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Wednesday, July 21, 2010

शिवराज के बयान से उपजा सवाल
क्या माफिया या पैसे के बल पर भाजपा में मुख्यमन्त्री बनते या बदलते हैं?
मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा शिवपुरी जिले के कोटानाका गांव में दिये गये बयान से उठा राजनैतिक तूफान थमने का नाम ही नहीं ले रहा हैं। मुख्यमन्त्री का बयान भी आइने के माकिफ था जिसमें उनकी पीड़ा साफ साफ दिखायी दे रही थी। प्रदेश का प्रमुख विपक्षी दल इस सदन में चर्चा कराना चाहता है जिसे लेकर सदन की कार्यवाही चल ही नहीं सकी। मुख्यमन्त्री ने अपने बयान में यह कहा था कि कुछ लोग उनको हटाने की कोशिश कर रहें हैं और भू माफिया इसके लिये धन एकत्रित कर रहा हैं। हालांकि उन्होंने पूछने पर यह खुलासा नहीं किया कि ऐसे लोग कौन हैं र्षोर्षोक्या राजनैतिक शक्तियां हैं या कोई अन्यर्षोर्षो प्रदेश की सरकार के मुखिया के ऐसे बयान से पूरे सूबे की सियासत में तूफान आ गया हैं। सत्ता दल और विपक्ष में इस बयान के अर्थ तलाशे जा रहे हैं।
वैसे तो यदि देखा जाये तो मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह की छवि विवादास्पद बयान देने वाले नेता की नहीं रही हैं। उनकी छवि ऐसी भी नहीं हैं कि जबान फिसलने से कोई गलत बयानी हो गई हो। शिवराज का एक बयान और विवादास्पद हुआ था जो उन्होंने सतना में दिया था। उन्होंने औद्योगिक विकास को लेकर कहा था कि मध्यप्रदेश इसमें भी अग्रणी रहेगा लेकिन इनमें बिहारियों को नहीं घुसने दिया जायेगा। अपने मध्यप्रदेश के लोगों को ही रोजगार दिलाया जायेगा। इस बयान पर भी काफी तूफान मचा था और कुछ लोगों ने तो यह भी मान लिया था कि जबान फिसनले से ऐसा हो गया होगा। लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना था कि उन्होंने जानबूझ ऐसा बयान दिया हैं क्योंकि वे मुख्यमन्त्री की कुर्सी छोड़कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे। इस बयान पर बिहार की तीखी प्रतिक्रिया के बाद अध्यक्ष पद की दौड़ से उनका नाम ही बाहर हो गया था। उनकी ऐसी कार्यप्रणाली को भाजपा में भी कई नेता समझते हैं। तभी तो भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमन्त्री सुन्दरलाल पटवा ने कहा हैं कि शिवराज ने जो कुछ कहा है सोच समझ कर कहा होगा।
मानसून सत्र की पूर्व संध्या पर शिवराज सिंह द्वारा दिये गये इस बयान ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। पहला और अहम सवाल तो यही हैं कि क्या भाजपा या संघ में मुख्यमन्त्री बनाने और हटाने के लिये पैसे चलने लगे हैं?यदि पैसे चलने लगे हैं तो पैसे ले कौन रहा हैं? क्या शिवराज सिंह खुद भी इसी तरीके से मुख्यमन्त्री बने थे? क्या भाजपा या संध के राजनैतिक निर्णय राजनैतिक कारणों के बजाय भू माफिया या खनन माफिया के प्रभाव में लिये जाते हैं? क्या मुख्यमन्त्री खुद को अपनी ही सरकार में असुरक्षित महसूस कर रहें हैं? क्या मुख्यमन्त्री ने दागियों कें लामबन्द होने और उमा भारती की वापसी की चर्चा से ध्यान हटाने के लिये जानबूझ कर ऐसा बयान दिया हैं और पार्टी में अपने विरोधियों को पैसे के खेल और माफिया के मेल के आरोपो के कठघरे में खड़ा कर दिया हैं?
अब इसमें सच्चायी क्या है? यह तो शिवराज सिंह ही जानते हैं। लेकिन एक बात जरूर हैं कि, Þअत्याचार ना भ्रष्टाचार, हम देगें अच्छी सरकारß का नारा बुलन्द करके सरकार में आने वाली भाजपा यदि आज खुद अपना मूल्यांकन करे तो वह उन कसौटियों पर खुद को खरा नही पायेगी जिन पर जनता का विश्वास हासिल किया था। आज दागी मन्त्री के नाम मन्त्रियों हटाने का सिलसिला भी भाजपा ने ही अपनी कार्यकारिणी की बैठक में लेकर शुरू किया था। इस अभियान की शुरुआत पूर्व प्रधानमन्त्री अटलबिहारी बाजपेयी जी के भांजे अनूप मिश्रा को मन्त्री मंड़ल से हटा कर की गई थी। इस कदम से अचानक ऐसा राजनैतिक सन्देश भाजपा में गया कि शिवराज बहुत ज्यादा ताकतवर हो गयें हें जो उन्होंने अटल जी के भांजे को हटवाने में सफलता पा ली हैं। फिर क्या था मन्त्री मंड़ल के बागियों ने भी लामबन्द होना चालू कर दिया और यह सवाल भी उछाल दिया कि लोकायुक्त जांच में डंपर कांड़ के दागी शिवराज भला दूसरे दागियो से कैसे स्तीफा मांग सकते हैंंर्षोर्षो दागी मन्त्रियों के समूह नें यह आवाज भी बुलन्द की है कि सिर्फ सरकार के ही क्यों संगठन के दागियों से भी स्तीफे लिये जायें। इस तरह प्रदेश भाजपा के संगठन और सत्ता के केन्द्र एकदम अलग अलग और विपरीत दो ध्रुवों पर खड़े नज़र आने लगे।तभी तो दागियों के खिलाफ कार्यवाही करने की दास्तान अनूप से चालू होकर अनूप पर ही खत्म हो गई हैं।
इसी बीच विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने भी सदन में सरकार को घेरने की घोषणा कर दी थी। इस सत्र में विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी निभाने वाले चौधरी राकेश सिंह ने भ्रष्टाचार और दागी मन्त्रियों को लेकर सरकार को घेरने की घोषणा पत्रकार वार्ता में कर दी थी। लेकिन कांग्रेस भी इस मामले में धर्म संकंट में पड़ गई हैं। कांग्रेस के सिवनी जिले के विधायक एवं विधानसभा के उपाध्यक्ष हरवंश सिंह एक जमीन घोटाले में कोर्ट के निर्देश पर दर्ज हुये एक धोखाधड़ी के मामले में अपने पुत्र सहित आरोपी बन गये हैं। हालांकि कोर्ट के दो बार निर्देश देने के बाद भी पुलिस ने हरवंश सिंह और उनके पुत्र के विरुद्ध मामला पंजीबद्ध नहीं किया था लेकिन तीसरे बार निर्देश मिलने पर मामला दर्ज कर जांच में ले लिया गया हैं। हरवंश सिंह का ऐसा मानना था कि 20 जुलाई को पेशी में अन्तिम प्रतिवेदन पेश हो जावेगा और वे आरोपों से बरी हो जावेंगें। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और कोर्ट में इस मामले की तारीख 19 अगस्त के लिये बढ़ गई हैे। इस तरह अब वषाZकालीन सत्र समाप्त होने के पहले इस मामले के समाप्त होने की गुजाइश खत्म हो गई हैं। वैसे भी डंपर कांड़ की जांच के लिये कांग्रेस आलाकमान के द्वारा गठित की गई जांच समिति के अध्यक्ष बनने के बाद से भाजपायी हल्कों में यह चर्चा भी यदा कदा सुनने को मिल जाती हैं कि मुख्यमन्त्री और हरवंश सिंह के बीच इन दिनों सब कुछ ठीक ठाक चल रहा हैं। तभी तो पिछले विशेष सत्र में कांग्रेस के बहिष्कार के निर्णय का ना केवल हरवंश सिंह ने साथ दिया वरन यह बयान भी दिया था कि पार्टी उनके लिये पहले हैं फिर विधानसभा उपाध्यक्ष का पद। इस पर काफी बबाल मचा था और प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा तो राज्यपाल का दरवाजा भी खटखटा आये थे। लेकिन ना तो मुख्यमन्त्री ने इस सम्बंध में कुछ किया और ना ही सदन में संसदीय कार्य मन्त्री के मामला उठाने बाद भी कोई व्यवस्था दी गई।
वैसे तो आजकल ऐसे अंर्तदलीय राजनैतिक समीकरण मिलना कोई नयी और आश्चर्य चकित कर देने वाली बात नहीं रह गई हैं जिनमें अपनी ही पार्टी के दलीय हितों की कुबाZनी देकर अपने स्वयं के हित साधे जाते हैं । इसकी निन्दा करने के बजाय आजकल राजनैतिक हल्कों में इसे एक अच्छा सा नाम दे दिया गया हैं और लोग बड़ी शान से कहते देखे जा सकते हैं कि फलां नेता का Þपोलिटिकल मेनेजमेंटß बहुत अच्छा हैं। विधानसभा का वषाZकालीन सत्र कैसे भी पूरा हो जाये या यह पूरा का पूरा मामला कैसे भी निपट जाये र्षोर्षोयह एक अलग बात होगी। लेकिन मुख्यमन्त्री के बयान से एक अहम सवाल तो सामने आ ही गया हैं कि शुचिता और संस्कार की बाते करने वाली भाजपा में क्या माफिया और पैसे के बल पर मुख्यमन्त्री बनते या बदलतें हैं र्षोर्षो
आशुतोष वर्मा
मो. 09425174640

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