ऐतिहासिक जनांदोलन भी हुये जनता ने खुलकर सड़क पर आकर अपनी भावनायें भी प्रगट की थीं। लेकिन अपने आप को जनता का प्रतिनिधि बताने वाले और भाजपा और कांग्रेस के षड़यंत्रकारी नेता हमेशा ही जनभावनाओं पर भारी पड़े। इसीलिये आज जिले में विकास के पहिये थम गये हैं। 

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